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Thursday, October 13, 2016

समरस एवं समर्थ भारत का निर्माण ही संघ स्थापना का उद्देश्य

समरस एवं समर्थ भारत का निर्माण ही संघ स्थापना का उद्देश्य – अजीत महापात्रा जी

अजीत महापात्रा जी ने विजयादशमी के दिन संघ की स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए स्वयंसेवकों का आह्वान किया कि अब परिवर्तन का समय आ गया है, इसलिए सभी स्वयंसेवक कमर कसकर सामाजिक परिवर्तन के लिए आगे आयें. समाज में जिस तरह अभी भी असमानता एवं अविश्वास की भावनाएं व्याप्त हैं, उसे केवल स्वयंसेवक ही दूर कर सकते हैं. स्वयंसेवकों को अपने आप में परिवर्तन कर देश में व्यापक परिवर्तन की लहर चलाने के लिए आगे आना होगा, तभी समरस एवं समर्थ भारत का निर्माण हो सकता है. संघ की स्थापना का यही उद्देश्य है. स्वयंसेवकों को शिवाजी महाराज एवं स्वामी विवेकानन्द से प्रेरणा लेकर परिवर्तन का संवाहक बनना होगा.
सह क्षेत्र धर्म जागरण प्रमुख रामचन्द्र पाण्डेय जी ने कहा कि आज कुछ विदेशी शक्तियां देश को कमजोर करने का षड्यन्त्र कर रही हैं, उन्हीं के इशारे पर हिन्दुत्व विरोधी नेता संघ मुक्त भारत का राग अलापने लगे हैं. पूरा देश ऐसी शक्तियों की असलियत को समझ गया है, इसलिए अपनी मुहिम में ये कभी कामयाब नहीं हो सकते. हिन्दू समाज का नुकसान किसी भी स्थिति में न होने पाये, इसके लिए सभी को प्रयत्न करना होगा. देश की युवा शक्ति को सही दिशा में आगे बढ़ाने के लिए संघ कार्य को बढ़ाने की आवश्यकता है. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि परिस्थितियां चाहे जो हों विजय हमारी ही होगी.
इसके पूर्व स्वयंसेवकों ने समवेत रूप से वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शस्त्र पूजन का अनुष्ठान पूर्ण किया. जार्जटाउन स्थित संघ कार्यालय से भारत माता की जय के उद्घोष के बीच स्वयंसेवकों ने पथ संचलन निकाला, जो नागरिकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना रहा. संचलन कार्यालय से निकलकर प्रीति नर्सिंग होम से घूमकर केपी इण्टर कॉलेज, बैरहना होते हुए सीएमपी डिग्री कॉलेज के सामने पुनः कार्यालय पहुंचा. मार्ग में कई स्थानों पर पुष्प वर्षा कर स्वागत किया. पहली बार संघ के नये गणवेश फुल पैंट में चल रहे स्वयंसेवक आकर्षण का केन्द्र रहे.
समारोह की अध्यक्षता जिला संघ चालक व्यंकटेश कुमार, भूपेन्द्र नाथ सिंह एडवोकेट ने की. इस अवसर पर विभाग प्रचारक मनोज, सहित अन्य गणमान्यजन, कार्यकर्ता व स्वयंसेवक उपस्थित थे.

विजयादशमी उत्सव पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का पूर्ण संबोधन

रेशिमबाग नागपुर में विजयादशमी उत्सव पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का पूर्ण संबोधनरेशिमबाग नागपुर में विजयादशमी उत्सव पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का पूर्ण संबोधन……..

अपने पवित्र संघकार्य के 90 वर्ष पूर्ण होने के पश्चात् युगाब्द 5118 अर्थात् ई. स. 2016 का यह विजयादशमी उत्सव एक वैशिष्ट्यपूर्ण कालखण्ड में संपन्न हो रहा है. स्व. पंडीत दीनदयाल जी उपाध्याय की जन्मशती के संबंध में पिछले वर्ष ही मैंने उल्लेख किया था. वह 100वाँ वर्ष पूरा होने के बाद इस वर्ष भी उनके जन्मशती के कार्यक्रम चलने वाले है. यह वर्ष अपने इतिहास के कुछ और ऐसे महापुरुषों के पुनःस्मरण का वर्ष है, जिनके जीवन संदेश के अनुसरण की आवश्यकता आज की परिस्थिति में हम सबको प्रतीत होती है.
यह वर्ष आचार्यश्री अभिनवगुप्त की सहस्राब्दी का वर्ष है. वे शैवदर्शन के मूर्धन्य आचार्य तथा साक्षात्कार प्राप्त संत थे. ‘‘प्रत्यभिज्ञा’’ संज्ञक दार्शनिक संकल्पना के प्रवर्तन के साथ-साथ उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के अविष्कार से काव्य, नाट्य, संगीत, भाषा, ध्वनिशास्त्र आदि लौकिक जीवन के पहलुओं में अत्यन्त समर्थ, प्रमाणभूत व शाश्वत परिणाम करने वाले हस्तक्षेप किये है. ‘ध्वनि’ के विषय में उनकी तात्विक विवेचना, परमतत्व की अनुभूति तक ले जाने की ‘ध्वनि’ शक्ति का विवेचन तो मात्र दर्शनशास्त्री ही नहीं, आधुनिक संगणक वैज्ञानिकों के भी गहन अध्ययन का विषय बना है. परन्तु उनकी जीवन तपस्या का सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपने देश की विविधता में एकता का दर्शन कराने वाली सनातन संस्कृति धारा को कश्मीर की भूमि से पुनःप्रवर्तित करना. स्वयं शैव दर्शनधारा के उपासक होते हुए भी उन्होंने मत संप्रदायों का भेद न करते हुए, सभी का आदरपूर्वक अध्ययन करते हुए सभी से ज्ञान प्राप्त किया. प्रेम व भक्तिपूर्ण समन्वय की दृष्टि तथा पवित्र आचरण का सन्देश स्वयं के जीवन तथा उपदेशों से देकर वे कश्मीर में बडगाँव के पास बीरवा की भैरव गुफा में शिवत्व में लीन हो गये.
दक्षिण के प्रसिद्ध संत ‘श्रीभाष्य’कार श्री रामानुजाचार्य की भी यह सहस्राब्दि है. दक्षिण से दिल्ली तक पदयात्रा कर सुल्तान के दरबार से अपने आराध्य की उत्सवमूर्ति वे निकालकर ले आये तथा मूर्ति की भक्त बनी सुल्तान कन्या को भी मेलकोटे के मन्दिर में स्थान दिया. जातिपंथ के भेदभावों का पूर्ण निषेध करते हुए समाज में सभी के लिए भक्ति व ज्ञान के द्वार खोल दिये. सामाजिक समता को प्रतिष्ठित करते हुए जीवन में धर्म के संपूर्ण व निर्दोष आचरण के द्वारा संपूर्ण देश में समता व बंधुता का अलख जगाया.
देश, समाज व धर्म की रक्षा हेतु ‘‘मीरी व पीरी’’ का दोधारी बाना अपनाते हुए स्वाभिमान की रक्षा व पाखंड का ध्वंस करने वाले दशमेश श्री गुरुगोविंद सिंह जी महाराज के जन्म का 350वाँ वर्ष मनाने जा रहा है. देश धर्म के हित में सर्वस्व समर्पण व सतत संघर्ष का उनका तेजस्वी आदर्श स्मरण करते हुए स्वामी विवेकानन्द जी ने भी लाहौर के उनके प्रसिद्ध भाषण में हिन्दू युवकों को उस आदर्श का अनुसरण करने का परामर्श दिया था.
यह वर्ष प्रज्ञाचक्षु श्री गुलाबराव महाराज का भी जन्मशती वर्ष है. संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज की स्वयं को ‘कन्या’ कहते हुए, परिश्रमपूर्वक स्वदेश तथा विदेश के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक ग्रंथों का व्यासंगपूर्ण अध्ययन उन्होंने किया. ब्रिटिश दासता के घोर आत्महीनता के कालखंड में अकाट्य तर्कों सहित हमारे शास्त्रों के परंपरागत तथा पश्चिम के अत्याधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के द्वारा बौद्धिक जगत में व भारतीय मनों में स्वधर्म, स्वदेश व स्वसंस्कृति की श्रेष्ठता का गौरव व आत्मविश्वास स्थापित किया. भविष्य में विज्ञान की प्रगति, मानवीयता व सार्थकता तथा विश्वभर के सभी पंथ-संप्रदायों के समन्वय का आधार हमारी श्रेष्ठ आध्यात्मिक संस्कृति ही हो सकती है, यह उनकी अति विशाल ग्रन्थ सम्पदा का स्पष्ट संदेश है.
वर्ष भर में जो परिस्थिति व घटनाक्रम हम अनुभव करते आ रहे हैं उसका अगर बारीकी से अध्ययन व चिन्तन करें तो इन चारों महापुरुषों के संदेशों के अनुसरण का महत्व ध्यान में आता है.
यह स्पष्ट है कि यद्यपि गति बढ़ाने की गुंजाईश है व और कई बातों का होना अपेक्षित है, गत दो वर्षों में देश में व्याप्त निराशा दूर करने वाली, विश्वास बढ़ाने वाली व विकास के पथ पर देश को अग्रसर करने वाली नीतियों के कारण कुल मिलाकर देश आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. यह भी स्पष्ट है – व हमने अपनायी हुई प्रजातांत्रिक प्रणाली में कुछ अपेक्षित भी है – कि जो दल सत्ता से वंचित रहते हैं वे विरोधी दल बनकर शासन प्रशासन की कमियों को ही अधो-रेखांकित कर अपने दल के प्रभाव को बढ़ाने वाली राजनीति कर रहे हैं, करेंगे. इसी मंथन में से देश के प्रगतिपथ की सहमति व उसके लिये चलने वाली नीतियों की समीक्षा, सुधार व सजग निगरानी होते रहना प्रजातंत्र में अपेक्षित रहता है. परंतु जो चित्र पिछले सालभर में दिख रहा है, उसमें कुछ चिंताजनक प्रवृत्तियों के खेल खेले जाते हुए स्पष्ट दिखते हैं. देश की स्थिति व विश्व परिदृश्य की थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले सभी को यह पता है कि भारत का समर्थ, एकात्म, आत्मनिर्भर व नेतृत्वक्षम होकर उभरना फूटी आँखों न सुहाने वाली कुछ कट्टरपंथी, अतिवादी, विभेदकारी व स्वार्थी शक्तियाँ दुनिया में हैं व भारत में भी अपना जाल बिछाए काम कर रही हैं. भारत के समाज-जीवन से अभी तक पूर्णतः निर्मूल न हो पायी विषमता, भेद व संकुचित स्वार्थ प्रवृत्तियों के चलते यदाकदा घटने वाली घटनाओं का लाभ लेकर, अथवा घटना घटे इसके लिये कतिपय लोगों को उकसाते हुए अथवा अघटित घटनाओं के घटने का असत्य प्रचार करते हुए विश्व में भारतवासी तथा भारत का शासन प्रशासन तथा भारत में ऐसी दुष्प्रवृत्तियों को रोक सकने वाले संघ सहित सज्जन शक्ति को विवादों में खींचकर बदनाम करने का व लोकमानस को उनके बारे में भ्रमित करने का प्रयास चलता हुआ दिखाई देता है. जैसी उनकी आकांक्षाएँ व चरित्र रहा है, यह प्रयास, आपस में भी टकराने वाली यह शक्तियाँ अलग-अलग अथवा समान स्वार्थ के लिये गोलबंद होकर करेंगी हीं. उनके भ्रमजाल तथा छल कपट के चंगुल में फँसकर समाज में विभेद व वैमनस्य का वातावरण न बने इसके प्रयास करने पड़ेंगे.
संघ के स्वयंसेवक इस दिशा में अपने प्रयासों की गति बढ़ा रहे हैं. अनेक प्रांतों में इस दृष्टि से सामाजिक समता की सद्यःस्थिति का सर्वेक्षण किया जा रहा है तथा उपाय के लिये समाज-मन की अनुकूलता बनाने की बातचीत शाखाओं के द्वारा अपने-अपने गाँव-मुहल्ले में प्रारंभ कर दी गयी है. उदाहरण के लिये संघ की दृष्टि से मध्यभारत प्रान्त माने गये क्षेत्र के 9000 गाँवों का विस्तारपूर्वक सर्वेक्षण पूरा हुआ, जिसमें अभी तक लगभग 40 प्रतिशत गांवों में मंदिर, 30 प्रतिशत में पानी व 35 प्रतिशत गांवों में शमशान को लेकर भेदभाव का व्यवहार होता है, यह बात सामने आयी हैं. उनके उपाय के लिये प्रयास भी प्रारम्भ हुए है. अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिये बने संवैधानिक प्रावधानों का, उनके लिये आवंटित धनराशि का विनियोग व निर्वाह प्रामाणिकता व तत्परता के साथ शासन व प्रशासन के द्वारा हो इसलिये भी संघ के स्वयंसेवकों ने सहायता का कार्य प्रारम्भ कर दिया है. अपनी जितनी शक्ति, जानकारी व पहुँच है, उतना सामाजिक समता की दिशा में संघ के स्वयंसेवकों का यह प्रयास होगा ही. परंतु समाज हितैषी सभी व्यक्तियों व शक्तियों को अधिक सक्रिय होकर इस दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है. छोटी मोटी घटना से उत्तेजित होकर अथवा अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में अपने ही निरपराध बंधुओं को अपमान व प्रताड़ना सहन करनी पड़े, यह 21वीं सदी के भारतीय समाज के लिये लज्जाजनक कलंक है ही, कतिपय छिद्रान्वेषी शक्तियां इसी का लाभ लेकर भारत को बदनाम करने की गतिविधियाँ चलाती हैं तथा समाज में चलने वाले अच्छे उपक्रमों की गति अवरुद्ध करने का प्रयास करती हैं.
देशी गाय जो अपने देश के पशुधन का बडा हिस्सा है, का रक्षण, संवर्धन व विकास यह संविधान के मार्गदर्शक तत्वों में निर्दिष्ट, भारतीय समाज की आस्था व परंपरा के अनुसार पवित्र कार्य है. केवल संघ के स्वयंसेवक ही नहीं, देशभर में अनेक संत, सज्जन, संविधान कानून की मर्यादा का पूर्ण पालन करते हुए जीवन तपस्या के रूप में इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं. आधुनिक विज्ञान के प्रमाण देशी गाय की उपयुक्तता व श्रेष्ठता को सिद्ध कर चुके हैं. अनेक राज्यों में गोहत्या प्रतिबंधक कानून तथा पशुओं के प्रति क्रूरता प्रतिबंधक कानून बने हैं. उनका ठीक से अमल हो, इसके लिये भी कभी-कभी व कहीं-कहीं गौसेवकों को अभियान करना पड़ता है. गौहत्या की घटनाओं का आधार लेकर अथवा कपोलकल्पित घटनाओं की अफवाह को उछालते हुए अपना व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करना, समाज में बिना कारण कलह खड़ा करना, अथवा केवल गौसेवा के पवित्र कार्य को ही लांछित व उपहासित करने के लिये कौभांड रचने वाले अवांच्छित तत्वों से उनकी तुलना नहीं हो सकती. गौसेवकों की तपस्या तो चलती, बढ़ती रहेगी. अपना हर कार्य कानून सुव्यवस्था की मर्यादा में ही हो यह स्वतंत्र देश के प्रजातंत्र का अनुशासन सभी सज्जन भावनाओं को भड़काने के प्रयासों के बावजूद पालन कर रहे हैं, करते रहेंगे. गोहत्या प्रतिबंधन कानूनों का अमल कड़ाई से हो व कानून सुव्यवस्था का पालन भी कड़ाई से हो यह देखते समय प्रशासन, सज्जन व दुर्जनों को एक ही तराजू में न तोले यह आवश्यक है. ऐसी घटनाओं में राजनीतिक लाभ की आशा से राजनैतिक व्यक्ति जो भी पक्ष लें, अपनी करनी से समाज में पड़ी दरारें चौड़ी न हों, विद्वेष का शमन हो ऐसा उनका मन, वचन, कर्म रहे, यह समाज की अपेक्षा है. माध्यमों में भी कुछ वर्ग अपने व्यापारिक लाभ की आशा से ऐसी घटनाओं के वृत्तकथन को वास्तविकता से अधिक भड़काऊ रंग में प्रस्तुत करता दिखाई देता है, इस मोह से उनको बचना चाहिये. सभी को यह ध्यान में रखना चाहिये कि समाज में स्वतंत्रता व समता का अवतरण व दृढ़ीकरण, समाज में बंधुभाव की व्याप्ति व दृढ़ता पर निर्भर रहता है. देश के सामने मुँह बाये खड़ी चुनौतियों का सामना उसी के बल पर देश कर सकेगा. श्री अभिनवगुप्त व श्रीरामानुज जैसे द्रष्टा महापुरुषों ने आगे बढ़ायी इस सद्भाव की परंपरा को और भी आगे बढ़ाने की आवश्यकता इसलिये भी है कि देश की सुरक्षा, एकात्मता, संप्रभुता व अखण्डता पर अभी भी खतरों के बादल मंडरा रहे हैं.
समूचे जम्मू-कश्मीर राज्य की सद्यःस्थिति इस दृष्टि से हमारी चिंताएँ और बढ़ाती है. इस संबंध में अब तक चलती आयी सफल अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक गतिविधियाँ तथा शासन व संसद के द्वारा बारबार व्यक्त किये दृढ़तापूर्ण संकल्प स्वागतार्ह हैं, परंतु उस सही नीति का तत्पर व दृढ़तापूर्ण क्रियान्वयन हो यह भी आवश्यक है. जम्मू-लद्दाख सहित कश्मीर घाटी का बड़ा क्षेत्र अभी भी कम उपद्रवग्रस्त व अधिक नियंत्रण में है. वहाँ पर राष्ट्रीय प्रवृत्तियाँ व शक्तियों का बल बढ़े, पक्का हो व स्थापित हो, ऐसी शीघ्रता करनी चाहिये. उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में उपद्रव उत्पन्न करने वाले स्थानीय व परकीय तत्वों का कड़ाई से व शीघ्र नियंत्रण हो इसलिये राज्य शासन व केन्द्र शासन अपने अपने प्रशासन सहित एकमत व एकनीति बनाकर दृढ़ता व तत्परता दिखाए, इसकी आवश्यकता है. मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगिट, बाल्टिस्तान सहित संपूर्ण कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है, यह दृढ़ भूमिका बनी रहनी चाहिये. वहाँ से विस्थापित हुए बंधु और कश्मीर घाटी से विस्थापित पंडित हिंदू, सम्मान, सुरक्षा तथा योगक्षेम की स्थिरता के प्रति निश्चिंत होकर यथापूर्व पुनःस्थापित हो जायें, यह कार्य शीघ्रता से आगे बढ़ाना होगा. विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर राज्य में तत्कालीन राज्य शासन द्वारा पाकिस्तान में गये भूभाग से विस्थापित होकर आये हिंदुओं को आश्वस्त करते हुए राज्य में ही बसने को कहा था, उनको राज्य में भी नागरिकता के सभी अधिकार प्राप्त करा देने होंगे. अब तक राज्य प्रशासन के द्वारा जम्मू व लद्दाख के साथ होने वाला भेदभाव तुरंत ही समाप्त होना चाहिये. जम्मू व कश्मीर में राज्य का प्रशासन राष्ट्रभाव से, स्वच्छ, तत्पर, समदृष्टि व पारदर्शी होकर चले तभी राज्य की जनता को विजय तथा विश्वास की एकसाथ अनुभूति मिलेगी व घाटी की जनता के सात्मीकरण की प्रक्रिया आगे बढे़गी.
कश्मीर घाटी में चलने वाले उपद्रवों के पीछे सीमा पार से ऐसे उपद्रवों को उकसाने, हवा देने के लिये सतत चलने वाली कुचेष्टा यह एक बड़ा कारण है, यह बात सारा विश्व अब जानता है. विश्व के अन्यान्य देशों में अपना केन्द्र बनाकर सीमा प्रदेशों में अलगाव, हिंसा, आतंक व नशीली दवाओं की तस्करी जैसी समाज के स्वास्थ्य व बल को नष्ट करने वाली गतिविधियाँ चलाने वाले छोटे बड़े समूहों का भी इनके साथ गठबंधन बनता चला जा रहा है, यह जानकारियाँ भी मिलती रहती हैं. ऐसी अवस्था में हमारे सामरिक बल की नित्यसिद्धता, सेना दल, रक्षक बल तथा सूचना तंत्रों में समन्वय व सहयोग का प्रमाण व नित्य सजगता में क्षणभर की ढिलाई महंगी पड़ सकती है, यह उरी के सैनिक शिविर पर हुए हमले की घटना ने फिर एक बार अधोरेखित किया है. इस हमले का ठीक उत्तर बहुत दृढ़तापूर्वक तथा कुशलतापूर्वक अपने शासन के नेतृत्व ने हमारे वीर जवानों द्वारा दिया गया, इसलिये शासन व सभी सेना दलों का हार्दिक अभिनंदन! परंतु हमारी यह दृढ़ता तथा राजनयिक व सामरिक कुशलता हमारी नीति में स्थायी हो यह आवश्यक है. समूचे सागरी व भूसीमा प्रदेशों में इस दृष्टि से कड़ी निगरानी रखते हुए शासन, प्रशासन व समाज के परस्पर सहयोग से अवांच्छित गतिविधियों को तथा उनके पीछे काम करने वाली कुप्रवृत्तियों को जड़मूल से समाप्त करना आवश्यक हो गया है.
राज्यों की शासन व्यवस्थाओं का भी इसमें पूर्ण सहयोग आवश्यक रहता है. देश की व्यवस्था के नाते हमने अपने संविधान में संघराज्यीय कार्यप्रणाली को स्वीकार किया है. ससम्मान व प्रामाणिकता पूर्वक उसका निर्वाह करते समय हम सभी को, विशेषकर विभिन्न दलों द्वारा राजनीतिक नेतृत्व करने वालों को यह निरन्तर स्मरण रखना पडे़गा कि व्यवस्था कोई व कैसी भी हो, संपूर्ण भारत युगों से अपने जन की सभी विविधताओं सहित एक जन, एक देश, एक राष्ट्र रहा है, तथा आगे उसको वैसे ही रहना है, रखना है. मन, वचन, कर्म से हमारा व्यवहार उस एकता को पुष्ट करने वाला होना चाहिये, न कि दुर्बल करने वाला. समाज जीवन के विभिन्न अंगों में नेतृत्व करने वाले सभी को इस दायित्वबोध का परिचय देते चलने का अनुशासन दिखाना ही पड़ेगा. साथ-साथ समाज को भी ऐसे ही दायित्वपूर्ण व्यवहार को सिखाने वाली व्यवस्थाएँ बनानी पड़ेंगी.
अनेक वर्षों से देश की शिक्षा व्यवस्था – जिससे देश व समाज के साथ एकात्म, सक्षम व दायित्ववान मनुष्यों का निर्माण होना चाहिये – पर चली चर्चा, इस परिप्रेक्ष्य में ही अत्यंत महत्वपूर्ण है. उस चर्चा के निष्कर्ष के रूप में एक सामान्य सहमति भी उभरकर आती हुई दिखाई देती है कि शिक्षा सर्वसामान्य व्यक्तियों की पहुँच में सुलभ, सस्ती रहे. शिक्षित व्यक्ति रोजगार योग्य हों, स्वावलंबी, स्वाभिमानी बन सकें व जीवनयापन के संबंध में उनके मन में आत्मविश्वास हो. वह ज्ञानी बनने, सुविद्य बनने के साथ-साथ दायित्वबोधयुक्त समंजस नागरिक तथा मूल्यों का निर्वहन करने वाला अच्छा मनुष्य बने. शिक्षा की व्यवस्था इस उद्देश्य को साकार करने वाली हो. पाठ्यक्रम इन्हीं बातों की शिक्षा देने वाला हो. शिक्षकों का प्रशिक्षण व योगक्षेम की चिन्ता इस प्रकार हो कि विद्यादान के इस व्रत को निभाने के लिये वे योग्य व समर्थ हों. शासन व समाज दोनों का सहभाग शिक्षा क्षेत्र में हो तथा दोनों मिलकर शिक्षा का व्यापारीकरण न होने दें. नयी सरकार आने के बाद इस दिशा में एक समिति बनाकर प्रयास किया गया, उसका प्रतिवेदन भी आ गया है. शिक्षा क्षेत्र के उपरोक्त दिशा में कार्य करने वाले बंधु तथा शिक्षाविदों की राय में उस प्रतिवेदन की संस्तुतियाँ इस दिशा में शिक्षा पद्धति को रूपांतरित करेंगी कि नहीं यह देखना पडेगा. दिशागत परिवर्तन के लिये उपयुक्त ढाँचा बनाने की रूपरेखा तभी प्राप्त होगी, अन्यथा उपरोक्त सहमति प्रतीक्षा की अवस्था में ही रहेगी.
परंतु नई पीढ़ी के शिक्षित होने के स्थानों में विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विद्यापीठों के साथ-साथ कुटुंब व पर्व उत्सवों से लेकर समाज की सभी गतिविधियाँ व उपक्रमों से निर्माण होने वाला वातावरण भी है. अपने कुटुंब में नई व पुरानी पीढ़ी का आत्मीय संवाद होता है क्या? उस संवाद में से उनमें शनैः-शनैः समाज के प्रति दायित्वबोध, व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य के सद्गुण, मूल्यश्रद्धा, श्रमश्रद्धा, आत्मीयता तथा बुराइयों के आकर्षण से दूर रहने की प्रवृत्ति का निर्माण होता है क्या? वे ऐसे बनें इसलिये घर के बड़ों का व्यवहार उदाहरण बनता है क्या? इन प्रश्नों के उत्तर अपने-अपने कुटुंब के लिये हम ही को देने होंगे. घर से उचित स्वभाव, लक्ष्य तथा प्रवृत्ति प्राप्त हो तो ही शिक्षा प्राप्ति का परिश्रम तथा उसके उचित उपयोग का विवेक बालक दिखाता है, यह भी हम सभी का अनुभव है. कुटुंब में यह संवाद प्रारम्भ हो व चलता रहे यह प्रयास अनेक संत सज्जन तथा संगठन कर रहे हैं. संघ के स्वयंसेवकों में भी एक गतिविधि कुटुंब प्रबोधन के ही कार्य को लेकर चली है, बढ़ रही है. किसी के माध्यम से हमारे पास यह कार्य पहुँचे, इसकी प्रतीक्षा किये बिना हम इसे अपने घर से प्रारम्भ कर ही सकते हैं.
समाज में चलने वाले अनेक उपक्रम, पर्व त्यौहार, अभियान इत्यादि का प्रारंभ समाज प्रबोधन व संस्कार की शाश्वत आवश्यकता को ध्यान में लेकर हुआ. उस प्रयोजन का विस्मरण हुआ तो उत्सव तो चलते रहता है, परंतु उसका रूप बदलकर कभी कभी भद्दा, निरर्थक बन सकता है. प्रयोजन ध्यान में लेकर इन पर्वों के सामाजिक स्तर पर आयोजन का काल सुसंगत रूप गढ़ना चाहिये तो आज भी वह समाज प्रबोधन का अच्छा साधन बन सकते हैं. महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेश मंडलियों के द्वारा अनेक स्थानों पर अच्छे प्रयोग किये हैं. वर्ष प्रतिपदा पर नव वर्ष मनाने की अनेक उपयुक्त कल्पनाएँ सामने आयी हैं. समाज से ऐसे कल्पक सुधारित उपक्रमों का प्रोत्साहन, सहयोग तथा अनुकरण होने की आवश्यकता है. शासकीय तथा अशासकीय दोनों प्रकार की पहल होकर कुछ नये प्रयास चले है, उनमें भी समाज का उत्साह बना रहे, बढ़ता रहे, इसका ध्यान निरन्तर सभी समाज हितैषी बंधु व स्वयंसेवकों को रखना पड़ेगा. वृक्षारोपण, स्वच्छ भारत अभियान, योग दिवस आदि इन उपक्रमों का महत्व समाज में सामूहिकता, समाज में स्वावलंबन, सामाजिक संवेदना आदि अनेक गुणों के निर्माण की दृष्टि से ध्यान में आ सकता है. इसी बात को मन में लेकर संघ के स्वयंसेवक भी इन उपक्रमों में, उत्सवों में समाज के साथ सहभागी होकर उनको अधिक सुव्यवस्थित, सुंदर व प्रभावी बनाने में समाज का सहयोग कर रहे हैं, करेंगे. समाज की स्वाभाविक संगठित अवस्था ही देश व विश्व में सुव्यवस्था, एकात्मता, शांति व प्रगति का मूल व मुख्य कारण बनती है, इस सत्य के आधार पर ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 वर्षों से निरंतर कार्य करते हुए आगे बढ़ रहा है.
परंपरा से ही हमारा समाज कई विविधताओं को साथ लेकर चला है. संपूर्ण सृष्टि के विविधरंगी दृश्य के पीछे, उन सभी विविधताओं के अस्तित्व में ओतप्रोत जो सनातन व शाश्वत एकत्व है, उसका साक्षात् बोध हमारे मनीषियों को हुआ. इसी बोध का प्रबोधन संपूर्ण जगत को कराने का साधन इस नाते उनके दुर्धर तप से हमारा राष्ट्र उत्पन्न हुआ और अब तक इसी प्रबोधन का सफल साधन बनने के लिये उसकी जीवन यात्रा चल रही है. सृष्टि के अस्तित्व तक इस प्रबोधन की आवश्यकता बनी रहेगी, उस आवश्यकता को पूर्ण करने वाला यह राष्ट्र भी बना रहेगा. हमारे राष्ट्र को इसलिये अमर राष्ट्र कहा जाता है. जड़ता, कलह की स्वनिर्मित श्रृंखलाओं में बद्ध विश्व को फिर उस प्रबोधन की आवश्यकता है. हमारे लिये अपने अस्तित्व के प्रयोजन को सिद्ध करने के लिये कर्तव्यबद्ध होकर चलने की घड़ी है. संपूर्ण अस्तित्व की एकता के सत्य पर दृढ़ता पूर्वक स्थापित, उसी से निःसृत हमारे सनातन धर्म व संस्कृति को वर्तमान युग के अनुसार समझकर, देशकाल परिस्थिति के अनुरूप उसका नूतन आविष्कार, हमारे संगठित, बल संपन्न, समतायुक्त, शोषणमुक्त, सर्वांग परिपूर्ण, वैभव संपन्न राष्ट्रजीवन को खड़ा करते हुए विश्व के सामने उदाहरण के रूप में रखना होगा. कई शतकों की विदेशी दासता व हमारी आत्म विस्मृति के कुप्रभावों से पूर्ण मुक्त होकर हमारे अपने विचार धन के आधार पर हमें राष्ट्र की नीतियाँ बनानी होंगी. उसके लिये हमारे उन सनातन मूल्यों, आदर्शों व संस्कृति की गौरव गरिमा श्रद्धापूर्वक हृदय में धारण करनी पड़ेगी. विश्व में आत्मविश्वास युक्त पदक्षेपों के साथ राष्ट्र आगे बढ़ रहा है, विश्व को सहस्राब्दियों से पीड़ा देने वाली समस्याओं का अचूक समाधान दे रहा है, यह दृश्य अपने जीवन व कर्तृत्व से खड़ा करना पड़ेगा. संतशिरोमणि श्री गुलाबराव महाराज की विशाल ग्रंथ संपदा व दुर्धर जीवन तपस्या का सारांश में संदेश यही है.
शासन का कार्य इस दिशा का ध्रुव रखकर चलें, प्रशासन उसकी नीति का तत्पर व कार्यक्षम रहकर क्रियान्वयन करें व देश के अंतिम व्यक्ति तक सभी को सुखी, सुंदर, सुरक्षित व उन्नत जीवन का लाभ हो रहा है, इस पर दोनों का ध्यान निरंतर रहे, इसके साथ-साथ समाज भी एकरस, संगठित व सजग होकर इन दोनों का सहयोग करे, प्रसंग पड़ने पर नियमन भी करे, यह राष्ट्रजीवन की उन्नति के लिये आवश्यक है. इन तीनों के एक दिशा में सुसूत्र व परस्पर संवेदनशील होकर समन्वित चलने से ही, आसुरी शक्तियों के छल-कपट व्यूहों के भ्रमजाल को भेदकर, समस्याओं व प्रतिकूलताओं की बाधाओं को चीरकर परम विजय की प्राप्ति में हम समर्थ हो सकेंगे.
कार्य कठिन लगता है, परंतु वही हमारा अनिवार्य सद्य कर्तव्य है. असंभव से लगने वाले कार्य को दृढ़निश्चय, पराक्रम, सर्वस्व समर्पण व निःष्काम, निःस्वार्थ बुद्धि से निरंतर सफलता की ओर बढ़ाने वाले श्री गुरुगोविंद सिंह जी महाराज के तेजस्वी जीवन की विरासत हमें मिली है. हमें श्रद्धापूर्वक सारी शक्ति लगाकर उस आदर्श की राह पर चलने का साहस दिखाना होगा.
समाज ऐसा दैवीगुणसंपदयुक्त बने, इसलिये अपने उदाहरण से ऐसे आचरण का वातावरण बनाने का एकमात्र कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है. अपने निःस्वार्थ एवं अकृत्रिम आत्मीयता से समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जोड़ना, अपने इस पवित्र और प्राचीन हिन्दू राष्ट्र को विश्व का परमवैभव संपन्न बनाने के भव्य लक्ष्य के साथ उसको तन्मय करना, कार्य के योग्य बनने के लिये शरीर, मन, बुद्धि का विकास करने वाली सहज, सरल शाखा साधना उसके जीवन का अंग बनाना, तथा ऐसे साधकों को आवश्यकता व क्षमतानुसार समाज जीवन के विविध अंगों में आवश्यक कार्य को सेवाभाव से करने के लिये प्रवृत्त करना यही उसकी कार्यपद्धति रही है. शीघ्रतापूर्वक समाज में इस परिवर्तन को लाने के लिये चलने वाली समरसता, गौसंवर्धन, कुटुंब प्रबोधन जैसी गतिविधियों का व उपक्रमों का अत्यल्प परिचय इस भाषण में आपको दिया है. परंतु संपूर्ण समाज ही इस दृष्टि से सक्रिय हो इसकी आवश्यकता है. नवरात्रि के नौ दिन तपस्यापूर्वक देवों ने – अर्थात् उस समय की सज्जनशक्ति ने – अपनी-अपनी शक्ति को परस्पर समन्वित व पूरक बनाकर सम्मिलित किया व दसवें दिन चंडमुंडमहिषासुर रूप मायावी असुर शक्ति का निर्दलन कर मानवता के त्रास का हरण किया, वही आज का विजयादशमी – विजयपर्व है. अतएव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस राष्ट्रीय कार्य पर आपके स्नेह व प्रोत्साहन की छाया की दृष्टि के साथ आपकी सहयोगिता व सहभागिता भी बढ़ती रहे, इस विनम्र आह्वान के साथ मैं इस वक्तव्य को विराम देता हूँ. आप सभी को विजयादशमी की शुभेच्छाएँ तथा सभी की ओर से एक प्रार्थना –
देह सिवा बरु मोहे ईहै, सुभ करमन ते कबहूं न टरों.
न डरों अरि सो जब जाइ लरों, निसचै करि अपुनी जीत करों..
अरु सिख हों आपने ही मन कौ, इह लालच हउ गुन तउ उचरों.
जब आव की अउध निदान बनै, अति ही रन मै तब जूझ मरों..
.. भारत माता की जय ..


Sunday, March 6, 2016

हिन्दू समाज को समरस बनाने के लिए समानता की नहीं समरसता की जरूरत – अभय जी

sangeet sameti (2)इलाहाबाद (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी प्रांत के प्रांत प्रचारक अभय जी ने कहा कि हिन्दू समाज को समरस बनाने के लिए समानता नहीं समरसता की जरूरत है. सभी के पूर्वज एक ही हैं, सभी सहोदर है. अभय जी रविदास जयंती की पूर्व संध्या पर प्रयाग संगीत समिति रामबाग में आयोजित सेवा भारती की संगोष्ठी को सम्बोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि रविदास का जन्म समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए हुआ और उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर लोगों को एक रास्ते पर चलने का संदेश दिया. वह एक महान संत थे, रामानन्द के परम शिष्य थे. सभी संतों ने  हिन्दू समाज को एकजुट करने के लिए काफी प्रयास किया.
उन्होंने कहा कि अमीर-गरीब, छोटा बड़ा और ताकतवर और कमजोर एवं जीवन व मौत यह भी सृष्टि की एक प्रक्रिया है. आज देश में समानता की आवश्यकता नहीं है. आज जरूरत है समरसता अर्थात आकर्षण की. जब तक हममें एक दूसरे के प्रति चाहत (आत्मीयता) नहीं होगी, तब तक हमारे देश का विकास सम्भव नहीं है. हम सभी एक ही पिता की संतान हैं. हमारे समाज में जो कुरीतियां आयी हैं, उसे विदेशी ताकतों ने अपनी-अपनी नीति के अनुसार समय-समय पर गलत तरीके ऐसे साहित्य के माध्यम से प्रचारित किया. हमारे हिन्दू समाज में पहले लिखने की कोई परम्परा नहीं थी. सभी अपने पूर्वजों के नाम से अपनी पहचान बनाते गये और उसी ने समाज में दूरी पैदा कर दी. कभी ऐसी हालत हो गई कि लोग अपने गोत्र भी भूल गये और वह पूर्वजों के नाम से ही अपनी पहचान बताते रहे. जिसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न जातियां उत्पन्न हो गईं. लेकिन सच यही है कि हम सभी कश्यप की ही संतान हैं. कश्यप के पहले भी हम एक थे और कश्यप के बाद भी हम एक ही पूर्वज की संतान हैं. प्रकृति में जो चल रहा है, वह सदैव चलता रहेगा. यदि सभी स्त्री एक सामान हो जाएं या पुरूष समान हो जाएं या फिर दुनिया में केवल स्त्री ही रह जाए, या पुरूष ही रहें तो पूरी सृष्टि विनाश के कगार पर पहुंच जाएगी. सभी एक सामान नहीं हो सकते है. ऐसा कोई कहता है, यह मिथ्या है. यह संसार विकार्षण से नहीं आकर्षण से संचालित हो रहा है. सभी एक दूसरे के पूरक हैं.
sangeet sameti (1)संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए विशिष्ट अतिथि कौशाम्बी के सांसद विनोद सोनकर ने कहा कि समाज को एक साथ मिलकर रहना चाहिए. यह संदेश देने का प्रयास संत रविदास जी ने पूरे समाज में किया. उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया, जिससे हमारा हिन्दू समाज एक साथ खड़ा हो जाए ताकि विनाशकारी शक्तियों से लड़ने में कामजोर न हो. संगोष्ठी का उद्घाटन जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द महाराज ने दीप प्रज्ज्वलन से किया और संत रविदास को श्रद्धासुमन अर्पित किया. मंच का संचालन सेवा भारती के प्रयाग महानगर के विभाग सेवा प्रमुख सुरेश जी ने किया. संगोष्ठी में समाज की सेवा में लगे डाक्टर कमलाकर, डॉ. डीके शुक्ला, मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया. (  Posted date: February 23, 2016 )

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने देशद्रोहियों पर मांगी कड़ी कार्रवाई

P1790907वाराणसी (विसंकें). जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में देश विरोधी नारों, देश को बांटने की साजिश और भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने के मंसूबे पालने वालों के खिलाफ मुस्लिम राष्ट्रीय मंच काशी प्रांत, मुस्लिम महिला फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं ने विवेकानंद चौराहे पर तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया. हाथों में तिरंगा और होठों पर भारत माता की जय के नारों के साथ मुस्लिम महिलाओं ने सड़क पर उतर कर जेएनयू में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त छात्रों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की. संगठन के कार्यकर्ताओं ने जेएनयू की सब्सिडी बंद करने, देशद्रोहियों की नौकरी छीनने, डिग्री रद्द करने की मांग सरकार से की. विवेकानंद चौराहे पर जुटे लोगों ने जेएनयू के गद्दार छात्रों के खिलाफ नारे लगाए.
प्रतिनिधियों ने जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने और देश के खिलाफ युद्ध की साजिश रचने वालों को संस्थान से निकालने की मांग की तथा सरकार से आग्रह किया कि इन्हें किसी भी सरकारी संस्थान या महत्वपूर्ण कंपनी में नौकरी न दी जाए. ये लोग नौकरी में आते ही संस्थान के दस्तावेज भी पाकिस्तान को सौंप सकते हैं.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सेवा प्रमुख डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि जेएनयू में भारत की बर्बादी के नारे लगने से हर भारतीय का हृदय छलनी हो गया है. भारत विरोधी नारे हम सहन नहीं करेंगे. जिन लोगों ने पाकिस्तान जिंदाबाद कहा है, उनकी नागरिकता छीनी जाए, ये वही लोग हैं जो हाफिज सईद के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं. गद्दार छात्रों का चेहरा सबके सामने आ चुका है, इन्हें जेल में डाला जाये.
P1790879मुस्लिम महिला फाउंडेशन की सदर नाजनीन अंसारी ने कहा कि अफजल गुरू आतंकवादी था, भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने पर उसे फांसी दी गई, जो उसका समर्थन करते हैं वे देशद्रोही हैं. जेएनयू के छात्र चंद पैसों और स्मैक के लिये पाकिस्तान के हाथ बिककर भारत के टुकड़े करने की साजिश करते हैं और मुसलमानों को बदनाम कर रहे हैं. जेएनयू में गद्दारों का संगठित गैंग है, जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के विरुद्ध अभियान चलाता है.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच काशी प्रांत के संरक्षक डॉ. हेमंत गुप्ता ने कहा कि देश के सीने में छुरा घोंपने वाले गद्दारों को माफ नहीं करना चाहिये. गद्दारों की बर्बादी और बेदखली तक यह अभियान चलता रहेगा. गद्दारों को फौरन जेल में डालकर यह संदेश देना चाहिये कि किसी कीमत पर देशद्रोही गतिविधियों को सहन नहीं किया जाएगा. प्रदर्शन के दौरान मो. अजहरुद्दीन, अर्चना भारतवंशी, संजीदा बेगम, नजमा परवीन, अभिनव सिंह, कहकशां अंजुम, श्याम नारायण मिश्रा, प्रीती पांडेय, शबनम बीबी, नजबुन, वारिस अली, शम्स परवीन, मदीना, शाहजहां सहित अन्य उपस्थित थे. (Posted date: February 15, 2016)
P1790735

गीता के उपदेशों को जीवन में धारण करना समय की आवश्यकता – डॉ. मोहन भागवत जी

गीता के उपदेशों को जीवन में धारण करना समय की आवश्यकता – डॉ. मोहन भागवत जी

गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
कुरुक्षेत्र (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने आप में परिवर्तन लाना होगा. और इसके लिए पवित्र ग्रन्थ गीता के उपदेशों को आचरण में धारण करना होगा. पवित्र ग्रन्थ गीता के उपदेश पूरे विश्व के लिये आवश्यक हैं और आज समय की आवश्यकता भी है कि महान ग्रन्थ गीता के संदेश को हम जीवन में धारण करें.
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी शुक्रवार को कुरुक्षेत्र में गीता ज्ञान संस्थानम का संतजनों की उपस्थिति में शिलान्यास करने के पश्चात मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे. कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक जी ने आदर्श गृहस्थ, वीर जवानों हार न मानो सहित दो अन्य पुस्तकों का विमोचन भी किया. संस्थानम का निर्माण कार्य तीन साल में पूर्ण होगा.
सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत मां के पुत्रों में भाईचारा और सद्भावना बरकरार रहे, इसके लिए गीता के संदेशों को अपने आचरण में लाना जरूरी है. देश को आगे ले जाना है तो इसके लिये सभी के सांझे सहयोग की जरूरत है. अगर भारत को फिर से विश्व गुरू बनाना है तो आपसी मनमुटाव को भुलाकर अपने आप में परिवर्तन लाना होगा. गीता के 11वें अध्याय के 13वें श्लोक के एक – एक शब्द को अपने जीवन में धारणा है. इसके साथ ही गीता के 12वें अध्याय भक्ति को भी ग्रहण करना है. गीता का 11वां अध्याय ज्ञान का संदेश देता है, वहीं 12वां अध्याय भक्ति का संदेश देता है. उन्होंने कहा कि भक्ति को मन में धारण करने के लिये स्वयं में नारायण देखना है, सभी को अपना मित्र मानना है और द्वेष को समाप्त करना है. स्वतंत्र देश में एक-एक गुण पर चितंन कर अपने जीवन में धारण करना है. भक्ति से ही कर्म सुंदर होता है.
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
स्वामी ज्ञानान्द जी महाराज ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्थान की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि यह एक बड़ा शोध केंद्र बनेगा. इस अवसर पर देश भर से आए हुए संत और अन्य महानुभव मंच पर उपस्थित थे. गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि चरित्र, परंपरा का सम्मान, बच्चों को संस्कारवान व युवाओं को सही मार्ग  केवल गीता के उपदेशों से ही मिल सकता है. उन्होंने कहा कि गीता का ज्ञान घर-घर पहुंचे तथा पूरे विश्व को एक बार फिर से कुरूक्षेत्र की पावन धरा से गीता का संदेश मिले, इसके लिये ही गीता ज्ञान संस्थानम का निर्माण किया जा रहा है.
राज्यपाल प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि महर्षि अरविंद जी ने भी दूरगामी सोच का परिचय देते हुए भविष्यवाणी की थी कि 21वीं शताब्दी में भारत विश्वगुरु बनने की तरफ अग्रसर होगा और उसका आधार गीता बनेगी. मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि हरियाणा की पावन धरा कुरूक्षेत्र में गीता ज्ञान संस्थानम की स्थापना होने से हरियाणा का गौरव पूरे विश्व में बढ़ेगा.
कार्यक्रम में स्वामी गुरु शरणानंद महाराज, हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, बाबा स्वामी रामदेव, स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज, रमेश ओझा, स्वामी वेदांतानंद महाराज, बाबा भूपेन्द्र सिंह, स्वामी परमात्मानंद, स्वामी सत्यानद आदि ने संबोधित किया.
भूल को पीछे छोड़ समाज बढ़े आगे
मंच से योग गुरू बाबा रामदेव जी की वाणी में हरियाणा में गत दिनों बिगड़े हालात पर पीड़ा झलक रही थी. उन्होंने कहा कि गौरव बनाने में समय लगता है, जबकि धूमिल क्षण भर में हो जाता है. हरियाणा ने देश और दुनिया को बहुत कुछ दिया है, परंतु जो भूल हुई है, हमें उससे आगे चलना होगा. उन्होंने बल देते हुए कहा कि इंसानियत की कीमत पर हमें कुछ नहीं चाहिये, हम जाति पंथ में बंधे हुए नहीं हैं. जाति मजहब का अवलंबन कमजोर लोग लेते हैं. योग्यता अर्जित कर स्थान बनाने पर समाज स्वयं सम्मान देता है. मैंने कभी जाति प्रांत का नाम नहीं लिया, बस योग साधना की है, जिससे लोगों ने मुझे प्यार से गले लगाया है. सामाजित भाईचारा बनाने के लिये संत शक्ति आगे आकर समाज का मार्गदर्शन करे. बाबा रामदेव जी ने हरियाणा की सेवा में अपना समय और पतंजलि उत्पादों से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा हरियाणा के हालात ठीक करने में खर्च करने की घोषणा की.
मेरठ से आए नेत्रहिन बच्चों ने गीता श्लोक सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया. राजस्थान के भरतपुर से आई बेटी अमृत्या ने गीता के श्लोक सुनाए, जिसे पूरे 700 श्लोक कंठस्थ थे. कुरूक्षेत्र के राजकीय स्कूल की छात्राओं ने हरियाणवी लोकगीत गाकर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का संदेश दिया. दीदी मां साध्वी ऋतंभरा ने बेटियों पर कविता सुनाकर सबकी आंखें नम कर दीं.
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र
गीता ज्ञान संस्थानम कुरूक्षेत्र

Thursday, October 22, 2015

आज भारत की गीता, भारत का योगदर्शन, भारत के तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं – डॉ. मोहन भागवत जी


पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का विजयादशमी उत्सव 2015 (गुरुवार दिनांक 22 अक्तुबर 2015) के अवसर पर दिया उद्बोधन -
नागपुर. कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि आदरणीय डॉ. वीके सारस्वत जी अन्य निमंत्रित अतिथि गण, उपस्थित नागरिक सज्जन, माता भगिनी तथा आत्मीय स्वयंसेवक बन्धु -
विजयादशमी के प्रतिवर्ष संपन्न होने वाले पर्व के निमित्त आज हम यहां एकत्रित हैं. संघ कार्य प्रारम्भ होकर आज 90 वर्ष पूर्ण हुए. यह वर्ष भारतरत्न डॉ. भीमराव जी उपाख्य बाबासाहेब आम्बेडकर की जन्मजयंती का 125वां वर्ष है. सम्पूर्ण देश में सामाजिक विषमता की अन्यायी नागपुर (1कुरीति को चुनौती देते हुए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया. स्वतंत्र भारत के संविधान में आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से उस विषमता को निर्मूल कर समता के मूल्यों की प्रतिष्ठापना करने वाले प्रावधान वे कर गये. संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के शब्दों में आचार्य शंकर की प्रखर बुद्धि व तथागत बुद्ध की असीम करुणा का संगम उनकी प्रतिभा में था.
गत वर्ष संघ के संस्थापक पू. डॉ. हेडगेवार जी की जयंती का भी 125वां वर्ष था. समतायुक्त शोषणमुक्त हिन्दू समाज के सामूहिक उद्यम के आधार पर संपूर्ण विश्व में उदाहरण स्वरूप परमवैभव संपन्न भारत के निर्माण का स्वप्न उन्होंने देखा था. उस लक्ष्य के लिये प्रामाणिकता से, निस्वार्थबुद्धि से व तन-मन-धन पूर्वक सतत् प्रयास करने वाले कार्यकर्ताओं के निर्माण की पद्धति देकर वे गये. उस कार्यपद्धति के जानकार, संघ के तृतीय सरसंघचालक स्व. बालासाहब देवरस का जन्मशती वर्ष प्रारम्भ हो रहा है. संघ की ही कार्यपद्धति में पले बढ़े तथा भारतीय दर्शनों के सनातन मूल्यों के आधार पर, राष्ट्र की व्यवस्था का संपूर्ण व युगानुकूल वैचारिक  दिग्दर्शन करनेवाले ‘एकात्म मानव दर्शन’ को देने वाले स्व. पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय का जन्मशतव्दी वर्ष भी प्रारम्भ हो चुका है.
नागपुर 1सुखद संयोग ऐसा है कि भारत में सुशासन का आदर्श प्रस्थापित कर, दक्षिणपूर्व एशिया महाद्वीप में अपनी सनातन भारतीय संस्कृति की मंगलसूचक पताका फहराने वाले राजराजेश्वर राजेन्द्र चोल महाराजा के राज्यारोहण का भी 1000वां वर्ष मनाया जा रहा है तथा, जाति, मत, पंथ के भेदों को पूर्णतः नकारकर, रूढ़ियों की बेड़ियों को तोड़कर भक्ति मार्ग को समाज के सभी घटकों के लिये खुला करते हुए, सामाजिक समरसता के जागरण का पुनः प्रवर्तन करने वाले श्री रामानुजाचार्य का 1000वीं जयंति का वर्ष भी अगले वर्ष संपन्न करने की तैयारी समाज में हो रही है. जम्मू-कश्मीर में शैव सिद्धान्त के महान आचार्य अभिनव गुप्त का भी यह 1000वीं जयंति का वर्ष चल रहा है. कर्मसु कौशलम् वसमत्व के साथ फलाशारहित निरन्तर विहित कर्म करने का संदेश देनेवाली श्रीमद्भगवद्गीता का 5151वां वर्ष गीता जयंती तक चलेगा.
इस वर्ष हमें छोड़ गये समाज के दो श्रद्धेय धुरीण, नई पीढ़ी में आत्मविश्वास  व देश गौरव जगाकर उन्हें देश के लिये हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने की प्रेरणा देने में ही जीवन लगा देने वाले पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम, व वैदिक शिक्षक बनकर अपने समाज में तथा विश्व में सनातन संस्कृति के विषय में युगानुकूल दृष्टि, गौरव व सक्रियता जगाने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती, इन दोनों का जीवनकार्य व संदेश भी भारत गौरव व सामाजिक एकता ही था. इन सब संयोगों के स्मरण का कारण यही है कि आज भी हमारे आपके परिवारों से लेकर सम्पूर्ण विश्व की समृद्धि, शांति व उन्नति के लिए हमारा कर्तव्य भी हमें समृद्ध, समर्थ व समरस भारत के निर्माण के लिए आह्वान कर रहा है. संपूर्ण समाज की संगठित शक्ति के आधार पर विजय प्राप्त करने का पथ ही आज का विचारणीय विषय है.
नागपुर2जीवन के सब क्षेत्रों में विजिगीषु नीति के आधार पर स्वावलम्बी, सामर्थ्य संपन्न, वैभव संपन्न, पूर्ण सुरक्षित होकर, संपूर्ण विश्व को मंगलप्रद उत्कर्ष कारक नेतृत्व देने वाला भारत खड़ा करना तब सम्भव होगा जब, समतायुक्त, शोषणमुक्त, गौरव संपन्न, संगठित व प्रबुद्ध समाज का उद्यम उन नीतियों के समर्थन में चलेगा तथा ऐसे समाज की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रजातांत्रिक व्यवस्था में चलने वाले तंत्र की तथा उसके संवैधानिक चालकों को दिग्दर्शक होगी. सजग, स्पष्ट, अचूक नीतियांतथा स्वार्थ भेदरहित विवेकी समाज यह दोनों कारक देश के भाग्य-परिवर्तन के लिए अनिवार्य है, इसलिए उनका उभयपक्षतः एक दूसरे से पूरक बनकर चलना आवश्यक है.
इस दृष्टि से जब आज के देश के परिदृश्य का विचार करते हैं, तब एक बहुत ही सुखद व आशादायक चित्र सामने आता है. दो वर्ष पूर्व में जो निराशा का, अविश्वास का, वातावरण था, वह अब प्रायः लुप्त हो गया है. अपेक्षाओं का तथा अपेक्षापूर्ति के विश्वास का वातावरण निर्माण हुआ है. उस वातावरण का साक्षात् अनुभव देश के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे तथा, अपने स्वयं के अनुभव से, अपने व देश के भाग्य परिवर्तन में, समाज के विश्वास की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहे, इसका ध्यान रखना होगा.
यह सभी अनुभव कर रहे हैं कि पिछले दो वर्षों में बहुत द्रुतगति से भारत की विश्व में प्रतिष्ठा बढ़ी है. पड़ोसी देशों से संबंध अपने देश का हित ध्यान में रखते हुए सुधारने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गए हैं तथा वे सफल परिणाम भी दे रहे हैं. लगता है कि विश्व को आधुनिक भारत का एक अलग नया परिचय मिल रहा है. स्वगौरव तथा आत्मविश्वास से युक्त होकर, संपूर्ण विश्व के प्रति अपना परंपरागत सद्भावनापूर्ण नागपुर (3)दृष्टिकोण रखते हुए, दृढ़तापूर्वक देशहित की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनय में दो टूक अपनी बात कहने वाला, विश्व के किसी भी देश में निर्माण हुए संकट में अपना मित्रतापूर्ण हाथ बढ़ाने वाला, भारत का नया अनोखा रूप धीरे-धीरे आकार लेता देख, विश्व के देश स्तब्ध, लुब्ध व नई आशा से आशान्वित हैं. भारत की गीता, भारत का योगदर्शन, भारत के तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं. भारतीय मानस व परंपरा के श्रद्धा के विषयों पर ध्यान जाना तथा उनकी सुरक्षा व मानरक्षा के लिए नीतिगत पहल भी प्रारम्भ हुई है. तथाकथित महाशक्तियों के अवांच्छनीय प्रभाव जाल से मुक्त होने के लिए छटपटाने वाली विकसनशील दुनिया नेतृत्व के लिए भारत की ओर देख रही है. भारतवर्ष की उन्नत तथा अवनत अवस्था में भी उसने विश्व को अपना कुटुम्ब मानकर अपनी सजगता, दृढ़ता व शक्ति के आधारपर, राष्ट्रहित व विश्वहित, दोनों को प्रामाणिकता से साधने की परंपरा निभायी है. राजनय की उस शैली का थोड़ा-थोड़ा अनुभव पुनः मिलने लगा है. विश्व के सामने व देश के प्रत्येक घटक के अंतःकरण की अनुभूति में, भारत का यह देदीप्यमान स्वरूप पूर्णतः अवतरित हो, यह आवश्यक है. उसके लिए जीवन के सभी अंगों में नये विचार व नये पुरुषार्थ का प्रकटीकरण हमें करना होगा. युगयुग से चलते आये हमारे अक्षुण्ण राष्ट्रजीवन के मूल व सर्वहितकारी सत्य के आधार पर, युगानुकूल नीति, तद्नुकूल व्यवस्थाएं तथा उनको क्षमतापूर्वक धारणा करने वाले समाज का नया रूप गढ़ना पड़ेगा.
नागपुर3“साहेब वाक्यं प्रमाणम् की मानसिक दासता का मन से पूर्ण उच्चाटन करते हुए, भारतीय चित्त व मानस के आधार पर, विश्व से जो अच्छा, उचित व सत्य प्राप्त होता है, उसको देशोपयोगी बनाकर, अपने देश के लिये काल सुसंगत पथ का स्वतंत्र विचार तथा तदनुरुप समाज में, विद्वानों व चिन्तकों में, प्रशासकों व प्रशासनों में तथा शासन व नीतियों में विचार व आचरण का परिवर्तन किए बिना, विश्व को उदाहरण स्वरूप, स्वावलम्बी, समतायुक्त, शोषणमुक्त, सामर्थ्य संपन्न, समृद्ध भारत का निर्माण संभव नहीं. कई शतकों से विश्व का चिन्तन जिस दृष्टि पर आधारित है, उस दृष्टि का अधूरापन अब वैज्ञानिक कसौटियों पर भी सिद्ध हो रहा है तथा उस अधूरे चिन्तन के परिणामों के अनुभव भी उस दृष्टि व चिन्तन के ही पुनर्विचार की आवश्यकता अधोरेखित कर रहे हैं.
1951 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सामाजिक व आर्थिक कार्यविभाग ने इस अधूरे चिन्तन का संपूर्ण समर्थन करते हुए यह कहा था – There is a sense in which rapid economic progress is impossible without painful adjustments. Ancient philosophies have to be scrapped; old social institutions have to disintegrate. Bonds of caste, creed and race have to burst and large numbers of persons who cannot keep up with the progress have to have their expectations of a comfortable life frustrated. Very few communities are willing to pay the full price of economic progress.
यह आत्यंतिक तक जडव़ादी, अहकेन्द्रित, मानवीय संवेदनशून्य दृष्टि विश्व पर थोपी गई, उसके सर्वविदित परिणामों के अनुभव जब इसके पुरस्कर्ताओं को भी होने लगे, तब उनकी इस भाषा में एकदम ”घूम जाव“(उलट) परिवर्तन दिखाई दिया. अक्तूबर 2005 में जी 20 राष्ट्रों के केन्द्रीय अधिकोषों के गवर्नरों का सम्मेलन कहता है – We note that development approaches are evolving over time and thus नागपुर (1)need to be updated as economic challenges unfold. —— We recognize there is no uniform development approach that fits all the countries. Each country should be able to choose the development approaches and policies that best suit its specific characteristics while benefitting from their accumulated experience in policy making over last decades, including the importance of strong macroeconomic policies for sustained growth.
बाद में 2008 में और अधिक स्पष्टता के साथ इसी बात को दोहराते हुए विश्व बैंक का समाचार बुलेटिन यह कहता है – In our work across the world we have learnt the hard way that there is no one model that fits all. Development is all about transformation. It means taking the best ideas, testing them in new situations and throwing away what doesn’t work. It means, above all, having the ability to recognize when we have failed. This is never an easy thing to do. It is ever more difficult for an organization to do so, be it the government or the World Bank, which constantly need to adapt to the changing nature of developmental challenge.
नागपुर (2)इस स्वानुभूति के बाद विष्व में विकास को लक्षित कर चलने वाले संवादों में ‘‘समग्र’’ (Holostic) ‘‘धारणक्षम विकास’’ (Sustainable development) आदि वाक् प्रयोगों का सुनाई देना प्रारंभ हुआ है तथा पर्यावरण की भी थोड़ी-थोड़ी चिंता होने लगी है. इसलिए प्रयोग-अनुभव-परिवर्तन के चक्र में से गुजरती हुई इस अधूरी दृष्टि को ध्रुव सत्य मानने के भ्रमजाल से मुक्त होकर, हमें अपनी स्वयं की समयसिद्ध शाश्वत दृष्टि के आधार पर ही चलना उपयुक्त होगा. वह दृष्टि समन्वय व सहयोग पर आधारित है. जीवन को अर्थ-काम प्रधान नहीं, धर्म व संस्कार प्रधान मानती है. धारणक्षम विकास के लिये कम से कम ऊर्जा व्यय, अधिकतम रोजगार, पर्यावरण, नैतिकता व कृषि के प्रति पूरकता तथा स्वावलम्बन व विकेन्द्रित अर्थतन्त्र का पुरस्कार करने वाले उद्योग तंत्र को मानती है. कौशल विकास तथा उत्पादन में वृद्धि पर उसका जोर रहता है. देश के सबसे अंतिम व्यक्ति की अभाव, अशिक्षा व अपमान से मुक्ति तथा ऐसे वर्ग का विकास इस अपनी दृष्टि में राष्ट्रीय विकास का आधार व विकास का प्रमाण माना जाता है. इसके लिए कृषि व किसान, लघु, मध्यम व कुटीर उद्योग; छोटे व्यापारी व कारीगर इनका अधिक ध्यान रखना पड़ेगा. आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले सभी संगठनों, चिन्तकों कार्यकर्ताओं को, नीतिकारों को, शासन, प्रशासन सभी को यह दिशा ध्यान में रखना आवश्यक है.
आनन्द की बात है कि नीति आयोग के घोषणापत्र में इस दिशा के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं. स्पष्ट है कि यह परिवर्तन एकदम नहीं होगा. विरासत में मिली आर्थिक स्थिति के तल से सामान्य धरातल पर आना, अनेक राजनीतिक संतुलनों को तथा प्रशासकीय अनिवार्यताओं को साधने-पाटने की कसरत कर, देश के सामान्य वर्गों तक विकास का अनुभव पहुंचाना तथा उनका भी सहभाग प्राप्त करते हुए सबके विश्वास की स्थिरता व वृद्धि होती रहे यह देखना, धैर्यपूर्वक परिणामों की प्रतीक्षा करना यह सभी को करना पड़ता है. मुद्रा बैंक, जन-धन योजना, गैस सब्सिडी को छोड़ देने का आह्वान, स्वच्छ भारत अभियान, कौशल विकास, ऐसी कुछ उपयोगी पहल इस दृष्टि से सरकार के द्वारा की गयी हैं. विकास नीतियों के जमीन पर दिखने वाले परिणामों की यथातथ्य जानकारी मिलना तथा विकास में सभी को सहभागी बनाने की दृष्टि से सार्थक संवाद व क्रियान्वयन की गति को बढ़ाने की आवश्यकता लगती है.
देश के भाग्य परिवर्तन में सब प्रकार की नीतियों की सफलता सम्पूर्ण समाज के उद्यम, सहयोग क्षमता तथा समझदारी पर निर्भर करती है. समाज का प्रबोधन व प्रशिक्षण उसके लिए अनिवार्य शर्त है. आजकल विकास का विचार करते समय देश की जनसंख्या भी एक विचार का विषय बनता है. हमारे देश की जनसंख्या नियंत्रण नीति विचारपूर्वक बनानी पड़ेगी. जनसंख्या बोझ है या साधन है? दोनों प्रकार से विचार कर देखना चाहिए. 50 वर्षों के पश्चात् हमारे देश के संसाधन तथा व्यवस्थाएं कितने लोगों को पोषण रोजगार व जीवन विषयक अवसर तथा सुविधाएं दे सकेंगे? 50 वर्षों के पश्चात् हमारे देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए कितने हाथों की आवश्यकता रहेगी? सन्तान वृद्धि का कष्ट व उनके मन संस्कारित करने का कार्य माताओं को करना पड़ता है.
उनका पोषण, स्वास्थ्यरक्षण, मानमर्यादा का संरक्षण, उनका सशक्तिकरण, उनका प्रबोधन, उनके लिए अवसर तथा उसका लाभ ले सकने की स्वतंत्रता इन सबकी कैसी व्यवस्था है, वह कैसी होनी पड़ेगी? 50 वर्ष के बाद हमारे देश की पर्यावरण स्थिति की हमारी कल्पना क्या है? पिछले दो जनगणनाओं के आंकड़े प्रसिद्ध होने के पश्चात् जनसंख्या का स्वरूप व उसमें उत्पन्न हुआ, असंतुलन आदि की भी पर्याप्त चर्चा हो रही है. देश के वर्तमान तथा भविष्य पर उसके भी परिणाम होते हैं, हो रहे हैं. वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर इन सब बातों का समग्र विचार कर संपूर्ण देश की प्रजा के लिए समान जनसंख्या नीति बनाने की आवश्यकता है. वह नीति मात्र शासन तथा कानून के बल से लागू नहीं होती. उसके स्वीकार करने के लिए समाज का मन बनाने के प्रयास भी पर्याप्त मात्रा में करने पड़ते हैं. उनका भी विचार नीति बनाते समय ही कर लेना उचित रहेगा. मनुष्य की सहज प्रवृत्तियां, पंथ-संप्रदायों की आचरण परम्पराएं, समाज में चलती आई सांस्कृतिक परम्पराएं ये ऐसे विषय हैं, जिनमें, यदि देश काल परिस्थिति के अनुसार आवश्यक व उचित हो तो भी, वैसा परिवर्तन केवल कानून के परिवर्तन से, अथवा उसके पीछे खड़े किये शासन के दण्ड के बलमात्र से न कभी हुआ है, न कभी होगा. ऐसे परिवर्तनों के पहले व बाद में भी, समाज प्रबोधन द्वारा मन बनाने का सौहार्दपूर्ण प्रयास शासन, प्रशासन, माध्यम, तथा समाज के धुरीण व सज्जनों को सतत् करना पड़ता है. सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ लेने के मोह से दूर रहते हुए, सत्य के ही दिग्दर्शन में, समाज के सभी वर्गों के प्रति आत्मीयतापूर्ण भाव रखकर ही, समाज का मन प्रबोधन के द्वारा बदला जा सकता है. हाल ही के दिनों में ऐसे कुछ निर्णय आये, जिससे संबंधित वर्गों में जो वेदना के भाव उभरे उनसे बचा जा सकता था.
उदाहरण के लिए जैन मतानुयायी वर्ग में संथारा, दिगंबर आचार्यों का विशिष्ट जीवनक्रम, बालदीक्षा आदि पद्धतियां पुराने समय से चली आ रही हैं. उन परम्पराओं के कारण, महत्व, तथा उनके पीछे का चिन्तन आदि को, पंथ-सम्प्रदायों के आचार्यों के साथ चर्चा कर गहराई के साथ समझे बिना उनसे छेड़छाड़ का परिणाम समाज के स्वास्थ्य, सौहार्द व अंततोगत्वा देश के लिए घातक होगा. प्रत्येक पंथसम्प्रदाय अपनी मान्यताओं एवं परम्पराओं का समय पर विश्लेषण कर, देश-काल-परिस्थिति के अनुसार उनमें बदल कर, मूल्यों के कालसुसंगत आचरण का रूप खड़ा करता जाता है, यह भी हमारे देश की ही परंपरा है. उसके अनुसार परम्पराओं का पुनर्विचार व परिवर्तन भी होना अच्छा है. परन्तु यह कार्य उस समूह के अंदर से ही हर बार किया गया है, बाहर से थोपने का प्रयास केवल विवादों को ही जन्म देता आ रहा है. कोई भी व्यवस्था परिवर्तन समाजमन परिवर्तन के बलपर ही यशस्वी हुआ है.
परिवर्तन के लिए समाज में एक महत्वपूर्ण साधन होता है शिक्षा की व्यवस्था. हाल के वर्षों में वह व्यापार का साधन बनती जा रही है. इसीलिए वह महंगी होकर सर्वसामान्य व्यक्ति की पहुंच के बाहर भी होती जा रही है. स्वाभाविक ही शिक्षा के उद्देश्य पूरे होते हुए समाज में दिखाई नहीं दे रहे हैं. शिक्षा का उद्देश्य विद्या दान के साथ-साथ, विवेक, आत्मभान व आत्मगौरव से परिपूर्ण, संवेदनशील, सक्षम, सुसंस्कृत मनुष्य  का निर्माण यह होना चाहिए. इस दृष्टि से समग्रता के साथ शिक्षापद्धति के अनेक प्रयोग विश्व में व देश में भी
चल रहे हैं. उन सारे प्रयोगों का ठीक से संज्ञान लेना चाहिए. उनके निष्कर्ष व अब तक शिक्षा के बारे में अनेक तज्ञों, संगठनों तथा आयोगों के द्वारा दिये गये उपयुक्त सुझावों का अध्ययन कर, पाठ्यक्रमों से लेकर शिक्षा संचालन, शुल्क व्यवस्था आदि शिक्षा पद्धति के सब अंगों तक में कुछ मूलभूत परिवर्तन लाने का विचार करना होगा. शिक्षा समाजाधारित होनी चाहिए. शिक्षा की दिशा उसके उद्देश्य व आज के समय की आवश्यकता दोनों की पूर्ति करने वाली हो, इतनी परिधि में पद्धति की स्वतन्त्रता भी देनी चाहिए. शिक्षा व्यापारीकृत न हो, इसलिए शासन को भी सभी स्तरों पर शिक्षा संस्थान अच्छी तरह चलाने चाहिए. सारी प्रक्रिया का प्रारम्भ शिक्षकों के स्तर की तथा उनमें दायित्वबोध की चिन्ता, उनके परिणामकारक प्रशिक्षण तथा मानकीकरण के द्वारा करने से होना पड़ेगा. परन्तु इन सबके साथ-साथ हम अभिभावकों, यानी समाज का भी दायित्व, इस प्रक्रिया में बहुत महत्व रखता है. क्या हम अपने घर के बालकों को अपने उदाहरण से व संवाद से यह सिखाते हैं कि जीवन में सफलता के साथ, किंबहुना उससे अधिक, महत्व सार्थकता का है? क्या हम अपने आचरण से सत्य, न्याय, करुणा, त्याग, संयम, सदाचार आदि का महत्व नई पीढ़ी के मन में उतारने में सफल हो रहे हैं? क्या हमारी पीढ़ी इस प्रकार के व्यवहार का आचरण हमारे सामाजिक व व्यावसायिक क्रियाकलापों में छोटे-मोटे लाभ-हानि की परवाह किये बिना आग्रहपूर्वक व सजगता के साथ कर रही है? हमारे करने, बोलने, लिखने से समाज विशेषकर नई पीढ़ी एकात्मता, समरसता व नैतिकता की ओर बढ़ रही है या नहीं इसका भान हम- समाज का प्रबोधन करने वाला नेतृवर्ग तथा माध्यम-रख रहे हैं क्या?
राज्यव्यवस्था, अर्थव्यवस्था आदि व्यवस्थाएं मनुष्यों के आचरण को नियंत्रित करती हैं, ”यथा राजा तथा प्रजा“; यह सत्य का एक पहलू है. इसलिए नीतियां समाज को जोड़ने वाली, दुर्बलतम घटक की उन्नति की चिन्ता करते हुए समाज के सभी घटकों की उन्नति का समन्वय साधने वाली होनी ही चाहिए. अपने देश का चुनाव तंत्र, प्रशासन, कर व्यवस्था, उद्योग नीति, शिक्षा नीति, कृषिनीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं आदि में अनेक मूलभूत सुधार कर उनको अधिक व्यवस्थित व लोकोपयोगी बनाने की आवश्यकता है, यह बात सही है.
पाकिस्तान की शत्रुता बुद्धि, चीन का विस्तारवाद, विश्व में बढ़ती हुई कट्टरता व अहंकार तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की शतरंज में चली गई कूटनीतिक कुचालों के कारण उत्पन्न हुआ आतंकवादी ISIS का संकट, इन सबके परिणामस्वरुप अपने देश के सामने पहले से खड़ी सीमा सुरक्षा की व अतंर्गत सुरक्षा की समस्या और जटिल व गंभीर बनती जा रही है. बाहरी सत्ता से समर्थित अथवा बाहरी विचार से प्रेरित आतंकवाद के कारण गुमराह होकर उस गलत राह पर अग्रसर होने वाले कुछ लोग अपने देश में भी मिल जाते है.
हमारे विविधतापूर्ण समाज को संगठित कर सकने वाला सूत्र कौन सा है? (1) निश्चित ही वह, सब विविधताओं का स्वीकार व सम्मान करने वाली हमारी सनातन संस्कृति-हिन्दू संस्कृति है. वही सब भारतीयों का स्वभाव, उनकी मूल्य परंपरा है. (2) उस संस्कृति के आचरण को ही जिन हमारे पूर्वज महापुरुषों ने अपना जीवन बनाया, उसके पोषण संवर्धन के लिए अथक परिश्रम किया, उसकी सुरक्षा प्रतिष्ठा के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया, उनका गौरव हमारे लिए आज भी प्रेरणा व आदर्श बना हुआ है. (3) जिस सुजल-सुफल चैतन्यमयी मातृभूमि में हमें उस संस्कृति के आधारभूत सत्य का तथा तद्भूत धर्म का साक्षात्कार हुआ, जिसकी दिव्य समृद्धि व पोषण ने हमें उदारचेता व सत्प्रवृत्त बनाया, उसकी प्रेमभक्ति उन पूर्वजों से ही विरासत में हमें मिली. वह आज भी देश के प्रत्येक व्यक्ति के पुरुषार्थ जागृति का सामर्थ्य रखती है. इन तीनों सूत्रों से अपनी भाषा, प्रान्त, पंथ, पक्ष आदि की विविधता को सुरक्षित रखकर भी व्यक्ति सहज ही मनःपूर्वक जुड़ता है. अपनी छोटी पहचान सुरक्षित रखकर समाज की विशाल पहचान का अंग बन जाता है. इन तीनों सूत्रों के आधार पर विकसित मानवतापूर्ण पुरुषार्थ, दृष्टि, चिन्तन व तदनुरूप निर्णय, अविरोधी आचरण को ही हम हिन्दुत्व कहते हैं. ऐसे इस हिन्दू समाज का जीवन सनातन समय से – ”हिन्दू“ शब्द के उत्पन्न होने के बहुत पहले से – इसी त्रिसूत्री के आधार पर समयानुकूल रूपों को धारण करते चलता आया है. इस देश के हिताहित का दायित्व केवल और केवल उसका है. इस अपने हिन्दुस्थान देश का भाग्य और भवितव्य, हिंदू समाज के साथ एकरूप है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 90 वर्षों से देश के भाग्यविधाता हिन्दूसमाज को, देश के लिए उद्यम करने योग्य बनाने का अविरत प्रयत्न कर रहा है. संघ निर्माता डॉ. हेडगेवार जी ने यह अच्छी तरह समझ लिया था, कि देशहित, राष्ट्रहित, समाजहित के काम किसी को भी ठेके पर नहीं दिए जा सकते. समाज को ही संगठित व योग्य बनकर दीर्घकाल उद्यम करना पड़ता है, तब देश वैभव सम्पन्न बनता है. समाज की यह तैयारी कराने वाले कार्यकर्ताओं को गढ़ने का कार्य ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. संघ की सरल साद्गीपूर्ण कार्यपद्धति से तैयार होकर निकले स्वयंसेवकों का कर्तृत्व आज सबके सामने है, वे आज समाज के स्नेह विश्वास के कृतज्ञ भागी हैं, भारत के लिए जगन्मान्यता भी प्राप्त कर रहे हैं. आईये, हम सब इस पवित्र कार्य के सहयोगी कार्यकर्ता स्वयंसेवक बनें. क्योंकि दुनिया को आवश्यक प्रतीत होती हुई नई राह देने वाला भारत बनाने का एकमात्र पथ यही है. भारतीय समाज को अपनी सनातन पहचान के आधार पर दोषरहित व संगठित होना ही पड़ेगा. निःशंक, निर्भय होकर सब प्रकार के भेदों को समाप्त करने वाले व मनुष्य मात्र को वास्तविक स्वतंत्रता देकर उसमें मानवता व बंधुभाव भरने वाले धर्ममूल्यों के अमृत से सिंचित अपने व्यक्तिगत तथा सामूहिक आचरण से मानव समाज को सुख शांति व मुक्ति देनी होगी. यही उपाय है, यही करना है.
हिन्दू हिन्दू एक रहें, भेदभाव को नहीं सहें, संघर्षों से दुःखी जगत को, मानवता की शिक्षा दें..
”भारत माता की जय“