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Sunday, March 28, 2010

कुरुक्षेत्र में संघ का मंथन आज
भास्कर न्यूज & कुर�
गोरक्षा, कश्मीर मुद्दा व राष्टï्रीय सुरक्षा के मुख्य मुद्दों पर चर्चा करने के लिए शुक्रवार सुबह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक का आगाज गीता निकेतन आवासीय विद्यालय के सभागार में हुआ। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित कर विधिवत रूप से इस कार्रवाई को अंजाम दिया। आने वाली 28 मार्च तक चलने वाली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व इससे संबंद्ध संगठनों की इस महत्वपूर्ण बैठक में 1400 प्रतिनिधि शिरकत कर रहे हैं। उदघाटन सत्र में संघ के सर कार्यवाहक सुरेश जोशी उर्फ भैय्या जी ने वार्षिक रिर्पोट पेश कर समाज के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण पेश करने वाले नेताओं को नमन किया। उन्होंने श्रेष्ठ कर्मयोगी नानाजी देसमुख, संघ के अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख रहे डा. श्रीपति शास्त्री, दक्षिण कर्नाटक के प्रांत संघ चालक डा. कृष्णमूर्ति, गुजरात प्रांत के नटवर सिंह , जम्मू कश्मीर के प्रांत संघ चालक ओमप्रकाश मैगी, वामपंथी नेता ज्योति बसु, छोटे लोहिया के रुप में विख्यात समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला, आंध्र के धर्मजागरण प्रमुख भीमसेन राव देशपांडे सहित देश के अन्य हिस्सों में देशसेवा को समर्पण करने वाले महापुरुषों को श्रद्धांजलि दी। सुरेश जोशी उर्फ भैय्या जी ने बताया कि इस वर्ष विश्वमंगल गो ग्राम यात्रा के रूप में कई प्रमुख संगठनों के सहयोग से देश को जागरूक करने वाला आंदोलन चलाया गया। बैठक 28 मार्च को संपन्न होगी।यात्रा के दौरान देशभर के आठ करोड़ 35 लाख से अधिक लोगों की ओर से हस्ताक्षरित ज्ञापन महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को सौंपा गया। सरकार्यवाहक सुरेश जोशी उर्फ भैय्या ने कहा कि आज देश की समस्याओं का समाधान केवल हिंदूत्व में है और हिंदू समाज में देशोत्मबोध, आत्मसम्मान की भावना प्रबल करना ही एकमात्र विकल्प है। यही कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ कर रहा है। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक 28 मार्च को संपन्न होगी।
स्त्रोत : http://www.bhaskar.com/2010/03/27/402324.html

राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा कुरुक्षेत्र में प्रारंभ




राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा कुरुक्षेत्र में कल से प्रारंभ हुई . प. पु. सरसंघचालक डा. मोहन भागवत जी माँ भारती को पुष्प अर्पण कर तथा दीपक जलाकर सभा का शुभारम्भ किया.
त्रिदिवसीय इस प्रतिनिधि सभा का समापन रविवार २८ मार्च को होगा. इस प्रतिनिधि सभा में संघ के कार्यो का सिहांवलोकन, संपन्न हुए विभिन्न कार्यक्रमों की समीक्षा, देश के समक्ष वर्तमान चुनौतियां तथा परिस्थितियों पर गहनता से विचार विमर्श होगा . राष्ट्रीय हित के अनेक मुद्धो पर मंथन होकर प्रस्ताव पारित किये जायेंगे.


सोमवार, २२ मार्च २०१०

(गाँधीजी के नाम सुखदेव की यह ‘खुली चिट्ठी’ मार्च, 1931 में लिखी गई थी, जो गाँधी जी के उत्तर सहित हिन्दी ‘नवजीवन’, 30 अप्रैल, 1931 के अंक में प्रकाशित हुई थी. यहाँ सुखदेव के पत्र को प्रकाशित किया जा रहा है)
परम कृपालु महात्मा जी,
आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की सफलता के बाद आपने क्रांतिकारी कार्यकर्त्ताओं को फिलहाल अपना आंदोलन बंद कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौक़ा देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं.
वस्तुतः किसी आंदोलन को बंद करना केवल आदर्श या भावना से होनेवाला काम नहीं है. भिन्न-भिन्न अवसरों की आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता है.
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अंतिम समझौता न होगा.
मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ गए होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले-मकसूद पर पहुँच गए हैं.
संपूर्ण स्वतंत्रता जब तक न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बँधी हुई है.
उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा विश्राम है.
इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की कल्पना की जा सकती और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है.
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आंदोलन के अगुआओं का है.
लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आपने फिलहाल सक्रिए आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा है, तो भी वह प्रस्ताव तो कायम ही है.
इसी तरह हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही साफ पता चलता है कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाज-सत्तावादी प्रजातंत्र की स्थापना करना है.
यह प्रजातंत्र मध्य का विश्राम नहीं है. उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने के लिए बँधे हुए हैं.
परंतु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध-नीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे. क्रांतिकारी युद्ध जुदा-जुदा मौकों पर जुदा-जुदा रूप धारण करता है.
कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी केवल आंदोलन-रूप होता है, और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन जाता है.

ऐसी दशा में क्रान्तिवादियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए. परंतु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया. निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतिवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता, हो नहीं सकता.
आपके समझौते के बाद आपने अपना आंदोलन बंद किया है, और फलस्वरूप आपके सब कैदी रिहा हुए हैं.
पर क्रांतिकारी कैदियों का क्या? 1915 से जेलों में पड़े हुए गदर-पक्ष के बीसों कैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं.
मार्शल लॉ के बीसों कैदी आज भी जिंदा कब्रों में दफनाये पड़े हैं. यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का है. देवगढ़, काकोरी, मछुआ-बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र के कैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बंद पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं.
लाहौर, दिल्ली, चटगाँव, बम्बई, कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज़्यादा षड्यंत्र के मामले चल रहे हैं. बहुसंख्यक क्रांतिवादी भागते-फिरते हैं, और उनमें कई तो स्त्रियाँ हैं.
सचमुच आधे दर्जन से अधिक कैदी फाँसी पर लटकने की राह देख रहे हैं. इन सबका क्या?

यह पत्र हिंदी अख़बार 'नवजीवन' में प्रकाशित हुआ थालाहौर षड्यंत्र केस के सज़ायाफ्ता तीन कैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गए हैं और जिन्होंने जनता की बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की है, वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नहीं हैं.
उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नहीं है. सच पूछा जाए तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फाँसी पर चढ़ जाने से ही अधिक लाभ होने की आशा है.
यह सब होते हुए भी आप इन्हें अपना आंदोलन बंद करने की सलाह देते हैं. वे ऐसा क्यों करें? आपने कोई निश्चित वस्तु की ओर निर्देश नहीं किया है.
ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आंदोलन को कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं, और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को द्रोह, पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है.
यदि ऐसी बात नहीं है, तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते.
अपना आंदोलन बंद करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्धी की प्रतीति करा लेने का प्रयत्न करना चाहिए था.
मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं, विनाश और संहार में आनंद मानने वाले हैं.
मैं आपको कहता हूँ कि वस्तुस्थिति ठीक उसकी उलटी है, वे सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं, और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं, उसका उन्हें पूरा-पूरा ख्याल होता है.
और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग की अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यंत महत्त्व का मानते हैं, हालाँकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवा और कोई चारा उनके लिए नहीं है.
उनके प्रति सरकार की मौजूदा नीति यह है कि लोगों की ओर से उन्हें अपने आंदोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है, उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाए. अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है.

ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि-भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करनेवाली होगी.
इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि या तो आप कुछ क्राँतिकारी नेताओं से बातचीत कीजिए-उनमें से कई जेलों में हैं- और उनके साथ सुलह कीजिए या ये सब प्रार्थनाएँ बंद रखिए.
कृपा कर हित की दृष्टि से इन दो में से एक कोई रास्ता चुन लीजिए और सच्चे दिल से उस पर चलिए.
अगर आप उनकी मदद न कर सकें, तो मेहरबानी करके उन पर रहम करें. उन्हें अलग रहने दें. वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं.
वे जानते हैं कि भावी राजनैतिक युद्ध में सर्वोपरि स्थान क्रांतिकारी पक्ष को ही मिलनेवाला है.
लोकसमूह उनके आसपास इकट्ठा हो रहे हैं, और वह दिन दूर नहीं है, जब ये जमसमूह को अपने झंडे तले, समाजसत्ता, प्रजातंत्र के उम्दा और भव्य आदर्श की ओर ले जाते होंगे.
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हों, तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिए.
आशा है, आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्वसाधारण के सामने प्रकट करेंगे।

आपका
अनेकों में से ऐक

शत शत नमन - शहीदों के चरणों में (२३ मार्च विशेष दिवस )

भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु












सुखदेव, राजगुरु तथा भगत सिंह के फ़ाँसी लटकाए जाने की ख़बर - लाहौर के ट्रिब्यून के मुख्य पृष्ठ पर


नाम चुना गया । निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनो ने एक निर्जन स्थान पर बम फेंक दिया । पूरा हॉल धुएँ से भर गया । वे चाहते तो भाग सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें फ़ाँसी कबूल है । अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया । उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने थे । बम फटने के बाद उन्होंने इन्कलाब-जिंदाबाद का नारा लगाना चालू कर दिया । इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गई और इनको ग़िरफ़्तार कर लिया गया ।

जेल के दिन
जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल गुजारे । इस दौरान वे कई क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे । उनका अध्ययन भी जारी रहा । उनके उस दौरान लिखे ख़त आज भी उनके विचारों का दर्पण हैं । इस दौरान उन्होंने कई तरह से पूंजीपतियों को अपना शत्रु बताया है । उन्होंने लिखा कि मजदूरों के उपर शोषण करने वाला एक भारतीय ही क्यों न हो वह उसका शत्रु है । उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ। जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हद्ताल कि। ६४वे दि
फ़ाँसी
२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर इनको तथा इनके दो साथियों सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे । कहा जाता है कि जब जेल के अधिकारियों ने उन्हें सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा - 'रुको एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है' । फिर एक मिनट के बाद किताब छत की ओर उछालकर उन्होंने कहा - 'चलो' फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे -
दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़तमेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी ।
फांसी के बाद कोई आन्दोलन ना भड़क जाए इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए तथा फिर इसे बोरियों में भर कर फ़िरोजपुर की ओर ले गए जहां घी के बदले किरासन तेल में ही इनको जलाया जाने लगा । गांव के लोगो ने आग देखी तो करीब आए । इससे भी डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ो को सतलुज नदी में फेंक कर भागने लगे । जब गांव वाले पास आए तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो को एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । ओर भागत सिन्घ हमेशा के लिये अमर हो गये इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ साथ गांधी जी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे । इसकारण जब गांधीजी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झंडे के साथ गांधीजी का स्वागत किया । किसी जग़ह पर गांधीजी पर हमला भी हुआ । इसके कारण गांधीजी को अपनी यात्रा छुपकर करनी पड़ी ।

गांधीजी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने कि वजह से उन्मे एक रोश ने जन्म लिय और् अंततः उन्होंने 'इंकलाब और देश् कि आजादि के लिए हिंसा' को अपनाना अनुचित नहीं समझा । उन्होंने कई जुलूसों में भाग लेना चालू किया तथा कई क्रांतिकारी दलों के सदस्य बन बैठे । बाद मे चल्कर वो अप्ने दल के प्रमुख क्रान्तिकारियो के प्रतिनिधि बने। उन्के दल मे प्रमुख क्रन्तिकरियो मे आजाद, सुख्देव्, राज्गुरु इत्यदि थे।

लाला लाजपत राय
१९२५ में साईमन कमीशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन हुए । इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठीचार्ज भी किया । इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई । अब इनसे रहा न गया । एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिंटेंडेंट सैंडर्स को मारने की सोची । सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु सैंडर्स के घर के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे । उधर बटुकेश्वर दत्त अपनी साईकल को लेकर ऐसे बैठ गए जैसे कि वो ख़राब हो गई हो । दत्त के इशारे पर दोनो सचेत हो गए । उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डीएवी स्कूल की चाहरीदीवारी के पास छिपे इनके घटना के अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे । सैंडर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधा उसके सर में मारी जिसके तुरत बाद वह होश खो बैठा । इसके बाद भगत सिंह ने ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इंतज़ाम कर दिया । ये दोनो जैसे ही भाग रहे थे उसके एक सिपाही ने, जो एक हिंदुस्तानी ही था, इनका पीछा करना चालू कर दिया । चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया -'आगे बढ़े तो गोली मार दूंगा' । नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी । इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय के मरने का बदला ले लिया ।
असेंबली में बम फेंकना
भगत सिंह मूलतः खूनखराबे के जोरदार पक्षधर नहीं थे । पर वे मार्क्स के सिद्धांतो से प्रभावित थे तथा समाजवाद के पक्षधर । इसकारण से उन्हें पूंजीपतियों क मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी । उस समय अंग्रेज सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति ही प्रकाश में आ पाए थे । अतः अंग्रेजों की मजदूरों के प्रति रूख़ से ख़फ़ा होना लाज़िमी था । एसी नीतियों के पारित होने को निशाना बनाना उनके दल का निर्णय था । सभी चाहते थे कि अंग्रेजों को पता चले कि हिंदुस्तानी जगे हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के खिलाफ़ क्षोभ है । ऐसा करने के लिए उन लोगों ने लाहौर की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची ।
भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा ना हो तथा अंग्रेजो तक उनकी 'आवाज़' पहुंचे । हंलांकि उनके दल के सब लोग एसा ही नहीं सोचते थे पर अंत में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का
नाम चुना गया । निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनो ने एक निर्जन स्थान पर बम फेंक दिया । पूरा हॉल धुएँ से भर गया । वे चाहते तो भाग सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें फ़ाँसी कबूल है । अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया । उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने थे । बम फटने के बाद उन्होंने इन्कलाब-जिंदाबाद का नारा लगाना चालू कर दिया । इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गई और इनको ग़िरफ़्तार कर लिया गया ।

जेल के दिन
जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल गुजारे । इस दौरान वे कई क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे । उनका अध्ययन भी जारी रहा । उनके उस दौरान लिखे ख़त आज भी उनके विचारों का दर्पण हैं । इस दौरान उन्होंने कई तरह से पूंजीपतियों को अपना शत्रु बताया है । उन्होंने लिखा कि मजदूरों के उपर शोषण करने वाला एक भारतीय ही क्यों न हो वह उसका शत्रु है । उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ। जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हद्ताल कि। ६४वे दि
फ़ाँसी
२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर इनको तथा इनके दो साथियों सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे । कहा जाता है कि जब जेल के अधिकारियों ने उन्हें सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा - 'रुको एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है' । फिर एक मिनट के बाद किताब छत की ओर उछालकर उन्होंने कहा - 'चलो' फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे -
दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़तमेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी ।
फांसी के बाद कोई आन्दोलन ना भड़क जाए इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए तथा फिर इसे बोरियों में भर कर फ़िरोजपुर की ओर ले गए जहां घी के बदले किरासन तेल में ही इनको जलाया जाने लगा । गांव के लोगो ने आग देखी तो करीब आए । इससे भी डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ो को सतलुज नदी में फेंक कर भागने लगे । जब गांव वाले पास आए तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो को एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । ओर भागत सिन्घ हमेशा के लिये अमर हो गये इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ साथ गांधी जी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे । इसकारण जब गांधीजी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झंडे के साथ गांधीजी का स्वागत किया । किसी जग़ह पर गांधीजी पर हमला भी हुआ । इसके कारण गांधीजी को अपनी यात्रा छुपकर करनी पड़ी ।

जेल के दिनों में उनके लिखे खतों तथा लेखों से उनके विचारों का अंदाजा लगता है । उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी के गुरुमुखी तथा शाहमुखी तथा हिंदी और उर्दू के संदर्भ में), जाति और धर्म के कारण आई दूरी से दुःख व्यक्त किया था । उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किए गए अत्याचार को ।
भगत सिंह को हिंदी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो कि उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी । उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जाएगी और ऐसा उनके जिंदा रहने से शायद ही हो पाए । इसी कारण उन्होंने सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से मना कर दिया । उन्होंने अंग्रेजी सरकार को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का युद्धबंदी समझा जाए तथा फ़ासी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाए ।
फ़ासी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा था -
उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या हैहमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या हैदहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करेंसारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें ।
इससे उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है ।
ख्याति और सम्मान
उनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा । इसके बाद में भी मार्क्सवादी पत्रों में उनपर लेख छपे, पर भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबंध लगा था इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी । देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया ।
दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख मैं नास्तिक क्यों हूँ पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसुमें के २२-२९ मार्च, १९३१ के अंक में तमिल में संपादकीय लिखा । इसमें भगतसिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को गांधीवाद के उपर विजय के रूप में देखा गया था ।
आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता उनको आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिंदगानी देश के लिए समर्पित कर दिया

राजगुरु
शिवराम हरि राजगुरु (१९०८-१९३१) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे । इन्हें भगत सिंह औरसुखदेव के साथ २३ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था । भारतीय स्वतंत्राता संग्राम में ये शहादत एक महत्वपूर्ण घटना थी ।
जन्म इनका जन्म १९०८ में पुणे जिला मे हुआ था । बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी आ गए थे । यहाँ वे संस्कृतसीखने आए थे । इन्होंने धर्मग्रंथों तथा वेदो का अध्ययन किया तथा सिद्धांत कौमुदी इन्हें कंठस्थ हो गई थी । इन्हें कसरत का शौक था और ये शिवाजी तथा उनकी छापामार शैली के प्रशंसक थे । वाराणसी में इनका सम्पर्क क्रंतिकारियों से हुआ । ये हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गए और पार्टी के अन्दर इन्हें 'रघुनाथ' के छद्म नाम से जाना जाने लगा । चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और जतिन दास इनके मित्र थे । वे एक अच्छे निशानेबाज भी थे । । सांडर्स हत्या कांड में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का साथ दिया था ।
२३ मार्च १९३१ को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ फांसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया ।

सुखदेव
सुखदेव थापर (या थापड़) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे । इन्हें भगत सिंह और राजगुरु के साथ २३ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था । इनकी शहादत को अब भी भारत में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ।
जन्म इनका जन्म १५ मई १९०७ को हुआ था । भगत सिंह, कॉमरेड रामचन्द्र एवम् भगवती चरण बोहरा के साथ लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया था । सांडर्स हत्या कांड में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का साथ दिया था । १९२९ में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में व्यापक हड़ताल में भाग लिया था । भगतसिंह तथा राजगुरु के साथ ये भी १९३१ को शहीद हो गए ।






Sunday, February 28, 2010


संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्रीपति शास्त्री का ह्दयाघात से निधन

पुणे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, पूर्व अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख प्रो. श्रीपति शास्त्री का आज पुणे में ह्दयाघात के कारण निधन हो गया। वे 74 वर्ष के थे।
उनका अंतिम संस्कार पुणे स्थित वैकुंठ धाम में प्रातः 11 बजे होगा। शास्त्रीजी पिछले कुछ समय से मधुमेह से पीड़ित थे और हाल ही में बंगलुरू में चिकित्सा के बाद पुणे वापस लौटे थे। यहां शनिवार दोपहर उन्हें ह्दयाघात हुआ, इसके पहले कि वह अस्पताल पहुंच पाते, उनके शरीर ने जीवन का साथ छोड़ दिया।
मूलतः मैसूर के पास के एक गांव के रहने वाले श्रीपति शास्त्री अंग्रेजी और इतिहास विषय के जाने-माने विद्वान थे। उन्होंने अपनी परास्नातक तक की शिक्षा अंग्रेजी विषय में प्राप्त की लेकिन आगे चलकर वह स्वरुचि से इतिहास विषय की ओर प्रवृत्त हुए और उन्होंने इसमें अद्भुत विशेषज्ञता प्राप्त की। उन्होंने आगे चलकर इतिहास में डॉक्टेरट उपाधि प्राप्त की और अध्यापन जगत में प्रवेश किया। अनेक महाविद्यालयों में पठन-पाठने करते हुए कालांतर में वह पुणे विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर नियुक्त हुए।
हिंदी, मराठी, अंग्रेजी, कन्नड़, तमिल आदि अनेक भाषाओं के जानकार श्रीपति शास्त्री इतिहास समेत धर्म और दर्शन के गूढ़ रहस्यों को भी अत्यंत रोचक ढंग से व्याख्यायित करने में सिद्ध थे। उनका वक्तृत्व इतना प्रभावी और तर्कपूर्ण होता था कि पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई भी उनकी वक्तृत्वकला और विद्वत्ता के मुरीद बन गए। एक बार उन्होंने भाजपा सांसदों के मध्य उन्हें वक्तृत्व के लिए आमंत्रित भी किया। भारतीय इतिहास और राजनीति पर पूरी रोचकता के साथ घंटों बोलने में समर्थ विद्वान के रूप में वह सर्वत्र लोकप्रिय थे। विशेषकर देश के विभाजन के मार्मिक अध्याय पर उनका सारगर्भित, धाराप्रवाह विश्लेषण सहज ही श्रोताओं को उन्हें सुनते रहने के लिए बाध्य कर देता था।
श्रीपति शास्त्री को देशाटन के साथ प्रांत-प्रांत के युवकों से वार्तालाप करने की गहन अभिलाषा रहती थी। संघ के नियमित प्रवासक्रम में वह विद्यार्थियों से मिलने, उन्हें सुनने और समझने में सर्वाधिक रुचि लेते थे। संघकार्य के लिए वह आजीवन देश का प्रवास करते रहे। उन्होंने अनेकानेक प्रतिभाओं को चुपचाप गढ़ने का अनूठा लोकसंग्रही कार्य करते हुए अपनी जीवनसाधना पूर्ण की। विश्व हिंदू वॉयस की ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि।
ब्यूरो। 27 फरवरी,

प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे

प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे
प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे

प्रख्यात समाजसेवी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, पद्मविभूषण नानाजी देशमुख नहीं रहे। उनका चित्रकूट स्थित उनके निवास स्थान सियाराम कुटीर में निधन हो गया। वह 94 वर्ष के थे और पिछले काफी समय से आयुवार्धक्य के कारण अस्वस्थ चल रहे थे। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उन्होंने 27 फरवरी को सायंकाल लगभग 5 बजे अंतिम सांस ली।



नई दिल्ली में नानाजी के निधन का समाचार मिलते ही संघ एवं सहयोगी संगठनों के कार्यालयों में शोक छा गया। झण्डेवाला स्थित दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान भवन में दिल्ली के कार्यकर्ताओं ने उनके चित्र के समक्ष पुष्पांजलि देकर श्रद्धांजलि समर्पित की। बड़ी संख्या में लोग चित्रकूट रवाना भी हुए हैं जहां 28 फरवरी को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

भारत में लोकतंत्र को सफल करने और उसे आम आदमी के प्रति उत्तरदायी बनाने वाले अग्रणी नायकों में नानाजी को शुमार किया जाता रहा है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए चले आपात विरोधी आंदोलन के अग्रणी नेताओं में नानाजी एक थे। उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए राजी करने से लेकर उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संख के निकट लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। नानाजी को देखकर एक बार जेपी ने कहा था कि जिस संगठन ने देश को नानाजी जैसे रत्न दिए हैं वह संगठन कभी सांप्रदायिक और कट्टरवादी नहीं हो सकता।

वस्तुतः नानाजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस पीढ़ी के कार्यकर्ता थे जिन्हें संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने अपने हाथों से दीक्षित किया था। 11 अक्तूबर, सन् 1916 में उनका जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले के कदोली नामक एक छोटे से कस्बे के एक निर्धन परिवार में हुआ था। उनका बचपन घोर अभावों में बीता। यहां तक कि उनकी स्कूली शिक्षा भी ठीक से पूरी नहीं हो पाती थी। उन्होंने जीवन के प्रारंभिक दिनों में ट्यूशन पढ़ाने और ठेले पर फल-सब्जी बेचकर आजीविका कमाने का कार्य भी किया। देशभक्ति उनके जीवन में कूट-कूटकर भरी हुई थी। वे लोकमान्य तिलक के अनन्य भक्त थे। और बाद में डॉ. हेडगेवार ने उनके जीवन को नई दिशा दिखाई। सन् 1940 में जब डॉ. हेडगेवार का निधन हो गया, नानाजी ने अपना संपूर्ण जीवन संघ प्रचारक के रूप में देश को समर्पित करने का मन बना लिया।

वह प्रचारक बनकर कुछ दिन आगरा में रहे जहां उनकी मुलाकात पंडित दीनदयाल उपाध्याय से हुई। उसके बाद संघ कार्य के विस्तार के लिए उन्होंने पूर्वी उत्तरप्रदेश को चुना और गोरखपुर आए। यहां कई महीनों तक भटकने के बाद दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक विख्यात महानुभाव के घर घरेलु नौकर के रूप में उन्होंने काम शुरू किया। लेकिन चूंकि उनके मन और मिशन में संघ कार्य के विस्तार की ललक थी, अतएव वह खाली समय में संघ की शाखा का नियमित संचालन करने लगे। बच्चों में संस्कार निर्माण के इस अनूठे कार्य को देखकर लोग-बाग उनकी ओर खिंचे चले आए। धीरे-धीरे उन्होंने गोरखपुर समेत आस-पास के अनेक जनपदों में संघकार्य का विस्तार किया। शिक्षा के प्रति उनके मन में बचपन से ही तीव्र अनुराग था। यही कारण है कि उन्होंने गोरखपुर में नौनिहालों की शिक्षा के लिए देश के पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की।

नानाजी देशमुख भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक थे। सन् 1975 में आपातकाल के समय गठित जनता पार्टी के वे संस्थापक महासचिव नियुक्त हुए। आपात विराधी आंदोलन में उन्होंने केंद्रीय भूमिका का निर्वहन किया। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित आपातकाल विरोधी रैली में उनके साहस को आज भी लोग बरबस याद करते हैं। तब बाबू लोकनायक जयप्रकाश नारायण को पुलिस लाठियों की बर्बरता से बचाने के लिए लाठियों के प्रहारों को अपने ऊपर झेल लेने का उत्कट एवं लोमहर्षक साहस प्रदर्शित कर उन्होंने जेपी और उनके समाजवादी समर्थकों को सदा के लिए अचंभित कर दिया था। वह आपात काल के बाद हुए आम चुनावों में गोण्डा से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद उन्हें केबिनेट मंत्री बनने का प्रस्ताव मिला लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और सन् 1978 में स्वप्रेरणा से राजनीति का पथ त्यागकर लोकसेवा के उदात्त पथ की यात्रा पर निकल पड़े।

सामाजिक सेवा एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरूजी की प्रेरणा से दीनदयाल शोध संस्थान नामक एक अद्वितीय संगठन की नींव डाली। उनके जीवन पर भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक पंडित दीनदयाल उपाध्याय और संपूर्ण क्रांति के दिग्दर्शक नेता बाबू लोकनायक जयप्रकाश नारायण का अद्भुत प्रभाव था। संभवतः इन दोनों महानुभावों के वैचारिक और प्रेरक जीवन का प्रभाव था कि उन्होंने इनके विचारों के अनुरूप स्वावलंबी ग्राम और स्वराज को असली मायनों में जिन्दा करने के लिए राजनीतिक पथ से विरत हो अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। इसके माध्यम से उन्होंने गोण्डा में बाबू लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं उनकी धर्मपत्नी प्रभावती के नाम पर जयप्रभा ग्राम को विकास के आदर्श के रुप में स्थापित किया। उन्होंने पुणे के बीड़ और कालांतर में चित्रकूट में समग्र विकास के अनूठे प्रकल्प हाथ में लिए और एक दशक के भीतर ही उन्हें रोजगार, कृषि, स्वास्थ्य, पेयजल, अवस्थापना सुविधाओं से सुसज्जित कर ग्रामीण विकास को नवीन आयाम दिए।

सन् 1991 में उन्होंने चित्रकूट में ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। सन् 1999 में देश को समर्पित सेवाओं के लिए उन्हें पद्म विभूषण के सम्मान से नवाजा गया। देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति के रूप में नानाजी के चित्रकूट प्रकल्प को देखने के बाद सार्वजनिक रूप से उनके कार्य का चतुर्दिक बखान किया। नानाजी सन् 1999 में राज्यसभा में मनोनीत किए गए। सांसद पद का सदुपयोग करते हुए उन्होंने चित्रकूट में विकास कार्यों को नई बुलंदियों तक पहुंचाया। राज्यसभा के सदस्य के रूप में उन्होंने देश में फैले आकंठ भ्रष्टाचार और राजनीतिक अकर्मण्यता पर जमकर चोट की। वे सांसदों को मिलने वाले भत्तों और विशेष सुविधाओं के सख्त विरोधी थे और उनके कार्यकाल में जब सांसदो के वेतन-भत्तों में वृद्धि की गई, उन्होंने उसे लेने से इनकार कर उसे प्रधानमंत्री सहायता कोश में जमा करवाने का निर्देश दिया।

दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की छठवीं मंजिल पर ही उनका निवास स्थान था, जहां वह दिल्ली प्रवास के समय ठहरते थे।
चित्र विवरण- ऊपर से प्रथम- लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ नानाजी देशमुख, द्वितीय चित्र में-पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर, उद्योगपति रामनाथ गोयनका एवं डॉ. शांति पटेल के साथ 24 मार्च, 1979 को जेपी के स्वास्थ्य के लिए मुंबई में प्रार्थना करते हुए नानाजी देशमुख)

राकेश उपाध्याय, Panchjanya, New Delhi

श्री नानाजी देशमुख

नमस्ते,
हमें अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि रा.स्व.संघ के वरिष्ट चिन्तक एवं महान समाजसेवक श्री नानाजी देशमुख हमारे बीच नहीं रहे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत जी द्वारा भेजा गया शोक सन्देश आपके पास प्रकाशनार्थ भेजा जा रहा है.
नोट: स्वर्गीय श्री नानाजी देशमुख का पार्थिव शरीर कल (दिनांक 28 -2 -2010 ) शाम 3 बजे संघ कार्यालय केशव कुञ्ज झंडेवाला नई दिल्ली, में जनता के दर्शन हेतु रखा जायेगा.

Dr. SRIPATI SHASTRI of PUNE and Sri NANAJI DESHMUKH

Namaste,

We are sad to inform you that two veteran RSS leaders Dr. SRIPATI SHASTRI of PUNE and Sri NANAJI DESHMUKH of CHITRAKOOT passed away today.

Dr. SRIPATI SHASTRI was basically from HARIHARA of CHITRADURGA district in Karnataka. A gold medalist from Mysore University in history. He did his Ph. D thesis on "history of constitution of the world". Then he joined department of history at Pune University and worked as professor of history for two decades.

He was an active member of RSS from his student days. Dr. Shastry was a well known intellectual, speaker and thinker. He was a member of national executive committee. his lectures on "Partition of Bharat" and "1857 freedom movement" were highly inspiring. He visited several western countries and participated in many RSS functions. Unmarried, he dedicated much of his life for the cause of society. His famous book on "RSS on Christian activities" was a noted work.He was respected by all spectrum of the society irrespective of political and religious groups. His nature was acceptable to everyone and was a great teacher of history for thousands. RSS pays tributes to the great soul.


Jyotipunj

Ulhas Latkar (Publisher, Ameya Prakashan, Pune) Manohar Joshi, Ravindra Dani (Translator), Narendra Modi, Gopinath Munde, Dr. Sripati Shastri (extreme right)

Sri. Nanaji Deshmukh

Sri. Nanaji Deshmukh known for his work on rural development of villages in Madhyapradesh. His work based at Chitrakoot was model in the rural development field and regarded as "a complete laboratory of rural development". He was the founder of 'Deendayal Research institute' at Arogyadham parisar of Chitrakoot, Satna District, Madhyapradesh.

Chitrakoot Project is an integrated and holistic model for the development of rural India, based on the principles outlines in Pt. Deendayal Upadhyaya's Integral Humanism to create a society based on the complimentarity of the family, primary school and the local population. The Chitrakoot Project is a self-reliance campaign that was launched on 26th January 2002 and will cover 500 villages around Chitrakoot in 2 phases. The 80 villages taken up in the 1st phase will be self-reliant by 15th August 2005, and the remaining villages will achieve self-reliance by 26th January 2009. The Campaign has also been started in the villages covered by the Institute in Gonda and Beed districts. The self-reliance campaign covers all aspects of individual, family and societal life of the villagers. The key to the campaign is the concept of Samaj Shilpi Dampati (SSD), 'graduate' couples that lives within the villages itself, and are responsible for motivating and guiding a cluster of 5 villages.


Dr. Abdul Kalam on Nanaji Deshmukh and his works :

"I recently visited Chitrakoot in Madhya Pradesh, where I met Shri Nanaji Deshmukh, 90+ and his team belonging to the Deendayal Research Institute (DRI). The DRI is a unique institution developing and implementing a village development system, which is most suited for India. As a part of integrated rural development, villagers are engaged in water harvesting; effectively using it for cultivation of food grains, medicinal and aromatic and horticulture cultivation. They are transforming herbs into herbal products and marketing them. Apart from all these development activities, the institute is facilitating a cohesive conflict free society. As a result of this, eighty villages around Chitrakoot are almost litigation free. Villagers have unanimously decided that no dispute will find its way to court. Differences will be sorted out amicably in the village itself. The reason given by Nana Deshmukhji is that if the people fight among each other they will have no time for development. This is also true in the life of a nation in every political system. The work of the DRI has enabled the generation of employment for a large number of farmers in the Chitrakoot region. During my visit, I went to a small village called Patni where the villagers talked to me about the progress of their village and their problems. Many women said they have to send their children long distances for studying beyond the 10th Class. They requested up-gradation of the school to the plus 2 level. They also felt the need for a road which would connect multiple villages. The then Chief Minister readily agreed and announced in the meeting itself, that school upgradation and the provision of roads would be implemented immediately. I am sure that would add to the happiness of many village farmers. The DRI understands that people's power is very potent. Social advancement and prosperity are possible only by injecting the spirit of self-reliance and excellence in the younger generation. Using this principle the DRI has plans to develop a hundred clusters of villages having approximately five villages each around Chitrakoot, based on the experience of 80 villages in 16 clusters. All these have been accomplished through the DRIs "samajshilpi dampati" a new concept of counseling and intervention promoted by the DRI as a well conceived societal mission.

I would like to share a few thoughts with the Honorable Members of this Legislative Assembly on the topic "Missions for Madhya Pradesh's Prosperity" with reference to the core competence of Madhya Pradesh and national vision."

Visit www.chitrakoot.org and www.driindia.org

Tuesday, February 23, 2010

पुणे विस्फोट के बहाने

केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा देश के कुछ शहरों में शहरों में आतंकी हमले की आशंका जताने के बाद भी जिस प्रकार पुणे के एक बेकरी में विस्फोट हुआ उससे वस्तुस्थिति का अंदाजा होता है. इससे स्पष्ट है कि चेतावनी के बाद भी अब तक लोग पूरी तरह सजग नहीं हुए है तथा वे सीखते जरूर है पर हाथ जला लेने के बाद. यह स्थिति निश्चय ही बेहतर नहीं कही जा सकती पर सच्चाई यही है तथा इस पर राजनीतिक लाभ हानि के हिसाब से बयानबाजी करने की बजाए व्यवस्था को और चुस्त एवं प्रभावशाली बनाए जाने पर बल दिया जाना चाहिए. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद इसे काफी गंभीरता से लिया है तथा मामले की तेजी से जांच के लिए केन्द्र एवं महाराष्ट्र सरकार को समन्वित तथा कारगर कार्रवाई का निर्देश दिया है. जबकि विपक्षी पार्टियां खासकर भाजपा एवं वामदलों ने सरकारी तंत्र की खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमता पर सवाल खड़ा किया है. जाहिर है विपक्ष इसके पीछे खुफिया तंत्र की नाकामी मानता है जबकि केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने दो टूक कहा कि पूणे विस्फोट के पीछे खुफिया नाकामी नहीं है. वैसे कुछ लोग इसके लिए राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं. उनकी नजर में राज्य सरकार ने खुफिया रिपोर्ट को गंभीरता से नहीं लिया जबकि सरकार का कहना है कि संभावित निशानों पर सुरक्षा उपाय किए गए थे जाहिर है यहां जो कुछ हुआ वह धोखे से रखे गए बम के कारण हुआ. दरअसल सुरक्षा व्यवस्था की अपनी सीमा है. महत्वपूर्ण संबंधित ठिकानों एवं व्यक्तियों की सुरक्षा तो संभव है पर हर समय, हर जगह सुरक्षाबल की व्यवस्था संभव नहीं है. यानि सुरक्षा मामले में सुरक्षाबलों के साथ ही आम जनता की अहम भूमिका है. इसमें सजगता एक अहम मामला है. यदि सभी लोग इस खतरे के प्रति सजग हो तो स्थिति को बहुत हद तक काबू में लाया जा सकता है. लावारिश वस्तुओं को नहीं छूना तथा इसकी सूचना जांच एजेंसियों को देना ऐसी चीज है जिसका पालन हर हाल में किया जाना चाहिए. खासकर जब वह क्षेत्र किसी कारण से खास हो तथा आतंकियों के लिए आसान टारगेट हो. यदि खुफिया सूचना के हिसाब से वह क्षेत्र संवेदनशील हो ऐसे में जिम्मेवारी और बढ़ जाती है. पर दुर्भाग्यवश पूणे में ऐसा नहीं हुआ. मुंबई के कोरेगांव पार्क स्थित वह बेकरी यहूदी प्रार्थना सभा एवं ओशो आश्रम के कारण भी निशाने पर था. आतंकवादियों के निशाने पर होने के कारण पुलिस ने उस क्षेत्र में जांच की थी. जाहिर है वस्तुस्थिति को भांप आतंकवादियों ने प्रमुख केन्द्र की बजाए बेकरी जैसा आसान लक्ष्य चुना जहां लोग मनपसंद चीजें खाने आते है तथा भीड़-भाड़ के समय लोगों का ध्यान अन्य चीजों की ओर नहीं जाता. आतंकियों का यह अनुमान सही साबित हुआ. पुलिस बड़े लक्ष्य पर निगाह गड़ाए रही तथा आतंकवादियों ने अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण लक्ष्य को अपना निशान बना लिया. ठीक है कि इससे वे किसी बड़ा हादसा का अंजाम देने में कामयाब नहीं हुए पर फिर भी सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर उन्होंने यह दिखा दिया कि वे इसमें सक्षम हैं. जाहिर है इससे अब सुरक्षा व्यवस्था की सारी रणनीति की नए सिरे से समीक्षा करनी होगी तथा व्यवस्था को और चुस्त करना होगा. इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि हर नागरिक इस मामले में जागरूकता का परिचय दे तथा सजग रहे. विपक्ष अपनी धरदार व प्रभावशाली भूमिका निभाए इससे भला किसी को क्या एतराज हो सकता है. बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह जरूरी भी है. सरकार की कमजोरियों की आलोचना गलत नहीं कही जा सकती पर यह भी जरूरी है कि वह महज रस्मअदायगी नहीं हो तथा महज आलोचना के लिए आलोचना नहीं हो. इसके कारण भारत पाकवात्र्ता को निशने पर लेना सही नहीं होगा.भाजपा भारत-पाक वार्ता शुरू किए जाने के विरूद्ध है तथा उसने इस मुद्दे पर खुलकर सरकार की आलोचना की है. निश्चत ही यह काफी संवेदनशील मामला है. सरकार इस मुद्दे पर अडिग रही है कि जब तक पाक भारत विरोधी आतंकवादियों के विरूद्ध समुचित कार्रवाई नहीं करता उसके साथ वार्ता बहाल नहीं की जानी चाहिए. यह गलत भी नहीं है पर इस महाद्वीप में आतंकवाद की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए 'डेडलॉकÓ की स्थिति भी बुद्धिमत्ता पूर्ण नहीं मानी जा सकती. चुप बैठकर उस दिन का इंतजार नहीं किया जा सकता जब पाकिस्तान खुद की लगाई आतंकी आग में जलकर खाक हो जायेगा. पाकिस्तान का पतन भारत के लिए कोई राहत की बात नहीं होगी क्योंकि अफगानिस्तान का अंजाम हम सबके सामने है. अत: महज चुप्पी खुद में समस्या का समाधान नहीं है. सारे बिन्दुओं को ध्यान में रखकर ही बात कना बेहतर होगा. ऐसे मुद्दे पर राजनीति करना तो किसी भी तरह से अच्छा नहीं होगा.आलेख - चदंन कुमार, जमशेदपुर

Friday, December 11, 2009

Freedom Fighters

Chandrasekhar Azad

Date of Birth : Jul 23, 1906
Date of Death : Feb 27, 1931
Place of Birth : India

Freedom Fighters
Dr. Rajendra Prasad
Purushottam Das Tandon
Motilal Nehru
Jawaharlal Nehru
Lal Bahadur Shastri
Indira Gandhi
Jayaprakash Narayan
Hakim Ajmal Khan
Pandit Madan Mohan Malaviya
Feroze Gandhi
Liaquat Ali Khan
Maulana Mohammad Ali
Maulana Shaukat Ali
Govind Ballabh Pant
Dr.Shanker Dayal Sharma
Mahavir Tyagi
Mukhtar Ahmed Ansari
Ram Manohar Lohia
Chandrasekhar Azad
Dr. B.R. Ambedkar
Mohandas Karamchand Gandhi
Dadabhai Naoroji
Sardar Vallabhbhai Patel
Bal Gangadhar Tilak
Ravi Shankar Vyas
Narhari Parikh
Jivatram Kripalani
Mahadev Desai
Mohanlal Pandya
Abbas Tyabji
Gopal Krishna Gokhale
Narahar Vishnu Gadgil
Vithalbhai Patel
Vinoba Bhave
Ganesh Vasudev Mavlankar
Vinayak Damodar Savarkar
Muhammad Ali Jinnah
Kulapati K.M. Munshi
Senapati Bapat
Mahadeo Govind Ranade
Subhas Chandra Bose
Bipin Chandra Pal
Chittaranjan Das
Maulana Abul Kalam Azad
Rabindranath Tagore
Surya Sen
Gopinath Bordoloi
Benoy Basu
Badal Gupta
Dinesh Gupta
Khudiram Bose
Bagha Jatin
Barindra Kumar Ghosh
Aravinda Ackroyd Ghosh
Surendranath Banerjea
Ambika Chakrobarty
C. Rajagopalachari
Krishna Menon
Bhogaraju Pattabhi Sitaramayya
Srinivasa Iyengar
Muhammad Iqbal
Lala Lajpat Rai
Sardul Singh Caveeshar
Sheikh Abdullah
Khan Abdul Ghaffar Khan
Bhagat Singh
Shivaram Rajguru
Sukhdev
Tej Bahadur Sapru
Sikander Hyat Khan
Madan Lal Dhingra

Chandrasekhar Azad was a great Indian freedom fighter and revolutionary thinker. Revered for his audacious deeds and fierce patriotism, he was the mentor of Bhagat Singh, the famous Indian martyr. Chandrasekhar Azad is considered one of the greatest Indian freedom fighter along with Bhagat Singh, Sukhdev, Rajguru, Ram Prasad Bismil, and Ashfaqulla Khan. Chandrasekhar Azad's parents were Pandit Sita Ram Tiwari and Jagrani Devi. He received his early schooling in Bhavra District Jhabua (Madhya Pradesh). For higher studies he went to the Sanskrit Pathashala at Varanasi. Young Azad was one of the young generation of Indians when Mahatma Gandhi launched the Non-Cooperation Movement. But many were disillusioned with the suspension of the struggle in 1922 owing to the Chauri Chaura massacre of 22 policemen. Although Gandhi was appalled by the brutal violence, Azad did not feel that violence was unacceptable in the struggle, especially in view of the Amritsar Massacre of 1919, where Army units killed hundreds of unarmed civilians and wounded thousands in Amritsar. Young Azad and contemporaries like Bhagat Singh were deeply and emotionally influenced by that tragedy. As a revolutionary, he adopted the lastname 'Azad', which means "Free" in Urdu.There is an interesting story that while he adopted the name "Azad" he made a pledge that the Police will never capture him alive. Azad and others had committed themselves to absolute independence by any means. He was most famous for The Kakori Rail Dacoity in 1925 and the assassination of the assistant superintendent of Police John Poyantz Saunders in 1928.


Azad and his compatriots would target British officials known for their oppressive actions against ordinary people, or for beating and torturing arrested freedom fighters. Azad was also a believer in socialism as the basis for a future India, free of social and economic oppression and adversity. Bhagat Singh joined Azad following the death of Lala Lajpat Rai, an Indian leader who was beaten to death by police officials. Azad trained Singh and others in covert activities, and the latter grew close to him after witnessing his resolve, patriotism and courage. Along with fellow patriots like Rajguru and Sukhdev, Azad and Singh formed the Hindustan Socialist Republican Association, committed to complete Indian independence and socialist principles of for India's future progress. Betrayed by an informer on 27 February 1931 Azad was encircled by British troops in the Alfred park, Allahabad. He kept on fighting till the last bullet. Azad is a hero to many Indians today. Alfred Park was renamed Chandrasekhar Azad park, as have been scores of schools, colleges, roads and other public institutions across India.