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Sunday, February 5, 2023

पूरे देश में धर्मांतरण और लव जिहाद हिंदू धर्म और संस्कृति के लिए चुनौती - नीरज

प्रयागराज| नौजवान जब जागता है जागरूक होता है तब परिवर्तन होता है| पूरे देश में धर्मांतरण और लव जिहाद हिंदू धर्म और संस्कृति को चुनौती दे रहा है| राष्ट्र प्रेमियों, देशभक्तों की आशाएं बजरंग दल के कार्यकर्ताओं पर हैं| जब-जब हिंदू संस्कृति पर, हिंदू मान बिंदुओं पर, आस्था पर चोट होती है| कुठाराघात होता है| तब बजरंग दल का नौजवान खड़ा होता है| उक्त बातें बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक नीरज जी ने कही| वे प्रयागराज में चल रहे माघ मेला शिविर में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के दो दिवसीय लखनऊ क्षेत्र का कार्यकर्ता चिंतन वर्ग को सम्बोधित कर रहे थे|

उन्होंने आगे कहा कि अयोध्या में जब कारसेवकों पर हमला होता है तो बजरंग दल का नौजवान खड़ा होता है| अमरनाथ की दर्शन यात्रा रूकती है तो बजरंग दल का कार्यकर्ता खड़ा होता है| गौ माता की रक्षा के लिए बजरंग दल का कार्यकर्ता संघर्ष करता है| लव जिहाद से संघर्ष बजरंग दल का कार्यकर्ता करता है| जब-जब इस राष्ट्र और संस्कृति पर संकट के बादल छाए हैं, बजरंग दल कि पराक्रम से संकट के बादल छंटे है| बजरंग दल अपनी स्थापना से आज तक प्रभु श्री राम के भक्त हनुमान जी को अपना आदर्श मानकर जैसे हनुमान जी ने भगवान राम के लिए उस समय-परिस्थिति के अनुसार बिना कुछ आशा के कार्य किया| वैसे ही बजरंग दल के कार्यकर्ता हिंदू संस्कृति के लिए निरंतर लगे रहते हैं| बजरंग दल का कार्य सेवा सुरक्षा और संस्कार का है| उन्होंने आगे कहा कि अगर इस राष्ट्र में रहना है तो भारत माता का, गौ माता का, गंगा माता का सम्मान करना होगा| दुनिया का ऐसा कोई भी देश नहीं है, जहां पर वहां के धर्म का सम्मान ना होता हो|

      विश्व हिंदू परिषद पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय संगठन मंत्री गजेंद्र जी ने चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए कहा कि आज बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को धर्मांतरण रोकने, लव जिहाद रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी| इसके लिए युवाओं में जागरण का कार्य बजरंग दल को करना है| हमारे नौजवान जिस दिन राष्ट्रभक्ति से प्रेरित होकर सोचना शुरू करेंगे उसी दिन हिंदू समाज के समक्ष खड़ी चुनौतियां समाप्त होंगी| बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को अपने शौर्य का परिचय देने का वक्त आया है| कोई राष्ट्र द्रोही बच ना पाए| धर्मांतरण हो ना पाए| लव जिहादी अब बच ना पाए| युवाओं में इतना जागरण करना है कि एक परिवर्तन समाज में दिखे कि संपूर्ण हिंदू समाज एक होकर लव जिहाद व धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाएं| बजरंग दल का संदेश है कि घर वापसी नहीं बंद होगी, धर्मांतरण पूर्ण बंद होगा| यह परिवर्तन दिखने वाला है|

Saturday, February 4, 2023

राष्ट्रचिंतन लेखमाला – भारत में ‘भारतीय’ बन कर रहें

- नरेंद्र सहगल

    भारतीय होने का सीधा और स्पष्ट मापदंड है, भारत के अखंड भूगोल, सनातन संस्कृति और गौरवशाली अतीत के प्रति आस्था/विश्वास और इसी के साथ जुड़े रहने का दृढ़ संकल्प. अपनी जाति, क्षेत्र और महजब से ऊपर उठ कर हम भारतीयकहने में गौरव की अनुभूति यही तो है भारतीयता. सर्वप्रथम हम भारतीय हैं.

    भारतीय होने के उपरोक्त मापदंड के संदर्भ में अनेक प्रश्न खड़े होते हैं. क्या उन लोगों को भारतीय, कहा जा सकता है जो गजवा-ए-हिन्दऔर दारुल इस्लामके ख्वाब देखते हैं? क्या वह लोग भारतीय कहलाने के हकदार हैं जो गरीबों, वंचितों की लाचारी का फायदा उठा कर उनका धर्मांतरण करके उनके गले में जबरदस्ती क्रॉसलटका देते हैं? वे लोग कैसे भारतीय हैं जो विदेशों में जाकर खुलेआम तिरंगे ध्वज को जलाकर खालिस्तानका शोर मचाते हैं? उन लोगों को भारतीय कैसे माना जाए जो भारत तेरे टुकड़े होंगेका इरादा रखते हैं? उन लोगों को भारतीय क्यों कहा जाए जो चीन से आशीर्वाद लेकर भारत को लाल करने के उद्देश्य से बेकसूर भारतीयों का खून बहाते हैं? हम तो उन लोगों की भारतीयता पर भी सवाल उठाएंगे जो भारत की पराक्रमी सेना के शौर्य पर सवाल उठाते हैं.

    इन सवालों के घेरे में तो वे राजनीतिक दल और नेता भी आते हैं जो अपनी सियासी औकात को चमकाने के लिए भारत में रचे गए पवित्र ग्रंथों को नफरतीकिताब कहकर भारत की राष्ट्रीयता का अपमान करते हैं. वेदों में दकियानूसी, रामायण में नारी और पिछड़ों की निंदा, महाभारत में सत्ता की भूख, गीता में जिहाद और मनुस्मृति में सामाजिक वैमनस्य की खोज करते हैं. इन पवित्र मानवीय ग्रंथों के वास्तविक अर्थों से पूर्णतया अनभिज्ञ, सत्ता के भूखे और धर्मविहीन लोगों को क्या भारतीय कहलाने का अधिकार है?

    उल्लेखनीय है कि उपरोक्त सभी ग्रंथों में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों, योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया उच्चकोटि का कर्मयोग ज्ञान, मनु द्वारा निर्धारित की गई आदर्श जीवन प्रणाली की व्यावहारिक व्याख्या है. इसी संदर्भ में इस सत्य को भी जान लेना चाहिए कि भारत में ही रचे गए जैन, बुद्ध और सिक्ख धर्मग्रंथों में कहीं भी अलगाववाद अथवा भारतीयता के विरोध में एक अक्षर भी नहीं मिलता. हमारे दस गुरुओं की बाणी, श्रीगुरु ग्रंथ साहिब और दशम ग्रंथ आदि साहित्य में समग्र भारतीयता समाई हुई है. यह सभी ग्रंथ सभी भारतवासियों को एक राष्ट्रपुरुष बनकर खड़े होने का धरातल प्रदान करते हैं.

    वास्तव में भारत की इसी मुख्यधारा से जुड़े रहकर ही हम भारतीय बने रह सकते हैं. इसी राष्ट्रीय स्वाभिमान की आज आवश्यकता है. भारत राष्ट्र की संस्कृति, राष्ट्र के मानबिन्दु, राष्ट्र का इतिहास और राष्ट्र का धर्म (जीवन प्रणाली) और राष्ट्र की उज्ज्वल परम्पराएं ही ऐसे केंद्र बिन्दु हैं, जिनको किसी भी राष्ट्र का स्वाभिमान और राष्ट्रीयता कहा जाता है. इस धारा के साथ जुड़े रहने को ही देशभक्ति कहा जाता है. राष्ट्र की इस मुख्यधारा का साम्प्रदाय, जाति, पंथ, प्रांत और भाषा इत्यादि से कोई भी टकराव नहीं होता.

    यह छोटी इकाइयां और समूह राष्ट्र की मुख्यधारा को पुष्ट करने में अपना आवश्यक योगदान करती हैं. इसी प्रकार राष्ट्र की मुख्यधारा भी इन मजहबी इकाइयों के स्वतंत्र विकास में खाद-पानी का काम करती है. यदि किसी वर्ग अथवा मजहब के लोग राष्ट्र की मुख्यधारा से हट कर, राष्ट्र पर आक्रमण करने वाले विदेशी लुटेरे आक्रान्ताओं का दामन थाम लें, तो वह वर्ग राष्ट्रीय नहीं कहा जा सकता.

आक्रमणकारियों का स्वागत करना (जैसे 1962 में साम्यवादियों ने चीन की सेना का स्वागत किया था), हमलावरों के साथ मिलकर अपने ही बाप-दादाओं की विरासत को बर्बाद करना और फिर उन विदेशी लुटेरों की तहजीब को स्वीकार करके उनके मजहब में शामिल होकर न केवल अपने पूर्वजों का त्याग ही करना, अपितु उनके इशारे पर देश/समाज के घोर शत्रु बन जाना इत्यादि कार्य राष्ट्र के साथ द्रोह करना नहीं तो और क्या है, क्या यही भारतीयता है?

    इसी को मानसिक अथवा बौद्धक गुलामी कहते हैं. राजनीतिक परतंत्रता, भौगोलिक परतंत्रता और आर्थिक परतंत्रता तो कालांतर में समाप्त होकर स्वतंत्रता में बदल सकती है, परंतु यह मानसिक परतंत्रता (जिसके अंतर्गत विदेशी शासकों का मजहब स्वीकार किया जाता है) तो राष्ट्र जीवन पर कोढ़ की तरह जाम जाती है. इस कोढ़ को समाप्त किए बिना राष्ट्र जीवन को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता. यह गुलामी अगर समाप्त नहीं हुई तो फिर शेष तीनों स्वतंत्रताएं : भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक भी सुरक्षित नहीं राखी जा सकती. देश की अखंडता और समाज की एकता पर भी संकट मंडराने लगते हैं.

    अतः यदि स्पष्ट रूप से साहस बटोरकर यह स्वीकार कर लिया जाए कि भारत में रहने वाले हम सभी भारतवासी हिन्दू पूर्वजों की ही संताने हैं और हमारा देश पर आक्रमण करने वाले विदेशी/विधर्मी आक्रान्ताओं के साथ कोई संबंध नहीं है तो भारत की अनेक सांप्रदायिक गुत्थियां क्षणों में ही सुलझ सकती हैं. इसके लिए प्रचंड राष्ट्रभक्ति और प्रबल इच्छा शक्ति (राष्ट्रीयता) की आवश्यकता होती है.

देशभक्त भारतीय बनने के लिए यह समझ लेना जरूरी है कि मजबूरी में मजहब बदलने से बाप-दादाओं की संस्कृति नहीं बदलती, राष्ट्र के प्रति श्रद्धा में अंतर नहीं आता, मानबिंदुओं के प्रति भक्ति में कोई अंतर नहीं आता और अपने जन्मदाता समाज के प्रति घृणा भी उत्पन्न नहीं होती.

यदि इन ऐतिहासिक और विश्व स्तर पर स्वीकृत सच्चाईयों की वास्तविक्ता को राष्ट्रहित में स्वीकार कर लिया जाए तो भारत के प्रत्येक व्यक्ति और जाति पंथ की पहचान और स्वतंत्रता पर आंच तक नहीं आ सकती. भारत में भारतीय बनकर रहने का यही एकमेव मार्ग है. यही भारत की अखंडता और सुरक्षा की गारंटी है. गर्व से कहो हम सभी भारतवासी एक राष्ट्रपुरुष हैं.

(वरिष्ठ पत्रकार व लेखक)

आगामी साप्ताहिक लेख का विषय : सोए सनातनको जगाना ही होगा

Friday, February 3, 2023

10, 11, 12 फरवरी को होगा काशी शब्दोत्सव का आयोजन

रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर, सिगरा में आयोजित होगा कार्यक्रम


काशी. विश्व संवाद केन्द्र काशी (काशी प्रान्त) के तत्वाधान में 10, 11, 12 फरवरी, 2023 को काशी शब्दोत्सव नाम से वैश्विक स्तर के वैचारिक संवाद का आयोजन किया जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत एवं माँ भारती के पुत्र एवं पुत्रियों को भारतीय ज्ञान, धर्म, संस्कृति और परम्परा की प्रासंगिकता को स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बताना है. भारतीय ज्ञान-परम्परा की वैश्विक दृष्टि कितनी मूल्यवान है, इसको ही आधार बनाकर संवाद केन्द्रित होंगे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के सह प्रचार प्रमुख मनोजकांत ने कहा कि काशी देश की सांस्कृतिक राजधानी कही जाती है. हम काशी की ज्ञान परम्परा, गरिमा एवं वैश्विकता के अनुरूप ही हर सत्र का आयोजन कर रहे हैं. काशी दुनिया को संस्कार, संस्कृति और परम्परा के माध्यम से शब्दों की उत्सवधर्मिता एवं मानवता का संदेश देती रही है. यह आयोजन वैचारिक चिंतन-मंथन के माध्यम से देश और दुनिया के बौद्धिक समाज को अमृत प्रदान करने वाला होगा. अतः इस आयोजन के लिए काशी को ही चुना गया है. इसीलिए तो इसका नाम काशी शब्दोत्सव रखा गया है.

काशी शब्दोत्सव के माध्यम से हम देश विदेश के लेखकों, विचारकों को काशी में त्रिदिवसीय आयोजन के मंच पर लाने का प्रयास कर रहे हैं और विश्व को काशी के संदेश से अवगत कराना चाहते हैं. हमारा प्रयास होगा कि काशी शब्दोत्सव में सभी भाषा-भाषी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो, जिससे भारतीय ज्ञान परम्परा की अटल गहराइयों के साथ-साथ उसकी उच्चता और शुद्धता का अध्ययन हो सके.

काशी के विद्वानों के साथ-साथ देश के नागरिकों में भारतीय ज्ञान परम्परा में रूचि रखने वाले सभी काशी शब्दोत्सव आयोजन के साक्षी बनेंगे.

शब्दोत्सव में शास्त्र और लोक, पुरातन और अद्यतन, परम्परा और विज्ञान, योग और अध्यात्म इन सबका समन्वय दिखाई देगा.

इस आयोजन में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नई दिल्ली भी सहभागी है. पुस्तक मेला भी आयोजित होगा. वाराणसी जनपद एवं आसपास के शैक्षिक परिसरों के छात्र छात्राओं एवं अध्यापक अध्यापिकाओं को जोड़ने का निरन्तर प्रयास चल रहा है. जिससे पाठकों, सुधी विद्वानों के साथ ही अन्यान्य बुद्धिजीवियों को भी राष्ट्रीय एवं विश्व स्तरीय साहित्य सुगमता से उपलब्ध हो सके.

हमारा प्रयास है कि यह सारा संवाद सकारात्मक एवं रचनात्मक दृष्टि उत्पन्न करने वाला बने. जिससे भारतीय समाज और विश्व को हमारे मूल तत्वज्ञान के साथ ही व्यावहारिक ज्ञान का बोध कराया जा सके. इसीलिए इस आयोजन में भारत बोध को भी समाहित किया गया है. हम काशी की विभूतियों को एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहे हैं. जिससे ज्ञान संस्कृति और परम्परा के संगम का यह अनूठा आयोजन बन सके.

काशी शब्दोत्सव में देश के शब्दधर्मी, उत्सवधर्मी लोकप्रिय एवं सम्मानित महानुभावों की उपस्थिति हो रही है. जिसमें केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, प्रख्यात वक्ता मनोज मुन्तशिर, चाणक्य धारावाहिक के विख्यात प्रस्तोता डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी जैसे अपने क्षेत्र के दिग्गज अपने विचारोत्तेजक विचार रखेंगे.

काशी शब्दोत्सव काशी की परम्परा का आयोजन है, काशीवासियों का आयोजन है. यह ज्ञान व भक्ति पद्धतियों का आयोजन है. अतः हम काशी के नागरिकों का आह्वान करते हैं कि वे इस आयोजन के साथ अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और इसे सार्थक बनाएं.

Thursday, February 2, 2023

सपा व राजद की शिकायत चुनाव आयोग से करेंगे – विहिप

नई दिल्ली. विश्व हिन्दू परिषद का उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल शीघ्र ही मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलकर समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की मान्यता रद्द करने की मांग करेगा. विहिप के केंद्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में समय लेने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र भेजा है.

प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से विहिप रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट 1951 की धारा 29ए का हवाला देते हुए चुनाव आयोग को बताएगी कि हर राजनैतिक दल को अपनी पार्टी के मेमोरेंडम के प्रावधानों में विश्वास रखते हुए पंथ निरपेक्षता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का निष्ठा के साथ पालन करना चाहिए.

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के श्री रामचरित मानस पर दिए बयानों, उसे प्रतिबंधित करने की मांग और उनके सहयोगियों द्वारा मानस के पवित्र पन्नों को जलाने से भारत के नागरिकों के बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर घृणित तरीके से भड़काया गया. इसके तुरंत बाद मौर्य को पदोन्नत कर समाजवादी पार्टी का महामंत्री बनाया जाना स्पष्ट करता है कि पूरी पार्टी उनके इस कृत्य के समर्थन में है.

इसी प्रकार राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के शिक्षामंत्री डॉ. चंद्रशेखर ने भी रामचरित मानस पर घृणित टिप्पणी और प्रतिबंध लगाने की मांग की. ये सब भी जानबूझकर वातावरण दूषित कर हिन्दू समाज में अविश्वास, भेदभाव व वैमनस्य के निर्माण की मानसिकता से किया गया. राष्ट्रीय जनता दल ने भी उनके विरुद्ध  कोई कार्यवाही नहीं की. यह इस बात का द्योतक है कि उनकी पार्टी भी उनके इन हिन्दू द्रोही बयानों से सहमत है.

अतः विहिप का प्रतिनिधिमंडल मांग करेगा कि इन दोनों पार्टियों ने अपने उन संवैधानिक प्रावधानों और मूल तत्वों का उल्लंघन किया है, जिनके तहत इनका चुनाव आयोग के यहां पंजीयन हुआ. इसलिए इनका पंजीयन रद्द किया जाना चाहिए.

Wednesday, February 1, 2023

राष्ट्रचिंतन लेखमाला – परम वैभवशाली अखंड भारतवर्ष

- नरेंद्र सहगल

देशवासियों ने प्रसन्नता और उल्लास के साथ अपना 74वां गणतंत्र दिवस मनाया है. यह हमारी राष्ट्रभक्ति का स्वाभाविक परिचय है. परंतु यह खंडित भारत की आधी अधूरी आज़ादी का जश्न था. भारत का आधे से ज्यादा भू-भाग अभी विदेशियों/विधर्मियों के कब्जे में है. संकल्प करना चाहिए कि हम अपने देश को पुनः परम वैभवशाली अखंड भारत वर्ष के रूप में देखेंगे. भारतवर्ष अखंड था और भविष्य में पुनः अखंड होगा.

इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अंग्रेजों के भारत छोड़ने के पश्चात खंडित भारत का जो हिस्सा हमारे पास रहा, उसी को हम भारत समझ बैठे. हमारे देश की सीमाएं पूर्वकाल में हिन्दूकुश पर्वत (अफगानिस्तान) से इंडोनेशिया और तिब्बत से श्रीलंका तक थी. हमारे प्राचीन ग्रंथों में भारत, भारतीय, देवतात्मा हिमालय, चक्रवर्ती क्षेत्र इत्यादि शब्दावली का इस्तेमाल बार-बार किया गया है.

अपने पुराणों एवं महाकाव्यों में भारत का जो वर्णन किया गया है, उसमें त्रिविष्टप (तिब्बत) की उत्तरी सीमा से लेकर समुद्र तक सारा क्षेत्र आ जाता है. इसमें तो उपगणस्थान (अफगानिस्तान), तिब्बत, नेपाल, सिक्किम, भूटान, मलेशिया, सिंगापुर तथा श्रीलंका इत्यादि सभी क्षेत्रों का वर्णन आ जाता है. अंग्रेजों ने इसी सारे भूभाग पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था. अर्थात् उस समय भी भारत अखंडही था. धूर्त अंग्रेज शासकों ने इसी भारत को कई बार टुकड़ों में बांटने का कुकृत्य किया.

विष्णु पुराण में एक श्लोक में तो भारत एवं भारतीशब्द स्पष्ट मिलते हैं..

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रैश्चैव दक्षिणमवर्षंतद् भारतंनाम भारती यत्र संतति.

अर्थात समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो विशाल क्षेत्र स्थित है, उसका नाम भारत है और उसकी संतान को भारती कहते हैं. महाकवि कालिदास ने भी देवतात्मा हिमालय का वर्णन किया है. आचार्य चाणक्य ने इसी विशाल क्षेत्र को चक्रवर्ती देश कहा है.

सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग के समय भारत की सीमाओं में आज का अफगानिस्तान और मध्य एशिया का तांशकंद समरकंद भी शामिल था. उससे भी पहले भारत की सीमाएं बर्मा, थाईलैंड, जावा, सुमात्रा, बाली, मलेशिया, फारमूसा और फिलीपीन तक फैली हुईं थी. भारत के प्राचीन संस्कृत साहित्य में तो अनेक स्थानों पर भारतवर्ष की भौगोलिक सीमाओं का स्पष्ट एवं विस्तृत वर्णन मिलता है.

आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रंथ कौटिल्य अर्थशास्त्रमें चक्रवर्ती क्षेत्र भारत की व्याख्या की है.

देशः पृथवी तस्यां

हिमवंस समुद्रन्तर मुदीचीनं

योजन सहस्त्र परिमाणं तिंचक चक्रवर्ती क्षेत्रम.

अर्थात हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र पर्यंत, पूर्व से पश्चिम दिशा में एक हजार योजन तक फैला हुआ भू-भाग चक्रवर्ती क्षेत्र है. यह श्लोक उत्तर एवं दक्षिण की सीमाओं के साथ-साथ भारत के पूर्व-पश्चिम को भी स्पष्ट करता है. अपने प्राचीन साहित्य से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत एक देश भी है और एक राष्ट्र भी है.

बौद्धकाल में हमारी मातृभूमि भारतवर्ष की वंदना इस प्रकार की गई है.

पृथिव्यैसमुद्रपर्यान्ताय एक राष्ट्र

इस प्रकार अपनी मातृभूमि का विस्तार तथा उसका पूर्णरूप ध्यान में रख कर ही अपने देश भारतवर्ष का चिंतन करना चाहिए. हमारी सनातन परंपरा में प्रत्येक भारतीय के प्रातः उठते ही भारतमाता की चरण रज को माथे पर लगाने की परंपरा थी जो थोड़ी बहुत आज भी प्रचलन में है.

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मंडलेविष्णुपत्नी नमस्तुभ्यमपादस्पर्शम् क्षमस्वमेव.

अर्थात् समुद्र में वास करने वाली देवी भारत माताहै. पर्वत मण्डल जिसके पवित्र स्तन हैं, ऐसी विष्णुपत्नी माता को मैं अपने पांव लगा रहा हूँ, मुझे क्षमा करो. अपनी मातृभूमि की यह उच्चकोटि की वंदना है. आधुनिक समय में स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविन्द एवं श्रीगुरु गोलवलकर ने भारतभूमि को एक चैतन्यमय देवता कहा है.

उल्लेखनीय है कि दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक एवं विश्व में शांति हेतु आध्यात्मिक क्रांति का श्रीगणेश करने वाले श्रद्धेय श्री आशुतोष महाराज जी ने तो और भी आगे बढ़ कर कहा है कि विश्व में केवल भारतवासी ही हैं जो अपने देश को भारत माताके सम्बोधन से सम्मानित करते हैं. जबकि कहीं भी अन्यत्र ऐसा नहीं कहा जाता. अर्थात चीन माता, अमरीका माता, इंग्लैंड माता कोई भी ऐसा नहीं कहता.

यह भी एक विडंबना ही है कि अधिकांश विद्वान एवं साधारण भारतवासी अखंड भारत को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बांगलादेश का समूह ही मानते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि अखंड भारतन केवल एक राजनीतिक अथवा भौगोलिक अवधारणा न होकर समस्त भारतवासियों की निष्ठा एवं श्रद्धा है. इसी आस्था के आधार पर भारत एक बार फिर अखंड होगा.

दरअसल अखंड भारत के विशाल संस्कृतिनिष्ठ विचारतत्व को न समझने वाले नेताओं ने जिस पाकिस्तान के निर्माण पर अपनी मोहर लगाई थी, वही पाकिस्तान आज आतंकवाद के सैकड़ों अड्डों एवं आतंकी सरगनाओं को पाल-पोस रहा है. आज तो भारत में कई और पाकिस्तान बनाने के षड़यंत्र रचे जा रहे हैं. हमारा सनातन राष्ट्र इस प्रकार के हजारों जख्मों से त्रस्त है. इन जख्मों के स्थाई इलाज के लिए भारत की अखंडता अति आवश्यक है.

भारत की अखंड शक्ति ही सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त विखंडन की प्रवृति का सामना कर सकती है. अतः समय की जरूरत है कि पहले समस्त भारतवासी स्वयं संगठित होकर शक्तिशाली बनें और खंडित भारत के सभी टुकड़ों को जोड़ने के लिए यात्रानिकालें. आज आवश्यकता है, एक ऐसी शस्त्र और शास्त्रआधारित यात्रा की, जिसमें सभी भारतवासी जाति और क्षेत्र से ऊपर उठकर भाग लें.

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं पत्रकार हैं 

Tuesday, January 31, 2023

गोरखनाथ मंदिर पर हमला करने वाले मुर्तजा को फांसी की सजा

 गोरखनाथ मंदिर पर हमले के मामले में एनआईए अदालत ने दोषी मुर्तजा अब्बास को फांसी की सजा सुनाई है. आरोपी मुर्तजा के खिलाफ UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया था, जांच में मुर्तजा का संबंध ISIS से भी मिला था. आतंकी मुर्तजा अब्बास को सोमवार को सुनवाई के लिए कड़ी सुरक्षा में लखनऊ में NIA/ATS की अदालत में लाया गया. जहाँ NIA कोर्ट के विशेष जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने उसे दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई. घटना के 10 माह के भीतर ही सभी साक्ष्य को देखते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई गई है.

मुर्तजा ने 4 अप्रैल, 2022 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर पर हमला किया था. 4 अप्रैल को गोरखनाथ चौकी के मुख्य कॉन्स्टेबल विनय कुमार मिश्रा ने मुर्तजा के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई थी. रिपोर्ट में बताया था कि वह मंदिर के गेट नंबर एक पर सुरक्षा प्रभारी था. मुर्तजा ने पीएसी के सिपाही अनिल कुमार पासवान पर अचानक धारदार हथियार से हमला कर उनसे हथियार छीनने की कोशिश की थी. अन्य सुरक्षाकर्मी जब बचाव में आए तो मुर्तजा ने उन पर भी हमला कर दिया. इसके बाद हथियार लहराते हुए अल्लाह हु अकबर के नारे लगाने लगा था.

पुलिस ने मशक्कत के बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. मामले की गहनता से जांच में हथियार, लैपटॉप और उर्दू में लिखी सामग्री बरामद की गई थी. मुर्तजा के पास से उर्दू भाषा में लिखी एक किताब भी बरामद हुई थी. सिर्फ इतना ही नहीं जांच में यह भी सामने आया कि गोरखनाथ मंदिर के पास सिपाहियों पर हमले के मामले का हमलावर नेपाल भी गया था. सरकारी वकील एमके सिंह के अनुसार, विवेचना के दौरान हासिल साक्ष्यों के आधार पर धारा 16/18/20/ 40 के तहत केस दर्ज किया गया. विवेचना ATS को सौंपी गई थी.

 

पूछताछ में किया था चौंकाने वाला खुलासा

गिरफ़्तारी के बाद आरोपी मुर्तजा ने ATS के सामने स्वीकार किया कि वह देश में चल रहे हिजाब विवाद, CAA आदि मामलों को लेकर काफी गुस्से में था. उसे लग रहा था, मुसलमानों के साथ गलत हो रहा है. बस इसी बात का बदला लेने के लिए उसने इस हमले को अंजाम दिया. मुर्तजा ने ATS के सामने यह भी स्वीकार किया कि उसने गोरखनाथ मंदिर पर जाकर मरने के इरादे से यह हमला किया था. जांच में पता चला कि मुर्तजा नफरती भाषण देने वाले जाकिर नाइक सहित कई अन्य कट्टरपंथी और देश विरोधी तत्वों को फॉलो करता था और उनकी तकरीरें सुनकर प्रभावित था. मुर्तजा ने IIT मुंबई से इंजीनियरिंग की है.

60 दिन की सुनवाई के बाद सजा

सजा सुनाए जाने के बाद एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार ने कहा, लगातार 60 दिन की रिकॉर्ड सुनवाई के बाद सजा का ऐलान हुआ है. इसमें धारा 121 IPC के तहत फांसी की सजा और 307 जो पुलिस पर हमला हुआ था, उसमें उम्र कैद की सजा सुनाई गई है. सभी सबूतों को अदालत के सामने पेश किया गया, अदालत ने सबूतों को सही माना है. घटना के 10 महीने बाद आज यानि सोमवार को लखनऊ स्थित NIA की विशेष अदालत ने फैसला सुनाया.

Saturday, January 28, 2023

अशिक्षा-लोभ और गरीबी धर्मांतरण के प्रमुख कारण - पद्मश्री डॉ रविंद्र नारायण

प्रयागराज| अशिक्षा लोभ और गरीबी धर्मांतरण के प्रमुख कारण है| राष्ट्रीयता का भाव धर्म और राष्ट्र एक ही है| यदि धर्म नहीं तो राष्ट्र नहीं, राष्ट्र नहीं तो धर्म नहीं| केवल इसी राष्ट्र की पहचान पूरी दुनिया में धर्म के लिए है| उक्त विचार विश्व हिंदू परिषद माघ मेला शिविर में चिकित्सक सम्मेलन को संबोधित करते हुए विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष पद्मश्री डॉ रविंद्र नारायण सिंह ने चिकित्सकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किया|

      उन्होंने आगे कहा कि हमारा धर्म हमें न्याय और त्याग की प्रेरणा देता है हम समाज से अपने व्यवसाय में बहुत कुछ प्राप्त करते हैं और हम उस समाज को क्या देते हैं यह हमें सोचना चाहिए| पूरी दुनिया में सभी धर्मों के लिए बहुत अनेक प्रकार के संसाधन एवं मुद्राएं हैं जिससे वह अपने धर्म का विस्तार कर रहे हैं आज हमें अपने कम संसाधन में ही अपने को सुरक्षित रखते हुए अपने धर्म संस्कृति का संवर्धन संरक्षण करना है| विश्व हिंदू परिषद की स्थापना ही हिंदू समाज की एकजुटता के लिए हुई है, लेकिन आज धर्मांतरण हिंदू समाज के लिए एक कठिन चुनौती है|

      कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ.एस. पी. सिंह ने कहा कि चिकित्सक व्यवसाय के लिए नहीं सेवा के लिए कार्य करते हैं| समाज में उन्हें ईश्वर के रूप में देखा जाता है| विश्व हिंदू परिषद का कार्य ईश्वरीय कार्य है जिसकी स्थापना ही धर्म की रक्षा के लिए हुई और आज संगठन की स्थापना से आज तक विश्व हिंदू परिषद के लिए लक्ष्य निष्ठा के कारण पूर्ण हो रहे हैं| उन्होंने कहा कि भारत में ही नहीं दुनिया के अनेक देशों में संगठन के कार्य सक्रिय रुप से हैं और मुझे आज जानकारी हुई कि संगठन के माध्यम से लाखों विद्यालय एवं लाखों सेवा प्रकल्प ऐसे स्थानों पर चल रहे हैं जहां पर हिंदू समाज संसाधन विहीन है| सभी चिकित्सक बंधुओं से आग्रह हैं कि वह अपनी सेवा धर्म को सर्वोपरि रखें| डॉक्टर युगांतर पांडे ने कहा कि बिना लोक कल्याण के मोक्ष नहीं मिलता| इसलिए हमारा धर्म लोक कल्याण होना चाहिए वैभव नहीं, जो हिंदू धर्म का सार है| जो समाज से लिया वही समाज को वापस दिया, ऐसा ही होना चाहिए| डॉ. कृतिका अग्रवाल ने कहा कि मैंने विश्व हिंदू परिषद के सेवा प्रकल्प को देखा है आज यहां उपस्थित चिकित्सक साथियों की संख्या को देखकर में उत्साहित हूं कि अपने व्यस्ततम समय में भी वे अपने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए तत्पर है और संगठन का कार्य सेवा, सुरक्षा, संस्कार के लिए जाना जाता है| धर्म की रक्षा से ही हमारी रक्षा है यह संगठन का धेय वाक्य है| विश्व हिंदू परिषद के प्रांत अध्यक्ष कविंद्र प्रताप सिंह ने सभी गणमान्य अतिथियों का परिचय कराया और विषय का प्रतिपादन किया कि चिकित्सक किस समाज में क्या भूमिका है राष्ट्र और धर्म के लिए चिकित्सक का क्या योगदान हो सकता है|

कार्यक्रम का संचालन विश्व हिंदू परिषद के प्रांत संगठन मंत्री मुकेश कुमार ने किया| कार्यक्रम में डॉ. सुबोध जैन, डॉ.युगांतर पांडे, आशु पांडे, वीके पांडे, अनिल दुबे, एसके अग्रवाल, विश्व हिंदू परिषद काशी प्रान्त के सह संगठन मंत्री नितिन सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे|