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Friday, December 17, 2021

वास्तविक बलिदानियों को भूलाकर सिकंदर को बना दिया गया महान - डॉ अशोक सोनकर

 

म्योरपुर (दुद्धी) स्वाधीनता के वास्तविक बलिदानियों को गुमनाम करके सिकंदर को महान बताया गया। हमारे प्रमुख स्थलों, चौराहों, मार्गों का नामकरण अपने बलिदानियों के नाम पर होना चाहिए| उक्त विचार दुद्धी जिले के म्योरपुर स्थित मां महामैत्रायणी योगिनी इंटर कालेज परिसर में अमृत महोत्सव आयोजन समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ अशोक सोनकर ने व्यक्त किया| इस दौरान विभिन्न जगहों से तिरंगा यात्रा निकाली गयी जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने प्रतिभाग किया|

प्रो. सोनकर ने आगे कहा कि हमारे मूल इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है। ऐसे अनेक लोग है जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया और अपने प्राणों की आहुति दी किन्तु उनका नाम आज भी अज्ञात है, ऐसे नाम सामने लाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अमृत महोत्सव का असली उद्देश्य यही है कि हम अपने आसपास के बलिदानियों को याद करें। उन्होंने कहा कि आज सड़कों का नाम शेरशाह सूरी ग्रांड टैंक रोड व औरंगजेब रोड है। हमें स्थानीय बलिदानीयों के नाम पर मार्गों का नाम रखना चाहिए। जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी उनके बारे में जानेगी और उनसे प्रेरित होगी| उन्होंने कहा कि असल बलिदानों का नाम इतिहास में नहीं लिख गया है,  जहां लिखा भी गया है,  वहां नाम मात्र की जगह दी गई है| बनवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों के प्रवेश के बाद बिरसा मुंडा ने आंदोलन के बल पर समाज और देश की रक्षा की,  लेकिन बिरसा मुंडा को कहीं इतिहास में जगह नहीं दी गई है। इससे पूर्व बीजपुर, बभनी, आश्रम मोड़, लिलासी आदि स्थानों से तिरंगा यात्रा निकालकर लोग म्योरपुर स्थित कार्यक्रम स्थल पहुंचे। इसके बाद विभिन्न विद्यालयों के बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति की।

कार्यक्रम में वीरेंद्रनारायण शुक्ला, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक पुनीतलाल, जिला संघचालक नंदलाल, वनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत संगठन मंत्री आनंद, अरुणोदय जौहरी, रामकुमार यादव, जिला प्रचारक इंद्रसेन, गगन, ब्लाक प्रमुख मान सिंह गौड़, शेषनाथ तिवारी, रमाशंकर गुप्ता समेत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

Thursday, December 16, 2021

ढाई लाख दीपों से बनाया दीपसेतु, स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर बढ़ने का दिया सन्देश

 जब तक हममें स्व जागृत नहीं होता, स्वतंत्रता अधूरी है - रमेश जी

प्रयागराज। प्रयागराज के अमृत महोत्सव में बुधवार को एक नया पृष्ठ जुड़ गया| 15000 लोगों ने 2,51,000 दीपों से 3 किलोमीटर लंबा दीपसेतु बनाकर स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर बढ़ने का सन्देश दिया। इस दौरान मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काशी प्रांत प्रचारक रमेश जी ने कहा कि जब तक भारत विश्व गुरु नहीं बन जाता, स्वतंत्रता का यह संघर्ष जारी रहेगा|

अमृत महोत्सव समिति प्रयाग दक्षिण भाग की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में   नगर के स्वामी विवेकानंद चौराहे से नेताजी सुभाष चंद्र बोस चौराहे तक सड़क के दोनों ओर लगभग 3 किलोमीटर लंबा दीप सेतु बनाया गया। पूरे मार्ग पर विभिन्न रेखाकृतियों पर प्रज्वलित दीप मनोहर छटा प्रस्तुत कर रहे थे। सायंकाल गोधूलि बेला में आयोजित इस कार्यक्रम में अमृत महोत्सव, भारत माता की जय, वंदेमातरम, स्वस्तिक, श्रीयंत्र तथा ओम समेत अनेक आकृतियो से सुसज्जित टिमटिमाते दीप लोगों को आकर्षित कर रहे थे| इस दौरान मुख्य वक्ता रमेश जी ने विश्वास व्यक्त किया कि अमृत महोत्सव से हमने स्वतंत्रता की ओर बढना शुरू कर दिया है और शताब्दी वर्ष तक इस लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे। उन्होंने आगे कहा कि इस दीप प्रज्वलन के माध्यम से हमने 1947 तक आजादी के संघर्ष में जूझे लाखों ज्ञात-अज्ञात शहीदों को श्रद्धांजलि दी है। सन 47 में हमने स्वाधीनता प्राप्त कर ली लेकिन अभी स्वतंत्रता शेष है। जब तक हममें "स्व" जागृत नहीं होता स्वतंत्रता अधूरी है। स्वधर्म, स्वभाषा, स्वदेशी जब अपने चरम पर होगा तभी भारत विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित होगा। उन्होंने दीपसेतु का उद्देश्य बताते हुए कहा कि यह दीपसेतु स्वामी विवेकानंद जी की आध्यात्मिक शक्ति और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बलिदान की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए बनाया गया है। स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो सम्मेलन में पूरी दुनिया को भारत की आध्यात्मिक शक्ति का बोध कराया था तथा सुभाष चंद्र बोस ने तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा देकर देशवासियों में बलिदान और समर्पण का भाव भरा था। बलिदान का स्मरण बना रहे देशभक्ति की ज्वाला जलती रहे इसलिए यह दीपसेतु बनाया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की पहचान आध्यात्मिक शक्ति के कारण है। भव्य काशी-दिव्या काशी की अलौकिक छटा तथा अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से देश अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहा है। हमारा प्रधानमंत्री राममंदिर शिलान्यास का पूजन करता है, विश्वनाथ धाम के लोकार्पण में बाबा का पूजन कर श्रमसाधकों का सम्मान करता है। सेकुलरी वर्जना तोड़ यह स्वधर्म के भाव का पहला चरण है। भारत आत्मनिर्भर हो रहा है, यह सतत चलता रहे इसका उत्तरदायित्व भारत के जागृत नागरिकों का है। अर्थात हमारा और आपका है। उन्होंने बड़े साफ शब्दों में कहा कि जब तक स्वधर्म, स्वभाषा, स्वदेशी एवं स्व-संस्कृति की भावना जन-जन में नहीं भर जाती तब तक स्वतंत्रता का लक्ष्य पूरा नहीं होगा और हमारा यह संघर्ष जारी रहेगा। युवा शक्ति आगे आए। उन्होंने युवाओं का पुनः आह्वान किया कि वे ऐसी स्वतंत्रता के लिए कमर कसकर आगे आएं। अमृत महोत्सव सच्ची स्वतंत्रता प्राप्ति का अभियान है। देशभक्ति की भावना के व्यापक जन-जागरण के लिए यह अभियान चलाया जा रहा है। इसके पूर्व सीएमपी डिग्री कॉलेज के प्रो.राज बिहारी लाल जी ने आयोजन के संबंध में विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम आम जनता का कार्यक्रम है। देश के नागरिकों एवं बच्चे-बच्चे में राष्ट्रीयता का भाव जगाने के लिए पूरे प्रांत में यह कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।







अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में एडीशनल सॉलीसीटर जनरल श्रीशशि प्रकाश जी ने कहा कि सही अर्थों में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए देश अब अग्रसर हो रहा है। इसके लिए सबको मिलजुल कर प्रयास करना होगा। युवा पीढ़ी को आगे आना होगा। कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया गया| शिशु मंदिर ज्वाला देवी की छात्राओं ने समवेत स्वरों में मुक्त कंठ से "दसो दिशा में गूंजे भारत मां की जय" गीत प्रस्तुत कर पूरे वातावरण को देशभक्तिमय कर दिया।

अन्त में भारत माता की भव्य आरती की गई। कार्यक्रम को डॉ पीयूष एवं वीर कृष्ण की टीम ने सफल बनाया। इस दौरान महंत लक्ष्मीनारायण, मोहन जी टंडन, अमृत महोत्सव आयोजन समिति के सह प्रांत संयोजक डॉ. मुरारजी त्रिपाठी, शिवकुमार, वसु पाठक समेत प्रतिष्ठित व्यवसायी, अधिवक्तागण, शिक्षक, मातृशक्ति एवं नागरिकों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई। संचालन विवेक जी ने तथा धन्यवाद ज्ञापन शरद जी ने किया। समापन वंदेमातरम के सामूहिक गायन  से हुआ।



बलिदानी सैनिक की बहन की शादी में सीआरपीएफ जवानों ने निभाया भाई का दायित्व, वीडियो देखें..

 

लखनऊ. सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें विवाह के दौरान सेना के कुछ जवान दुल्हन को स्टेज तक लेकर जा रहे हैं. वीडियो रायबरेली में एक शादी का है. कश्मीर में बलिदान हुए CRPF के जवान की बहन की शादी थी, और इसमें भाई का दायित्व निभाने के लिए बलिदानी सैनिक की बटालियन के जवान पहुंचे थे. इन जवानों ने शादी में भाई का दायित्व निभाया. जिसे देख बलिदानी सैनिक का परिवार काफी भावुक था.

रायबरेली के बलिदानी शैलेंद्र प्रताप सिंह की बहन ज्योति सिंह की 13 दिसंबर, 2021 को अपने गृह निवास में शादी हुई. समारोह में शामिल लोगों के लिए वह पल भावुक करने वाला था, जब शादी में अचानक पहुंचे सीआरपीएफ जवानों ने न केवल रस्मों में हिस्सा लिया, बल्कि एक भाई की तरह अपनी बहन को आशीर्वाद और उपहार दिया. इसके अलावा फूलों की चादर से सजी चुनरी को पकड़कर बहन को स्टेज तक ले गए और उसे विदा किया.

सीआरपीएफ के जवानों को देखकर सभी की आंखों में खुशी और गम के आंसू थे. इन जवानों ने भाई का दायित्व निभाकर भाई की कमी को पूरा करने का प्रयास किया. भावुक पिता ने कहा कि मेरा बेटा अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन मुझे सीआरपीएफ के सैनिकों के रूप में नए बेटे मिल गए हैं जो सुख-दुख में हमेशा हमारे साथ खड़े रहते हैं. शादी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

दरअसल, दक्षिण कश्मीर के आतंकग्रस्त क्षेत्र पुलवामा के लेथपुरा में स्थित 110 बटालियन सीआरपीएफ में तैनात सिपाही शैलेंद्र प्रताप सिंह आतंकियों से मोर्चा लेते हुए पांच अक्तूबर 2020 को वीर गति को प्राप्त हो गए थे. देश की खातिर सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस जवान की बहन की शादी में पहुंचकर सीआरपीएफ के साथियों ने भाई ने दायित्व निभाया.

Tuesday, December 14, 2021

काशी विश्वनाथ धाम और महात्मा गांधी

 

महात्मा गांधी 3 फरवरी, 1916 को काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने गए थे. अपनी इस तीर्थयात्रा का जिक्र उन्होंने अगले दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में भी किया था. उस दिन महात्मा गाँधी ने मंदिर के आसपास फैली अव्यवस्था की ओर इशारा करते हुए कहा था – “मैं विश्वनाथ के दर्शनों के लिए गया था. उन गलियों में चलते हुए मेरे मन में ख्याल आया कि यदि कोई अजनबी एकाएक ऊपर से इस मंदिर पर उतर पड़े और यदि उसे हम हिन्दुओं के बारे में विचार करना पड़े तो क्या हमारे बारे में कोई छोटी राय बना लेना उसके लिए स्वाभाविक न होगा? क्या यह महान मंदिर हमारे अपने आचरण की और उंगली नहीं उठाता? मैं यह बात एक हिन्दू की तरह बड़े दर्द के साथ कह रहा हूँ. क्या यह कोई ठीक बात नहीं है कि हमारे पवित्र मंदिर के आसपास की गलियां इतनी गन्दी हों? उसके आसपास जो घर बने हुए हैं, वे बे-सिलसिले और चाहे जैसे हो. गलियां टेढ़ी-मेढ़ी और संकरी हों. अगर हमारे मंदिर भी सफाई के नमूने न हों तो हमारा स्वराज कैसा होगा? चाहे ख़ुशी से, चाहे लाचारी से अंग्रेजों का बोरिया-बसना बंधते ही, क्या हमारे मंदिर पवित्रता, स्वच्छता और शांति के धाम बन जाएंगे?” (महात्मा गाँधी सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 13, प्रकाशन विभाग: नई दिल्ली, 1965, पृष्ठ 214-215)

महात्मा गाँधी का यह दर्द दो तरह से समझा जा सकता है. पहला वे बरसों पुरानी भारतीय आध्यात्मिक सांस्कृतिक विरासत के केन्द्रों पर मुगलों एवं ब्रिटिश सरकार की अनदेखी की ओर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहते थे. उनका प्रश्न एकदम स्पष्ट था कि अंग्रेज भारत से बिलकुल जाएंगे, लेकिन हमारे यह मंदिर कब अपने पहले जैसे भव्य स्वरुप में आएंगे? दूसरा ऐसा लगता है कि उन्होंने इस मुद्दे को जानबूझकर उठाया था. दरअसल, उस दिन दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह, एनी बेसेंट और मदनमोहन मालवीय भी वहां उपस्थित थे. अतः महात्मा गाँधी मंच के माध्यम से इन सभी को एक सन्देश देना चाहते थे कि भारत के स्वराज को हमारे मंदिरों के साथ भी जोड़कर देखना चाहिए.

महात्मा गाँधी अपने एक पत्र में बनारस को सम्मान देते हुए यानि काशीजीकहकर संबोधित करते हैं. (महात्मा गाँधी सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 17, प्रकाशन विभाग : नई दिल्ली, 1966, पृष्ठ 62)

उनका बनारस के प्रति लगाव कोई अचानक से नहीं उमड़ा था, बल्कि यह उनके व्यक्तिव में ही शामिल था. महात्मा गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो सबसे पहले कोलकाता (उस दौरान कलकत्ता) गए, जहाँ उन्हें अपनी वकालत से जुड़े कुछ काम थे. साथ-ही-साथ साल 1901 में इसी शहर में कांग्रेस का अधिवेशन भी प्रस्तावित था, जिसमें वे भी शामिल हुए थे. इसके बाद उन्होंने कोलकाता में ही रूककर एक महीना गोपाल कृष्ण गोखले के साथ बिताने का निश्चय किया. वास्तव में, यहीं से मोहनदास करमचंद गाँधी के महात्मा गाँधी बनने के सफर का पहला अध्याय शुरू होता है.

दरअसल, गोखले के साथ बिताये हुए समय के दौरान उन्होंने भारत दर्शन का निर्णय लिया. उन्होंने अपनी इस यात्रा का मार्ग कोलकाता से काशी, आगरा, जयपुर और पालनपुर होते हुए राजकोट तक चुना. यह यात्रा उन्होंने रेलगाड़ी के तीसरे दर्जे में की और धर्मशालाओं एवं यात्रियों की भांति पंडों के घरों में रुके. भारत को समझने के क्रम में वे इन शहरों में एक-एक दिन रुके. विशेष यह कि अपनी इस यात्रा में सिर्फ उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन का वर्णन खुद अपनी आत्मकथा, ‘सत्य के साथ प्रयोगमें किया है.

विश्वनाथ के दर्शन के अनुभवों पर उन्होंने पूरा एक अध्याय लिखा है. हालाँकि उनका उद्देश्य मंदिर के दर्शन करना था, चूँकि सफाई के प्रति उनका झुकाव था, इसलिए वे वहां फैली प्रशासनिक अव्यवस्थाओं को देखकर थोड़े निराश भी हुए. अपनी इस तीर्थयात्रा पर वे लिखते है, “काशी स्टेशन पर मैं सवेरे उतरा. मुझे किसी पण्डे के ही यहाँ उतरना था. कई ब्राहमणों ने मुझे घेर लिया. उनमें से जो मुझे थोड़ा सुघड़ और सज्जन लगा उसका घर मैंने पसंद किया. मेरा चुनाव अच्छा सिद्ध हुआ. ब्राहमण के आंगन में गाय बंधी थी. ऊपर एक कमरा था. उसमें मुझे ठहराया गया. मैं विधिपूर्वक गंगा-स्नान करना चाहता था. तब तक मुझे उपवास रखना था. पण्डे ने सब तैयारी की. मैंने उससे कह रखा था कि मैं सवा रुपये से अधिक दक्षिणा नहीं दे सकूँगा, अतएव वह उसके लायक तैयारी करे.

पण्डे ने बिना झगड़े के मेरी विनती स्वीकार कर ली. वह बोला, ‘हम लोग अमीर-गरीब सब लोगों को पूजा तो एक ही कराते हैं. दक्षिणा यजमान की इच्छा पर, शक्ति पर निर्भर करती है’. मेरे ख्याल से पंडाजी ने पूजा-विधि में कोई गड़बड़ी नहीं की. लगभग बारह बजे इससे फुरसत पाकर मैं काशी विश्वनाथ के दर्शन करने गया.” (महात्मा गाँधी सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 39, प्रकाशन विभाग : नई दिल्ली, 1971, पृष्ठ 186-187)

महात्मा गाँधी अपने जीवन में कुल तीन बार काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए गए थे. इस बात में कोई दोराय नहीं कि उन्हें किसी भी तरह का पाखंड रास नहीं आता था, अतः उन्हें वहां जैसा दिखा अथवा समझ आया, उस पर उन्होंने अपने स्पष्ट विचार रखे. जब उन्होंने हरिजनों को लेकर आन्दोलन शुरू किया, तो उनके मंदिरों में प्रवेश पर भी उनका मत सटीक था. साल 1936 (10 जून) में कंगेरी के हरिजन सेवक सम्मलेन में उन्होंने कहा, “मैं दावा करता हूँ कि मैं किसी कट्टर सनातनी हिन्दू से कम अच्छा हिन्दू नहीं हूँ. हिन्दू धर्म के तमाम अनुशासनों को अपने जीवन में उतारने का मैंने अपनी क्षमता भर प्रयत्न किया है. मैं मानता हूँ कि मेरी क्षमता अल्प है. लेकिन इससे हिन्दू धर्म के प्रति मेरे हृदय में जो भाव और भक्ति है, उसमें कोई कमी नहीं आ जाती. हिन्दू धर्म के प्रति उस पूरे भक्तिभाव के होते हुए भी मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ आपसे यह कहता हूँ कि जब तक एक भी हरिजन के लिए काशी के मंदिर के द्वार बंद हैं, तब तक उसके अन्दर भगवान् विश्वनाथ का वास नहीं है.” (महात्मा गाँधी सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 63, प्रकाशन विभाग : नई दिल्ली, 1976, पृष्ठ 41)

प्रयागराज दीपदान उत्सव : …आजाद के मूछो की है शान वंदेमातरम !

 1498 से 1947 तक चले भीषण संघर्ष की बलिदान गाथा इतिहास के पन्नों में सही नहीं रमेश जी 

प्रयागराज। प्रयागराज के ऐतिहासिक चंद्रशेखर आजाद पार्क में अमृत महोत्सव समिति प्रयाग उत्तर भाग की ओर से आयोजित दीपदान उत्सव में देश के क्रांतिवीरों एवं स्वतंत्रता सेनानियों की गौरव गाथा का अलग अलग अंदाज में वर्णन किया गया| इस दौरान मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काशी प्रांत प्रचारक रमेश जी ने अपने विचार व्यक्त किये| उत्सव में उपस्थित कवियों ने भी अपने कविताओं से परिसर को राष्ट्रभक्ति वातावरण से ओत-प्रोत कर दिया|

कार्यक्रम में रमेश जी ने आह्वान करते हुए कहा कि सच्ची स्वतंत्रता के लिए युवा पीढ़ी बलिदानों के लिए तैयार रहें। 15 अगस्त 1947 को तो केवल स्वाधीनता मिली है, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी है। उन्होंने आगे कहा कि स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले बलिदानियों का स्मरण करने के लिए हम एकत्रित हुए हैं| यह दीपदान उन सभी बलिदानियों को समर्पित है। उन्होंने बड़े ही ओजस्वी स्वर में कहा कि हम देशभक्ति की ही ज्वाला धधकाने के लिए निकले हैं। प्रखर राष्ट्रभक्ति की भावना से ही देश की सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है। उन्होंने भरोसा दिलाते हुए कहा कि देश पर प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हाल ही में शहीद जनरल विपिन रावत समेत सभी बलिदानियो का श्रद्धापूर्ण स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि बलिदानियो का मजाक उड़ाने वाले देश के दुश्मन है। इन्हें मुंहतोड़ जवाब मिलना चाहिए। अमृत महोत्सव के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाले  महाअभियान का नाम ही अमृत महोत्सव है। देश को केवल स्वाधीनता मिली है| उन्होंने कहा कि 1498 से 1947 तक चले भीषण संघर्ष की बलिदान गाथा इतिहास के पन्नों में सही नहीं लिखी गई। केवल एक परिवार और एक विचारधारा को महिमामंडित कर बलिदानियों की पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। यह बलिदानियो  के साथ सरासर अन्याय है। इस सच्चाई का बोध कराने के लिए तथा लोगों के दिलों में बलिदान की याद अंकित कराने के लिए अमृत महोत्सव का आयोजन  किया गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रयागराज का जनमानस देशभक्ति से ओतप्रोत है। पूरे प्रांत में ऐसा ही देशभक्ति का वायुमंडल खड़ा करने के लिए यह अमृत महोत्सव आयोजित किया जा रहा है।

इतिहास की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि देशवासियों को पढ़ाया जाता है कि एक लंबे समय तक देश मुगलों और अंग्रेजों के अधीन रहा जबकि सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। पूरा देश कभी भी गुलाम नहीं हुआ। आजादी के लिए लगातार संघर्ष चलते रहे और पूरे देश पर विदेशियों का आधिपत्य कभी भी स्थापित नहीं हो पाया। इतिहास के पन्नों में इस सच्चाई को स्थान नहीं मिल पाया है| इस सत्य का साक्षात्कार कराने के लिए जनजागरण का अभियान जारी है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि बलिदानी चंद्रशेखर आजाद से प्रेरणा लेकर सभी लोग अपने मन में देशभक्ति का भाव जगाये और राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सचेष्ट रहें। इसके पूर्व समाजसेवी प्रो राज बिहारी लाल जी ने कहा कि देश को स्वतंत्रता समझौता वादियो ने नहीं बल्कि क्रांतिकारियों ने दिलाया है। इसके लिए हजारों लोगों को बलिदान देना पड़ा है। देश बलिदानियो के प्रति कृतज्ञ है। तत्पश्चात उत्सव में आये प्रतिष्ठित युवा कवियों ने राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत अपनी कविता को सुना कर पूरे वातावरण को जोश से भर दिया। कवियों को सुनकर एकत्रित नौजवानों ने जोशीले अंदाज में भारत माता की जय और वंदे मातरम का घोष करके अपनी राष्ट्रभक्ति की भावना को मनो नया स्वर दिया| कवियों में अपनी विशेष पहचान रखने वाले शैलेंद्र मधुर के संचालन में शुरू हुए इस सम्मेलन में योगेश झमाझम ने वंदेमातरम को परिभाषित करते हुए क्रांतिवीरों को श्रद्धांजली दी -

मन में उमंग और तन में तरंग भरे

अदम्य शौर्य की पहचान वंदे मातरम।

खींच लेता दुश्मनों का प्राण वंदेमातरम

आजाद के मूछों की है शान वंदेमातरम।

कवि अमित आभास ने हम रहे न रहे, देश जिंदा रहेसुनाया| अलका श्रीवास्तव समेत अनेक युवा कवियो ने वीर रस मे कविता सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। उद्बोधन के पश्चात प्रांत प्रचारक रमेश जी, शिव कुमार पाल जी, प्रो राज बिहारी ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भारत माता की समवेत स्वरों में स्तुति के साथ आरती की। कार्यक्रम के बीच-बीच में लोगों ने भारत माता की जय तथा वंदेमातरम का उद्घोष कर राष्ट्रभक्ति वातावरण बना दिया|

इस अवसर पर प्रो0 एसपी सिंह, शिव प्रकाश जी, विभाग प्रचारक डॉ. पीयूष जी, अमृत महोत्सव के प्रांत सह संयोजक डॉ मुरारजी त्रिपाठी, शिव कुमार पाल जी, प्रो. अमित पांडे, संजीव जी, रामकुमार जी, नागेंद्र जी, त्रिवेणी लाल श्रीवास्तव समेत हजारों की संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे। संचालन अरुण वर्मा ने किया। कार्यक्रम का संयोजन गंगा समग्र ने किया।

Monday, December 13, 2021

औरंगजेब के अत्याचार, उसके आतंक के इतिहास की साक्षी है काशी


काशी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का लोकार्पण किया. उन्होंने बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करने के साथ ही  नगर कोतवाल कालभैरव जी के दर्शन भी किये.

इस अवसर पर उन्होंने कहा कि हमारे पुराणों में कहा गया है कि जैसे ही कोई काशी में प्रवेश करता है, सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है. भगवान विश्वेश्वर का आशीर्वाद, एक अलौकिक ऊर्जा यहाँ आते ही हमारी अंतर-आत्मा को जागृत कर देती है. विश्वनाथ धाम का ये पूरा




नया परिसर एक भव्य भवन भर नहीं है. ये प्रतीक है, हमारे भारत की सनातन संस्कृति का.! ये प्रतीक है, हमारी आध्यात्मिक आत्मा का.! ये प्रतीक है, भारत की प्राचीनता का, परम्पराओं का.! भारत की ऊर्जा का, गतिशीलता का..

आप यहाँ जब आएंगे तो केवल आस्था के दर्शन नहीं करेंगे. आपको यहाँ अपने अतीत के गौरव का अहसास भी होगा. कैसे प्राचीनता और नवीनता एक साथ सजीव हो रही हैं, कैसे पुरातन की प्रेरणाएं भविष्य को दिशा दे रही हैं, इसके साक्षात दर्शन विश्वनाथ धाम परिसर में हम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि आततायियों ने इस नगरी पर आक्रमण किए, इसे ध्वस्त करने के प्रयास किए. औरंगजेब के अत्याचार, उसके आतंक का इतिहास साक्षी है. जिसने सभ्यता को तलवार के बल पर बदलने की कोशिश की, जिसने संस्कृति को कट्टरता से कुचलने की कोशिश की. लेकिन इस देश की मिट्टी बाकी दुनिया से कुछ अलग है. यहाँ अगर औरंगजेब आता है तो शिवाजी भी उठ खड़े होते हैं. अगर कोई सालार मसूद इधर बढ़ता है तो राजा सुहेलदेव जैसे वीर योद्धा उसे हमारी एकता की ताकत का अहसास करा देते हैं. और अंग्रेजों के दौर में भी, हेस्टिंग का क्या हश्र काशी के लोगों ने किया था, ये तो काशी के लोग जानते ही हैं.

प्रधानमंत्री ने कहा कि गुलामी के लंबे कालखंड ने हम भारतीयों का आत्मविश्वास ऐसा तोड़ा कि हम अपने ही सृजन पर विश्वास खो बैठे. आज हजारों वर्ष पुरानी इस काशी से, मैं हर देशवासी का आह्वान करता हूं – पूरे आत्मविश्वास से सृजन करिए, Innovate करिए, Innovative तरीके से करिए.

मेरे लिए जनता जनार्दन ईश्वर का ही रूप है, हर भारतवासी ईश्वर का ही अंश है. इसलिए मैं कुछ मांगना चाहता हूं. मैं आपसे अपने लिए नहीं, हमारे देश के लिए तीन संकल्प चाहता हूं – स्वच्छता, सृजन और आत्मनिर्भर भारत के लिए निरंतर प्रयास. एक संकल्प जो आज हमें लेना है, वो है आत्मनिर्भर भारत के लिए अपने प्रयास बढ़ाने का. ये आजादी का अमृतकाल है. हम आजादी के 75वें साल में हैं. जब भारत सौ साल की आजादी का समारोह बनाएगा, तब का भारत कैसा होगा, इसके लिए हमें अभी से काम करना होगा.

आज का भारत अपनी खोई हुई विरासत को फिर से संजो रहा है. यहां काशी में तो माता अन्नपूर्णा खुद विराजती हैं. मुझे खुशी है कि काशी से चुराई गई मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा, एक शताब्दी के इंतजार के बाद अब फिर से काशी में स्थापित की जा चुकी है.

उन्होंने कहा कि हर भारतवासी की भुजाओं में वो बल है, जो अकल्पनीय को साकार कर देता है. हम तप जानते हैं, तपस्या जानते हैं, देश के लिए दिन रात खपना जानते हैं. चुनौती कितनी ही बड़ी क्यों ना हो, हम भारतीय मिलकर उसे परास्त कर सकते हैं.

काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण, भारत को एक निर्णायक दिशा देगा, एक उज्जवल भविष्य की तरफ ले जाएगा. ये परिसर, साक्षी है हमारे सामर्थ्य का, हमारे कर्तव्य का. अगर सोच लिया जाए, ठान लिया जाए, तो असंभव कुछ भी नहीं.

काशी अहिंसातप की प्रतिमूर्ति चार जैन तीर्थंकरों की धरती है. राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा से लेकर वल्लभाचार्यरामानन्द जी के ज्ञान तक चैतन्य महाप्रभुसमर्थगुरु रामदास से लेकर स्वामी विवेकानंदमदनमोहन मालवीय तक कितने ही ऋषियोंआचार्यों का संबंध काशी की पवित्र धरती से रहा है.

बनारस वो नगर है, जहां से जगद्गुरू शंकराचार्य को श्रीडोम राजा की पवित्रता से प्रेरणा मिली, उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बांधने का संकल्प लिया. ये वो जगह है, जहां भगवान शंकर की प्रेरणा से गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस जैसी अलौकिक रचना की.

यहीं की धरती सारनाथ में भगवान बुद्ध का बोध संसार के लिए प्रकट हुआ. समाज सुधार के लिए कबीरदास जैसे मनीषी यहाँ प्रकट हुये. समाज को जोड़ने की जरूरत थी तो संत रैदास जी की भक्ति की शक्ति का केंद्र भी काशी बनी.

काशी शब्दों का विषय नहीं हैसंवेदनाओं की सृष्टि है. काशी वो है – जहां जागृति ही जीवन है! काशी वो है – जहां मृत्यु भी मंगल है! काशी वो है – जहां सत्य ही संस्कार है! काशी वो है – जहां प्रेम ही परंपरा है.

सोनभद्र : स्वदेशी, स्वाभिमान और स्वावलंबन की अवधारणा पुनः करनी है स्थापित – रमेशजी

सोनभद्र। हमारे लिए गौरवशालीस्वाभिमानी भुलाये गये इतिहास की पुनर्स्थापना ही स्वतंत्रता का अमृत है। ‘स्व’ की तलाश और बलिदानियों के योगदान को प्रतिस्थापित कराना है। स्वदेशीस्वाभिमान और स्वावलंबन की अवधारणा एक बार फिर स्थापित करनी है। भारत को पुनः विश्व गुरु पद पर आसीन कराना है। राष्ट्र को परम वैभव तक पहुँचाने में हम घटक के रूप में सहभागी बनें, इसकी आवश्यकता है। यह विचार काशी प्रान्त प्रचारक रमेश ने शुक्रवार को जनपद मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज स्थित तहसील परिसर से स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव’ अभियान के तृतीय चरण में तिरंगा यात्रा को रवाना करते हुए व्यक्त किया।

यात्रा के दौरान भारतमाता की भव्य झांकी के साथ सैकड़ो की संख्या में बाइक सवार नागरिक तिरंगा लिए नगर भ्रमण के लिए निकल पड़े। तिरंगा यात्रा सिविल लाइन रोड से होते हुए स्वर्णजयंती चौकपिपरी रोडमुख्य चौराहा से होते हुए पन्नूगंज सड़क तक शहर में तिरंगा यात्रा और भारत माता के जयकारे लगाते लोग दिखे।

महिला थाने के पास से यात्रा पुनः कचहरी परिसर आई। यहाँ भारत माता की आरती और पूजन के पश्चात् कार्यक्रम का समापन हुआ। इसके पूर्व यात्रा में लोग ‘भारत माता की जय‘ और ‘वंदेमातरम’ के गगनभेदी नारे लगाते चल रहे थे। विभिन्न स्थानों पर भारत माता की आरती उतारी गई। नगर में एक नई चेतना का संचार स्पष्ट नजर आया।

इसमें अधिवक्ताअध्यापकव्यापारीकिसानमजदूर समेत समाज के विभिन्न वर्गों के लोग सहभागी बनें। आयोजित तिरंगा यात्रा में प्रवेशहर्ष अग्रवालनंदलाल जीब्रजेश सिंहपंकजआलोकसत्या रमणकीर्तनयोगेशदयाशंकरकृष्ण मुरारी गुप्तानीरज सिंहहर्षवर्धन केसरवानी समेत सैकड़ो नागरिक उत्साह के साथ तिरंगा लिए हुए उदघोष के बीच भ्रमण किए।