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Monday, January 23, 2023

सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती विशेष : ...जब नगाओं ने अपने हिस्से का भोजन भी आईएनए के सैनिकों को दे दिया था

आशुतोष भटनागर


नगा राजा कल्बेट की प्रसन्नता का पारावार न था. अंग्रेज जिसके नाम से भय खाते थे, वे सुभाष चन्द्र बोस नागालैंड के उस छोटे से गांव में कल्बेट के घर जो आ रहे थे. 08 अप्रैल, 1944 में ऐतिहासिक दिन नागालैंड की राजधानी कोहिमा पर आजाद हिन्द फौज ने तिरंगा लहराया और भारतीय स्वातंत्र्य के इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ जुड़ गया. लेकिन यह विजय भी सरल न थी.

संसाधनों और खाद्य सामग्री के अभाव में आजाद हिन्द फौज के सैनिक केले के तने और जंगली बांस की कोमल पत्तियां तक उबाल के खाने को विवश थे, ऐसे समय में ही सहायता के लिये आगे आए थे नगा सरदार राजा कल्बेट. नगाओं ने अपने हिस्से का भी भोजन इन सैनिकों को खिलाया. नेताजी कल्बेट और उसके गांव-समाज के लोगों द्वारा आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को दी गयी सहायता से इतने अभिभूत थे कि युद्ध के इस भीषण दौर में भी कृतज्ञता प्रकट करने के लिये राजा कल्बेट के गांव गए.

इससे पहले 4 फरवरी, 1944 की एक सुबह. आजाद हिन्द फौज प्रस्थान के लिये तैयार है. सैनिकों को कूच का आदेश देते हुए सुभाष चन्द्र बोस कह रहे हैं – “दूर, बहुत दूर, नदी के उस पार, पहाड़ और जंगलों के उस पार है हमारा देश. जहां की मिट्टी में हम पैदा हुए हैं, वहीं हम लौट जाएंगे”.

सुनो, भारत हमें बुला रहा है. बुला रहे हैं अड़तीस करोड़ भारतवासी. रक्त पुकार रहा है रक्त को. अगर ईश्वर ने चाहा तो हम बलिदान देंगे. लेकिन मरने से पहले उस रास्ते को चूमेंगे, जिस पर होकर हमारी सेना गुजरेगी. दिल्ली का रास्ता ही स्वतंत्रता का रास्ता है. आज से हमारा नारा होगा स्वाधीनता या मृत्यु. चलो दिल्ली!

जंगलों और पहाड़ों को पार करते हुए आजाद हिन्द पौज के सैनिक निरंतर बढ़ रहे थे. रास्ते में अराकान जीता. ताऊंग बाजार पर अधिकार किया. एक मार्च को जीता सेटाबिन, 5 को कालादि और 8 मार्च को होआइट और चार दिन बाद लेनाकट. 18 मार्च को केनेडी पीक जीता जिसके पार था भारत. 19 मार्च की भोर में यह सेना भारत की धरती पर थी. आह्लाद से नाचते सैनिक मार्ग के सारे कष्ट भूल गये थे. 22 मार्च को जापान के जनरल तोजो ने घोषणा दोहराई – “भारत के जीते हुए भाग पर पूरी तरह से आजाद हिन्द सरकार का ही अधिकार होगा”.

मेजर जनरल एम. जेड. कियानी के नेतृत्व में पहली डिवीजन आगे बढ़ रही थी. इसके अंतर्गत तीन ब्रिगेड थीं. सुभाष ब्रिगेड का संचालन मेजर जनरल शाहनवाज खां, गांधी ब्रिगेड का कर्नल आई. जे. कयानी तथा आजाद ब्रिगेड का नेतृत्व कर्नल गुलजारा सिंह कर रहे थे. लक्ष्य था नागालैंड की राजधानी कोहिमा. डिवीजन को आठ सेक्टरों में बांट कर गुलजारा सिंह, ठाकुर सिंह, प्रीतम सिंह, पूरन सिंह, एस. मलिक, रतूड़ी, बुरहानुद्दीन और रामस्वरूप आठ दिशाओं से आगे बढ़ रहे थे. कोहिमा में पहले से डटी अंग्रेजों की यॉर्कशायर रेजिमेन्ट, डरहम लाइट इनफैन्ट्री, रॉयल स्कट्स आदि इनके मार्ग में बाधा बने हुए थे.

घेरा कसता गया. पहले अधिकार में आया जी टी पहाड़, फिर डिप्टी कमिश्नर का बंगला. घमासान लड़ाई हुई. अंग्रेज सेना पीछे हटते हुए जहां जा पहुंची, वह जगह लम्बाई में छः सौ गज थी और चौड़ाई में साढ़े तीन सौ गज. 8 अप्रैल, 1944 को इस युद्ध का यह आखिरी मोर्चा था, जिसके बाद थी विजय. कर्नल ठाकुर सिंह ने कोहिमा पर तिरंगा लहरा दिया.

6 जुलाई को नेताजी ने महात्मा गांधी के लिये रेडियो पर संदेश प्रसारित किया – “स्वाधीनता प्राप्ति के लिये भारत की अंतिम लड़ाई जारी है. आजाद हिन्द फौज अब भारत के भीतर बड़ी बहादुरी के साथ लड़ रही है. हजारों तरह की विघ्न-बाधाओं के बावजूद वे आगे बढ़ते जा रहे हैं. राष्ट्रपिता, भारत के इस पवित्र मुक्ति संग्राम में हम आपकी शुभेच्छा और आशीर्वाद चाहते हैं”.

10 जुलाई को रंगून में नेताजी ने कहा – “हम जानते हैं कि उनके रसद और अस्त्र-शस्त्र हमसे कहीं ज्यादा अच्छे हैं क्योंकि हमसे लड़ने के लिये, बहुत पहले से वे भारत का शोषण कर रहे हैं. इस पर भी हम उन्हें पीछे धकेलने में सक्षम हुए हैं. क्योंकि शक्ति बीयर, रम, पोर्क या मांस से नहीं आयी है. आयी है आत्मविश्वास, आत्मत्याग, वीरता और अविचल धैर्य के रास्ते”.

11 जुलाई को को बहादुर शाह जफर की समाधि पर जाकर उन्होंने संकल्प व्यक्त किया – “यदि मनुष्य हैं तो ब्रिटिशों से, अकथनीय अत्याचार सहन कर जिन वीरों ने अकाल मृत्यु का वरण किया है, उसका बदला लेकर रहेंगे. जिन ब्रिटिशों ने हमारे स्वाधीनता प्रेमी वीरों का खून बहाया है, उन पर अमानुषिक अत्याचार किया है, उन्हें यह ऋण चुकाना ही पड़ेगा”.

ब्रिटिश सेना जब पीछे हट रही थी, तभी उसे भारी अमेरिकन सहायता प्राप्त हो गयी. अब पासा पलट गया था. इसी समय तेज वर्षा ने आजाद हिन्द फौज को घेर लिया. सेना को वापस लौटने के आदेश दिये गये. लेकिन यह वापसी और अधिक करुण थी.

मेजर जनरल शाहनवाज ने इसका मार्मिक वर्णन करते हुए लिखा है – “न खाने के लिये रसद थी और न दवाएं. इस जंगल में बहुत बड़ी-बड़ी मक्खियां थीं जो कहीं भी घाव पाकर उस पर बैठ जाती थीं तो आधे घण्टे में उस घाव पर हजारों कीड़े नजर आने लगते. रास्ते बह गये थे और नये बनाये रास्तों में पानी भर गया था. काफी सैनिक उसी कीचड़ में फंस कर मर गए. बहुत से लोग पेचिश और मलेरिया से बीमार थे. रास्ते के दोनों ओर जापानी और भारतीय सैनिकों की लाशें पड़ी थीं. चार दिन पहले मरे घोड़े का मांस खाते भी देखा मैंने अपने सैनिकों को. कोई भूख से तो कोई थकावट से मरा. किसी ने कष्ट न सहन कर पाने की स्थिति में खुद को गोली मार ली”.

एक दिन मुझे सड़क के किनारे एक घायल सिपाही दिखायी पड़ा. वह पड़ा हुआ मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था. उसके घाव पर अनगिनत कीड़े बिलबिला रहे थे. मुझे देख उसने उठने की कोशिश की पर उठ न सका. उसने मुझे पास बैठने का इशारा किया. उसने मुझे कहा – “आप लौट रहे हैं, आपकी नेताजी से भेंट जरूर होगी. मेरी तरफ से उन्हें जय हिन्द कहियेगा और कह दीजियेगा कि मैंने उन्हें जिस बात का वचन दिया था, उसका अक्षरशः पालन किया है. मेरी मृत्यु कैसे हुई, यह उन्हें साफ-साफ बता दीजियेगा. मुझे जीते-जी कीड़े किस तरह से कुतर-कुतर कर खा रहे हैं, यह भी बताइयेगा. एक बात और उनसे बता दीजियेगा इस भयंकर यन्त्रणा में भी मैं शांति और आनंद में हूं क्योंकि हर पल मुझे लग रहा है कि अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिये मैं प्राण त्याग रहा हूं”. सैनिकों के इन कष्टों का समाचार नेताजी तक भी पहुंचता रहा.

हिरोशिमा और नागासाकी पर एटमी हमले के पश्चात जापान ने आत्म समर्पण कर दिया. 11 अगस्त को यह समाचार नेताजी तक पहुंचा. उनकी प्रतिक्रिया थी – “जापान की लड़ाई खत्म हो सकती है, हमारी नहीं. उनके आत्मसमर्पण का मतलब भारत की मुक्ति वाहिनी का आत्मसमर्पण नहीं है. आजाद हिन्द फौज इस पराजय को स्वीकार नहीं करेगी”. 12 अगस्त को वे सिंगापुर पहुंचे. समूचे दक्षिणपूर्व एशिया में फैले आजाद हिन्द फौज के सूत्रों को संदेश भिजवाने और आगे की रणनीति तय करने में तीन दिन बीत गये.

15 अगस्त, 1944 को शत्रु सेना के निकट पहुंचने के समाचार मिलने लगे. उन्होंने कर्नल स्ट्रेसी और कैप्टन आर. ए. मलिक को बुलवा भेजा. उनकी आंखों के आगे उन हजारों सैनिकों के चेहरे घूम रहे थे, जिन्होंने कोहिमा, इम्फाल और विशनपुर में भारत की स्वाधीनता के लिये अपने प्राण दिये थे. नेताजी ने स्ट्रेसी की ओर देखा और बोले – “किसी भी समय शत्रु यहां पहुंच सकता है. उनके पहुंचने के पहले इन शहीदों को समर्पित स्मारक बन जाना चाहिये. मैं चाहता हूं कि सिंगापुर में कदम रखते ही ब्रिटिश समुद्र की ओर सिर उठाये इस शहीद स्तम्भ को देख सकें”. तुम यह काम जरूर कर सकोगे. ईश्वर तुम्हारी सहायता करे. तीन दिन और तीन रात अथक परिश्रम करके स्ट्रेसी ने नेताजी की इच्छा को साकार कर दिखाया.

कुछ वर्ष पूर्व ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के राज्यारोहण के साठ साल पूरे होने का समारोह ब्रिटेन में जब मनाया गया तो ब्रिटेन के प्रिन्स एंड्र्यू भारत के दौरे पर आये. जिस ब्रिटेन के राज्य में कहा जाता था कि सूरज कभी डूबता नहीं था, वही आज सिमट कर इतना छोटा रह गया है कि कमजोर नजर वाले उसे दुनिया के नक्शे पर ढूंढ भी नहीं सकते. किन्तु न तो उन्होंने अपने इतिहास से पलायन किया है और न ही वे इससे शर्मिन्दा हैं. 1857 का स्वातंत्र्य समर भारतीय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है तो ब्रिटेन के लिये वह काला अध्याय. लेकिन कुछ वर्ष पहले जब भारत इसके 150 वर्ष का समारोह मना रहा था, कुछ ब्रिटिश नागरिक भारत आये और उन तमाम जगहों पर जाकर उन्होंने अपने उन पुरखों को याद किया जो 1857 में मारे गये थे.

युवराज ऐंड्र्यू इस अवसर पर नागालैंड की राजधानी कोहिमा में बने युद्ध स्मारक पर फूल चढ़ाने भी गये. उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के समय मणिपुर व नागालैंड की पहाड़ियों और जंगलों में 4 अप्रैल से 22 जून 1944 तक चले संघर्ष में मारे गये अंग्रेज सेनाधिकारियों सहित 5 हजार सैनिकों को श्रद्धांजलि दी.

भारत के एक प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र ने शीर्षक लगाया द्वितीय विश्व युद्ध में मारे गये सैनिकों को एंड्र्यू का सलाम. प्रायः ऐसे ही शीर्षक के साथ अन्य समाचार पत्रों में भी खबरें छपीं. लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि यह सेनाधिकारी मरे कैसे. किसने उन्हें मारा, जिन्होंने उन्हें मारा, उनका क्या हुआ. अगर यह इतनी बड़ी ऐतिहासिक घटना है कि सात दशक बाद भी ब्रिटेन का शाही परिवार उसे भुला नहीं सका है तो उसका भारत के इतिहास से क्या रिश्ता है. इस युद्ध को भारत के इतिहास में किस रूप में दर्ज किया गया है और अगर इतनी ऐतिहासिक घटना, जो भारत की धरती पर घटी, का पता भारत के ही नागरिकों को नहीं है तो इसका दोषी कौन है, यह आज भी अनुत्तरित है.

- निदेशक, जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र दिल्ली

सुभाष चंद्र बोस ने किया था ब्रिटिश साम्राज्य पर अंतिम निर्याणक प्रहार

- नरेन्द्र सहगल

तुम मुझे खून दो - मैं तुम्हें आजादी दूंगाके गगनभेदी उद्घोष के साथ आजाद हिंद फौज के सेनापति और सशस्त्र क्रांति के अंतिम ध्वज-वाहक सुभाष चंद्र बोस ने 90 वर्षों तक निरंतर चले स्वातंत्र्य-यज्ञमें अपने प्राणों से पूर्ण आहुति दी थी। इंग्लैंड के दोनों प्रधानमंत्रियों चर्चिल और एटली ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि अंग्रेजों ने अहिंसक सत्याग्रह के कारण भारत को नहीं छोड़ा और ना ही 1942 में हुए तथाकथित भारत छोड़ो आंदोलनसे अंग्रेज घबराए थे।

सच्चाई तो यही है कि देश के कोने कोने में सशस्त्र क्रांति की लपटें विकराल रूप धारण कर रही थी। भारतीय सेना ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। अधिकांश रियासती राजाओं ने अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी बंद कर दी थी। आजाद हिंद फौज ने भारत के एक भूभाग पर अपनी सरकार गठित कर ली थी। द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी होने के बावजूद भी विश्वव्यापी ब्रिटिश साम्राज्यवाद चरमरा गया था। भारत में अंग्रेज भक्त चाटुकारों का दिवालिया पिट चुका था। आजाद हिंद फौज के जांबाज सैनिक आगे बढ़ते जा रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघआर्य समाजअभिनव भारत जैसी संस्थाएं सुभाष चंद्र बोस के रास्ते पर चलने के लिए पूर्णतया तैयार थी। ऐसी विकट परिस्थितियों में भारत को छोड़ने के लिए अंग्रेज बाध्य हो गए थे।

यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर अंतिम निर्णायक प्रहार किया था। 21 अक्तूबर, 1943 को नेता जी द्वारा सिंगापुर में गठित आजाद हिन्द सरकार को जापान और जर्मनी सहित नौ देशों ने मान्यता दे दी थी। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर इस सरकार ने 30 दिसंबर को भारत का राष्ट्रध्वज तिरंगा फहरा कर आजाद भारत की घोषणा कर दी थी। अंडमान और निकोबार के नाम बदल कर शहीदऔर स्वराजकर दिए गए।

अत: यह कहने में कोई भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नेताजी द्वारा गठित सरकार अखंड स्वतंत्र भारत की पहली सरकार थी। नेताजी सुभाषचंद्र बोस अखंड स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। 30 दिसंबर, 1943 ही वास्तव में अखंड भारत का स्वतंत्रता दिवस है। इसी दिन नेताजी ने अखण्ड भारत की सर्वांग एवं पूर्ण स्वतंत्रता का बिगुल बजाया था। दुर्भाग्य से कांग्रेस द्वारा देश का विभाजन स्वीकार कर लिया गया और 15 अगस्त को खण्डित भारत का स्वतंत्रता दिवस स्वीकृत हो गया। हम सबने भी अर्थात देश की जनता ने इसे स्वीकार कर लिया। हम स्वतंत्र हो गए यह प्रसन्त्ता की बात है। आज सारा देश हर्सोल्लास के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगाँठ मना रहा। सभी देशवासियों को हमारी ओर से हार्दिक बधाई। परन्तु भारतवासियों को भारत को पुनः अखंड करने की रणनीति पर भी विचार करना चाहिए। एक दिन अवश्य आएगा जब हम स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ स्वतंत्र अखंड भारत में मनाएंगे।

उपरोक्त तथ्यों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में झांक कर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि स्वतंत्रता संग्राम के इस महत्वपूर्ण एवं निर्णायक अध्याय को जानबूझ कर इतिहास के कूड़ेदान में डाल देने का राष्ट्रीय अपराध किया गया। वर्तमान खंडित भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण हुए हैं। इस अवसर पर देश के नागरिकोंयुवा पीढ़ी को ऐतिहासिक तथ्य से अवगत करवाकर गलती को सुधारने का सुनहरा अवसर हमारे पास है।

यही ऐतिहासिक अन्याय वीर सावरकरसरदार भगत सिंहचन्द्रशेखर आजादरासबिहारी बोसडॉक्टर हेडगेवार जैसे सैकड़ों देशभक्त क्रांतिकारियों एवं आजाद हिन्द फौज के 30 हजार बलिदानी सैनिकों के साथ किया गया है। आर्य समाजहिन्दू महासभा इत्यादि के योगदान को भी नकार दिया गया।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस कांग्रेस के प्रखर राष्ट्रीय नेता थे। वे किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण के घोर विरोधी थे। नेताजी के अनुसार केवल अहिंसक सत्याग्रहों से ही देश आजाद नहीं हो सकता। नेताजी के इसी एक निर्विवाद सिद्धांत के कारण गांधीवादी नेताओं ने उन्हें 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। नेताजी ने 03 मई 1939 को अपने सहयोगियों की सहायता से एक स्वतंत्र संगठन फॉरवर्ड ब्लाक की स्थापना की। उन्होंने समस्त राष्ट्रीय शक्तियों को एकत्रित करने का अभियान छेड़ दिया।

सितंबर 1939 में पोलैण्ड पर जर्मनी के हमले के साथ द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। ब्रिटेन और फ्रांस भी युद्ध में कूद पड़े। नेताजी ने इस अवसर का लाभ उठाकर अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास प्रारंभ कर दिए। उन्होंने अनेक क्रांतिकारी नेताओं वीर सावरकरडॉक्टर हेडगेवार एवं डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे स्वातंत्र्य योद्धाओं के साथ मिलकर निर्णायक प्रहार का ऐतिहासिक फैसला किया।

इसी उद्देश्य से नेताजी गुप्त रूप से विदेश चले गए। वहां उन्होंने हजारों क्रांतिकारी देशभक्त भारतीय युवाओं की योजनाबद्ध ढंग से आजाद हिन्द फौज में भर्ती करवाई। इधरवीर सावरकर ने भारतीय सेना में विद्रोह करवाने की मुहिम छेड़ दी। आजाद हिन्द फौज अपने उद्देश्य के अनुसार सफलता की ओर बढ़ने लगी।

नेताजी के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने जिस स्वाधीनता संग्राम का श्रीगणेश कियाउसने तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश का बिगुल ही बजा दिया। इस फौज के सेनापति सुभाष चन्द्र बोस ने जैसे ही दिल्ली चलो का उद्घोष कियाभारतीय सेना में विद्रोह की आग लग गई। डॉक्टर हेडगेवारसावरकर और सुभाष चन्द्र के बीच पूर्व में बनी एक गुप्त योजना के अनुसार भारतीय सेना में भर्ती हुए सैनिकों ने अंग्रेज सरकार को उखाड़ डालने के लिए कमर कस ली। यह जवान सैनिक प्रशिक्षण लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ेंगेइसी उद्देश्य से भर्ती हुए थे।

राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध गुप्तचर विभाग की रपटों में कहा गया है कि 20 सितंबर 1943 को नागपुर में हुई संघ की एक गुप्त बैठक में जापान की सहायता से आजाद हिन्द फौज के भारत की ओर कूच के समय संघ की सम्भावित योजना के बारे में विचार हुआ था।एक दिन अवश्य ही इस दबी हुई सच्चाई पर से पर्दा उठेगा कि वीर सावरकर एक महान उद्देश्य के लिए तथाकथित माफीनामा लिख कर जेल से बाहर आए थे। यह अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने जैसा कदम था। अभिनव भारत का गठनसेना में विद्रोहऔर आजाद हिंद फौज की स्थापना इस रणनीति का हिस्सा थे।

सन् 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के तुरंत पश्चात ब्रिटिश शासक इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि अब भारत में उनका रहना और शासन करना संभव नहीं होगा। दुनिया के अधिकांश देशों पर अपना अधिपत्य जमाए रखने की उनकी शक्ति और संसाधन पूर्णतया समाप्त हो चुके हैं। वास्तव में यही वजह थी अंग्रेजों के भारत छोड़ने की।

लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्मके नवंबर 2009 के अंक में के।सी। सुदर्शन जी का एक लेख पाकिस्तान के निर्माण की व्यथाछपा था। जिसमें लिखा था - जिस ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली के काल में भारत को स्वतंत्रता मिलीवे 1965 में एक निजी दौरे पर कोलकत्ता आए थे और उस समय के कार्यकारी राज्यपाल और कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी सी।डी। चक्रवर्ती के साथ राजभवन में ठहरे थे।

बातचीत के दौरान चक्रवर्ती ने सहजभाव से पूछा कि 1942 का आंदोलन तो असफल हो चुका था और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी आप विजयी रहेफिर आपने भारत क्यों छोड़ातब एटली ने कहा था कि हमने 1942 के कारण भारत नहीं छोड़ाहमने भारत छोड़ा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के कारण। नेताजी अपनी फौज के साथ बढ़ते-बढ़ते इंफाल तक आ चुके थे और उसके तुरंत बाद नौसेना एवं वायु सेना में विद्रोह हो गया था।जाहिर है कि अंग्रेज शासकों का दम निकल चुका था। अगर उस समय कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोसवीर सावरकरडॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और संघ के बड़े अधिकारियों के साथ संयुक्त संग्राम छेड़ा होता तो देश स्वतंत्र भी होता और भारत का दुःखद विभाजन भी नहीं होता।

 

(लेखक पूर्व संघ प्रचारक एवं पत्रकार हैं|)

Tuesday, January 17, 2023

दिवस विशेष : जानें कौन हैं रणछोड़दास रबारी ‘पागी’, जिन्होंने 1,200 पाकिस्तानी सैनिकों को धुल चटा दी

भारत की अपने पड़ोसी चीन और पाकिस्तान से सीमा पर प्रायः मुठभेड़ होती रहती है। इनमें जहां सैनिक आगे बढ़कर मोर्चे पर लड़ते हैं, वहां स्थानीय नागरिक पीछे से सेना का सहयोग करते हैं। ऐसे ही एक पशुपालक रणछोड़दास रबारी पागीने 1965 में सेना की जो सहायता की, उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। वे गुजरात से लगे पेथापुर गथडो गांव के पशुपालक गडरिये थे; पर 1947 में यह गांव पाकिस्तान में चला गया। इससे वहां हिन्दुओं का उत्पीड़न होने लगा। अतः वे सपरिवार गुजरात के बनासकांठा में बस गये।

राजस्थान और गुजरात के गडरिये अपने ऊंट, भेड़, बकरी आदि के साथ कई-कई दिन तक रेगिस्तानी क्षेत्रों में घूमते रहते हैं। चांद, सूर्य, तारे तथा अन्य नक्षत्रों की सहायता से उन्हें समय, मौसम तथा दिशा का ठीक ज्ञान होता है। रणछोड़दास तो इसके विशेषज्ञ ही थे। इसलिए 58 वर्ष की अवस्था में बनासकांठा के पुलिस अधीक्षक वनराज सिंह झाला ने उन्हें रास्ता दिखाने वाले मार्गदर्शक (पागी) के रूप में रख लिया। रणछोड़दास रेत पर पड़े पैरों के निशान देखकर बता देते थे इधर से गये व्यक्ति या पशु कितनी देर पहले गये हैं तथा कितनी दूर पहुंच गये होंगे। वे उनकी उम्र और कितना बोझ लेकर चल रहे हैं, इसका भी ठीक आकलन कर लेते थे। पशुओं की गंध और मल-मूत्र से वे उनके नर या मादा होने का अनुमान लगा लेते थे।

1965 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने गुजरात में कच्छ सीमा पर स्थित विद्याकोटथाने पर कब्जा कर लिया। इस लड़ाई में लगभग 100 भारतीय सैनिक शहीद हुए। अतः दस हजार सैनिकों एक बड़ी टुकड़ी वहां भेजी गयी। उनके मार्गदर्शक थे रणछोड़दास। रेगिस्तान में तेज आंधी से रेत के टीले जगह बदल लेते हैं। इससे लोग भ्रमित हो जाते हैं; पर रणछोड़दास के साथ सेना अनुमान से 12 घंटे पहले ही छारकोटके मोर्चे पर पहुंच गयी और पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया। इतना ही नहीं, भारतीय सीमा में छिपे 1,200 शत्रु सैनिक भी पकड़ लिये गये। इसके लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कारदिया गया। 

1971 के युद्ध में भी रणछोड़दास ने कच्छ के रण और सीमावर्ती सर क्रीक में कई जगह भारतीय सेना की ऐसी ही सहायता की। ऊंट को रेगिस्तान का जहाज कहते हैं। जहां जीप और ट्रक भी हार जाते हैं, वहां ऊंट ही काम आता है। बिना खाये-पिये वह दिन भर चलता रहता है। रणछोड़दास ने कई बार अपने ऊंटों पर लादकर बम, गोले और अन्य सैन्य सामग्री मोर्चे तक पहुंचायी। पाकिस्तान के पालीनगर को जीतने में उनकी बड़ी भूमिका थी। तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशा ने इसके लिए उन्हें 300 रु. नकद पुरस्कार दिया।

1965 और 1971 के युद्ध में भारतीय सेना को दिये गये अमूल्य योगदान के लिए उन्हें संग्राम पदक, पुलिस पदक तथा समर सेवा पदक मिले। जनरल मानेकशा तो रणछोड़दास से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने एक बार सैन्य हैलिकाॅप्टर भेजकर उन्हें अपने साथ भोजन के लिए बुलाया। रणछोड़दास के पास कपड़े की एक छोटी सी पोटली थी। उसमें दो मोटी रोटी, प्याज और गुजरात में प्रचलित बेसन से बना गांठिया था। जनरल मानेकशा ने दो में से एक रोटी खुद खाकर रणछोड़दास को अनूठा सम्मान दिया। अपने अंतिम दिनों में भी उन्होंने कई बार इस अनूठे योद्धा रणछोड़दास पागीको याद किया।

2009 में 108 वर्ष की अवस्था में रणछोड़दास ने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली। 17 जनवरी, 2013 को 112 वर्ष की भरपूर आयु में उनका निधन हुआ। गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र के लोकगीतों में पागीबाबा आज भी जीवित हैं। भारतीय सेना ने उनके सम्मान में उत्तर गुजरात में सुइगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा की एक चैकी को रणछोड़दास पोस्टनाम दिया है। उनके जीवन पर एक हिन्दी फिल्म भी बन रही है। 

(अंतरजाल पर उपलब्ध सामग्री)

Sunday, January 15, 2023

श्रद्धा-ममता और आत्मीयता की संगमनगरी है प्रयागराज - रमेश जी

प्रयागराज| प्रयागराज श्रद्धा, ममता और आत्मीयता की संगमनगरी है। यहां उपासना पद्धतियों के सारे भेद स्वयं मिट जाते हैं। सब मिलकर यहां एक माह कल्पवास करते हैं। उक्त विचार काशी प्रांत प्रचारक श्रीमान रमेश जी ने व्यक्त किया| वे प्रयागराज उत्तर भाग स्थित मेडिकल कॉलेज में विद्यार्थी कार्य विभाग की ओर से प्रीतमदास मेहता प्रेक्षागृह में आयोजित राष्ट्रीय युवा संगम एवं सहभोज कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे|

उन्होंने आगे कहा कि प्रयागराज की धरती समन्वय तथा समरसता की शिक्षा देती है। मकर संक्रांति पर पूरे देश भर के लोग यहां आकर समरसता का ही भाव ग्रहण करते हैं। यह क्रांतिवीरों की धरती है। हुतात्मा चंद्रशेखर आजाद के बलिदान की यह पवित्र भूमि है जो हमें त्याग और समर्पण की शिक्षा देती है। उन्होंने आह्वान करते हुए नौजवानों से कहा कि देश को सर्वोच्च स्थान पर ले जाना चाहते हैं तो अपने सर्वस्व का त्याग करना पड़ेगा। तभी यह देश परम वैभव को प्राप्त कर सकेगा। प्रभु श्री राम ने भी कहा था सबसे बड़ा धर्म राष्ट्रधर्म है। मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है। यह देश उस सर्वस्पर्शी राम का है जिन्होंने शबरी के जूठे बेर खाकर मानव समाज में समरसता का सन्देश दिया था। अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने भी ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत किया था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह ने की| मंच पर मा. सह विभाग संघचालक नागेंद्र जी, विभाग प्रचारक डॉ. पीयूष जी, नितिन जी, जिला प्रचारक बृजेश जी, कार्यवाह मुकेश जी समेत बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रयाग विभाग के सभी 40 नगरों में मकर संक्रांति का पर्व सामाजिक समरसता दिवस के रुप में मनाया गया| इस अवसर पर सेवा बस्तियों में वंचितों एवं उपेक्षित जनों के साथ संघ के कार्यकर्ताओं ने मिलकर खिचड़ी खाई।

"संगठन गढ़े चलो, सुपथ पर बढ़े चलो, भला हो जिसमें देश का वो काम सब किए चलो।"

प्रयागराज दक्षिण भाग के सहभोज मे प्रांत प्रचारक जी ने कहा कि विदेशी और विधर्मी आक्रमणकारियों के कारण हमारे समाज को जो क्षति को पूर्ण करने का, जो भी विषम परिस्थितियां उत्पन्न हुई थी उन्हें दूर करने का समय आ गया है। इसीलिए संघ सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी, स्वभाषा,  धर्म-संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रयास कर रहा है। हमें राम जी का नाम सुमिरन करना है पर यह पर्याप्त नहीं। हमें राम जी के काम का भी अनुसरण करना है। माता शबरी, सखा निषाद राज का सम्मान कर राम से नारायण हो गये। आतताई रावण का नाश भगवान राम अपनी दैवी शक्ति से चुटकियों में कर सकते थे, पर उन्होंने वानर-भालुओं की संगठित शक्ति का गठन कर रावण विजय की। उनके इसी संगठन मंत्र को संघ ने अपनाया। इसीलिए हम गीत गाते हैं "संगठन गढ़े चलो, सुपथ पर बढ़े चलो, भला हो जिसमें देश का वो काम सब किए चलो।" उन्होंने धर्मान्तरण पर अपना विचार रखते हुए कहा कि हम एक नहीं हैं इसी कारण से हमारी बहनों को बहला-फुसलाकर उनका धर्मांतरण कराया जाता है| यदि वे ऐसा नहीं करती हैं तो उनके 36 टुकड़े कर दिए जाते हैं। इसका एकमात्र कारण यही है कि हम विचारों से बंटे हुए हैं और अच्छे संस्कार अपने बच्चों में नहीं डाल पा रहे हैं|

...हमें भी सबको एक स्थान देना चाहिए

उन्होंने वार्षिक माघ मेला पर आगे कहा कि हम प्रयागराज के रहने वाले लोग हैं| यहां हर वर्ष माघ मेला लगता है| मां गंगा के आंचल में सभी स्नान करते हैं| स्नान करने वाला व्यक्ति नहीं जानता कि हमारे बगल में कौन स्नान कर रहा है? वह किस जाति का है? वह किस स्थान का है? जब मां गंगा समरसता का आंचल बिखेर कर सबको एक स्थान देती है तो हमें भी सबको एक स्थान देना चाहिए, हिन्दू दर्शन यही है ।

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता तिलक राज सोनकर जी ने की| मंच पर रामगोपाल अग्निहोत्री जी (मा. भाग संघचालक प्रयाग दक्षिण भाग) भी उपस्थित रहे| कार्यक्रम में संजय जी, वीर कृष्ण जी, वसु जी, ऋषभ जी, आशीष जी एवं हजारों की संख्या में स्वयंसेवक बंधु और बहने उपस्थित रहीं।

Saturday, January 14, 2023

"सब समाज को लिए साथ में आगे है बढ़ते जाना" का भाव हम सभी के मन में होना चाहिए - रमेश जी

प्रतापगढ़| मकर संक्रांति सामाजिक समरसता का महापर्व है, हमारी परंपरा सभी को साथ में लेकर चलने की है| "सब समाज को लिए साथ में आगे है बढ़ते जाना" यह भाव हम सभी के मन में होना चाहिए| हम सभी को नर में नारायण और नारी में नारायणी के स्वरूप का दर्शन करना चाहिए| हम सभी मां भारती की संतति है| हम सभी के लिए राष्ट्र सबसे पहले हैं| उक्त विचार मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काशी प्रांत प्रचारक श्रीमान रमेश जी ने प्रतापगढ़ स्थित शहीद उद्यान में मकर संक्रांति उत्सव के कार्यक्रम में व्यक्त किया|

उन्होंने कहा कि आज जिस प्रकार से समाज में विभिन्न राष्ट्र विरोधी शक्तियां समाज को विखंडित करने में लगी हुई हैं उनसे राष्ट्र को बचाने के लिए हमारी भूमिका और बढ़ जाती है| उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, शिक्षा सेवा का माध्यम है| एक शिक्षित व्यक्ति को समाज की सेवा के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए| उन्होंने कहा कि भगवान श्री राम, भगवान श्रीकृष्ण हम सब के आदर्श हैं| हम सभी उनके आराधक हैं| आवश्यकता इस बात की है कि भगवान की आराधना के साथ-साथ श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारें| श्रीराम के आदर्शों पर चलकर ही समाज को सही दिशा दी जा सकती है और राष्ट्र को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है| हम सभी को पूर्ण समर्पित भाव से देश को समुन्नत बनाने हेतु राष्ट्र के प्रति अपने संपूर्ण कर्तव्यों का और समरस समाज के निर्माण हेतु अपनी भूमिका का निर्वहन करना होगा| उन्होंने कान्वेंट शिक्षा पर अपना विचार रखते हुए कहा कि कान्वेंट शब्द का शाब्दिक अर्थ अपने आप में भारतीय संस्कृत के विरुद्ध है| कान्वेंट पद्धति के माध्यम से ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण को बढ़ावा देने का कार्य किया जाता है| उन्होंने लव-जिहाद पर सचेत करते हुए कहा कि आज बेटियों को शिक्षित और जागररुक करने की आवश्यकता है|

     इस अवसर पर कार्यक्रम के आरंभ में स्वस्तिवाचन के साथ प्रांत प्रचारक रमेश जी एवं मा. विभाग संघचालक रमेश चंद्र त्रिपाठी द्वारा भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन किया गया| कार्यक्रम में मा. जिला संघचालक चिंतामणि जी, सह नगर संघचालक नितेश खंडेलवाल जी, जिला कार्यवाह डॉ.सौरभ पांडेय, जिला प्रचारक शिवप्रसाद, प्रचार प्रमुख प्रभाशंकर पांडेय एवं आलोक गर्ग आदि उपस्थित रहे|