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Sunday, March 15, 2015

मसर्रत आलम की रिहाई पर संघ देशवासियों के आक्रोश के साथ : दत्तात्रय होसबले

मसर्रत आलम की रिहाई पर संघ देशवासियों के आक्रोश के साथ : दत्तात्रय होसबले

DSC_0182नागपुर, मार्च 13. जम्मू-कश्मीर की मुफ़्ती सरकार द्वारा कश्मीरी अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई से पूरे देश में जनाक्रोश है. इस आक्रोश का समर्थन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबले ने कहा कि हम देशवासियों के साथ हैं. उन्होंने यह भी कहा कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी संसद में इस पर आक्रोश व्यक्त किया था. सह सरकार्यवाह अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक के पहले दिन मीडिया को सम्बोधित कर रहे थे. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सबकुछ ठीक चल रहा है, ऐसा हम नहीं मानते. सह सरकार्यवाह ने कहा कि आज एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल (भाजपा) वहां सरकार में शामिल है, यह एक प्रयोग के तौर पर है.
उन्होंने कहा कि संघ का कार्य समाज में सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करना है. संघ समाज को संगठित करने का कार्य करता है, इसलिए हम समाज के सम्पर्क में रहते हैं. संघ की शाखा हमारी ऊर्जा का केंद्र है. शाखा के माध्यम से हमें ऊर्जा मिलती है. इसी ऊर्जा के बल पर संघ के द्वारा देशभर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवाकार्य चलता है.
उन्होंने बताया कि देश भर में लगने वाली शाखाओं में तीन साल की अवधि में बढ़ोतरी हुई है. शाखा स्थान वर्ष 2012 की संख्या 5161 से बढ़कर वर्ष 2015 में 10413 हो गए हैं, ऐसे ही प्रतिदिन लगने वाली शाक्षाओं की संख्या वर्ष 2012 की संख्या 33,222 से बढ़कर वर्तमान में 51,330 हो गई है. इसी प्रकार साप्ताहिक मिलन की संख्या 12847 और मासिक मंडली की संख्या 9008 है, केवल युवा छात्रों की 6077 शाखाएं हैं. कुल 55010 स्थानों पर संघ कार्य चल रहा है.
सह सरकार्यवाह होसबले ने बताया कि गत मार्च के पश्चात संघ शिक्षा वर्गों में प्रथम वर्ष सामान्य और विशेष वर्गों में 59 वर्ग हुए, जिसमें 9609 स्थानों से 15332 शिक्षार्थी सहभागी हुए. वहीं द्वितीय वर्ष सामान्य एवं विशेष के 16 वर्गों में 2902 स्थानों से 3531 शिक्षार्थी सहभागी हुए. तृतीय वर्ष में 657 स्थानों से 709 संख्या रही. उन्होंने बताया कि विभिन्न प्रान्तों में सम्पन्न प्राथमिक वर्गों में भी ग्रामों का प्रतिनिधित्व एवं शिक्षार्थियों की संख्या भी अच्छी रही है. इन वर्गों में कुल मिलाकर 23 हजार 812 शाखाओं से 80 हजार 409 शिक्षार्थी सम्मिलित हुए.
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संघ से बहुत सारे नए लोग जुड़ रहे हैं. वे लोग संघ के बारे में जानना चाहते हैं, अतः पश्चिम बंगाल में आधा और एक दिन का ‘संघ परिचय वर्ग’ का आयोजन किया गया. इस परिचय वर्ग में दक्षिण बंगाल में 11 हजार और उत्तर बंगाल में 5000 नए लोग शामिल हुए.
दक्षिण कर्नाटक में ‘समर्थ भारत’ संकल्पना को लेकर 2 दिवसीय चर्चा सत्र का आयोजन किया गया. इसके तहत सोशल मीडिया द्वारा पंजीयन के लिए युवाओं को आह्वान किया गया. देश व समाज के लिए कार्य करने की इच्छा रखनेवाले युवाओं का इसमें भरपूर उत्साह देखने मिला. इस 2 दिवसीय आयोजन में दक्षिण कर्नाटक से 3852 युवा सम्मिलित हुए. इस आयोजन में ग्राम-विकास, सेवा-बस्ती के कार्य, जल संवर्धन, स्वयंसेवी कार्य, महिलाओं की समस्या, शैक्षिक प्रयोग, पर्यावरण, वैचारिक आन्दोलन, मतिमंद और विकलांगों की समस्याएं आदि विषयों पर चर्चा हुई. इस समग्र आयोजन की संकल्पना को इन शब्दों में वर्णित किया जा सकता है – “समूह हेतु संकल्पना” और “संकल्पना हेतु समूह” (Team for Theme and Theme for Team). यही कारण है कि 77 युवकों ने एक वर्ष देश के लिए अर्पित करने के लिए सिद्धता प्रगट की.
सह सरकार्यवाह होसबले से पत्रकारों ने पूछा कि क्या वे मोदी सरकार के 9 महीने के कार्य से संतुष्ट हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि असंतुष्ट होने का कोई कारण नहीं है और संतुष्टि के लिये उन्हें 5 वर्ष का समय दिया जाना चाहिये. भूमि अधिग्रहण कानून के सन्दर्भ में पूछा गया कि संघ से जुड़े भारतीय किसान संघ और मजदूर संघ इस बिल का विरोध कर रहे हैं, ऐसे में संघ किसके साथ है? उन्होंने कहा कि भारतीय किसान संघ और मजदूर संघ स्वतंत्र संगठन हैं. सरकार की नीतियों में सुधार के लिये अपनी भावनाएं व्यक्त करने का उनका अधिकार है. लेकिन जब किसी विषय पर कोई सुझाव या कुछ आपत्ति हो तो बैठकर उन नीतियों में सुधार करने के लिये संघ प्रेरित करता है.
भारत में कोई अल्पसंख्यक नहीं है जहां सब लोग ‘सांस्कृतिक, राष्ट्रीयता और डीएनए से हिंदू’ हैं.‘‘आप किसे अल्पसंख्यक कहेंगे ? हम किसी को भी अल्पसंख्यक नहीं मानते हैं. देश में अल्पसंख्यक की कोई अवधारणा नहीं है क्योंकि अल्पसंख्यक कोई है ही नहीं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘मोहन भागवतजी ने कई बार कहा है कि भारत में जन्म लेने वाला सभी हिंदू हैं. चाहे वे इसे मानते हों या नहीं, सांस्कृतिक, राष्ट्रीयता और डीएनए के तौर पर एक हैं.’’

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा प्रस्ताव प्रस्ताव १ : अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का स्वागत

संयुक्त राष्ट्र की ६९ वीं महासभा द्वारा प्रति वर्ष २१ जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की घोषणा से सभी भारतीय, भारतवंशी व दुनिया के लाखों योग-प्रेमी अतीव आनंद तथा अपार गौरव का अनुभव कर रहे हैं . यह अत्यंत हर्ष की बात है कि भारत के माननीय प्रधान मंत्री ने २७ सितम्बर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र की महासभा के अपने सम्बोधन में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का जो प्रस्ताव रखा उसे अभूतपूर्व समर्थन मिला. नेपाल ने तुरंत इसका स्वागत किया. १७५ सभासद देश इसके सह-प्रस्तावक बने तथा तीन महीने से कम समय में ११ दिसम्बर २०१४ को बिना मतदान के, आम सहमति से यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया.
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहती है कि योग भारतीय सभ्यता की विश्व को देन है . ‘युज’ धातु से बने योग शब्द का अर्थ है जोड़ना तथा समाधि. योग केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं है, महर्षि पतंजलि जैसे ऋषियों के अनुसार यह शरीर मन, बुद्धि और आत्मा को जोड़ने की समग्र जीवन पद्धति है. शास्त्रों में ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’, ‘मनः प्रशमनोपायः योगः’ तथा ‘समत्वं योग उच्यते’ आदि विविध प्रकार से योग की व्याख्या की गयी है, जिसे अपनाकर व्यक्ति शान्त व निरामय जीवन का अनुभव करता है. योग का अनुसरण कर संतुलित तथा प्रकृति से सुसंगत जीवन जीने का प्रयास करने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, जिसमें दुनिया के विभिन्न संस्कृतियों के सामान्य व्यक्ति से लेकर प्रसिद्ध व्यक्तियों, उद्यमियों तथा राजनयिकों आदि का समावेश है. विश्व भर में योग का प्रसार करने के लिए अनेक संतों, योगाचार्यों तथा योग प्रशिक्षकों ने अपना योगदान दिया है, ऐसे सभी महानुभावों के प्रति प्रतिनिधि सभा कृतज्ञता व्यक्त करती है. समस्त योग-प्रेमी जनता का कर्तव्य है कि दुनिया के कोने कोने में योग का सन्देश प्रसारित करे.
अ. भा. प्रतिनिधि सभा भारतीय राजनयिकों, सहप्रस्तावक व प्रस्ताव के समर्थन में बोलनेवाले सदस्य देशों तथा संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों का अभिनन्दन करती है जिन्होंने इस ऐतिहासिक प्रस्ताव को स्वीकृत कराने में योगदान दिया . प्रतिनिधि सभा का यह विश्वास है कि योग दिवस मनाने व योगाधारित एकात्म जीवन शैली को स्वीकार करने से सर्वत्र वास्तविक सौहार्द तथा वैश्विक एकता का वातावरण बनेगा.
अ.भा. प्रतिनिधि सभा केंद्र व राज्य सरकारों से अनुरोध करती है कि इस पहल को आगे बढ़ाते हुए योग का शिक्षा के पाठ्यक्रमों में समावेश करें, योग पर अनुसन्धान की योजनाओं को प्रोत्साहित करें तथा समाज जीवन में योग के प्रसार के हर संभव प्रयास करें. प्रतिनिधि सभा स्वयंसेवकों सहित सभी देशवासियों, विश्व में भारतीय मूल के लोगों तथा सभी योग-प्रेमियों का आवाहन करती है कि योग के प्रसार के माध्यम से समूचे विश्व का जीवन आनंदमय स्वस्थ और धारणक्षम बनाने के लिए प्रयासरत रहें.

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा प्रस्ताव 2 : मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा देश-विदेश की विविध भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करने की पक्षधर है लेकिन उसका यह मानना है कि स्वाभाविक शिक्षण व सांस्कृतिक पोषण के लिए शिक्षा, विशेष रुप से प्राथमिक शिक्षा, मातृभाषा अथवा संविधान स्वीकृत प्रादेशिक भाषा के माध्यम से ही होनी चाहिए.
भाषा केवल संवाद की ही नहीं अपितु संस्कृति एवं संस्कारों की भी संवाहिका है. भारत एक बहुभाषी देश है. सभी भारतीय भाषाएँ समान रूप से हमारी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति करती हैं. यद्यपि बहुभाषी होना एक गुण है किंतु मातृभाषा में शिक्षण वैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है. मातृभाषा में शिक्षित विद्यार्थी दूसरी भाषाओं को भी सहज रूप से ग्रहण कर सकता है . प्रारंभिक शिक्षण किसी विदेशी भाषा में करने पर जहाँ व्यक्ति अपने परिवेश, परंपरा, संस्कृति व जीवन मूल्यों से कटता है वहीं पूर्वजों से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र, साहित्य आदि से अनभिज्ञ रहकर अपनी पहचान खो देता है.
महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ ठाकुर, श्री माँ, डा. भीमराव अम्बेडकर, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे मूर्धन्य चिंतकों से लेकर चंद्रशेखर वेंकट रामन,प्रफुल्ल चंद्र राय, जगदीश चंद्र बसु जैसे वैज्ञानिकों, कई प्रमुख शिक्षाविदों तथा मनोवैज्ञानिकों ने मातृभाषा में शिक्षण को ही नैसर्गिक एवं वैज्ञानिक बताया है. समय-समय पर गठित शिक्षा आयोगों यथा राधाकृष्णन आयोग, कोठारी आयोग आदि ने भी मातृभाषा में ही शिक्षा देने की अनुशंसा की है. मातृभाषा के महत्व को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र ने भी समस्त विश्व में 21 फरवरी को मातृभाषा-दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया है.
प्रतिनिधि सभा स्वयंसेवकों सहित समस्त देशवासियों का आवाहन करती है कि भारत के समुचित विकास, राष्ट्रीय एकात्मता एवं गौरव को बढ़ाने हेतु शिक्षण, दैनंदिन कार्य तथा लोक-व्यवहार में मातृभाषा को प्रतिष्ठित करने हेतु प्रभावी भूमिका निभाएँ. इस विषय में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण है. अभिभावक अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा अपनी ही भाषा में देने के प्रति दृढ़ निश्चयी बनें.
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा यह भी आवाहन करती है कि केन्द्र सरकार एवं राज्य-सरकारें अपनी वर्तमान भाषा संबंधी नीति का पुनरावलोकन कर प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा अथवा संविधान स्वीकृत प्रादेशिक भाषा में देने की व्यवस्था सुनिश्चित करें तथा शिक्षा के साथ-साथ प्रशासन व न्याय-निष्पादन भारतीय भाषाओं में करने की समुचित पहल करें.

ABPS Resolution 2 : Education in Mother Language

Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha is fully supportive of study of various languages including foreign languages but it is its considered opinion that for natural learning and to enrich cultural moorings, the education, particularly elementary education should be in mother language or in state languages recognised in our Constitution.
Language is not only the medium of communication but it is also a carrier of culture and value system. Bharat is a multilingual country. All the Bharatiya languages equally reflect national and cultural pride of our country. Although it is a merit to be multilingual but it is scientifically expedient to impart education in mother language for developing the personality. A student educated in mother language can easily grasp other languages as well. A person having elementary education in a foreign language, gets alienated from his surroundings, traditions, culture and values of life, at the same time one also loses his identity, remaining ignorant of ancient knowledge, science and literature.
Eminent thinkers like Mahamana Madanmohan Malaviya, Mahatma Gandhi, Ravindranath Thakur, Sri Maa, Dr. Bhimrao Ambedkar, Dr. Sarvapalli Radhakrishnan and scientists like Chandrashekhar Venkat Raman, Prafulla Chandra Ray, Jagdish Chandra Basu and several prominent educationists and psychologists have opined that it would be both, natural and scientific to impart education in mother language. Various commissions constituted from time to time such as Radhakrishnan Commission, Kothari Commission etc. have also recommended for imparting education in mother language. Taking note of the significance of mother language, the United Nations also decided to observe 21st February as Mother Language Day for whole of the world.
ABPS calls upon the countrymen, including swayamsevaks to play an effective role to establish the dignity of the mother language in education, day-to-day working and public affairs to achieve all-round development, national integrity and pride. In this regard, family has an important role. Parents should have a firm resolve to impart elementary education to their children in their own language.
ABPS calls upon the Union Government and State Governments to review their present language policies and ensure effective system to impart education in mother language or in constitutionally recognised state languages and simultaneously take initiative for use of Bharatiya languages in education, administration and delivery of justice.

सरकार्यवाह जी द्वारा अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 2015 में प्रस्तुत वार्षिक प्रतिवेदन

सरकार्यवाह जी द्वारा अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 2015 में प्रस्तुत वार्षिक प्रतिवेदन

DSC_0172परमपूजनीय सरसंघचालक जी, अखिल भारतीय पदाधिकारी गण, अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सभी सदस्यगण, क्षेत्रों एवम् प्रान्तों के मान्यवर संघचालक तथा कार्यवाह बंधुगण, नवनिर्वाचित अखिल भारतीय प्रतिनिधि बंधु तथा सामाजिक जीवन के विविध कार्यों में कार्यरत निमंत्रित बहनों तथा भाइयों का नागपुर के इस पावन परिसर में संपन्न हो रही अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में हृदय से स्वागत है. संभव है कि आप में से कुछ बंधुओं का इस सभा में सम्मिलित होने का यह पहला ही अवसर होगा.
श्रद्धांजलि : वर्षों तक जिनका सान्निध्य तथा मार्गदर्शन हमें प्राप्त होता रहा तथा सामाजिक, राजनीतिक, जन प्रबोधन एवं जन जागरण के क्षेत्र में अपने सामर्थ्य से जिन्होंने जन-जन में अपना स्थान बनाया था, ऐसे कुछ महानुभाव विगत कार्यकारी मंडल की बैठक के बाद हमसे बिछुड़ गये हैं. उनका स्मरण होना स्वाभाविक है.
संघ समर्पित और स्वयंसेवकों के लिए जिनका जीवन आदर्श रहा ऐसे दक्षिण मध्य क्षेत्र के मा. संघचालक टीवी देशमुख जी कर्क रोग से संघर्ष करते-करते हमें छोड़ कर चले गये. गुजरात में जिनका प्रदीर्घ प्रचारक जीवन रहा ऐसे जीतुभाई संघवी अकस्मात अपनी जीवनयात्रा समाप्त कर गये. वनवासी कल्याण आश्रम में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करने वाले विशेषतः पूर्व एवं उत्तर पूर्व क्षेत्रों में कार्य को सशक्त आधार प्रदान करने वाले डॉ. रामगोपाल जी कर्क रोग से जूझते हुए स्वर्गलोक की यात्रा पर गमन कर गये. बिहार प्रांत में संघ कार्य के विस्तार में जिनकी अहम् भूमिका रही एवं पश्चात् पूर्व सैनिक सेवा परिषद के अखिल भारतीय सह-संगठन मंत्री रहे ऐसे नरेन्द्र सिंह जी आज हमारे मध्य नहीं है. जयपुर महानगर में दायित्व निर्वहन करने वाले प्रचारक श्री तरुणकुमार जी रेल दुर्घटना में स्वर्गगमन कर गये. कर्नाटक प्रांत से प्रचारक जीवन का प्रारंभ करने वाले एवं विश्व हिंदु परिषद् में विभिन्न दायित्वों को निभाने वाले वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर आचार्य भी हमारे बीच अब नहीं रहे.
कोलकाता के माननीय संघचालक विश्वनाथ जी मुखर्जी, अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष यतींद्र जी तिवारी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के भूतपूर्व महामंत्री तथा तेलगु साहित्य और पत्रकारिता क्षेत्र में जाने माने भाग्यनगर के पी. व्यंकटेश्वरलु, पद्मविभूषण से सम्मानित इसरो के भूतपूर्व प्रमुख, स्वनामधन्य बसंतराव गोवारीकर जी, बड़ोदरा के राजपरिवार की सदस्या मृणालिनीदेवी, यह सभी महानुभाव परलोक की यात्रा पर प्रस्थान कर गये.
चित्रपट सृष्टि के जाने-माने कलाकार मुंबई के सदाशिव अमरापुरकर, महाभारत धारावाहिका के दिग्दर्शक रवी चौपड़ा जी, हास्य अभिनेता देवेन वर्मा, सिने जगत के ही गुजरात के उपेन्द्र त्रिवेदी जी और भाग्यनगर के ‘चक्री’ उपनाम से प्रख्यात जी. चक्रधर जी, इन्हें हम पुनः कभी देख नहीं पायेंगे.
व्यंगचित्र के क्षेत्र में प्रतिभा संपन्न, वर्षों तक ‘‘सामान्य मनुष्य’’ के रुप में हमारी स्मृति में रहेंगे ऐसे आरके लक्ष्मण जी, न्याय के क्षेत्र में जिनकी प्रतिबद्धता और प्रखरता से सारा देश परिचित रहा ऐसे न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर जी, प्रख्यात स्तंभलेखक एवं कार्टूनिस्ट दिल्ली के राजिंदर पुरी, जाने माने पत्रकार तथा पायोनिअर एवं आऊटलुक के संस्थापक संपादक विनोद जी मेहता तथा योजना आयोग के सदस्य के नाते रहे ऐसे रजनी कोठारी जी की अनुपस्थिति सदा ही वेदना देती रहेंगी.
मेघालय के स्वधर्म जागरण संगठन ‘सेंगखासी’ में जिनकी प्रभावी भूमिका रही ऐसे एम्. एफ. ब्लो. (M. F. Blow), वैसे ही मेघालय के ही ‘पनार’ जनजाति में ‘‘दोलोय’’ (धार्मिक एवं प्रशासनिक प्रमुख) थे ऐसे के. सी. रिम्बाय (K. C. Rymbai) जो ‘स्वधर्म’ पालन का विचार दृढ़ता के साथ रखते थे, ऐसे दोनों महानुभाव अंतिम यात्रा पर प्रस्थान कर गये.
बंग्लादेश में जिनका वास्तव्य रहा और हिन्दु समाज जिनके मार्गदर्शन से लाभान्वित होता रहा ऐसे पू. महामण्डलेश्वर स्वामी प्रियव्रत ब्रम्हचारी जी तथा तेवक्केमठम् के पूज्य मठाधिपति शंकरानंद ब्रम्हानंदभूति मूप्पिल स्वामीयार जी का पार्थिव शरीर शांत हो गया.
गोरखाभूमि हेतु आंदोलन का नेतृत्व करने वाले बंगाल के सुभाष घीसिंग, मुंबई से सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री रहे मुरली देवरा जी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे अब्दुल रहमान अंतुले जी, महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री, युवा नेता आरआर पाटील जी, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मास्टर हुकुमसिंह, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक केरल के एमपी राघवन् तथा साम्यवादी विचारों के प्रखर पुरस्कर्ता गोविंद पानसरे जी राजनीतिक क्षेत्र में प्रभावी भूमिका निर्वहन करते हुए काल प्रवाह में ओझल हो गये.
विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं में एवं आतंकवादियों के हाथों अपने प्राण गंवाने वाले सामान्य-जन तथा देश की सुरक्षा हेतु अपना जीवन समर्पित करने वाले सेना तथा सुरक्षाबलों के वीर जवान आदि सभी को हम इस अवसर पर स्मरण करते हैं.
इन सभी दिवंगत बंधु-भगिनियों के परिवार जनों के प्रति अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा अपनी शोक संवेदना प्रकट करती है तथा इन दिवंगत आत्माओं को हम श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.
कार्यस्थिति :
2012 में नागपुर में संपन्न अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में हमने कार्य विस्तार पर चिंतन करते हुए निश्चित योजना पर कार्य करना प्रारंभ किया था. तीन वर्षों के सतत प्रयासों के संतोषजनक परिणाम सामने आये हैं. 2012 की तुलना में वर्तमान में 5161 स्थान और 10413 शाखाओं की वृद्धि हुई है. वैसे ही साप्ताहिक मिलन और संघ मंडली की संख्या में भी वृद्धि हुई है. संकलित वृत्त के अनुसार इस समय 33222 स्थानों पर 51330 शाखाएं, 12847 साप्ताहिक मिलन और 9008 संघ मंडली हैं. इसमें तरुण विद्यार्थिओं की 6077 शाखाएं है. कुल मिलाकर 55,010 स्थानों तक हम पहुंच गए हैं.
गत मार्च के पश्चात संपन्न संघ शिक्षा वर्गों में प्रथम वर्ष सामान्य एवं विशेष के 59 वर्गों में 9609 स्थानों से 15332 शिक्षार्थी, द्वितीय वर्ष सामान्य एवं विशेष के 16 वर्गों में 2902 स्थानों से 3531 शिक्षार्थी सहभागी हुए. तृतीय वर्ष के वर्ग में 657 स्थानों से 709 संख्या रही. इसी कालखंड में विभिन्न प्रान्तों में संपन्न प्राथमिक वर्गों में भी ग्रामों का प्रतिनिधित्व एवं शिक्षार्थियों की संख्या भी अच्छी रही है. कुल मिलाकर 23812 शाखाओं से 80409 संख्या रही.
परम पूजनीय सरसंघचालक जी का 2014-15 का प्रवास :  क्षेत्रश: प्रवास में संगठनात्मक बैठकों के साथ-साथ विशेष कार्यक्रमों में उपस्थिति और विशेष संपर्क की योजना बनी थी. देवगिरी प्रान्त का विशाल एकत्रीकरण और इम्फाल में संपन्न शीत सम्मेलन, दोनों ही कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं का सघन प्रयास और समाज का सहभाग अत्यंत प्रेरक रहा. ब्रज एवं उत्तराखंड के महाविद्यालयीन छात्र शिविर, नियोजन और उपस्थिति की दृष्टि से प्रभावी रहे.
कुछ स्थानों पर आयोजित वार्तालाप कार्यक्रमों में प्रसार माध्यमों के प्रमुख व्यक्ति, शिक्षाविद्, न्यायाधीश, शासकीय अधिकारी, संत, साहित्यकार आदि महानुभावों की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही.
विशेष संपर्क के क्रम में मंगलयान योजना के प्रमुख मन्नादुरै, नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, आचार्य महाश्रमण जी, भंते राहुलबोधि जी, स्वामी दयानंद सरस्वती जी, पुरी के महाराजा गजपती जी आदि महानुभावों से मिलना हुआ.
मा. सरकार्यवाह जी का प्रवास :   वर्ष 2014-15 की प्रवास योजना में अन्यान्य संगठनात्मक बैठकों के साथ ही एक विशेष बैठक का आयोजन सभी स्थानों पर किया गया. कार्य विस्तार के नाते अधिकाधिक ग्रामों तक कार्य खड़ा हो इस दृष्टि से जिले के मुख्य मार्ग पर आने वाले ग्रामों तक संपर्क करने की योजना बनाई गयी. ऐसे सभी ग्रामों से चयनित व्यक्तियों को निमंत्रित किया गया.
प्रवास के दौरान 11 क्षेत्रों में ऐसी 15 बैठकों का आयोजन किया गया जिसमें 34 जिलों के 1522 ग्रामों से 2919 लोग उपस्थित रहे. सभी बैठकों में आगामी कालखंड में कैसी रचना हो इस पर विचार हुआ. बैठकों में नए संपर्क में आए व्यक्तियों का प्रतिशत लगभग 40 रहा. अनुकूल वातावरण का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ. समग्रता से नियोजन होगा तो अच्छे परिणाम आऐंगे.
कुछ क्षेत्रों में विभिन्न गतिविधियों के प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठकें हुई. विशेषतः धर्मजागरण समन्वय विभाग का कार्य सुनियोजित पद्धति से बढ़ रहा है ऐसा कह सकते हैं.
कार्यकर्ता विकास वर्ग :  कार्यकर्ताओं की क्षमता विकास की दृष्टि से ‘‘कार्यकर्ता विकास वर्ग’’ का विचार किया गया है. जिला-विभाग स्तर का दायित्व निर्वहन करने वाले अधिक सक्षम हों यह विचार करते हुए पाठ्यक्रम तैयार किया गया. यह वर्ग क्षेत्रश: हो रहे हैं. वर्ष 2014-15 में मध्य-क्षेत्र और उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों के वर्ग संपन्न हुए. अनुभव अच्छा रहा. प्रतिवर्ष क्षेत्रश: वर्ग होने वाले हैं.
कार्य विभाग वृत्त :
(1) शारीरिक विभाग :  गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष प्रहार महायज्ञ में सभी बिंदुओं में – जैसे सहभागी शाखाएं, स्वयंसेवक, कुल प्रहार, 1,000 से अधिक प्रहार लगाने वालों की संख्या आदि – अच्छी वृद्धि हुई है. पचास प्रतिशत से अधिक शाखाओं के 3 लाख 27 हजार स्वयंसेवकों का सहभाग जिसमें 90 प्रतिशत स्वयंसेवक 45 वर्ष से कम आयु के थे. कुल 15 करोड़ 80 लाख प्रहार लगाये गये जो इस कार्यक्रम की उल्लेखनीय विशेषताएं हैं.
इस वर्ष उज्जैन में बालों के लिए मलखंब का विशेष प्रशिक्षण वर्ग आयोजित किया गया, जिसमें 26 प्रातों से 54 बाल एवं किशोर स्वयंसेवक सहभागी हुए.
घोष प्रमुखों की बैठक में 34 प्रांतों का प्रतिनिधित्व रहा. आसन-योग विषय का वर्ग भी संपन्न हुआ जिसमें 38 प्रांतों से 101 स्वयंसेवक सम्मिलित हुए.
(2) बौद्धिक विभाग :  इस वर्ष बौद्धिक विभाग द्वारा भोपाल में एक विशेष ‘अखिल भारतीय बौद्धिक अभ्यास वर्ग’ का आयोजन हुआ. इस वर्ग में (1) हिन्दुत्व – हिन्दु-राष्ट्र, (2) सामाजिक समरसता, (3) विकास की अवधारणा, (4) जैन, बौद्ध, सिक्ख धर्मों का सार, (5) मातृशक्ति इन पाँच विषयों की प्रमुख अधिकारियों द्वारा प्रस्तुति के बाद गटश: गहन चर्चा की गई. परम पूजनीय सरसंघचालक जी द्वारा प्रश्नोत्तर व मार्गदर्शन प्राप्त हुआ. इस वर्ग में कुल 194 उपस्थिति रही.
इस वर्ष सभी शाखाओं में राष्ट्रीय, स्वयंसेवक, संघ इन तीन शब्दों पर व्यापक रूप से चर्चा की गई. परम पूजनीय डॉक्टर जी के जीवन पर दो बौद्धिक वर्गों की योजना भी सभी शाखाओं के लिये की गई थी. लगभग सभी प्रान्तों में इस विषय पर बौद्धिक देने वाले वक्ताओं की तैयारी के लिये कार्यकर्ताओं की कार्यशालाएं भी आयोजित की गईं.
(3) प्रचार विभाग :  नारद जयंती के उपलक्ष्य में पत्रकार सम्मान तथा प्रबोधन के वार्षिक कार्यक्रमों की शृंखला में 118 स्थानों पर कार्यक्रम संपन्न हुए जिसमें 3,401 पत्रकार एवम् अन्य नागरिक उपस्थित रहे. कुल मिलाकर 355 स्तंभ लेखक संपर्क में आये हैं. कम्युनिटी रेडिओ चलाना एवं दूरदर्शन पर पैनल चर्चा के प्रशिक्षण वर्ग भी संपन्न हुए. परिणामस्वरुप 217 कार्यकर्ता विविध भाषाओं के 68 टेलिव्हिजन केद्रों पर आयोजित चर्चा सत्रों में नियमित जाने लगे हैं. पुणे और कोलकाता में पत्रकारों के लिए ‘संघ परिचय वर्ग’ का विशेष उपक्रम का आयोजन हुआ. इन वर्गों में महिला पत्रकारों समेत अच्छी संख्या में पत्रकारों ने सहभागी होकर संघ के बारे में जानने का प्रयास किया. जागरण पत्रिका के माध्यम से 2 लाख 27 हजार ग्रामों से संपर्क स्थापित हुआ है. इस वर्ष देशभर में प्रमुख 912 स्थानों पर 12,652 स्वयंसेवकों द्वारा साहित्य बिक्री के कार्यक्रम आयोजित किये गये.
प्रान्तों में संपन्न विशेष कार्यक्रम :
  1. ऐतिहासिक पथसंचलन – तमिलनाडु : इस वर्ष राजा राजेंद्र चोल के सिंहासनारोहण को 1000 वर्ष पूर्ण हुए. इस निमित्त विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन स्थान-स्थान पर हो रहा था. तमिलनाडु के कार्यकर्ताओं ने 9 नवंबर 2014 को सभी जिला केन्द्रों में पथसंचलन निकालने की योजना बनाई. राजनीतिक दबाव के चलते प्रशासन ने अनुमति देने से इंकार कर दिया. मामला न्यायालय में पहुंचा. न्यायालय ने संघ के पक्ष में निर्णय देते हुए पथसंचलन पर रोक लगाना ठीक नहीं ऐसा कहा, परंतु प्रशासन का दुराग्रह बना रहा. संघ ने न्यायालयीन निर्णय एवं अपनी योजना के अनुसार संचलन निकाले. सभी जिला केन्द्रों में संचलन में नागरिक, महिला एवं पुरुष भी सम्मिलित हुए. 35,000 बंधु-भगिनियों की गिरफ्तारियां हुई. एक अभूतपूर्व शक्ति का दर्शन हुआ है.
विधि सम्मत ढंग से कार्य करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ब्रिटिशकाल के किसी कानून की धारा के अंतर्गत गणवेश में संचलन करने की अनुमति न देना तमिलनाडु सरकार की तानाशाही का ही परिचायक था. प्रशासन के इस व्यवहार को लेकर न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज किया गया है.
  1. ‘समर्थ भारत’ – कर्नाटक दक्षिण : कर्नाटक दक्षिण प्रांत ने एक अभिनव प्रयोग किया. बंगलुरु में ‘समर्थ भारत’ संकल्पना से दो दिवसीय चर्चा सत्र का आयोजन किया गया.
युवाशक्ति, जो देश और समाज के लिए कुछ करना चाहती है, उन्हें चर्चा तथा विचार-विमर्श हेतु मंच उपलब्ध हो इस दृष्टि से ही यह आयोजन किया गया था. सोशल मीडिया द्वारा ऑनलाइन पंजीकरण हेतु आह्नान किया गया. परिणामतः कर्नाटक दक्षिण प्रांत से 3,852 युवक इस दो दिवसीय शिविर में सहभागी हुए. कार्यक्रमों का स्वरूप गटश: चर्चा का था. 48 प्रकार के विषय चर्चा हेतु तय किये गये थे. सामाजिक क्षेत्र के अनुभवी तथा विशेषज्ञ महानुभावों के साथ चर्चा का अवसर सहभागी बंधुओं को मिला. शिविर स्थान पर एक विशेष प्रदर्शनी लगाई गई थी जिसके द्वारा विविध सेवाकार्य और विभिन्न चुनौतियों की जानकारी दी गयी.
ग्राम विकास, सेवा-बस्ती के कार्य, जलसंवर्धन, स्वयंसेवी कार्य, महिला समस्या, शैक्षिक प्रयोग, पर्यावरण, वैचारिक आंदोलन, मतिमंद एवं विकलांग समस्याएँ आदि विषयों पर करणीय बातों की चर्चा हुई.
इस समग्र आयोजन की संकल्पना को इन शब्दों में वर्णित किया जा सकता है – ‘‘समूह हेतु संकल्पना’’ और ‘‘संकल्पना हेतु समूह’’ ( Theme for team and Team for theme). परिणामतः 77 युवकों ने एक वर्ष देश के लिए कार्य करने की सिद्धता प्रकट की.
इस कार्यक्रम से ध्यान में आता है कि युवा वर्ग परिश्रम, समय, शक्ति और अपनी बुद्धिमत्ता समाज हेतु अर्पण करने के लिए तैयार है. आवश्यकता है नियोजन और मार्गदर्शन की. कर्नाटक दक्षिण प्रांत का यह प्रयोग अनुकरणीय है.
  1. साप्ताहिक मिलन द्वारा सामाजिक समरसता हेतु प्रयास, कोंकण : कोंकण प्रान्त में रत्नागिरी जिले के दापोली तहसील का ग्राम आसोंदा. हमेशा पेयजल की समस्या से जूझने वाला यह ग्राम. सभी ग्रामवासियों ने सामूहिक प्रयासों से समस्या निवारण हेतु योजना बनाई. इस हेतु सभी परिवारों से निधि संकलन किया गया. ध्यान में आया कि ग्राम में सोलह परिवारों का सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है. ग्राम में व्यवसायी स्वयंसेवकों का साप्ताहिक मिलन प्रायः डेढ़ वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ था. सभी स्वयंसेवकों ने बस्ती तथा समुदायश: चर्चा करते हुए सामाजिक समरसता की दिशा में प्रयास प्रारम्भ किया. ग्राम-सभा में इस गंभीर समस्या पर चर्चा हुई. बहिष्कृत सोलह परिवारों को जनजागरण के द्वारा समाज के साथ ससम्मान जोड़ने के प्रयास प्रारम्भ हुआ. लगभग चार महीनों के निरंतर प्रयासों से वातावरण सकारात्मक बनता चला गया. परिणामतः बस्ती वालों ने ही ग्राम प्रमुख को पत्र लिखकर समस्या सुलझाये जाने की जानकारी दी. आज सारे परिवार मिलजुल कर रहते हैं. समाज ने स्वयंसेवकों के प्रयासों की सराहना की.
  2. ‘महासंगम’ – देवगिरी प्रान्त : कार्यविस्तार की कल्पना को सामने रखते हुए देवगिरी प्रान्त ने ‘महासंगम’ का आयोजन दिनांक 11 जनवरी 2015 को किया था. एक वर्ष के श्रृंखलाबद्ध कार्यक्रमों की रचना करते हुए व्यापक संपर्क के द्वारा मंडल इकाइयों तक पहुंचने का प्रयास रहा. प्रान्त के सभी 123 खण्डों में खण्डश: बैठकों का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के पूर्व लगभग तीन मास पूर्व पंजीकरण रोका गया. तब तक 60,000 का पंजीकरण हो चुका था. कार्यक्रम में 1,223 मंडलों से, 686 बस्तियों से, 3,196 स्थानों से 42,870 स्वयंसेवक उपस्थित रहे. महासंगम में लगभग 25,000 नागरिक महिला, पुरुषों की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही.
महासंगम में 60 प्रतिशत उपस्थिति पंद्रह से चालीस आयु वर्ग की थी. भोजन व्यवस्था की दृष्टि से 20,000 हजार परिवारों से ढाई लाख रोटियां संकलित की गई थीं. यह आयोजन प्रान्त में कार्यविस्तार की दृष्टि से अत्यंत परिणामकारक रहा. शाखा, मिलन तथा मंडली की संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है.
  1. कार्यकर्ता शिविर, गुजरात : तीन वर्ष पूर्व इस प्रकार के शिविर का विचार किया गया था. तेरह वर्ष से अधिक आयु के स्वयंसेवक, जो शाखा टोली से लेकर ऊपर तक के दायित्व का निर्वहन कर रहे हों, ऐसे ही स्वयंसेवकों को शिविर में शामिल करने का निश्चय किया गया था. यथासमय पंजीकरण प्रक्रिया प्रारंभ हुई और शिविर से तीन मास पूर्व पंजीकरण प्रक्रिया पूर्ण हुई. सभी जिलों एवं तहसीलों से प्रतिनिधित्व रहा. कुल 1,084 मंडलों के 2,165 स्थानों से, 4 महानगरों की 786 बस्तियों से और अन्य नगरों की 819 बस्तियों से 14,370 उपस्थिति रही. 79 प्रतिशत स्वयंसेवक 40 वर्ष से कम आयु वर्ग के थे. प्रदर्शनी विशेष आकर्षण का केन्द्र बनी. नगर के विभिन्न विद्यालयों के छात्र एवं अन्य नागरिक अच्छी संख्या में प्रदर्शनी देखने शिविर स्थान पर आये थे. शिविर में मातृशक्ति, अध्यापक वर्ग और संत ऐसे तीन सम्मेलनों का भी आयोजन किया था. समापन समारोह में द्वारका शारदा पीठ के प.पू. दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त हुआ.
  2. राष्ट्र साधना सम्मेलन, यवतमाल – विदर्भ : ग्यारह जनवरी को विदर्भ प्रान्त के यवतमाल विभाग ने ‘राष्ट्र साधना सम्मेलन’ का आयोजन किया था. कार्यविस्तार एवं दृढ़ीकरण की दृष्टि से किया गया यह आयोजन अपेक्षाकृत सफल रहा.
पूर्व तैयारी के नाते से तीन से सात दिन तक तहसील, जिला और विभाग स्तर के कार्यकर्ता विस्तारक के नाते स्थान-स्थान पर गए. बारह कार्यकर्ता एक से डेढ़ माह तक विस्तारक के नाते निकले. परिणामतः सभी चौबीस तहसीलों से, नगर की सभी चौबीस बस्तियों से, 261 में से 206 मंडलों के 469 ग्रामों से 5,767 स्वयंसेवक इस सम्मेलन में उपस्थित रहे.
शारीरिक कार्यक्रम बहुत अच्छा रहा. परिसर के गणमान्य नागरिकों तथा जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही. संपूर्ण कार्यक्रम में पर्यावरण की दृष्टि से प्लास्टिक का प्रयोग नहीं किया गया. प्रकट कार्यक्रम से पूर्व तीन स्थानों से पथ संचलन निकला. स्वागत समिति के माध्यम से अनेक गणमान्य नागरिकों का सहभाग अच्छा रहा. अनुवर्तन की योजना भी बनी है.
  1. महाविद्यालयीन कार्य, मालवा : प्रांत में इस कार्य हेतु वार्षिक योजना बनाई गयी. उत्सव, संचलन कार्यक्रम महाविद्यालयीन छात्र केन्द्रित हुए. इस वर्ष शीत शिविर में 1238 महाविद्यालयीन स्वयंसेवक उपस्थित रहे. ‘‘परिवर्तन का वाहक – प्राध्यापक’’ इस विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया. इसमें 184 प्राध्यापक उपस्थित थे. चिकित्सा क्षेत्र के छात्रों हेतु ‘‘संघ परिचय’’ वर्ग संपन्न हुआ जिसमें 12 महाविद्यालयों के 126 छात्र उपस्थित रहे.
  2. महाकौशल प्रान्त : महाकौशल प्रान्त के तीन कायक्रमों का वृत्त भी उत्साहवर्धक है.
(1) व्यापक संपर्क योजना – नगरीय क्षेत्रों में सभी बस्तियों में कार्य बढ़े इस दृष्टि से एक संपर्क योजना बनाई गई. एक से सात अक्तूबर इस कालखंड में प्रान्त के सभी 157 नगरों की 1,107 बस्तियों में परिवार संपर्क हेतु गटनायक तय किये गए. कुल 7,254 स्वयंसेवकों के द्वारा 3,17,264 परिवारों से संपर्क हुआ. संघ कार्य की जानकारी के साथ नित्योपयोगी स्वदेशी वस्तुओं की सूची भी घर-घर दी गयी. भविष्य में निश्चित ही नये-नये उपक्रमों के द्वारा बस्तियों में कार्य प्रारंभ होगा.
(2) विस्तारक योजना – 1 से 15 दिसंबर इस कालखंड में अधिक से अधिक स्वयंसेवक विस्तारक निकलें ऐसी योजना बनी थी. प्रान्त के 17 जिलों से 62 नगरों से, 288 शाखाओं से 7 दिन और उससे अधिक दिनों के लिए 839 विस्तारक निकले. परिणामतः 249 नये स्थानों पर शाखा प्रारम्भ हुई हैं. इस वर्ष प्रान्त में संपन्न प्राथमिक शिक्षा वर्गों में 2,884 स्थानों से 6,111 शिक्षार्थी सम्मिलित हुए.
(3) स्वास्थ्य शिविर – सेवा विभाग द्वारा सेवाभारती के सहयोग से सात जिलों में 17 स्वास्थ्य शिविर संपन्न हुए जिसमें 549 ग्रामों से लगभग 24,000 बंधु लाभान्वित हुए. शिविर में 143 विकलांग बंधुओं को साइकिल, 100 को श्रवण यंत्र, 249 को व्हीलचेअर, 75 अंध बंधुओं को ‘सहारा छड़ी’ प्रदान की गयी. 281 शाखा के 736 स्वयंसेवकों ने इन शिविरों में कार्य किया. इस माध्यम से कई विशेषज्ञ चिकित्सक सेवाभारती से जुड़े हैं.
  1. संघ परिचय वर्ग, हरियाणा : हरियाणा प्रान्त में गत सत्र में 4723 कार्यकर्ताओं ने प्राथमिक संघ शिक्षा वर्गों में प्रशिक्षण प्राप्त किया. जिसके फलस्वरुप शाखायुक्त मंडलों की संख्या में 30 प्रतिशत, शाखायुक्त बस्तियों की संख्या में 23 प्रतिशत, शाखा स्थानों में 34 प्रतिशत एवं कुल शाखाओं में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसी प्रकार नये बन्धु जो JOIN RSS के माध्यम से जुड़ने की इच्छा व्यक्त करते है उनके लिये 5 घंटे का एक संघ परिचय कार्यक्रम ‘‘300 मिनिट संघ के निकट’’ 14 दिसंबर 2014 को संपन्न हुआ. जिसमें 225 ऊर्जावान युवाओं की सहभागिता रही.
  2. साहित्य दर्शन एवं पुस्तक प्रदर्शनी तथा पुस्तक मेला, जालंधर – पंजाब : जनसामान्यों को अपने धर्मग्रंथों से, अपने इतिहास के प्राचीन साहित्य से तथा संघ साहित्य से अवगत कराने के उद्देश्य से सोलह से अठारह जनवरी इस मेले का आयोजन किया गया था.
वेद-पुराण, उपनिषद्, जैन ग्रंथ व गुरुग्रंथ साहब की प्रतियों (सैचियों) के साथ महापुरुषों की जीवनियाँ, संघ साहित्य, सामाजिक विषयों पर उपन्यास आदि पुस्तकें बिक्री के लिये उपलब्ध थीं. अनेक गणमान्य महानुभावों की मेले में उपस्थिति प्रेरक रही. उन्नीस विद्यालयों व छह महाविद्यालयों के छात्र मेले में सहभागी हुए. 120 कार्यकर्ता मेले की सफलता हेतु कार्यरत थे. स्थानीय प्रसार माध्यमों का सहयोग भी अच्छा रहा.
  1. महाविद्यालयीन छात्र शिविर, उत्तराखंड : पतंजलि योग पीठ के पावन परिसर में उत्तराखंड प्रांत का महाविद्यालयीन छात्रों का शिविर संपन्न हुआ. प.पू.सरसंघचालक जी का सान्निध्य शिविरार्थियों को प्राप्त हुआ. शिविर की पूर्व तैयारी के नाते स्थान-स्थान पर कार्यकर्ता प्रशिक्षण बैठकें तथा अखंड भारत विषय पर सामूहिक गोष्ठियों का आयोजन किया गया. शिविर पूर्व पंजीकरण किया गया जिसमें 4,703 छात्रों का पंजीकरण हुआ. शिविर में 4,875 महाविद्यालयीन छात्र, 105 विधि स्नातक, 38 शोध छात्र, 93 वैद्यकीय और तकनीकी छात्र उपस्थित थे. 31 प्राध्यापक बंधु भी शिविर में सम्मिलित हुए. प.पू.सरसंघचालक जी की उपस्थिति में आयोजित बैठक में विविध विश्वविद्यालयों के 11 कुलपति उपस्थित थे.
समापन समारोह में पू. स्वामी रामदेव जी की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही. समारोह में लगभग 5,300 नागरिक महिला, पुरुष उपस्थित थे. इस आयोजन के परिणामस्वरुप प्रान्त में महाविद्यालयीन छात्रों की 98 शाखाएं एवं 179 साप्ताहिक मिलन प्रारंभ हुए हैं.
  1. विभागश: एकत्रीकरण, मेरठ प्रांत : इस वर्ष प्रांत में विभागश: एकत्रीकरण की योजना बनाई गई. इस कार्यक्रम हेतु 3,677 गटनायक बनाये गये और 87,116 स्वयंसेवकों का संपर्क हुआ. छह स्थानों पर हुए एकत्रीकरण में 52,985 की उपस्थिति रही. कुल 3,500 ग्रामों का प्रतिनिधित्व हुआ.
  2. युवा संकल्प शिविर, ब्रज प्रांत : आगरा में दिनांक एक से तीन नवंबर ‘युवा संकल्प शिविर’ का आयोजन किया गया. शिविर में सभी जिलों से 1,064 स्थानों से 3,817 शिविरार्थी सम्मिलित हुए. दस अध्यापकों और 153 शिक्षकों की भी उपस्थिति रही. इसके अतिरिक्त लगभग 1,000 स्वयंसेवक प्रबंधक के नाते आये थे. प.पू.सरसंघचालक जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ. बाबा श्री सत्यनारायण मौर्य द्वारा प्रस्तुत नाट्य-गीत का मंचन, ओलंपिक पदक विजेता श्री राज्यवर्धन सिंह राठौर व पटना के सुपर-30 के संचालक श्री आनंद कुमार, इनकी उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही.
सामाजिक जीवन में सेवा जागरण की दृष्टि से कार्य करने वाले बंधुओं के स्वागत-अभिनंदन का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया था. ‘दिव्य प्रेम सेवा मिशन’ के श्री आशीष गौतम जी, दीनदयाल शोध संस्थान के श्री भरत पाठक जी, वनवासी कल्याण आश्रम कन्या छात्रावास रुद्रपुर की सुश्री वर्षा घरोटे, गोपालक श्री रमेश बाबा एवं ‘कल्यांण करोति’ के संचालक श्री सुनील शर्मा जी आदि युवा कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया.
  1. उत्तर असम : उत्तर असम प्रांत में एक विशेष योजना के अनुसार सात दिन के 258 अल्पकालीन विस्तारक निकले जिसके कारण 188 शाखाओं की वृद्धि हुई.
  2. विषेश कार्यक्रम, मणिपुर प्रान्त : अपने प्रवास क्रम में प.पू.सरसंघचालक जी का इस वर्ष मणिपुर जाना हुआ. वर्तमान एवं पूर्व प्रचारक बैठक, एकल विद्यालय के प्रशिक्षण केन्द्र का लोकार्पण, विविध कार्यों में कार्यरत पूर्णकालिक कार्यकर्ता एवं क्षेत्र स्तरीय संगठन मंत्री बैठक आदि कार्यक्रम संपन्न हुए.
दि. 7 दिसंबर 2014 को प्रान्तीय शीत सम्मेलन संपन्न हुआ. समापन कार्यक्रम की अध्यक्षता मणिपुर के महाराजा लैसेंबा सनाचैबा ने की. सम्मेलन में 400 स्थानों से 7,000 नागरिक उपस्थित रहे. इस हेतु 685 गटनायक बनाये गए थे. संघ कार्य की दृष्टि से सम्मेलन की सफलता समाज द्वारा अपने कार्य की स्वीकार्यता का परिचायक है. प्रवास में इम्फाल के गणमान्य विशेष महानुभावों के साथ वार्तालाप का कार्यक्रम भी सफल रहा.
इस वर्ष कार्यविस्तार की दृष्टि से अल्पकालीन विस्तारक योजना बनाई गई. जिसमें कुल 38 विस्तारक निकले. फलस्वरुप 38 शाखाओं की वृद्धि हुई है जिसमें 18 स्थान नये है.
राष्ट्रीय परिदृश्य :
गत दिनों में विविध मंचों, संस्थाओं द्वारा संपन्न हुए कार्यक्रमों में हिन्दु समाज का सहयोग एवं सहभागिता बहुत प्रेरक रही है.
चेन्नई में संपन्न ‘हिन्दु आध्यात्मिक एवं सेवा मेला’ (Hindu spiritual and service fair) में सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं की सहभागिता विशेष रही. लगभग सप्ताह भर चले इस आयोजन में विद्यालयों, महाविद्यालयों के छात्रों का अवलोकनार्थ आना और साथ ही जनसामान्य का उत्साह अवर्णनीय रहा है. लगभग 8 लाख लोग इस कालखंड में कार्यक्रम स्थल पर आये थे. 232 धार्मिक एवं जाति बिरादरी की संस्थाओं ने अपने कार्य की जानकारी प्रस्तुत की. 11-12 प्रांतों से कार्यकर्ता आयोजन देखने आये थे. आयोजन का स्वरूप बहुत ही प्रभावी, आकर्षक रहा है. आने वाले दिनों में देश के अन्य प्रांतों में भी इस प्रकार के आयोजन हों ऐसी कल्पना है. सामाजिक, शैक्षणिक, आध्यात्मिक एवं सेवा के क्षेत्र में हिन्दु संस्थाओं की भूमिका प्रभावी है इस प्रकार का विश्वास निर्माण होता है.
मालवा प्रांत के महेश्वर में नर्मदा तट पर प.पू.सरसंघचालक जी की उपस्थिति में संपन्न ‘माँ नर्मदा हिन्दु संगम’ अपने आप में एक सफल आयोजन सिद्ध हुआ. ग्राम-ग्राम में गठित ‘धर्म रक्षा समिति’ में ग्रामवासियों का सहभाग, कार्यक्रम पूर्व निकाली गई कलश यात्रा में माताओं का सहभाग तथा ग्राम-ग्राम में लगभग 5 लाख परिवारों तक व्यापक संपर्क अभूतपूर्व रहा. प्रत्यक्ष संगम में 1 लाख 35 हजार बंधुओं की और 150 से अधिक संत-वृंद की उपस्थिति हिन्दु विचार की स्वीकार्यता का ही परिचायक है.
वैसे ही मध्यप्रदेश में नर्मदा तट पर संपन्न नदी उत्सव, उत्तराखंड का थारु वनवासी सम्मेलन इन कार्यक्रमों द्वारा जागृत हुई चेतना का भी विशेष उल्लेख आवश्यक है.
राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय विचारों का प्रभाव :
मई 2014 में संपन्न लोकसभा चुनाव में भारत की जनता ने राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया है और देश में स्थिर एवं सुव्यवस्थित सरकार बनाने के पक्ष में मतदाताओं ने अपना मत व्यक्त किया है. यह पहला अवसर है कि भारतीय चिंतन में प्रतिबद्धता रखकर चलने वाले राजनीतिक दल को बहुमत से विजयी बनाकर समाज ने अपना विश्वास व्यक्त किया है. कई वर्षों के बाद इस विचार से प्रेरित समूह आज ‘निर्णय-केन्द्र’ में स्थापित हुआ है. नीति निर्धारक, चिंतक एवं तज्ञों के सहयोग से संतुलित चिंतन करते हुए कालसुसंगत योजनाएँ बनें एवं क्रियान्वित हों यह स्वाभाविक अपेक्षा है.
जनसामान्य की इच्छा आकांक्षाओं की पूर्ति के साथ ही देश की सुरक्षा, स्वाभिमान, सार्वभौमत्व अबाधित रहे. भारतीय चिंतकों-मनीषियों द्वारा समय-समय पर प्रस्तुत चिंतन और भारत की जीवनशैली एवं मूल्यों के प्रकाश में विकास की अवधारणा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है. ग्रामीण जनजीवन, संस्कृति, अनुसूचित जाति-जनजाति की आवश्यकताओं एवं भावनाओं को सर्वोपरि रखा जाय.
भारत का श्रेष्ठ चिंतन, परंपराएँ, जीवनमूल्य तथा संस्कृति विश्व के लिये सदा मार्गदर्शक रही है. वर्तमान सरकार भारत की अपनी विशेषताओं का विश्व-मंच पर प्रतिनिधित्व करे यही देशवासियों की अपेक्षा है.
जम्मू-कश्मीर में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के बाद राज्य में नई सरकार बनी है किन्तु राज्य के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद द्वारा आतंकवादियों, हुर्रियत कान्फ्रेंस तथा पाकिस्तान को शांतिपूर्ण चुनाव का श्रेय देने वाला वक्तव्य सभी दृष्टि से अवांछनीय ही कहा जायेगा. जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुए चुनावों का श्रेय राज्य की शान्तिप्रिय जनता, राजनीतिक दल, सेना व सुरक्षाबलों, वहां के प्रशासनिक अधिकारियों तथा चुनाव आयोग को ही दिया जाना चाहिये.
विश्व की स्पर्धा में भारत की प्रतिष्ठा बढ़े और शाश्वत विकास का उदाहरण प्रस्तुत करने वाला भारत कैसे विश्व के सम्मुख प्रस्तुत हो यह वर्तमान की एक बड़ी चुनौती है. पड़ोसी देशों से मित्रता बढ़े यह क्षेत्र की सुख शांति के लिये अनिवार्य है. पड़ोसी देशों से भी हम इसी प्रकार के सकारात्मक सहयोग-संवाद की अपेक्षा रखते हैं. विश्वास ही परस्पर मित्रता का आधार रहता है. विविध देशों में रह रहे भारत मूल के निवासी भी वर्तमान सरकार और नेतृत्व की प्रभावी भूमिका से गर्व का अनुभव कर रहे हैं. अतः जन-जन की अपेक्षाओं, भावनाओं एवं संवेदनाओं को समझते हुए वे कार्य करें, देश यही अपेक्षा कर रहा है. जनसामान्य सरकार की मर्यादाओं को भी समझते है.
स्वच्छता अभियान, गंगा सुरक्षा जैसे विषयों पर सरकार द्वारा हो रहे प्रयास निश्चित ही अभिनंदनीय हैं. जनसहभागिता के द्वारा ही ऐसी समस्याओं के समाधान की दिशा में बढ़ा जा सकता है. सही दिशा में चल रहे ऐसे सभी प्रयासों का सारा देश स्वागत कर रहा है.
अराष्ट्रीय शक्तियाँ व्यथित होकर अनावश्यक बातों को चर्चा का मुद्दा बनाकर वातावरण दूषित करने का प्रयास करती रहती हैं. देशवासी इस संदर्भ में सजग रहें. इस दिशा में सभी राष्ट्रीय विचार मूलक शक्तियों को मिलकर पहल करनी होगी.
समापन :  आज देशभर में हम अनुकूलता का अनुभव कर रहे हैं. संघ कार्य की स्वीकार्यता और हिन्दुत्व के चिंतन के प्रति विश्वास भी बढ़ा है. स्वाभाविक ही है कि यह अपने कार्यवृद्धि के लिए भी सुसमय है. यदि हम सुनियोजित ढंग से और परिश्रमपूर्वक योजना बनाते हैं तो आने वाले निकट भविष्य में अपने कार्य के सुपरिणाम हम निश्चय ही अनुभव करेंगे. संकल्प करें, दृढ़तापूर्वक सब मिलकर आगे बढ़ें, जीवन के सभी क्षेत्रों में अपने विचारों का प्रभाव स्थापित करते हुए समाज की सृजनात्मक शक्ति को विश्व के सम्मुख प्रस्तुत करें.





Friday, October 17, 2014

बिना भेदभाव के नागरिक और राष्ट्रीय बोध जगाने का काम करता है संघ: श्री दत्तात्रेय होसबाले - गाँव-गाँव तक पहुँचा संघ कार्य

लखनऊ-17 अक्तूबर, 2014। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बिना किसी भेदभाव के अपने कार्यों के विस्तार के साथ ही समाज में नागरिक बोध जगाने का काम करता है जिससे देश में अनुसान, कर्मनिष्ठा, सार्वजनिक स्वच्छता, पर्यावरण आदि विषयों में जाग्रति आये। संघ राहत कार्यों में हिन्दू और मुसलमानों में भेद नहीं करता।  संघ सम्पूर्ण देश के बारे में चिन्तन करता है। सरकार को काम करने का समय देना चाहिए। कार्यों की प्राथमिकता तय करना सरकार पर छोड़ना चाहिए।
अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की बैठक लखनऊ में प्रारम्भ




यह बात रा.स्व.संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कही। वह अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की बैठक होने के अवसर पर पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे। उन्होंने कहाकि अखिल भारतीय तथा क्षेत्रीय पदाधिकारियों की यह बैठक दशहरा व दीवाली के बीच में होती है। यह सामान्य बैठक है। फिर भी तात्कालिक विषयों पर इसमें चर्चा होती है। जम्मू-कश्मीर, आन्ध्र, उड़ीसा, मेघालय की दैवीय आपदा तथा कश्मीर में सीमा पार की गोलीबारी से मारे गये लोगों व शहीद सैनिकों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त की गयी। उड़ीसा, आन्ध्र, मेघालय, जम्मू-कश्मीर में प्राकृतिक आपदा के 6-7 घण्टे के अन्दर ही संघ के स्वयंसेवक राहत कार्य में लग गये थे। जम्मू-कश्मीर की आपदा में 3085 लोगों को स्वयंसेवकों ने सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया, 140 स्वास्थ्य शिविर लगाये गये। जिसमें 21 हजार लोगों का इलाज किया गया। इसके अलावा बड़ी मात्रा में राहत सामाग्री वितरित की गयी। संघ आपदा प्रभावित सभी इलाकों में पुनर्वास का काम करेगा। जम्मू-कश्मीर में ठण्ड बढ़ेगी, इसे ध्यान में रख कर विशेष राहत कार्य किया जायेगा। 
पिछले 3 वर्षों में रा.स्व.संघ के कार्यों का बहुत विस्तार हुआ है। सभी मुख्य मार्गों के दोनों ओर के सभी गावों में संघ कार्य को विस्तार देने की योजना बनायी गयी है। अण्डमान से लेकर लेह-लद्दाख तक देश के सभी हिस्सों में संघ की 4500 शाखाएँ एवं 1500 साप्ताहिक मिलन बढ़े हैं, कई प्रान्तों में 20 प्रतिशत कार्य बढ़ा है। आॅनलाइन ज्वाॅइन आर.एस.एस. नाम से शुरू हुए सोशल मीडिया कार्यक्रम से लोग बड़ी संख्या में जुड़ रहे हैं। संघ कार्य से परिचित कराने के लिए 1-2 दिन के संघ परिचय वर्ग लगाये जा रहे हैं, इसमें भारी संख्या में लोग सम्मिलित हो रहे हैं जिसमें अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों को संघ से परिचित कराया जायेगा। समाज में अनुशासन, सफाई, नागरिक बोध, वृक्षारोपण आदि माहौल बनाने के लिए अभियान चलाने पर भी चर्चा होगी। देशहित में ऐसे कार्य संघ पहले से ही करता आ रहा है।-----(प्रस्तुति - पवनपुत्र बादल)
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Wednesday, March 12, 2014

प. पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी का बौद्धिक

                   प. पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी का बौद्धिक
                               16 फरवरी 2014
                           स्थान ः भाऊराव देवरस सभागार
                        निवेदिता शिक्षा सदन, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

माननीय क्षेत्र संघचालक जी और माननीय विभाग संघचालाक जीउपस्थित अन्य अधिकारीगण एवं आत्मीय स्वयंसेवक बन्धुओं. ये मेरा भी सौभाग्य है कि प्रवास के निमित्त देश के विभिन्न स्थानों पर जाना होता हैऔर आप सब लोगों के दर्शन का अवसर मिलेलगभग दो तीन वर्षों में एकाध बार अवश्य प्राप्त होता ही है. यहाँ कार्यक्रम की प्रस्तावना में यह कहा गया कि, आपका सौभाग्य है कि सरसंघचालक जी के दर्शन हो गएऔर मैं कह रहा हूँ कि मेरा सौभाग्य ये है कि आपके दर्शन हो गए. अब ८८ वर्षों से ये संघ चल रहा हैतो ये भाषा भी अपनी परिचित है. लेकिन हम सबलोग जानते हैं, और अगर नहीं जानते हैं तो हमको ये जानना चाहिए कि ये भाषा मात्र नहीं हैकोई कार्यकर्ता मिलता हैदीखता हैस्वयंसेवक को आनंद होता है. स्वयंसेवक को स्वयंसेवक मिलता है तो मिलने मात्र से आनंद है. ट्रेन में मिल जाएबस में मिल जाएनया अपरिचित मिल जायेऔर पता चले कि वो स्वयंसेवक है तो एक आनंद की अनुभूति हम सब लोग करते हैं. अब आप विचार कीजिये कि अपने देश के आज के वातावरण में ये एक चमत्कार हीहै की नहींएक दुसरे को लोग देखते हैंतो पहला विचार तो ये करते हैं की ये मेरे किस काम आएगादूसरा विचार ये करते हैं की ये मेरे काम आएगा कि मेरे काम के विरुद्ध जायेगाऔर फिर उसके अनुसार उनका व्यवहार होता है. यहाँ पर देश में लाखों लोग ऐसे हैं की जो मिल जायेऔर एक परिचय मिल जाये की हम संघ के स्वयंसेवक हैंतो सब आनंदित हो जाते हैंऔर एक दुसरे पर विश्वास रखकर आत्मीयता का व्यवहार करते हैं,और ऐसा उनका व्यवहार अनेक वर्षों से चल रहा हैजिसका अनुभव वो तो कर ही रहे हैं लेकिन समाज भी कर रहा है.
समाज का स्वयंसेवकों पर विश्वास:
समाज को भी और किसी परिचय की आवश्यकता नहीं हैसमाज को अगर पता चल गया कि ये स्वयंसेवक हैतो समाज भी एकदम आश्वस्त हो जाता है. अभी उत्तरान्चल में इतना बड़ा एक विभीषिका हो गयीतो उस समय तो लोगों का वहाँ पहुँचना भी दूभर थाअन्दर वाले अन्दर फंसे थे बाहर वाले बाहर खड़े थेसबसे पहले लोग वहां पर विमान लेकर पहुंचे और हमारे स्वयंसेवक पैदल पहुंचे. बद्रीनाथ के आस-पास कुछ चार-साढ़े चार हज़ार लोग फंस गए थेऔर अपने स्वयंसेवक लोग वहां जाने के प्रयत्न में थेसाधन कुछ मिल नहीं रहा थाजल्दी जाना थासेना के लोगों को भी सूचना हो गयी की वहां लोग फंसे हैं,तो उन्होंने झट अपना एक विमान बुला लियाऔर उसमे वहां के लिए निकलने को तैयार हो गएअपने स्वयंसेवकों को पता चलास्वयंसेवक वहां गएजैसे संघ का अनुशासन है, वैसे सेना का भी अनुशासन है. सेना के विमान में जाने वालों की तो सूचि होती हैऔरउतने ही लोग जाते हैंबाकि लोगों को जाने की अनुमति होती नहीं है. लेकिन लोग फंसे हैंउनको मदद करनी हैये व्याकुलता इतनी तीव्र थी की अपने दो स्वयंसेवकउस विमान में जैसे तैसे घुस गए, विमान में जो लोग जा रहे थेउनके जो प्रमुख थे उनको भी पता नहीं था. विमान के उड़ने के बाद सेना के लोगों ने गिना तो दो लोग ज्यादा थे, उन्होंने पूछा“भाई आप लोग किस रेजिमेंट के हो? स्वयंसेवकों ने उत्तर दिया, “हम रेजिमेंट- वेगिमेंट से नहींहम आर०एस०एस० के लोग हैं”तो विमान प्रमुख बोले, “अच्छा बिना अनुमती तुम घुस गएविमान नहीं होता तो बाहर फेंक देता तुम्हेंलेकिन अब चलो,वापसी में अपना रास्ता ढूंढ लेना”उन्होंने (स्वयंसेवकों ने) कहा, “ठीक है हमको तो जाना ही हैवापसी का हमने सोचा ही नहीं”. विमान उतरा, वहाँ सारी भीड़ थी, वो आशावादी निगाहों से देख रही थी, विमान उतरा, एक ही विमान था, वह भी छोटा विमान, १०-१२ लोग जिसमे आते हैं. कुछ लोगों को निराशा भी लगी होगी, की जल्दी छुट्टी नहीं होगी, लेकिन जैसे ही वो दो निक्करधारी स्वयंसेवक उतरे, वो सारी चार साढ़े चार हज़ार की भीड़ में एक बात चली, अरे वो निक्कर वाले आ गए, अब सब ठीक हो जाएगा. ये निक्कर वालों के प्रति समाज का विश्वास है, क्यों है? क्योंकि हमारा एक आचरण ८८ वर्षों से चल रहा है, उस आचरण को बढ़ते हुए कार्य में भी संगठन के प्रत्येक घटक में उत्पन्न करने की सतत साधना, सतत तपस्या हम सब लोग कर रहे हैं. इसका बड़ा महत्व है और यही उपाय है.
समस्या नहीं, उपायों की चर्चा:
अपने संगठन में समस्याओं की चर्चा, केवल जानकारी रखने के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही होती है. परिस्थिति का डर दिखाकर लोगों को खड़ा करना, ये हमारा उपाय नहीं है, ये हमारा प्रयास ऐसा नहीं रहता, बाकी लोग करते हैं, एक दुसरे के प्रति डराना, परिस्थिति के प्रति डराना, उसके आधार पर अपने छत्र के नीचे लाना. हमारे यहाँ ऐसा नहीं है, हम लोग उपायों की चर्चा करते हैं. डॉ० साहब के भी जो उपलब्ध हैं, दो तीन भाषण उपलब्ध हैं, वो आपने पढ़े, तो आपके ध्यान में आएगा, कि देश की परिस्थिति को इतनी बारीकी से समझने वाले डॉ० साहब, संघ स्थापना के बाद, स्वयंसेवकों के सामने जब-जब बोलते थे, तो बहुत ज्यादा परिस्थिति का वर्णन नहीं करते थे, उस परिस्थिति का उपाय करने के लिए जो करना चाहिए, उसके बारे में ही ज्यादा बोलते थे. हमारा भी स्वभाव वैसा ही बना है, और इसीलिए उसी की चर्चा हम ज्यादा करते हैं. क्योंकि हमें पता है की परिस्थिति क्या है, इसका महत्व नहीं है, परिस्थिति तो रहती ही है, और वो अपने हाँथ में नहीं रहती है, और वो नित्य बदलती रहती है. कल वर्षा थी, आज धूप है, और कल फिर से क्या होगा? कोई बता नहीं सकता. नित्य बदलने वाली परिस्थिति में हम हैं, उपाय करने वाले हम तब भी थे, आज भी हैं, और कल भी रहेंगे. और इसलिए हम जो उपाय करेंगे उसके आधार पर परिस्थिति को झेलना सबके लिए संभव हो जायेगा. परिस्थिति अनेक प्रकार की प्रतिकूल भी हैं, परिस्थिति का विचार करते हैं, जब लोग बोलने लगते हैं, तो लोगों का दिल जैसे बैठ जाता है, क्योंकि इतने संकट हैं, सीमायें सुरक्षित नहीं, आर्थिक स्थिति बिगड़ गयी है, सामाजिक स्थिति कलहों से भरी है, लोगों में स्वार्थ प्रबल है, अब ऐसी सब बातें सामने आती हैं तो लोग कहते हैं, इसका मतलब कुछ करना बेकार है, तो परिस्थिति के डर से कुछ करने के लिए प्रवृत्त होने की बजाय लोग बैठ जाते हैं, जो करना चाहते हैं उनका हाल ऐसा हो जाता है की इधर दौडूँ या उधर दौडूँ, पहले चीन को रोकूँ की पाकिस्तान को रोकूँ, भ्रष्टाचार को समाप्त करूं की गरीबी को हटाऊँ, कई ऐसी बातें हैं जो करने लायक हैं और एक आदमी के मन में इतने सारे सवाल उठते हैं, ये करना की वो करना. लेकिन इधर जाओ उधर जाओ, ये करो वो करो से, इन सब बातों का मूल कहाँ है, उसको देखना और उसका उपाय करना, तो सारी बातें ठीक हो जाती हैं, ये अगर हम करते हैं, तो सब ठीक होता है. एक बार ऐसा हुआ, जंगल में एक खरगोश सो रहा था, छोटा सा खरगोश, कोमल उसका शरीर, सुन्दर भी बड़ा दिखने वाला. सोया था तो ताड़ का पेड़ था जंगल में उसका एक पत्ता सूखा था, टूट कर गिर गया, आवाज़ हुई ताड़ से, हडबडा के वो खरगोश जागा, और भागा क्योंकि आवाज़ हुई थी, दूर एक स्थान पर जाकर बैठता है, सोचता है क्या हुआ, तो कुछ नहीं, एक बडे पेड़ का बड़ा पत्ता, सुखा हुआ गिरा, तो उसको खुद पर बड़ी ग्लानी हुई. (खरगोश सोचता है) क्या मैं हूँ? भगवान, तूने मुझे कैसा बनाया है? कोई मैं प्रतिकार नहीं कर सकता, मेरे दांत नहीं, नाखून नहीं, सींह नहीं, कुछ नहीं, सुखा पत्ता खडका, तो मुझे अपनी नींद छोड़ कर भागना पड़ा, कैसा तूने बनाया? इतना सा छोटा सा जीव, क्या करेगा, डरेगा नहीं तो? कम से कम मुझे हाथी जैसा शरीर देता, तो मैं डरता नहीं बड़े पत्ते से. भगवान सबकी सुनता है, उसकी (खरगोश की) भी सुन रहा है, भगवान की क्या इच्छा हुई, सुनकर ज़रा हंसा, और तथास्तु कह दिया, तो खरगोश हाथी जैसा बन गया. खरगोश को बड़ा आनंद हुआ, सोचा अबतो डरने की बात नहीं है, हाथी जैसे बड़े बन गए, अब आराम से हम नहाएँगे, नींद लगभग हो गयी है, नहा धो कर फ्रेश हो जाएँगे, फिर घूमेंगे जंगल में. वो तालाब की ओर चला, तालाब के किनारे मेढकों के झुण्ड ने देखा कोई विचित्र प्राणी आया है, दीखता तो खरगोश जैसा है, लेकिन है तो हाथी जितना बड़ा, तो मेढक भागने और छिपने लगे, तो उसने आवाज़ दिया, “ए डरो मत भाई लोगों, मै रोज़ दिखने वाला वही खरगोश ही हूँ, ये भगवान की कृपा से इतना बड़ा बन गया हूँ, अब बिना डरे जंगल में घूमूँगा, घूमकर आकर फिर नहाऊंगा तालाब में, आपको मुझसे कोई डरने की ज़रुरत नहीं है”. मेढकों ने कहा, “लगते तो तुम वही हो आवाज़ से, हमको तो अब डर नहीं है, तुमने परिचय दिया तो हम समझ गए कि तुम हमारा कुछ नहीं बिगाडोगे, लेकिन तुमको बड़ा भय है इसमें”. खरगोश बोला, क्यों?. मेढ़को ने बताया, “यहाँ एक मगरमच्छ आ गया है, और पानी के अन्दर वह हाथी पर भारी पड़ता है. इसलिए स्नान मत करो और वापस जाओ”. तो बेचारा खरगोश उलटे पाँव लौट गया, फिर से रोने लगा, क्या भगवान क्या फायदा हुआ, हाथी जितना बड़ा  बनाया, क्या अच्छा होता, मगरमच्छ जैसी ताकत देता, मोटी खाल देता, शरीर पर कांटे देता, तो मैं डरता नहीं, आराम से स्नान कर लेता. भगवान तो सुन ही रहा था, क्या हश्र हुआ हाथी जैसा बनाने के बाद. भगवान फिर से हंस दिया, और कहा ‘तथास्तु’. तो तुरंत खरगोश की खाल मोती हो गयी, कांटे आ गए उस पर, ताकत आ गयी शरीर में. खरगोश को लगा की चलो अब तो डरने की ज़रुरत नहीं है. फिर से निकला छुपने की जगह से बाहर, जैसे ही बाहर कदम रखा, शेर की दहाड़ सुनी. अब शरीर तो दूसरा बन गया था लेकिन मन तो वही था, तो दहाड़ जैसे ही सुनी, फिर से दौड़ कर दूसरे झुरमुट में जाकर छुप गया. फिर उसके ध्यान में आया, हम तो बड़े बन गए हैं, मोटे भी बन गए हैं, और ताकत भी है, तो हमको डरने की क्या आवश्यकता? मगर फिर से रोने लगा, क्या भगवान क्या किया तुमने, ये सब दिया तुमने, मगर फिर भी शेर से डरता हूँ, उसके जैसे दांत नहीं है, नाखून नहीं है, तो भगवान ने कह दिया तथास्तु, वो भी उसको प्राप्त हो गया. फिर निकला की अब तो किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है, तो देखा की जंगल में सारे पशु भाग रहे हैं, देखा सब भाग रहे हैं एक दिशा में, पीठ पर पैर रखकर भाग रहे हैं, कोई रुककर बोलने बताने की जगह सब भाग रहे हैं. तभी कूदते-फांदते बंदरों में से एक रूककर बोला, अरे भैया, हुम भाग रहे हैं, तुम भी भागो जान प्यारी है तो, क्योंकि जंगली भैंसों का एक झुण्ड यहाँ आ रहा है, सबको रौंद रहा है, तो तुम बगल हट जाओ, छुप जाओ या यहाँ से भाग लो”. खरगोश फिर से जाकर रोने लगा क्या भैंसे जैसा तो तुमने नहीं बनाया, क्या मजाक कर रहे हो भगवान, मैं प्रार्थना करता हूँ, तुम वरदान भी देते हो, लेकिन समस्या तो सँभालते नहीं हो. तो फिर भगवान ने उसको कहा आकाश से कि, अरे मुर्ख, तुम अगर डर भगाना है तो ये मोटी खाल, वो वजन और वो आकार, दांत, नाखून, ये सब मांगने की बजाए, पहले तू अपने छोटे से सुकोमल शरीर में ही, एक निडर ह्रदय मांग लेता तो सारा संकट समाप्त हो जाता, जो करना चाहिए वो तो तुम कर नहीं रहे हो, और इधर उधर की सब बातें कर रहे हो.”
हिन्दू समाज ही पूरी दुनिया की समस्याओं का निवारणकर्ता:
अपने देश की समस्याओं को आज की तारिख में देखते हैं, तो यही बात ध्यान में आती है. समस्याएँ आज की हैं नहीं, बहुत पुरानी हैं, शतकों पुरानी समस्याओं से हम जूझ रहे हैं. ऐसा नहीं की हम चुपचाप पड़े समस्याओं की मार खाते रहे, कितने महापुरुष हुए, कितने पराक्रमी वीर हुए, सबने अपना-अपना काम किया बलिदान दिया. सब प्रकार की समस्याओं से लड़ने वाले लोग हमें मिले, पिछले २०० वर्ष के इतिहास में हमारे देश में जितने महापुरुष हुए, और जितने प्रयोग हुए, उतने दुनिया के गत २००० वर्ष के इतिहास में नहीं हुए. लेकिन ऐसा होने के बाद भी समस्याएँ ज्यों की त्यों कायम हैं. अब समस्याएँ हैं तो बड़ी विकराल बड़ी भयंकर. ये समस्याएँ ऐसी हैं, जहाँ से चलीं वहां से भारत आते-आते, रास्ते में जितने देश थे, कोई ५० साल में, कोई १०० साल में, उन्होंने बदल ही दिया पूरा, समाप्त ही हो गए वो, देश के देश. इस्लाम की आंधी अरबिस्तान के बाहर निकली तो ७७ साल में स्पेन से साइबेरिया तक, पूरा आधिपत्य उनका हो गया. पारसियों का देश ईरान, वो ईरान भी रहा नहीं, पारसी भी रहा नहीं, आर्यों का भी रहा नहीं, पारसियों का भी रहा नहीं, वो तो आज शिया मुस्लिमों का देश माना जाता है, बचे-खुचे लोग उसके भारत में आकर पनाह लेकर, सदियों से रह रहे हैं. ऐसी समस्या है, लेकिन विचार करते हैं तो ध्यान में आता है कि ऐसी भयंकर इस्लाम की आंधी को, भारत वर्ष की सीमा पर दो छोटे राज्य थे काबुल और जाबुल, उसको जीतने में १०० साल लग गए, सिन्धु नदी के किनारे आते-आते पौने तीन सौ साल लग गए, अन्दर घुस गए और २०० साल में भारत पदाक्रांत करना चाहा लेकिन आसाम को छू नहीं सके, आसाम पर कभी मुगलों का सुल्तानों का बादशाहों का तुर्कों का अफगानों का राज्य रहा ही नहीं, हिन्दुओं का ही राज्य रहा, बहुत आक्रमण किये, चार बार आक्रमण हुए, आखिर चौथी बार तो ब्रम्हपुत्र के पानी में उस आक्रामक सेना को बहा दिया आसाम के वीरों ने, तब जाके समाप्त हो गयी आक्रमण की बातें. और ५०० साल यहाँ पांच सल्तनतें और एक बादशाही राज करती रही, लेकिन आज अपना देश हिंदुस्तान है, अभी भी अस्सी प्रतिशत हिन्दू हैं, हिन्दुओं के प्राचीन जीवन को आज भी ज्यों का त्यों यहाँ देखा जा सकता है. तो इन समस्याओं की तो अपने को (हम को) समाप्त करने की ताकत ही नहीं है, क्योंकि ५०-१०० साल में उन्होंने जो अन्यत्र कर दिया, और यहाँ १००० साल माथा पटक रहे कुछ नहीं हो रहा है. तो समस्याओं की तो हमको समाप्त करने की ताकत ही नहीं, और हम १००० साल से प्रयत्न कर रहे वो समाप्त नहीं हो रहे. तो गड़बड़ कहाँ है, वो भी नहीं मिटते हम भी नहीं मिटते, कोई परिणाम ही नहीं, ऐसा क्यों हो रहा है? इसको सोचते हैं तो ध्यान में आता है, संघ के चिंतन के मूल में परिस्थिति का ये आकलन है. हिन्दू समाज के पास सबकुछ है, आज की अपनी स्थिति में भी हिन्दू समाज सारी दुनिया पर भारी है, हिन्दू समाज की एक ही बात है (समस्या है) की वह भूल ही गया है कि वह कौन है, और भूल गया है इसलिए बंट गया है. अगर हम हिन्दू नहीं हैं, तो किसी जाति के हो जाते हैं. अगर हम हिन्दू नहीं हैं, तो किसी एक पंथ, सम्प्रदाय के हो जाते हैं. अगर हम हिन्दू नहीं हैं, तो किसी एक प्रान्त के रहने वाले हो जाते हैं, तो किसी एक भाषा के बोलने वाले हो जाते हैं. और बाकी लोगों को पराया मान लेते हैं. इसमें और स्वार्थ आ जाता है, तब हम अपनों के प्रति अपनत्व को भूलकर अपनों के ही गले पर अपना पैर रखते हैं, और स्वार्थ के लिए विदेशियों को भी सर पर बैठा लेते हैं. पूरा इतिहास देखेंगे अभी तक का, इस क्षण तक का, तो यही हो रहा है. इस स्वभाव के दोष को हिन्दू समाज से निकालना, उसको आत्मगौरव संपन्न बनाना, गुणसम्पन्न बनाना, और संगठित रूप में चलना सिखाना, ये अगर करते हैं, तो इस समाज की शक्ति इतनी प्रचण्ड है, कि अपनी समस्याओं का समाधान तो ढूंढ ही लेगा, सारी दुनिया की समस्याओं का निवारणकर्ता भी वही बनेगा, उसी के पथ प्रदर्शन में सब देश चलेंगे, और सुखी हो जायेंगे. नहीं तो इन समस्याओं का कोई पार नहीं है, सारी दुनिया में ये समस्याएँ हैं, दुनिया को भी उपाय नहीं पता. आजकल दुनिया चिंतन कर रही, कि भारत के पास इसका उपाय होगा, क्योंकि उनके पास उनका प्राचीन विचार है. और विचार तो बिलकुल ठीक है, लेकिन दुनिया राह देख रही कि अपने विचार के आधार पर चलने वाला समाज ये लोग खड़ा करेंगे, तो उसके चलने से हमको भी रास्ता मिलेगा, हम भी उसके पीछे- पीछे चलेंगे, ये (हिन्दू समाज) एक उपाय करते तो बाकी सारा ठीक हो जाता.
अंग्रेज थे, तो हम उनको दोष देते हैं कि उन्हीं के कारण हमारी सब दुर्गति है, अब अंग्रेज चले गए, ६७ साल हो गए, अब क्या है? अब कौन है जिम्मेवार? अपने ही लोग हैं, बिगाड़ने वाले भी अपने ही लोग हैं. तो हम तो अपने ही दोषों के चलते दुस्थिति में हैं. जैसे गरिष्ठ अन्न खाकर आदमी सो गया, और हाजमा ठीक नहीं है, तो उसको स्वप्न आयेगा, दुस्वप्न भी आयेगा. अब स्वप्न में कोई बड़ा राक्षक पीछा करता है, तो वो भागता है, भागता है, भागना होता नहीं है, राक्षक पास आरहा है, भाग रहे, लेकिन राक्षक पीछा नहीं छोड़ रहा है. अब वो सपने में कितना भी चिल्लाए कुछ भी करे, राक्षक उसे सपने में पकड़ेगा ही नहीं, क्योंकि सपने में मार ही नहीं सकता, सपना तो सपना ही है, लेकिन डर तो लगता है. सपने में दौड़ रहे हैं, सोते-सोते ह्रदय गति तेज़ हो जाती है. उपाय? उपाय क्या है? नींद छोड़ कर जागो, एक मिनट में समस्या समाप्त, जाग गए तो सपने रहते ही नहीं, ऐसा ही हो रहा है. और इसलिए हम लोगों ने सोचा, कि ठीक है, तात्कालिक समस्याओं से लड़ने वाले अनेक लोग हैं, उस समय तो थे ही, अच्छे-अच्छे लोग थे, उन सबका अनुभव भी यही बताता है, कि कुछ मूलभूत बातें हिन्दू समाज की कमियां हैं, उनको जब तक दूर नहीं करते तब तक हमारा काम भी पूरा नहीं होगा, सफल नहीं होगा, ऐसा सब लोग सोचते थे, और मानते थे, और डॉ० साहब को पता था, क्योंकि डॉ० साहब सबके साथ सम्बन्ध रखते थे, सबके कामों में कार्यकर्ता बनकर के काम करते थे. तो उनको (डॉ० साहब को) उनके (अन्य सभी के) चिंतन के निष्कर्षों का भी पता था. अब मालूम सबको था, लेकिन करना कैसे पता नहीं था. जिनको कैसे करना, इसको हम खोज लेंगे ऐसी उम्मीद थी, उनको फुर्सत नहीं थी. तो डॉ० साहब ने सोचा, सब छोड़कर, इसी के पीछे मैं लगता हूँ, ८-१० साल उन्होंने प्रयोग किये, और अपना संघ अस्तित्व में आया, उस काम को हम कर रहे हैं. जब शुरू किया तब तो लोगों का बिलकुल ही ध्यान नहीं था और लोग तो डॉ० साहब को पागल समझते थे. छोटे बच्चों को लेकर मैदान में कुछ खेल खेल रहे और कह रहे हैं देश का इससे कुछ भला होगा, ऐसा नहीं होगा, डॉ० हेडगेवार बड़ा अच्छा आदमी था, लेकिन आजकल लगता है की पागल हो गया, नाँक साफ़ नहीं कर सकते ऐसे बच्चों के आधार पर, कह रहा है की देश को परम वैभव संपन्न बनायेंगे. आज ऐसा कोई नहीं कहता. आज सब लोग संघ की ओर टकटकी लगाए देख रहे, संघ क्या करता है? क्या नहीं करता है, अनुमान भी करते हैं, और अनुमान हमेशा उनका गलत होता है. मैं चार दिन से यहाँ हूँ, और खबरें छप रही हैं बाहर पेपर में, अन्दर क्या हुआ किसी को पता नहीं है, अपने-अपने अनुमान चला रहे हैं. अरे भाई जिन बातों का आप लोग (पत्रकार) खूब मन से विचार करते हो और मानते हो कि इसी के आधार पर देश का भाग्य बदलने वाला है, वो बातें तो हमारी गिनती में भी नहीं हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि, नेता, नारा, नीति, पार्टी, सरकार, अवतार इसके आधार पर भाग्य नहीं बदलता, हाँ वो सहायक होते हैं, इसलिए उनका अच्छा होना आवश्यक है, उस सम्बन्ध में अपना जो कर्तव्य है उतना तो हमको करना ही है, और हम करते भी हैं, परन्तु वो उपाय नहीं हैं. ये सब जहाँ से आते हैं उस समाज को बनाना, और समाज प्रबोधन से नहीं बनता, प्रबोधन से समाज की जानकारी बनती है. प्रबोधन से समाज को बदलना होता, तो हमारे यहाँ प्रबोधन कुछ कम है क्या? राम हुए, कृष्ण हुए, बुद्ध हुए, महावीर हुए, १०-१० सिख गुरु हुए, वहीँ इतने सारे नेता हुए, दुनिया में जिनका नाम चमकता है, और लोग जिनके विचारों की दुहाई देकर काम कर रहे हैं सारी दुनिया में, ऐसे लोग हमारे यहाँ हुए, और हमलोग कहाँ हैं? हम लोग किस स्थिति में हैं? हमारे यहाँ कौन से दृष्य दिखते हैं? तो उपदेशों से होता, महापुरुषों से होता, तत्वज्ञान से होता, तो हमारा देश तो अबतक स्वर्ग बन जाना चाहिए था. लेकिन उसपर चलना पड़ता है. जो उपदेश हैं, जो आदर्श हैं, जो महापुरुष हैं, उनके बनाए रास्तों पर चलना पड़ता है, तब काम होता है. और चलने की हिम्मत अकेले को नहीं रहती, और कोई एक दौड़ पड़ा महापुरुष उस रास्ते से चला गया, देखा तो अपनी हिम्मत नहीं बनती, क्योंकि फिर हम लोग क्या करते हैं? हमलोग उस महापुरुष की पूजा करते हैं. आप बड़े महान हैं, देश के लिए बलि गए, बस ये तो वही कर सकते हैं हम तो नहीं कर सकते हैं. इसलिए हम उनकी जयंती, पुण्यतिथि, पूजा सब करेंगे. वो जैसा करते हैं, वैसा नहीं करेंगे. डॉ० साहब को एक सज्जन मिले और पूछा कि, आप राम की पूजा तो रोज़ करते नहीं हो, और धर्म का काम करते हो, ऐसा कहते हो, तो ये सब ठीक नहीं है. तो डॉ० साहब ने उनसे पूछा कि, ठीक है रामायण मैंने पढ़ी है, आपने पढ़ी है, तो भगवन राम के जो आदर्श हैं उसको अपने जीवन में कितना उतारा? तो वो सज्जन गुस्सा हो गए, बोले, भगवान राम, भगवान हैं, और न देव चरितं चरेत, देवों के जैसा नहीं चलना, ऐसा अपनी संस्कृति का आदेश है. अब ये उलटी गंगा कब से बही, क्योंकि अपने यहाँ तो, शिवो भूत्वा, शिवो ...........है. शिव की पूजा करना है, तो शिव बनकर करो. ये विचित्र स्थिति अपने समाज की उसको बदलना ज़रूरी है. और इसलिए हमने सोचा कि सामान्य लोगों में परस्पर आत्मीयता, भेद और स्वार्थ का पूर्ण तिरोहन. और उसकी गुणवत्ता ऐसी बनायेंगे कि वो देश के लिए जियेगा-मरेगा और अकेले नहीं, सबको साथ लेकर चलेगा, सबके साथ चलेगा. समाज बोलेगा, समाज चलेगा, समाज करेगा, तो एक दिशा में करेगा, एक जैसा करेगा, एक ही समय में उसी समय में करेगा.
इतने विदेशी आक्रामक आये, और जिस दिन उन्होंने अपनी देश की सीमा के अन्दर पैर रखा, उसी दिन से उनके खिलाफ संघर्ष शुरू हुआ, यही अपना इतिहास है. अपना इतिहास पराजय का नहीं है, अपना इतिहास संघर्ष का इतिहास है. जिस कोई विदेशी आक्रामक अपने यहाँ प्रवेश कर गया, उस दिन से उसके खिलाफ संघर्ष हुआ. लेकिन पूरे इतिहास में, पुरे देश में, एक समय सबलोग उठे ऐसा दुर्भाग्य से नहीं हुआ, और ये पहेली बुझाने में उनको देर नहीं लगी. एक होकर सब उठ जाते, तो भारत वर्ष का इतिहास बदल गया होता. एकसाथ मिलकर, एक समय में, एक काम जैसा तय है वैसा करना, अपने मन और मत सबको बाजु रखना, सबने मिलकर तय किया है, वो करना. तय करने के पहले जो चर्चा होती है उसमे सबको स्वतंत्रता है, मत रखने की चर्चा करने की सब, लेकिन एक बार निर्णय हो गया तो उसके अनुसार काम करना. ये आदत नहीं रही, आज भी नहीं है. आज भी देश के अच्छे प्रामाणिक लोगों में भी इस मतभेद के कारण मनभेद है, तो सज्जन शक्ति में कभी एकता आती ही नहीं, दुर्जन लोगों के खिलाफ. एक तो सब एकसाथ सक्रीय नहीं होते, और सक्रियता में छोटे-मोटे विचार को लेकर भेद हो जाता है, तो अलग चल देते हैं. ये संगठन का स्वभाव हिन्दू समाज का बनाना, ये काम लेकर अपना संघ शुरू हुआ, और जहाँ तक आया है, जहाँ पर हम तो इन सब बातों का अनुभव अपने मन में करते ही हैं, जो मैं बोल रहा हूँ कोई नई बात नहीं, हमारे नित्य अनुभव की बात है, जो स्वयंसेवक हैं उसके लिए, लेकिन समाज भी उसका अनुभव आज कर रहा है, इसलिए हमारे सामने कर्तव्य कौन सा है? ऐसा विचार करते हैं तो स्पष्ट बात है, संघ को बढाओ. गाँव-गाँव तक, प्रत्येक बस्ती में, संघ के ऐसे लोगों को निर्माण करने वाली शाखा होती है, उसके बिना दूसरा चारा नहीं है. देश में आपत्ति आती है आसमानी हो या सुल्तानी हो, सेना-पुलिस के पहले कभी-कभी संघ के स्वयंसेवक पहुँच जाते हैं, अपना काम बिलकुल ठीक करते हैं, पाई-पाई का हिसाब रखते हैं, जितने समय में काम होना है, उतने समय में काम पूरा करते हैं, और करते समय अपना स्वार्थ देखते नहीं, अपना घर देखते नहीं, अपनी गृहस्थी देखते नहीं, समाज का काम पहले. तो लोगों को आश्चर्य होता है की आपलोग क्या सिखाते हैं? हमलोग क्या सिखाते हैं, हमको पता है, हमलोग कुछ नहीं, शाखा पर कबड्डी सिखाते हैं. बड़े-बड़े भाषण अपने यहाँ होते नहीं, एक-एक समस्या का गहन और व्यापक विचार करके अपने स्वयंसेवक को प्रशिक्षित करना, ऐसे तो हम नहीं करते. जानकारी बताते हैं, लेकिन बहुत ज्यादा हम इन लोगों को मैदान पर लाते हैं, शारीरिक कार्यक्रम, बौधिक कार्यक्रम, छोटे सरल कार्यक्रम करते हैं, और उसके आधार पर हमारा जो स्वयंसेवक तैयार होता है, वो सब करता है, उसका ट्रेनिंग हम नहीं देते हैं. गोला-बारी चल रही है, और सेना को अन्न पहुँचाना है, कैसे पहुँचाना है, ट्रेनिंग नहीं है हमारी, लेकिन जब ये काम पड़ता तो हमारा स्वयंसेवक सबसे आगे होता है और ठीक करता है. सेना के लोग कहते हैं, सामान्य आदमी मिले, तो उसको बॉर्डर पर भेजना है तो तैयार करने के लिए उन्हें ६ महीने लग जायेगा, संघ का स्वयंसेवक मिले तो ३-४ दिन काफी हैं. यहाँ क्या पढ़ाते हैं हमलोग? यहाँ कुछ नहीं पढ़ाते हैं, यहाँ शाखा है. यह इस शाखा की महत्ता है, क्योकि सब काम करने के लिए, जो आवश्यक मन है मनुष्य का, स्वभाव है, प्रत्यक्ष आचरण है, और समर्पण है, वो यहाँ निर्माण होता है. हम संघ के स्वयंसेवकों को स्वयंसेवक कहते हैं, उसका अर्थ क्या है? वो स्वयं होकर सेवा करने आया है, स्वयं होकर आया है, वो किसी की आज्ञा की राह नहीं देखता, उसको पता है ये अपना समाज है, और उसका दुःख है तो मुझे क्यों किसी का आदेश चाहिए. मेरा समाज है और वहां दुःख है तो मै जाऊंगा, करूंगा. कोई घर को आग लग गयी, अन्दर एक छोटा बच्चा रह गया, और परिवार खड़ा है, तो बैठक करते हैं क्या? की बच्चा अपना अन्दर फंसा है, उसको छुड़ाना की नहीं छुड़ाना, कैसे छुड़ाना, कौन छुड़ाएगा, कौन पहले जायेगा, ऐसे कुछ करते हैं क्या? जिसको पहले ध्यान में आता है कि एक बच्चा फंस गया, वो दौड़ पड़ता है, माता दौड़ पड़ती है, उसको पता है की वो घर जल रहा है, हम अन्दर जायेंगे तो बच्चा तो नहीं बचेगा मैं भी जल जाऊँगी, लेकिन रहा नहीं जाता है. ये अन्दर की आत्मीयता काम करती है. एक बहुत बड़े सज्जन आये, कुछ दिन पहले मिलने के लिए, बहुत बड़े, दुनिया में उनको बहुत बड़ा धनपति माना जाता है, दुनिया के पहले सौ धनपतियों में उनका नाम है, वो आये और मुझे कहने लगे कि, “हमारे पिताजी ने सोचा था, और हमको भी बताया कि देखो भाई, दुनिया में भला करना चाहिए, बात तो ठीक है, लेकिन भला करने के लिए पहले खुद कुछ बनो, तो उन्होंने और हमने मिलकर अब इतना बड़ा धन खड़ा कर लिया है कि अब किसी बात की कमी नहीं है, तो अब हमने सोचा है की भारत वर्ष में खूब सेवा करेंगे, तो बजट की कोई कमी नहीं, ५०० करोड़ हो १००० करोड़ हो, चाहे जितना लगा देंगे, आप लोगों के बहुत सारे सेवा कार्य, सुनते हैं की एक लाख तीस हज़ार से ऊपर है, मैं जानने के लिए आया हूँ कि इंफ्रास्ट्रक्चर आपने कैसे खड़ा किया, तो हम भी उसका लाभ लेकर हम भी ऐसा जाल खड़ा करेंगे.” तो मैंने उनको कहा कि “ये आपसे होगा नहीं, आप स्वतंत्र विचार कीजिये, आप कर सकेंगे, लेकिन हमारे तरीके से आप नहीं कर सकेंगे, वो क्यों? थोड़ा हमारा-आपका तरीका बिलकुल अलग है.” “आपको समाज का दुःख दिखा, आपने सोचा कि पहले मैं कमा लूँ, बाद में समाज को दूँ. हमारे यहाँ, हमारा स्वयंसेवक है, मुख्यशिक्षक है, कार्यवाह है, मंडलकार्यवाह है, खंडकार्यवाह है, वो तो बिलकुल सामान्य व्यक्ति है, उसका अपना घर भी बड़ी मुश्किल से चलता है, लेकिन वो समाज का दुःख देखता है तो दौड़ पड़ता है, वो विचार नहीं करता की मैं सेवा कार्य करने जा रहा हूँ, तो धन कहाँ से आएगा? वो शुरू कर देता है. जब शुरू कर देता है, और अन्दर की आत्मीयता से करता है, लोग देखते हैं तो पैसा आता है.”
और एक ऐसे ही सज्जन मिले, भारतवर्ष के बहुत से लोग हैं उस पहले १०० की सूचि में. क्योंकि मैं गया था मिलने उनसे मिलने के लिए, वो तो पहले से ही मान कर चले थे कि धन मांगने आया है. क्योंकि उनके पास सबलोग इसी के लिए जाते हैं. वो बहुत अच्छा सेवा कार्य करते हैं. सादगी से रहते हैं, अपने ऊपर कम से कम व्यय करते हैं, बहुत धन समाज में लगाते हैं. उनको ऐसा लगा, ये भी आये हैं कुछ न कुछ मांगेंगे. हम लोगों की बात हुई, लगभग एक घंटा गप-शप हुई, कोई विषय ही नहीं निकला पैसे का. वो अस्वस्थ हो गए, कब मांगेगा? क्या मांगेगा? राह देख रहे थे. फिर उन्होंने ही विषय निकाला कि, “आपने अभी बताया कि लाखों सेवा कार्य आपके चलते हैं, तो इसके फण्ड की व्यवस्था आप कैसे करते हैं?” उनको लगा की अब मैंने दी है जगह बोलने की तो अब ये मांगेगा. मगर मैंने कहा, “उसकी हमारी योजना कोई होती नहीं. हम काम शुरू कर देते हैं. हाँ पैसा जो आता है उसकी योजना हम व्यवस्थित रखते हैं, उसके हिसाब-किताब पर कोई ऊँगली नहीं रख सकता. लेकिन काम हमारा पहले शुरू हो जाता है, बाद में फिर जो पासा आता है उसपर आगे कार्य चलाते हैं”. तो फिर उनको रहा नहीं गया, कि अभी भी नहीं मांग रहा है. उन्होंने सीधा पुछा, “तो फिर आप आये क्यों हैं मेरे पास?” मैंने कहा, “मैं इसलिए आया हूँ, आप भी बहुत अच्छा काम कर रहे हो समाज में, शिक्षा में. हमारे पास भी चार-चार शिक्षा संगठन हैं, जिनका बहुत अनुभव है, अगर आपको काम करने में हमारी कोई मदद चाहिए, तो हम हमारे तग्य और अनुभवी लोगों को आपके पास भेज सकते हैं, जिससे आपको मदद हो सकती है. यही बताने के लिए आया था.” तो उनको बहुत आश्चर्य लगा. अब विद्या भारती के लोग उनके साथ जाते हैं और अपना सहयोग देते हैं. तो हमारा स्वयंसेवक काम करता है वो स्वयं प्रेरणा से करता है, कोई उस पर दबाव नहीं है. संघ में नियम नहीं है जो सेवा कार्य नहीं करेगा, उसको स्वयंसेवक नहीं माना जायेगा. इतने सारे स्वयंसेवक आते हैं, सब थोड़े ही सेवा में जाते हैं, लेकिन स्वयंसेवक हैं. कोई दबाव नहीं है, दबाव के कारण सेवा नहीं करता, अपनत्व के कारण करता है. स्वयंसेवक मजबूरी में काम नहीं करता, मजबूरी में बहुत से अन्य लोग काम करते हैं. बच्चा था पानी में गिर गया, गाँव के तालाब में, डूबने लगा तो चिल्लाया जोर से, वहां पे खड़ा एक लड़का कूद गया, और बच्चे को निकाल कर ले आया किनारे पर, तो लोगों ने उसको कंधे पर उठाकर जूलूस निकला. पत्रकार आये तो उन्होंने पूछा, “आपको कैसे प्रेरणा आयी, उस बच्चे को बचाने के लिए?” उसने कहा, “प्रेरणा-व्रेरणा छोड़ो, पहले ये पता करो मुझे गिराया किसने पानी में?” किसी ने धक्का मार के गिरा दिया, सीधा बच्चे के पास गिरा, बच्चे ने हडबडा कर उसका गला पकड़ लिया. अब मरना है तो दोनो को, बचना है तो दोनों को, तो मजबूरी में बच्चे को को भी बचा लिया. अपना स्वयंसेवक ऐसा नहीं है, उसकी कोई मजबूरी नहीं है, संघ का काम अपनी मर्ज़ी का काम, कोई स्वार्थ भी नहीं, हो भी तो पूरा तो होता ही नहीं है. स्वार्थी लोगों के स्वार्थ यहाँ पुरे नहीं होते. कल ही पूछा किसी ने बैठक में कि, “संघ में कोई आई-कार्ड नहीं मिलता, सर्टिफिकेट नहीं मिलता फिर हम संघ में क्यों आयें? ऐसा लोग हमसे पूछते हैं, तो क्या जवाब दें?” तो मैंने कहा, “आप जवाब दो, संघ में कोई सर्टिफिकेट या आई-कार्ड मिलेगा नहीं, तो आप संघ से दूर रहो, बिलकुल मत आना. ये तो बिलकुल पागल लोगों का काम है, जो बर्बाद कर लेते हैं अपने आप को, मिलता कुछ नहीं. कोई इनसेनटिव भी नहीं मिलता. इसलिए जब तुम पागल हो जाओगे तब आना. जब तक तुम पागल नहीं हो और संघ में नहीं हो, तब तक संघ भी ठीक है, तुम भी ठीक हो.” तो अपने यहाँ तो केवल देने के लिए ही आना होता है. हम सूचियाँ बनाते हैं हर काम की. मराठी में सूचि के लिए शब्द है ‘यादि’, इसका बहुवचन है ‘याद्या’. अपने प्रान्त संघचालकजी हैं महाराष्ट्र के, अपने बौधिक वर्ग में कहते हैं, “संघ में याद्या काम है” यानि सूचि बनाने का काम है, चार लोगों की बैठक है, सब एक दूसरे से परिचित हैं, फिर भी कागज़ पर लिखते हैं, ऐसी हमारी नीति है. वो कहते थे इसी का काम है, और कुछ काम नहीं है, और मतलब समझाते थे, मराठी में ‘या’ यानि आइये, और ‘द्या’ यानि दीजिये, अर्थात इसी का काम है, आइये और दीजिये, लीजिये वाला शब्द ही नहीं आता है. तो स्वयंसेवक को स्वार्थ की तो कोई आशा ही नहीं है, न मजबूरी है, न भय है, वो अपने आत्म प्रेरणा से काम करता है. मेरा समाज है, उसका दुःख मुझे निवारण करना ही है, उसके लिए योग्य बनना है. रोज़ आऊंगा, तपस्या करूंगा, और सेवा करूंगा. और सेवा करने के बदले क्या मिलेगा? कुछ नहीं मिलेगा, सेवा ही अधिकार है, इसलिए और-और सेवा करूँगा. तन समर्पित, मन समर्पित, और यह जीवन समर्पित. अब जीवन भी दे दिया तो क्या बचा? बची है एक चीज़ बची है, ‘चाह’ बची है. चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ. और इसीलिए संघ का स्वयंसेवक, हम स्वयंसेवक कहते हैं सभी को, लेकिन सबको यह विचार करना चाहिए, संघ जो हमें स्वयंसेवक कह रहा है, मैं स्वयंसेवक हूँ क्या? आज उसी का प्रश्न है. आज समस्या निवारण की लालच देकर समाज से अपना काम निकलने वाले बहुत लोग हैं. और भोला समाज उस लालच में कभी-कभी गलत लोगों के पीछे भी जाता है, उनको बड़ा भी कर देता है, फिर अपना माथा ठोकते रहता है. फिर हमारे पास आता है, कुछ करो. अब इस परिस्थिति को अगर पाटना है तो हर स्वयंसेवक को ऐसा बनना पड़ेगा. स्वयंसेवक तो हमको संघ ने कह दिया, जिस दिन पहला ध्वज प्रणाम किया, उस दिन संघ ने कहा ये हमारा स्वयंसेवक है. लेकिन स्वयंसेवक क्यों है? स्वयंसेवक बनने के लिए है. स्वयं प्रेरणा से माता की सेवा का व्रत धारा है, सत्य स्वयंसेवक बनने का सतत प्रयत्न हमारा है. सतत प्रयत्न है, खूब किया स्वयंसेवक के नाते, स्वयंसेवक जैसा जीवन जिए, और फिर लगने लगा की मैंने बहुत किया तो फिर गलत है, बहुत नहीं किया, और भी कर सकते हो और भी करने लायक है, गर्व मत करो. युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया और इतना दान दिया कि स्वर्ग में घंटा बजने लगा, सुना सब ने. सभी गर्व से फूल गए, इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ, इंद्रदेव ने स्वर्ग में घंटा बजाने की आज्ञा दी, इतना दान दिया हमने (पांडवों ने). इतने में एक नेवला आया वहां पर, वो नेवला विचित्र था, था नेवले जैसा लेकिन आधा शरीर उसका सोने (स्वर्ण) का था. वो नेवला यज्ञकुंड के पास आया और वहां की भूमि की धूलि में लोटपोट हो गया, फिर अपने शरीर को देखा उसने इधर-उधर से ध्यान से, और फिर वापस जाने लगा. तो युधिष्ठिर महाराज ने पूछा कि, “आप कौन हैं? यहाँ क्यों आये हैं? और वापस क्यों जा रहे हैं बिना कुछ लिए हुए? हम तो देने के लिए बैठे हुए हैं, हमने इतना दान किया है कि स्वर्ग में घंटे बजने लगे, इतना श्रेष्ठ दान अभी तक नहीं हुआ है. आपको कुछ चाहिए तो बताइए.” तो नेवले ने उत्तर दिया कि, “मै यह देखने आया था कि क्या इतना कोई श्रेष्ठ यज्ञ है कि मेरा बाकी का शरीर सोने का कर दे, मगर मुझे बड़ी निराशा हुई, स्वर्ग में तो घंटे बज गए मगर मेरा बाकी का शरीर तो सोने का नहीं हुआ.” तो युधिष्ठिर को लगा, ऐसा कैसे हुआ? तो सुनो (नेवले ने सुनाया) “एक गरीब बेचारा, वानप्रस्थी ब्राम्हण था, वो इतनी खराब स्थिति में था कि भोजन भी बड़ी मुश्किल से कर पाता था. वो भोजन कैसे कमाता था, तो खेत जब लहलहाते हैं, पंछी कुछ दाना चुग लेते हैं, और भी प्राणी कुछ न कुछ दाने खा लेते हैं, बाद में किसान आकर काट लेते हैं, फिर वो दाना झाड़ते हैं, और घर पर ले जाते हैं, लेकिन कुछ दाने मिट्टी में गिर जाते हैं, वह उन दानों को बिनकर, उनसे अपना पेट भरता था, ऐसा तपस्वी था वह. लेकिन एक बार भयंकर अकाल पड़ा, किसी के पास कुछ नहीं बचा, मुझे भी दो-तीन दिन से कुछ नहीं मिला, और बहुत भूख लगी थी. तो उसके (ब्राह्मण के) के घर में कुछ मिलता है क्या? ऐसा देखने के लिए गया. फिर जो भूखा होता है वो बेशरम भी हो जाता है और निडर भी हो जाता है. तो जहाँ बैठे थे भोजन के लिए, वहीँ गया मैं, और देखने लगा उनके पात्रों पर आशा से. कई दिनों में, लगभग १५ दिनों में, बिन-बिन कर तकरीबन मुट्ठी भर दाने जमा हुए थे, उसको पीस कर, उसमे पानी मिलाकर,  चार भाग करके, वो, उसका लड़का, उसकी लड़की और उसकी पत्नी, चारों बैठे थे भोजन करने. मैं गया उनके यहाँ. और कहा, महाराज मेरे लिए क्या? तो उसने अपना हिस्सा दिया, मेरा पेट नहीं भरा तो पत्नी ने दिया, फिर लड़के ने दिया, और आखिरी में लड़की ने भी अपना भोजन मुझे दे दिया. और क्योंकि १५ दिन से भूखे थे, और आया हुआ अन्न मेरे पेट में चला गया, तो थोड़ी देर के बाद पूरा परिवार मर गया. मैंने तो भूख के मारे विचार नहीं किया, और वहीँ सो गया, लेकिन उठ के देखता हूँ तो वहां की धुल से मेरा आधा शरीर सोने का हो गया. मुझे लगा कि स्वर्ग की घंटियाँ बजती हैं तो तुम्हारा भी यज्ञ इतना ही शक्तिशाली होगा, लेकिन ऐसा तो है नहीं तुम्हारा.” गर्व नहीं करना, कितना भी किया हो, कितना भी कर रहे हो. सतत प्रयत्न हमारा, और भी कर सकते हैं. इतना आगे इतना आगे, जिसका कोई छोर नहीं, जहाँ पूर्णता भी मर्यादा हो, सीमाओं की डोर नहीं. समाज में भी हम ऐसे ही कहते हैं, स्वयंसेवक को कहते हैं, राष्ट्रभक्ति मेरा नाम आर०एस०एस०-आर०एस०एस०, बिलकुल मत कहना, ये गलत है. हमने ठेका नहीं लिया है, सारा समाज राष्ट्रभक्त है. पथसंचलन में ये कभी मत कहना, कौन चले, भाई कौन चले? भारत माँ के लाल चले. हम अकेले भारत माँ के लाल नहीं हैं, पूरा समाज भारत माँ का लाल है. करने के बाद भी अपना अहंकार नहीं होना चाहिए, संगठन का भी अहंकार नहीं होना चाहिए. ऐसी पूर्ण मनोवृत्ति के, केवल सेवा का अधिकार मान कर, अधिकाधिक सेवा की इच्छा रखकर, स्वयं प्रेरणा से समाज के लिए काम करने वाला, काम करने के लिए योग्य बनने की शाखा पर साधना करने वाला, वो स्वयंसेवक होता है. अब आप सोचिये अपने-अपने बारे में कि हम स्वयंसेवक कितने हैं? टोपी-निकर पहन कर यहाँ बैठे हैं तो कुछ तो स्वयंसेवक जरूर हैं सब, मेरे सहित. लेकिन स्वयंसेवकत्व के इस स्तर तक हमको जाना है, कदम बढ़ा रहे है की नहीं? पहुंचे नहीं हैं तो कोई बात नहीं, कभी न कभी तो पहुँच जायेंगे. लेकिन कदम बढ़ाते हों तभी पहूँचेंगे. रस्ते में रुक गए हों, बैठ गए हों तो कैसे पहुंचेंगे?
हम लोग राष्ट्रीय हैं, यानी हमलोग पुरे राष्ट्र का विचार करते हैं. आज हिन्दू समाज की जो दृष्टि है उसमे हम भी किसी जाति में जन्मे हैं, किसी कुल में जन्मे हैं, किसी भाषा को बोलने वाले हैं, किसी मत-सम्प्रदाय को मानने वाले हैं, किसी प्रान्त के रहने वाले हैं. थोड़ा बहुत इसका अभिमान अपने मन में भी रहता है, लेकिन अपने जीवन में कोई भी कृत्य करेंगे, किसी भी कृत्य में अपना बल लगायेंगे, तो ये सोच कर लगायेंगे की सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए ये ठीक है की नहीं. अगर राष्ट्र के लिए ठीक नहीं, और मेरे लिए ठीक होगा तो भी नहीं करेंगे. क्योंकि हम राष्ट्र के हैं, हम जाति के नहीं हैं, हम कुल के नहीं हैं, हम पंथ-सम्प्रदाय के नहीं हैं, हम भाषा के नहीं हैं, हम प्रान्त के नहीं हैं, हम पार्टी के नहीं हैं. हम राष्ट्र के हैं. उस राष्ट्र का छोटा स्वरुप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. वो विस्तारित होते-होते एकदिन राष्ट्र के साथ समव्याप्त हो जायेगा, उसके हम घटक हैं, हम राष्ट्रीय हैं.
और ये राष्ट्र कौन सा है? कैसा है? इसके बारे में बोलने में हमको कोई संकोच नहीं. उस बोलने से हमारे साथ लोग आते हों, या हमको लोग छोड़ जाते हों, हमको इसकी परवाह नहीं. हम डंके की चोट पर कहते हैं हिन्दुस्थान, हिन्दू राष्ट्र है, हिन्दुओं का है. हिन्दू धर्म संस्कृति के अनुसार चलेगा, हिन्दू समाज की इच्छा के अनुसार चलेगा. इससे सर्वांगीण उन्नति होगी हमारी, और हम बताते हैं इसकी सर्वांगीण उन्नति हम करने वाले हैं. एक सज्जन मिले, और उन्होंने कहा कि, “भाईसाहब ये तो बहुत अच्छा काम है और जल्दी बढ़ने की आवश्यकता है, बहुत ज्यादा समय नहीं है, और जल्दी बढ़ाइए, एक बात है, आप अगर ये हिन्दू-हिन्दू कहना बंद कर देते न, भारतीय कहते या सनातन ऐसा कुछ कहते, तो बहुत लोग जुड़ेंगे आपसे.” तो मैंने कहा, “बहुत लोग जुड़ेंगे, ये बात तो सही है, लेकिन हम नहीं छोड़ेंगे इस हिन्दू शब्द को, हम हिन्दू हैं, हमारा हिन्दू राष्ट्र है. हम इसी भाषा में बोलेंगे, इन्हीं शब्दों का उपयोग करेंगे. संघ तो हिन्दू और हिन्दुस्थान, इसको छोड़ेगा नहीं. हिन्दूराष्ट्र को छोड़ेगा नहीं.” तो उन्होंने कहा कि, “भाईसाहब विचार करना चाहिए, नहीं तो डूब जायेगा सब.” हमने बोला, “अगर हिन्दू, हिन्दुस्थान, और हिन्दुराष्ट्र डूबने वाला हो, तो हम उसके साथ डूबेंगे. बिना हिन्दुराष्ट्र के जीने की इच्छा हमको है ही नहीं, हम भी उसके साथ डूबेंगे, लेकिन उसको छोड़ेंगे नहीं.” क्योंकि वो सत्य है, हम सत्य पर चल रहे हैं, सत्य डूबने वाला हो, तो सत्य के साथ हम डूबेंगे. हमको बिना सत्य के रहना ही नहीं, हमको कोई पॉपुलैरिटी चाहिए ही नहीं, हमको खूब भीड़ चाहिए अपने पीछे, ऐसा भी कुछ नहीं है. सत्य है, सत्य के लिए जीना है, सत्य के साथ जीना है. हिन्दुस्थान, हिन्दुराष्ट्र है, यह सत्य है, हम सारी दुनिया को बताते हैं. जब लोग कहते थे गधा कहो, लेकिन हिन्दू मत कहो, तब भी हम यही कहते थे, और आज जब लोग कह रहे हैं, गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, तब भी हम वही बात कह रहे हैं, क्योंकि सत्य परिस्थितियों के साथ नहीं बदलता. स्वामी विवेकानंद ने कहा है, “सत्य किसी को आदर वन्दना नहीं देता. सत्य के सामने, सब संस्कृतियों को, सब राष्ट्रों को आदर वन्दना करनी पड़ती है.” हम उस सत्य के साथ हैं. हमको बाकी किसी बात की चाह नहीं, उसी में रहना है, उसी में जीना है, उसी में मरना है. और अगर वो डूबने वाला है, तो उसी के साथ डूबना है.