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Thursday, June 25, 2026

आपातकाल – इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने लोकतंत्र को जकड़ा, संविधान को कुचला…!!

भारतीय लोकतंत्र में ऐसा भी कुछ हो सकता है, किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। कैसे एक लोकतांत्रिक देश की संसद में कोई दल और नेता अपनी मजबूती और महत्वाकांक्षा का दुरुपयोग कर देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान को तहस-नहस कर सकता है।

25 जून 1975, इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया। यह भारत की आजादी के बाद के इतिहास का सबसे काला कालखंड है। भारत का लोकतंत्र सिहर उठा था क्योंकि संविधान को कुचला गया, अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया गया और लोकतंत्र को जंजीरों में जकड़ा गया था। आधी रात को रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी।

इंदिरा गांधी ने सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए 25 जून की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत से अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति के नाम पर पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया।

इसके बाद विपक्ष के तमाम नेताओं को गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया गया और लोगों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। देश भर में प्रेस सेंसरशिप लगा दी गई और संविधान को अपने हिसाब से बदलने की पूरी कोशिश की गई थी। आपातकाल की घोषणा के साथ ही विरोधी दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थानों पर जेल में बंद कर दिया गया था। सरकार ने मीसा यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट और डिफेंस ऑफ इंडिया रूल यानी डीआईआर के तहत नेताओं को बंदी बनाया था। विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, जयप्रकाश नारायण को जेल भेज दिया गया। कांग्रेस कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य चंद्रशेखर को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था।

ऐसा कानून बनाया गया, जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत मांगने का भी अधिकार नहीं था। नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना उनके रिश्तेदारों, मित्रों और सहयोगियों तक को नहीं दी गई थी। जेल में बंद नेताओं को किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थी और उनकी डाक तक सेंसर किया जाता था। उनसे मुलाकात के दौरान खुफिया अधिकारी मौजूद रहते थे। आपातकाल की शुरुआत में ही संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर दिया गया था। ऐसा करके सरकार ने कानून की नजर में सबकी बराबरी, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को रोक दिया था। अनुच्छेद 19 को भी निलंबित करके अभिव्यक्ति की आजादी, प्रकाशन, संघ बनाने और सभा करने की आजादी को भी छीन लिया गया था।

आपातकाल लगाए जाने के साथ ही अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई थी। अखबारों और समाचार एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नया कानून बनाया था। सरकार ने चारों समाचार एजेंसियों पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती को खत्म कर एक नई समाचार एजेंसी बना दी थी। इसके साथ ही प्रेस के लिए आचार संहिता की घोषणा कर दी गई और कई संपादकों को सरकार विरोधी लिखने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था।

आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ को जब्त कर लिया गया और किशोर कुमार जैसे गायकों को काली सूची में डाल दिया गया था। आंधी फिल्म पर पाबंदी लगा दी गई थी। पुलिस अत्याचार और दमन आम बात थी। आपातकाल के सबसे बुरे प्रभावों में से एक परिवार नियोजन था। नसबंदी के लिए अध्यापकों और छोटे कर्मचारियों पर सख्ती की जाती थी और लोगों का जबरदस्ती परिवार नियोजन किया जा रहा था।

दरअसल, 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से निर्वाचित हुई थीं। इंदिरा गांधी ने राज नारायण को पराजित किया था। चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप में राज नारायण ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द करते हुए अगले 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और 24 जून को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन रद्द करने के फैसले को सही ठहराया, लेकिन इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दे दी थी। इंदिरा गांधी लोकसभा में जा सकती थी, लेकिन वहां वोट नहीं कर सकती थी। दूसरी तरफ उस वक्त देश भर में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर इंदिरा गांधी के खिलाफ लोगों में काफी नाराजगी थी, पूरा विपक्ष इंदिरा गांधी से इस्तीफा मांग रहा था।

इस घटनाक्रम के मध्य इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बने रहने की उम्मीद को खत्म कर दिया था। इंदिरा गांधी सत्ता में बने रहने के लिए पूरे देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया जो भारतीय लोकतंत्र का सबसे बदनुमा धब्बा है। आपातकाल 25 जून की आधी रात से 21 मार्च 1977 तक जारी रहा। 21 महीने तक चलने वाला आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में सत्तारूढ़ सरकार की तानाशाही का इतिहास है।

संविधान का 42वां संशोधन

आपातकाल के दौरान संविधान संशोधन भारतीय राजनीतिक इतिहास का सबसे विवादास्पद संविधान संशोधन है। इस दौरान संविधान का 42वां संशोधन किया गया, जिसके जरिए संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करने, संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुंचाने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश की गई थी। 42वां संविधान संशोधन (1976) भारतीय लोकतंत्र और संविधान के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय है। आपातकाल की आड़ में किए गए इस संशोधन के जरिए सत्ता का केंद्रीकरण किया गया, न्यायपालिका की समीक्षा शक्तियों को सीमित कर कार्यपालिका को असीमित अधिकार दिए गए, राज्यों के अधिकारों में कटौती कर संघीय ढांचे को कमजोर किया गया। इस संशोधन को व्यापक बदलावों के कारण ‘मिनी-संविधान’ भी कहा जाता है। 42वां संविधान संशोधन के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति को काफी कम कर दिया गया और संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति दे दी गई और न्यायिक जांच से बाहर कर दिया गया। राज्य सरकारों के अधिकार कम किए गए और ‘शिक्षा’, ‘वन’ जैसे महत्वपूर्ण विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया। मौलिक अधिकारों का हनन करते हुए राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों पर वरीयता दी गई।

आपातकाल के दौर में कई संविधान संशोधन

आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में कई संविधान संशोधन किए थे। जुलाई 1975 में 38वें संविधान संशोधन के जरिए न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया था। इसके 2 महीने बाद ही 39वें संविधान संशोधन के जरिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया था। 40वें और 41वें संशोधन के जरिए संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संविधान संशोधन किया गया। 42वें संशोधन के जरिए एक प्रकार से पूरे संविधान का पुनरीक्षण किया गया और संविधान में बहुत से मूलभूत बदलाव कर दिए गए थे। 42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना था। इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा सकता था। इस संशोधन ने न्यायपालिका को पूरी तरह से बौना कर दिया था। दूसरी तरफ विधायिका को अपार शक्तियां दे दी गई थीं। इन बदलावों के कारण तब के केंद्र सरकार को यह भी शक्ति थी कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी। इसके अलावा राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया था। 42वें संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया गया कि संसद से किए गए संविधान संशोधनों को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। लोकसभा का कार्यकाल भी 5 साल से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया था।

जनता पार्टी की सरकार ने अधिकार वापस दिलाए

1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की आवश्यकता महसूस करते हुए 44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के जरिए आपातकालीन प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की गई। हालांकि इससे पहले ही 43वें संविधान संशोधन के जरिए सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय को उनके अधिकार वापस दिया गया था। 44वें संशोधन से 42वें संशोधन के जरिए संविधान में किए गए बदलावों को रद्द करते हुए संविधान को फिर से अपने मूल रूप में वापस लाया गया था। हालांकि संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर वैधानिक अधिकार बना दिया गया। 44वें संशोधन ने संविधान में कई ऐसे बदलाव किए, जिससे 1975 के आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न ना हो सके।

आंतरिक अशांति शब्द हटाया गया

पहले अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगाने के लिए युद्ध बाहरी आक्रमण या आंतरिक अशांति जैसी परिस्थितियों का होना जरूरी था, लेकिन 44वें संशोधन में अनुच्छेद 352 में से आंतरिक अशांति शब्द हटा दिया गया और इसकी जगह सशस्त्र विद्रोह शब्द जोड़ा गया। अब इस प्रकार का आपातकाल युद्ध बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह या इस प्रकार की आशंका होने पर ही घोषित किया जा सकेगा। सिर्फ आंतरिक अशांति के नाम पर आपातकाल घोषित नहीं किया जा सकता है। वर्तमान में भी यही व्यवस्था कायम है।

42वें संशोधन के जरिए आपातकाल की घोषणा को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया गया था। लेकिन 44वें संशोधन से यह बंधन हटा लिया गया। अब आपातकाल लगाने के सरकार के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। यह भी व्यवस्था की गई कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा करेंगे, जबकि मंत्रिमंडल लिखित रूप में राष्ट्रपति को ऐसा परामर्श दे। आपातकाल की घोषणा के एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से इसके लिए मंजूरी लेना जरूरी बनाया गया है। इसे लागू रखने के लिए हर 6 महीने के बाद संसद से मंजूरी आवश्यक है। लोकसभा के कार्यकाल को दोबारा 5 साल कर दिया गया।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने अनुच्छेद 368 में भी बदलाव कर दिया था, जिससे कि संविधान में किए गए बदलाव की न्यायिक समीक्षा न की जा सके। आपातकाल के दौरान किए गए 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान के लगभग 53 अनुच्छेदों और 14 नए अनुच्छेदों को जोड़ा या संशोधित किया गया। यह एक प्रकार से संविधान का पुनरीक्षण था। हालांकि बाद में सरकार ने संविधान संशोधन के जरिए संविधान में जो बिगड़ा हुआ था, उसे सुधारने की भरपूर कोशिश की थी।

बंगाल का “वंदे मातरम् क्षण”


- डॉ. मनमोहन वैद्य

अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने पूरे देश को अचंभित और आनंदित किया है।

दिसंबर 2025 और फरवरी 2026 में मुझे बंगाल जाने का अवसर मिला था। वहाँ अधिकांश लोग परिवर्तन की इच्छा तो रखते थे, किंतु यह परिवर्तन वास्तव में संभव हो सकेगा, ऐसा विश्वास बहुत कम लोगों को था। परिस्थितियाँ भी ऐसी थीं कि परिवर्तन किसी चमत्कार से कम नहीं लगता था। निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान के लिए आवश्यक खुला तथा निर्भय वातावरण तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती थी। परंतु चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय, केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा सुरक्षा बलों के संयुक्त प्रयासों से यह संभव हो पाया।

बंगाल की जनता ने इस बार बढ़-चढ़कर मतदान किया। पिछले पाँच चुनावों 2001, 2006, 2011, 2016 और 2021 में मतदान का औसत 79.22% था, जबकि 2026 में यह बढ़कर 92.47% हो गया। लगभग 13 प्रतिशत अंकों की इस वृद्धि में SIR का योगदान नकारा नहीं जा सकता। परंतु इसके साथ ही यह वृद्धि निर्भय माहौल और जनता के अभूतपूर्व उत्साह को भी दर्शाती है। इस चुनाव को समाज द्वारा एक सभ्यतागत संघर्ष के रूप में देखना, सुरक्षा बलों द्वारा अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करना और लोगों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग के प्रति आश्वस्त करना, इन कारणों को भी नकारा नहीं जा सकता।

फरवरी 2026 में कोलकाता में एक वरिष्ठ महिला पत्रकार से भेंट हुई थी, जो पूर्णतः वामपंथी विचारधारा की हैं। 29 मई को उनसे फिर बात हुई। उन्होंने बताया कि जब वे 18 वर्ष की थीं, तब उन्होंने पहली बार मतदान किया था और उसके बाद अब 2026 में उन्होंने फिर से मतदान किया। वे इस समय 46 वर्ष की हैं। परिवर्तन की तीव्र इच्छा और यह विश्वास कि परिवर्तन संभव है, उनके मतदान के प्रमुख प्रेरक बने। बंगाल में चुनावों के दौरान हिंसा का इतिहास रहा है। ऐसे में इस बार का चुनाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। इसका श्रेय भी केंद्रीय गृह मंत्रालय को दिया जा सकता है। यही कारण है कि लोग निर्भय होकर घरों से बाहर निकले और मतदान किया।

इस चुनाव में केवल भाजपा की जीत नहीं हुई है। बंगाल की जनता ने भारत की आध्यात्मिक परंपरा और हिन्दुत्व के विचार की विजय सुनिश्चित की है। ऐसा प्रतीत होता है कि बंगाल की आत्मा पुनः जागृत हुई है। यह रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जगदीशचंद्र बसु और बिपिनचंद्र पाल जैसे आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूत महापुरुषों के बंगाल की आत्मा की विजय है।

यह क्षण मुझे 1905 में ब्रिटिश शासन द्वारा प्रस्तावित बंगाल-विभाजन के विरोध की याद दिलाता है। उस समय बंकिमचंद्र के ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के साथ बंगाल में अदम्य ऊर्जा, अभूतपूर्व एकता और राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ था। उस जागृति का विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि उसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश शासन को 1911 में बंगाल-विभाजन का प्रस्ताव निरस्त करना पड़ा। इतना ही नहीं, ब्रिटिश शासन को अपनी राजधानी भी 1911 में कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करनी पड़ी। इस दृष्टि से देखा जाए, तो बंगाल के इस 2026 के चुनाव में भारत की आध्यात्मिक परंपरा और हिन्दुत्व के विचार की विजय को बंगाल का “वंदे मातरम् क्षण” कहा जा सकता है।

वंदे मातरम्’ गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ के लिए लिखा था। 1896 में इसे पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गाया था। इसके बाद 1905 में अंग्रेजों द्वारा प्रस्तावित बंगाल-विभाजन के विरोध में बंगाल की जनता ने “वंदे मातरम्” को स्वतंत्रता आंदोलन का युद्धमंत्र बना लिया। बंगाल-विभाजन के प्रस्ताव के विरोध में पूरा भारत खड़ा हो गया था। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिनचंद्र पाल- लाल, बाल, पाल- को सबने अपना नेता मान लिया था। ‘वंदे मातरम्’ का गान होते ही लोगों के भीतर अदम्य ऊर्जा और राष्ट्रीय चेतना का संचार हो जाता था। अनेक क्रांतिकारियों ने ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के साथ फाँसी का फंदा चूमते हुए हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर किए।

ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तावित बंगाल-विभाजन के विरोध में ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। 16 अक्तूबर 1905, रविवार को कोलकाता में मनाया गया रक्षाबंधन उत्सव ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण था। सामान्यतः रक्षाबंधन का पर्व श्रावण पूर्णिमा, अर्थात् अगस्त महीने में आता है। परंतु बंगाल-विभाजन के विरोध में 16 अक्तूबर को कोलकाता के हिन्दू और मुस्लिम महिला-पुरुषों ने गंगाजी में स्नान किया, एक-दूसरे को राखी बाँधी और यह संकल्प लिया कि इस रेशमी धागे की तरह हम बंगाल को एक सूत्र में बाँधकर एकजुट रखेंगे और बंगाल का बँटवारा नहीं होने देंगे।

तब श्री अरविंद घोष ने पहली बार ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता का मंत्र कहा। राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए श्री अरविंद घोष ‘वंदे मातरम्’ नाम से साप्ताहिक पत्रिका निकालते थे। 1907 में जर्मनी में मैडम भीकाजी कामा ने स्वतंत्र भारत का जो ध्वज फहराया था, उस पर ‘वंदे मातरम्’ लिखा हुआ था। तब से ‘वंदे मातरम्’ स्वाधीनता का मंत्र-गान, देशभक्ति का स्फूर्ति-गीत और क्रांतिकारियों का चेतना-मंत्र बन गया।

वंदे मातरम्’ से प्रज्ज्वलित क्रांति की ज्वाला से भयभीत होकर ब्रिटिश सरकार ने अप्रैल 1906 में इसके सार्वजनिक गायन पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु इस दमन के विरोध में बंगाल में अदम्य उत्साह और ऊर्जा का संचार हुआ और अंततः ब्रिटिश शासन को बंगाल-विभाजन का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

यह ऊर्जा और उत्साह केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहा। इस जागृति की ज्वाला संपूर्ण भारत में फैल गई। नागपुर में संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार ने, जब वे दसवीं कक्षा के छात्र थे, ‘वंदे मातरम्’ का सार्वजनिक उद्घोष कर विद्यालय प्रशासन का रोष सहन किया। इसके कारण उन्हें विद्यालय से निष्कासित भी किया गया।

तब से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्येक वार्षिक अधिवेशन में पूर्ण ‘वंदे मातरम्’ का गान होता रहा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरला देवी चौधरानी, पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर और ओंकारनाथ ठाकुर जैसे मूर्धन्य गायकों ने इसे स्वर दिया। कांग्रेस के सभी सदस्य, चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम, इसे स्वतंत्रता आंदोलन के प्राण-मंत्र के रूप में गाते रहे। किंतु 1921 के बाद ब्रिटेन की विभाजनकारी राजनीति के प्रभाव से कांग्रेस के भीतर सांप्रदायिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा। इसके परिणामस्वरूप तुर्की के खिलाफत आंदोलन का समर्थन तथा ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिक बताकर उसका विरोध करने जैसी प्रवृत्तियाँ उभरने लगीं। जो गीत 1920 तक स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण-मंत्र माना जाता था, वही 1923 के बाद सांप्रदायिक कहा जाने लगा। यहीं से भारत-विभाजन के बीज बोए जाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

भारतीय चिंतन में मनुष्य को केवल शरीर के रूप में नहीं, बल्कि शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा से युक्त पंचकोषात्मक सत्ता के रूप में देखा गया है। इसी प्रकार ‘वंदे मातरम्’ में भारत का समग्र स्वरूप प्रस्तुत होता है। इसके प्रथम पद में भारतभूमि का वर्णन है, द्वितीय पद में भारत के जन, अर्थात् लोक का चित्रण है, जबकि बाद के पदों में भारत के मन, बुद्धि, प्राण और आध्यात्मिक चेतना का निरूपण मिलता है।

तुमि विद्या, तुमि धर्म” – यहाँ “विद्या” भारत की अध्यात्म-विद्या है, जो मोक्ष का मार्ग सिखाती है। ‘मैं’ को छोटा कर ‘हम’ की भावना को बड़ा करना तथा अपनेपन के भाव से समाज को देना, समाज को लौटाना-यही ‘धर्म’ है; यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ ‘रिलिजन’ नहीं है। भगिनी निवेदिता ने कहा है कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक केवल अपने पास न रखकर समाज को देते हैं, उस समाज के पास एकत्रित सामाजिक पूँजी के बल पर संपूर्ण समाज संपन्न और समृद्ध बनता है, तथा समाज का प्रत्येक व्यक्ति भी संपन्न और समृद्ध बनता है। यही “धर्म” है। इसलिए एक अर्थ में समाज की इस सामाजिक पूँजी को समृद्ध करना ही “धर्म” है। इसीलिए स्वतंत्रता के बाद भारत के नेतृत्व ने विचारपूर्वक लोकसभा के लिए “धर्मचक्र प्रवर्तनाय”, राज्यसभा के लिए “सत्यम् वद, धर्मं चर”, सर्वोच्च न्यायालय के लिए “यतो धर्मस्ततो जयः” और राष्ट्रध्वज में धर्मचक्र का समावेश किया। यह विद्या और धर्म भारतमाता के हृदय में हैं; यही भारत का प्राण है।

यह भारतमाता शक्ति की देवी दुर्गा, समृद्धि की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती-तीनों का एकत्र रूप है। यही भारत है। इसी कारण 1905 से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में संपूर्ण ‘वंदे मातरम्’ का गान होता रहा। इसे गाने में लगभग तीन मिनट का समय लगता है। इसमें सांप्रदायिकता कहाँ है?

बाद में विभाजनकारी और सांप्रदायिक तत्वों के प्रभाव में आकर इसके विरोध का क्रम शुरू हुआ, जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। इसमें सांप्रदायिकता देखने वाले भारत की आध्यात्मिक धरोहर और परंपरा के बारे में अपना अज्ञान ही प्रदर्शित करते हैं। अथवा ऐसा प्रतीत होता है कि वे तब ब्रिटिश शासन के और आज भारत-विरोधी विभाजनकारी तत्वों के प्रभाव में हैं, या उनके हाथों में खेल रहे हैं।

किंतु ‘वंदे मातरम्’ ने भारत के प्राणों को झकझोरा, राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और जन-जन में स्वाधीनता का भाव प्रज्ज्वलित किया। यही कारण था कि बंगाल-विभाजन के विरुद्ध इतना व्यापक जनक्षोभ उत्पन्न हुआ कि अंततः ब्रिटिश शासन को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। अभी भारत सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को प्राथमिकता देकर संपूर्ण ‘वंदे मातरम्’ के गान का आग्रह किया है, यह समुचित और सराहनीय है।

2026 के बंगाल चुनाव के परिणामों ने 1905 से 1911 के बीच बंगाल में हुई जन-जागृति, संकल्प, राष्ट्रीय चेतना और निर्णायक सक्रियता की याद ताजा कर दी है। बंगाल को भाषिक अस्मिता के आधार पर अलग करने के षड्यंत्र इस चुनाव ने ध्वस्त कर दिए हैं। बंगाली भाषा अलग होते हुए भी उसकी अस्मिता भारत की आध्यात्मिक अस्मिता से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा है – यह इस चुनाव के परिणामों ने सिद्ध किया है।

1905 में जिस तरह ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियाँ और जिहादी कट्टरपंथी भारत की राष्ट्रीय पहचान को नष्ट करने के लिए एक साथ मिलकर काम कर रहे थे, उसी तरह 2026 में विचारहीन राजनेता, जिहादी कट्टरपंथी और कल्चरल मार्क्सवादी बंगाल के भारत के साथ संबंधों को समाप्त करने के लिए मिलकर काम कर रहे थे। 1905 और 2026 – दोनों ही समय बंगाल के हिन्दुओं को अपने अस्तित्व पर आए संकट का सामना करना पड़ा है। प्रतीत होता है कि रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बंगाल की अस्मिता पुनः जागृत हो उठी है। भारत का सर्वसमावेशी, एकात्म और आध्यात्मिक जीवन-दर्शन-अर्थात् भारत का हिन्दुत्व – एक बार फिर मुखर होकर सामने आया है।

इस परिणाम को संभव बनाने वाले शासन और प्रशासन के सभी अधिकारियों तथा निर्भय होकर अभूतपूर्व संख्या में मतदान करने का साहस और संकल्प प्रदर्शित करने वाले बंगाल के समस्त महिला-पुरुष नागरिकों का मनःपूर्वक अभिनंदन है। उनकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और परिवर्तन की आकांक्षा ने इस ऐतिहासिक परिणाम को संभव बनाया है। निःसंदेह, यह बंगाल का “वंदे मातरम् क्षण” है।

 

Saturday, June 13, 2026

विज्ञान भारती : मानव कल्याण और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बने वैज्ञानिक नवाचार – योगी आदित्यनाथ जी


वाराणसी, 13 जून, 2026 विज्ञान भारती (विभा) के 7वें राष्ट्रीय अधिवेशन का शुभारम्भ शनिवार को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में हुआ। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वैदिक विज्ञान केन्द्र, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू) तथा अंतर-विश्वविद्यालय शिक्षक शिक्षा केन्द्र के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दो दिवसीय अधिवेशन में भारत तथा विदेशों से 1,300 से अधिक वैज्ञानिक, शोधकर्ता, शिक्षाविद, नीति-निर्माता, उद्योग जगत के प्रतिनिधि सहभागिता कर रहे हैं।

अधिवेशन के उद्घाटन सत्र में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि अनुसंधान एवं नवाचार का उद्देश्य मानव कल्याण, आर्थिक प्रगति तथा राष्ट्रीय विकास होना चाहिए। अनुसंधान एवं नवाचार हमेशा से भारतीय सभ्यता में समाहित रहा है और इसने भारत की समृद्धि तथा वैश्विक नेतृत्व में योगदान दिया है। प्राचीन भारतीय परंपराएं, चाहे वे कृषि से जुड़ीं हो, स्वास्थ्य से संबंधित हों या भोजन से जुड़ी अन्य विधियां, वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित रही हैं। इन्होंने हमारे समाज को तो सशक्त बनाया ही है, लोगों को भी नई चेतना और प्रेरणा प्रदान की है। इसका उदाहरण हमने कोविड 19 महामारी के काल में भी देखा कि कैसे भारतीय प्राचीन ज्ञान पद्धतियों ने आम लोगों की सहायता की, जब इम्यूनिटी को मज़बूत करने के लिए भारतीय पद्धतियों को अपनाया गया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान और नवाचार के बिना कोई भी राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। युवा अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा और अनुसंधान क्षमता को राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित करें। आधुनिक विज्ञान को पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने सतत विकास, प्राकृतिक कृषि, जमीनी स्तर के नवाचार तथा उद्यमिता को बढ़ावा देने का आह्वान किया।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की स्थापना-दृष्टि विज्ञान भारती के उस उद्देश्य से गहराई से जुड़ी है, जिसके अंतर्गत आधुनिक विज्ञान और भारत की ज्ञान परम्पराओं के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने भारतीय मूल्यों पर आधारित वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता दोहराते हुए प्रतिभागियों से अधिवेशन की विभिन्न चर्चाओं में सक्रिय सहभागिता करने का आह्वान किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति और भारत की समग्र ज्ञान परम्पराओं के बीच समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि समकालीन विज्ञान ने तकनीकी उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, किन्तु पर्यावरण, स्वास्थ्य तथा समाज से जुड़ी उभरती चुनौतियों के समाधान के लिए अधिक समन्वित एवं मानव-केंद्रित दृष्टिकोण आवश्यक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा अन्य उभरती प्रौद्योगिकियों को लेकर कहा कि ऐसी प्रौद्योगिकियों को मानव कल्याण एवं पर्यावरणीय स्थिरता के हित में उपयोगी बनाना विज्ञान भारती जैसे संस्थानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। युवाओं से सामाजिक आवश्यकताओं पर आधारित अनुसंधान एवं नवाचार को आगे बढ़ाने का आह्वान करते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने तथा भारतीय भाषाओं एवं भारत की समृद्ध ज्ञान परम्पराओं के माध्यम से वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार का सुझाव दिया।

अपनी भाषाओं में भी बहुत सारा ज्ञान-विज्ञान भरा पड़ा है। संस्कृत के साथ ही अन्य भाषाओं तथा लोक भाषाओं में समाहित ज्ञान-विज्ञान में हम आधुनिक बातों को जोड़कर समाज के सामने उपयोगी रूप में प्रस्तुत करें। भारत में जीवन के हर क्षेत्र में समग्रता से विचार करते हुए मात्र मनुष्य ही नहीं, अपितु जगत और सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण हेतु एक सतत चिन्तन का अभ्यास चला है, इसलिए जीवन का कोई क्षेत्र-विषय उससे अछूता नहीं रहा।

विज्ञान भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शेखर सी. मांडे ने कहा कि विज्ञान भारती भारत की ज्ञान परम्पराओं पर आधारित समग्र दृष्टिकोण के माध्यम से वैज्ञानिक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। भारतीय परम्परा में विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म को परस्पर पूरक माना गया है। जलवायु परिवर्तन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी वैश्विक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान, नैतिकता और सभ्यतागत दृष्टिकोण के समन्वय से ही सार्थक समाधान प्राप्त किए जा सकते हैं।

विज्ञान भारती के महासचिव विवेकानन्द पई ने प्रतिनिधियों का स्वागत किया। उन्होंने विज्ञान भारती के प्रमुख विषयों- प्राचीन से आधुनिक विज्ञान, विज्ञान एवं अध्यात्म तथा भारतीय भाषाओं में विज्ञान का उल्लेख करते हुए पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के समन्वय की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि भारतीय अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव, विश्व आयुर्वेद कांग्रेस, विद्यार्थी विज्ञान मंथन तथा विभिन्न विज्ञान जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से विज्ञान भारती वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने, नवाचार को बढ़ावा देने तथा विज्ञान संचार को सुदृढ़ बनाने के लिए कार्य कर रही है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान – बीएचयू के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि अनुसंधान संस्थानों, उद्योगों, नवउद्यमों, किसानों तथा नीति-निर्माताओं को एक मंच पर लाकर नवाचार एवं उद्यमिता के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सकता है।

अंतर विश्वविद्यालय शिक्षक शिक्षा केंद्र के निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह ने अधिवेशन की थीम “कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान और मानवता” का उल्लेख करते हुए कहा कि विज्ञान का उद्देश्य केवल मशीनों को अधिक सक्षम बनाना नहीं, बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए। उन्होंने विकसित भारत के निर्माण के लिए नैतिक मूल्यों, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व तथा मानव कल्याण पर आधारित संतुलित विकास की आवश्यकता बताई।

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आशुतोष शर्मा ने कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में तीव्र प्रगति मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से प्रभावित कर रही है, किन्तु समाज का भविष्य तकनीकी उन्नति और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखने पर निर्भर करेगा। मानवीय चेतना, संवेदनशीलता और नैतिक विवेक का कोई विकल्प नहीं है। विज्ञान को केवल दक्षता और उत्पादकता ही नहीं, बल्कि अधिक संतुलित, सार्थक और जागरूक समाज के निर्माण में भी योगदान देना चाहिए।

उद्घाटन सत्र के दौरान अधिवेशन स्मारिका तथा विज्ञान भारती के वार्षिक प्रतिवेदन का विमोचन भी किया गया। इसके अतिरिक्त विद्यार्थी विज्ञान मंथन पहल के अंतर्गत भारत की प्रख्यात महिला वैज्ञानिकों प्रो. रोहिणी गोडबोले, प्रो. अन्ना मणि तथा प्रो. असीमा चटर्जी पर आधारित प्रकाशनों का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम में देश के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों एवं संस्थानों के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने सहभागिता की।




Monday, June 8, 2026

संघ के साथ मिलकर चुनौतियों का सामना करें सभी देशवासी- स्वांत रंजन जी

प्रयागराज। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन जी ने सभी देशवासियों से देश के सामने खडी चुनौतियों का मिलकर मुकाबला करने का आह्वान करते हुए कहा कि भारत को विकासशील से विकसित राष्ट्र बनाने के लिए चार बड़ी चुनौतियों से मिलकर सामना करना होगा।

वे शनिवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी प्रांत द्वारा आयोजित प्रयागराज के गौहनिया स्थित वात्सल्य परिसर में आयोजित 15 दिवसीय संघ शिक्षा वर्ग सामान्य एवं प्रांत घोष वर्ग के समापन समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने अपने उद्बोधन मे कहा कि आतंकवाद, अर्बन नक्सलवाद, मातांतरण तथा बाजारवाद समेत चार चुनौतियां देश के सामने मुंह बाये खड़ी है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए संघ के साथ पूरे समाज को मिलकर इन चुनौतियों का सामना करना होगा।

उन्होंने कहा कि 100 वर्ष से संघ हिंदू समाज को सशक्त बनाने के लिए, उसकी शक्ति खड़ी करने के लिए प्रयास कर रहा है। इसके लिए उसे उपेक्षा और उपहास का भी सामना करना पड़ा। इन स्थितियों के बाद अब समाज में संघ की स्वीकार्यता बढी है लेकिन इस स्थिति से हम अभी भी संतुष्ट नहीं है। हमें अभी आगे और परिश्रम करना है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत प्राचीन राष्ट्र है और हिंदू राष्ट्र है। हिंदू समाज ने इसकी रक्षा के लिए पसीना भी बहाया है और खून भी। आर्यों के बाहर से यहां आकर बसने की थ्योरी  पूरी तरह मनगढ़ंत है। यह एक सुनियोजित साजिश है। इससे देशवासियों को सावधान रहने की जरूरत है।

संघ पंच परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के लिए निरंतर प्रयत्नशील है। सभी देशवासी संघ के साथ जुड़कर कार्य करें जिससे भारत को विकासशील से विकसित राष्ट्र बनाया जा सके। उन्होंने आग्रह किया कि जो जहां है वहीं से इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए अपना सहयोग दें।

अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख ने कहा कि कार्यकर्ताओं का निर्माण करने के लिए देशभर में और 98 संघ शिक्षावर्ग चल रहे हैं। इसका उद्देश्य है वर्ग में तैयार होकर कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र में संघ कार्य को आगे बढ़ाएं। उन्होंने संघ शिक्षा वर्ग के विषयों की भी विस्तार से जानकारी दी और कहा कि शारीरिक, बौद्धिक कार्यक्रमों के द्वारा स्वयंसेवकों को एक प्रामाणिक कार्यकर्ता के रूप में निर्माण किया जाता है।

पिछले 100 वर्षों से संघ राष्ट्र जागरण के महत्वपूर्ण कार्य में लगा है। संघ के समर्पित स्वयंसेवक इस कार्य को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्र जागरण के इस महत्वपूर्ण कार्य में पूरे समाज को आगे बढ़कर अपना सहयोग करना होगा तभी लक्ष्य की पूर्ति हो सकेगी।

देश को परम वैभव पर ले जाना है तो सभी देशवासियों को मिलकर राष्ट्र निर्माण के इस अनुष्ठान में तन—मन—धन से लगना होगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यूनाइटेड ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन, प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ.जगदीश गुलाटी ने कहा कि संघ पूरे समाज को जोड़ने के लिए काम कर रहा है। सभी देशवासियों को संघ से जुड़ना चाहिए। सामाजिक समरसता के लिए संघ द्वारा किए जा रहे प्रयास सराहनीय है। प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके स्वयंसेवकों से आग्रह किया कि आवश्यकता पड़ने पर देश सेवा के लिए हमेशा तैयार रहें।

कार्यक्रम का प्रारंभ संघ प्रार्थना के पश्चात शिक्षार्थियों द्वारा ध्वज की मान वंदना प्रदक्षिणा से हुई। इसके पश्चात शिक्षार्थियों ने दण्ड, पद विन्यास, यष्टि, नियुद्ध, दण्ड व्यायाम योग, व्यायाम योग, आसन का आकर्षक प्रदर्शन किया।

शताब्दी वर्ष के प्रतीक 100 पर  व्यूह रचना का  हुआ प्रदर्शन

घोष के प्रशिक्षणार्थियों ने भारतीय रागों पर आधारित रचनाओं का वादन करते हुए  समारोह मे आकर्षक प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के क्रम में घोष की रचनाओं में शताब्दी वर्ष का प्रतीक 100 पर आधारित व्यूह रचना में स्वस्तिक, शंख में किरण, वेणु में स्वर पाठ एवं व्यायाम योग के समय कावेरी, ध्वजारोपणम, ध्वजावतरण का प्रमुख रूप से प्रदर्शन कर उपस्थित जनसमूह को भारतीय राग से परिचित कराया।

मंच पर मा0 प्रांत संघचालक अंगराज जी, ‌सर्वाधिकारी गौतम सिंह की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। वर्ग कार्यवाह डॉक्टर संजय जी ने अतिथि परिचय एवं वृत्त निवेदन किया। सर्वव्यवस्था प्रमुख आशीष जी ने आभार प्रकट किया।

समारोह में प्रांत प्रचारक रमेश जी, वर्ग पालक सुनील जी, प्रचारक प्रमुख राम चन्द्र जी, मुख्य शिक्षक कौशल जी के अतिरिक्त प्रांत कार्यवाह मुरली पाल, सहकार्यवाह डा0 राकेश जी, प्रांत प्रचार प्रमुख डॉक्टर मुरार जी त्रिपाठी, बौद्धिक प्रमुख डा0 कुलदीप जी, सत्यविजय जी, घनश्याम जी, डा0 नीरज अग्रवाल, डा कृतिका अग्रवाल समेत बडी संख्या मे गणमान्य नागरिक एवं माताएं—बहने उपस्थित रही।











Saturday, May 23, 2026

देश में शांति स्थापित रहेगी तो हमारा जीवन भी शांतिपूर्ण यापन होगा : रमेश जी

प्रयागराज। अखिल भारतीय साहित्य परिषद काशी प्रांत की ओर से शनिवार को राष्ट्र साधना के 100 वर्ष के उपलक्ष्य में जिला पंचायत सभागार में भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि काशी प्रांत के प्रचारक रमेश जी ने कहा कि साहित्य परिषद सबके हित के कार्य को कवियों के माध्यम से रखने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश का भाग्य ही प्रत्येक ना
गरिक का भाग्य है। देश समर्थ
, समृद्ध और विकसित होगा तो हम भी समर्थ, समृद्ध और विकसित होंगे। देश में शांति स्थापित रहेगी तो हम भी शांति के साथ जीवन यापन कर सकेंगे। संघ अपने स्थापना वर्ष से देशहित में कार्य कर रहा है। राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए संघ 100 वर्षों से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत में धर्म, संस्कृति और समाज की खोई हुई पुनः स्थापित करने का कार्य अखिल भारतीय साहित्य परिषद कर रही है।

अध्यक्षता करते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री पवनपुत्र बादल ने कहा कि साहित्य परिषद ने केवल हिंदी नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। भारत की एकात्मता का भाव लेकर लेकर साहित्य परिषद काम कर रहा है। उन्हेें राष्ट्र निर्माण के लिए साहित्य परिषद से जुड़ने का आग्रह किया। भारत की पुरातन, सनातन और वैदिक भाव को पुनः जागृति करने के लिए साहित्य परिषद कार्य कर रहा है। इस मौके पर स्वामी वैदेही वल्लभ सरकार ने कहा कि ब्रह्म से भी पहले शब्द की उत्पत्ति हुई। संघ तो वटवृक्ष है और संपूर्ण साधना सिखाता है।

‘एक दीप से जले हज़ारों यह अद्भुत विस्तार है, भारत के इस नव निर्माण में संघ शक्ति आधार है...’

इस अवसर पर आमंत्रित कवियों ने राष्ट्रप्रेम और त्याग की कविताओं से वातावरण भावपूर्ण बना दिया। कार्यक्रम में विनीत चौहान ने मंच संचालन किया। कवि अभय निर्भीक ने ‘त्याग तपस्या ज्ञान संघ है, क्षमता का उत्थान संघ है, मातृभूमि को सदा पूजता भारत का सम्मान संघ है’ के माध्यम से संघ को प्रस्तुत किया। कवियित्री प्रियंका राय ने ‘मैं भारत की आनबान सम्मान की खातिर जीती हूं, मुरझाये चेहरों पर मैं मुस्कान की खातिर जीती हूं, जीते होंगे लोग यहां धन-दौलत शोहरत की खातिर, सच कहती हूं मैं तो हिन्दुस्तान की खातिर जीती हूं’ के माध्यम से श्रोताओं में जोश भर दिया। कवि दास आरोही आनन्द ने ‘हम प्रखर पुंज, हम तेजवंत हम पारस जैसे सजे हैं, हमको हल्के में मत लेना, हम भारत के बच्चे हैं’ के माध्यम से युवाओं को जागृत किया। मध्यप्रदेश के भोपाल से आई नुसरत मेहंदी ने ’जन-जन में आत्मबोध जगाया है संघ ने, सर्वाेपरि है राष्ट्र सिखाया है संघ ने’ के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में बताया। कवियित्री नेहा शर्मा ने अपनी कविता ‘हमेशा याद रखना तुम की ये धरती तुम्हारी है, ये गंगा गोमती सरयू, ये यमुना जी तुम्हारी है, तिरंगा भी तुम्हारा है, और भमवा तुम्हारा है, सनातन है तो सब कुछ है और हस्ती तुम्हारी’ के माध्यम से मंत्रमुग्ध कर दिया। कवि प्रशांत अवस्थी ‘प्रखर’ ने अपनी कविता ‘सुनो कथानक कहता हूं मैं, है जिनकी कथा सुनहरी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक के संघी, सदा दंश के प्रहरी’ के माध्यम से श्रोताओं का मन मोह लिया। 

गांव और ग्रामीण संस्कृति पर कविता लिखने वाली मनु वैशाली ने अपनी कविता ‘चप्पल पहन के जिनकी चलते थे शौक से हम तुम पूछते हो वैसे गांव में क्या रखा है’ के माध्यम से गांव से जुड़ाव की याद दिलाई। कवि डां. प्रवीण आर्य ने कविता ‘जननी जन्मभूमि का वंदन, आओ कर ले हम, वन्दे मातरम वन्दे मातरम।। राम कृष्ण को मातृभूमि से स्वर्ग लगा धीमा धीमा, चूमे चरण चांदनी भू के, भाल लगा के सर टीका, सुर नर मुनि तरसा करते, पाने को जहाँ जन्म, वन्दे मातरम वन्दे मातरम’ के माध्यम से राष्ट्रभक्ति का वातावरण बनाया। विख्यात मिश्र ने ‘सज गये सारंगधारी, संघ के कारण ही है, अब सजेंगे ब्रजबिहारी, संघ के कारण ही है’ के माध्यम से संघ का महत्व बताया। कार्यक्रम का संयोजन कर रहे कवि और शिक्षक डॉ. विनम्र सेन सिंह ने अपनी कविता ‘एक दीप से जले हज़ारों यह अद्भुत विस्तार है, भारत के इस नव निर्माण में संघ शक्ति आधार है।’ के माध्यम से भारत की एकता का परिचय दिया।

कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन और भारत मां के चित्र पर पुष्प अर्पित करके किया गया। इसके बाद साहित्य परिषद की ओर से सभी मंचासीन अतिथियों और कवियों को स्वागत किया गया।

कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सह-कोषाध्यक्ष कमलाकांत गर्ग, प्रदेश महामंत्री महेश पाण्डेय ‘बजरंग’ पूर्व आईजी केपी सिंह, प्रो. वाईपी सिंह, डा. अमरेंद्र त्रिपाठी, प्रो. रमेश सिंह, डा. स्नेहसुधा, अर्चना सिंह और प्रो. कल्पना वर्मा आदि मौजूद रहे।



Monday, May 11, 2026

समाज का प्रबोधन करना ही सच्ची पत्रकारिता — सुभाष जी

आद्य पत्रकार देवर्षि नारद जयन्ती के उपलक्ष्य में सामाजिक परिवर्तन में मीडिया की भूमिका विषयक संगोष्ठी गोष्ठी का आयोजन।

प्रयागराज। आद्य पत्रकार  देवर्षि नारद जयंती के उपलक्ष्य में   रविवार को हिंदुस्तानी अकादमी में विश्व संवाद केंद्र प्रयागराज काशी प्रांत के द्वारा 'सामाजिक परिवर्तन में मीडिया की भूमिका’ विषयक  गोष्टी आयोजित की गयी।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुभाष जी ने कहा कि  समाज का  प्रबोधन करना ही सच्ची पत्रकारिता है। समसामयिक विषयो के प्रति सामाजिक जागरूकता बढाना मीडिया का कार्य है। इसके लिए पत्रकारो को दीपक की तरह जल कर समाज मे वैचारिक  प्रकाश फैलाना पड़ता है। इसकी प्रेरणा नारद जी से मिलती है। नारद जी आद्य पत्रकार हैं। उन्होंने कहा कि संपादक जगत नारायाण लाला जैसे संपादकों को श्रेष्ठ जीवन मूल्य स्थापित करने के प्रयास में अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ा लेकिन अखबार का प्रकाशन बंद नहीं होने दिया। ऐसे लोग पत्रकारों के प्रेरणास्रोत हैं। गीता प्रेस के संस्थापक हुनुमान प्रसाद पोद्दार ने सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली भारत रत्न जैसे सम्मान को विनम्रता के साथ अस्वीकार कर पूरे समाज के सामने नया आदर्श स्थापित किया। रामायण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि देवर्षि नारद कोमल चित्त वाले थे। उनके अंदर करुणा और ममता थी यह पत्रकारों का स्वभाव होना चाहिए। उन्होंने दैनिक जागरण के पूर्व संपादक नरेन्द्र मोहन की भी चर्चा की और उनसे पत्रकारों को प्रेरणा लेने की बात कहीं। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को अनावश्यक नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। पत्रकार सैनिकों की भाति  कलम के सिपाही हैं। कलम के सिपाही का मूल कर्तव्य है सामाजिक चेतना, सत्य को सामने लाना, राष्ट्र निर्माण, राष्ट्रीयता, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विचारों को संबल प्रदान करने का कार्य करना। यही नारद जयंती मनाने का उद्देश्य है।   

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक योगेश नारायण दीक्षित ने ‘आज की पत्रकारिता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हम सब लोग पत्रकारिता के मूल उद्देश्य से भटक कर व्यवसायिकरण की ओर बढ़ रहे हैं।  हमें चिंतन करना होगा कि पत्रकार सत्य को उजागर एवं समाज की दृष्टि को सामने लाने के लिए समाज के प्रहरी के रूप में कार्य करता है। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तम्भ माना गया है। सोशल मीडिया पर अच्छे नॉरेटिव वायरल करने का उन्होंने सुझाव दिया।

विषय प्रवर्तन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ मुरारजी त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता का धर्म देवर्षि नारद से सीखना चाहिए। एजेंडा आधारित पत्रकारिता समाज का भला नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि भारतीय पत्रकारिता का इतिहास  सृष्टि के प्रारंभ मैं नारद जी से प्रारंभ होता है।    लोक मंगल हेतु की गई पत्रकारिता ही समाज के लिए उपयोगी है। मंच पर प्रचार विभाग के पालक आशीष जी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम का प्रारंभ अतिथियों द्वारा देवर्षि नारद के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। समापन राष्ट्र सेविका समिति की बहनों के नेतृत्व में वंदे मातरम के सामूहिक गायन से हुआ।

गोष्ठी में प्रांत प्रचारक रमेश जी, राकेश जी सह भाग कार्यवाह, चारूमित्र जी, व्रत शील शर्मा  रितेश जी, विष्णु जी, कृष्ण मनोहर जी, आदित्य जी, संतोष, विजेंद्र, रामनरेश, पिंडी वास  राजेश प्रताप आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। अतिथि परिचय सह विभाग प्रचार प्रमुख मुकेश जी ने कराया। धन्यवाद ज्ञापन कृष्ण मनोहर तिवारी एवं संचालन विभाग प्रचार प्रमुख वसु पाठक ने किया।