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Monday, August 31, 2026

भारत के मौलिक दर्शन को मानने वालों का संगठन है संघ – डॉ. कृष्ण गोपाल जी


काशी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, काशी महानगर द्वारा चौकाघाट स्थित गिरजा देवी सांस्कृतिक संकुल के सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित प्रमुखजन संवाद-संगोष्ठी में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के मौलिक दर्शन को मानने वालों का संगठन है। अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान को सुरक्षित रखते हुए युगानुकूल तकनीक को स्वीकार कर समाज में संगठन का कार्य संघ कर रहा है। हिन्दू समाज दुनिया को बचाने का एकमात्र आधार है, परन्तु सबसे पहले हिन्दू समाज को अपना घर सुव्यवस्थित करना होगा।

उन्होंने कहा कि 100 वर्षों की संघ यात्रा रोचक और रोमांचकारी है। यद्यपि इस कालखण्ड में संघ को अनेक समस्याएं झेलनी पड़ी, परन्तु संघ ने युगानुकूल परिवर्तन कर समाज को एकत्रित करने का कार्य जारी रखा। प्राचीन भारत गणित, ग्रह गति, वस्त्र विन्यास, कृषि, रसायन विज्ञान, मानव शरीर रचना विज्ञान में विश्व में अग्रणी था। नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला जैसे विश्व विख्यात विश्वविद्यालय भारत में थे। विश्व अर्थव्यवस्था में 30 प्रतिशत भारत का योगदान था। मानवीय मस्तिष्क की जो भी उच्चतम कृति हो सकती है, वह सब भारत में बनती थी। परन्तु हजारों वर्षों के संघर्ष के कारण शस्य श्यामला भूमि अकाल ग्रस्त होने लगी। संघ संस्थापक पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने समस्याओं के समाधान के तीन मुख्य बिन्दु बताए। प्रथम – भारतीय नागरिकों के मन में देशभक्ति भाव का जागरण करना, दूसरा – समाज जीवन में आत्मविश्वास की वृद्धि करना और तीसरा – पूर्वजों की कीर्ति को ध्यान में रखकर उसके अनुरूप कार्य करना। अंग्रेजों का कथन था कि भारतीय अकर्मण्य है, प्रशासनिक समझ नहीं है एवं आर्य बाहर से आए हैं। डॉ. हेडगेवार ने इन भ्रांतियों को हटाने का कार्य प्रारम्भ किया।

सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि आज 90 हजार से अधिक शाखाएं और 50 लाख से अधिक स्वयंसेवक एक समान उद्देश्य को लेकर देशहित में अपना समय देते हैं। सामाजिक जीवन में बदलाव के लिए स्वयंसेवक अनेक संगठन चला रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती, श्रमिकों के मध्य भारतीय मजदूर संघ, सेवा के क्षेत्र में सेवा भारती, वनवासी समाज के मध्य वनवासी कल्याण आश्रम जैसे अनेकों समूह समाज की विषमता को दूर करने का कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति से सचेत रहने का आग्रह किया। साथ ही विश्व में व्याप्त असहिष्णुता को समाप्त करने का आह्वान किया। श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए एक प्रश्न के उत्तर में सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि 1947 में दुनिया के सभी देश मानते थे कि भारत एक राष्ट्र के रूप में लम्बे समय तक नहीं टिक सकता, वह देश बिखर जाएगा। परन्तु आज शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की यात्रा अनवरत जारी है। कोरोना काल में भारत एकमात्र देश रहा, जहां लाखों लोगों को प्रतिदिन नि:शुल्क भोजन प्राप्त हो रहा था।

भारत में हिन्दू वह व्यक्ति है, जो इस देश को मातृभूमि मानता हो, सभी मत-पंथों के प्रति श्रद्धावान रहे। हिन्दू सांस्कृतिक अधिष्ठान है जो अनन्त विविधताओं को साथ लेकर चलता है। यह ”वे ऑफ लाइफ” है। स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका के प्रश्न पर डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार स्वयं दो बार स्वतंत्रता संग्राम में जेल गए थे। डॉ. हेडगेवार ने राजगुरु एवं सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों की सहायता भी की थी। संघ के स्वयंसेवकों ने 1942 के आन्दोलन में जेल यात्रा की थी। ज़ेन-ज़ी को धर्म और संस्कृति का संस्कार देने के प्रश्न पर कहा कि सभी हिन्दू परिवारों को युवाओं के साथ चर्चा करनी चाहिए। युवाओं को यह बताना आवश्यक है कि युगानुकूल परिवर्तन के लिए हिन्दू धर्म सदैव तैयार है। उनके मन में दूसरों के प्रति आत्मीयता बढ़ानी होगी।

उन्होंने कहा कि वास्तव में धर्म कर्तव्य का बोध है। वहीं धर्म का दूसरा पक्ष उसे गुण विशेष बनाता है। मातृधर्म, राजधर्म, जल का धर्म, वायु का धर्म इत्यादि से धर्म की व्याख्या की। धर्म परिवर्तन नहीं हो सकता, वह मात्र मतांतरण होता है। कमजोर वर्गों को सम्भालना हमारी जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने कहा कि राष्ट्रधर्म सर्वोच्च है। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। निवेदिता शिक्षा सदन की बालिकाओं ने वन्देमातरम, एकल गीत प्रभात ने प्रस्तुत किया। संचालन विभाग कार्यवाह राजेश विश्वकर्मा एवं धन्यवाद ज्ञापन संजय चौरसिया ने किया।

प्रमुख जन संवाद संगोष्ठी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 अजीत चतुर्वेदी, चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ0एस.एन.शंखवार जी, प्रसिद्ध उद्यमी आर.के.चौधरी, पद्मश्री देवी प्रसाद द्विवेदी, प्रख्यात साहित्यकार डा.नीरजा माधव, समाजसेवी सूर्यकान्त जालान, प्रान्त कार्यवाह मुरली पाल जी, सह प्रान्त कार्यवाह डा0 राकेश जी, प्रान्त प्रचारक रमेश जी, सह प्रान्त प्रचारक सुनील जी, प्रो0 मंजू द्विवेदी, डॉ आनन्द प्रभा सिंह, मीना चौबे सहित बड़ी संख्या में काशी महानगर के गणमान्य एवं प्रबुद्धजन मातृशक्ति उपस्थित रही।





हमारी संस्कृति ने सदैव समाज को जोड़ने और समरसता स्थापित करने का मार्ग दिखाया है — अनिल जी

गाजीपुर। रक्षाबंधन उत्सव के उपलक्ष्य में गाजीपुर में आयोजित रक्षाबन्धन उत्सव को सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र प्रचारक अनिल जी ने कहा कि भारत त्योहारों का देश है और यह हम सभी सनातनियों का सौभाग्य है कि हमारे पूर्वजों ने हमें एक विराट एवं समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा प्रदान की है। हमारी संस्कृति ने सदैव समाज को जोड़ने, समरसता स्थापित करने और संपूर्ण मानव समाज के कल्याण का मार्ग दिखाया है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में देशभर में सनातन संस्कृति के प्रति जागरण और आस्था का एक व्यापक प्रवाह दिखाई दे रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह सनातन की व्यापक स्वीकार्यता का ही प्रभाव है कि कश्मीर में विपरीत विचारधारा के राजनीतिक लोग भी शिवलिंग पर जल अर्पित करती हुए दिखाई देते हैं। उन्होंने सभी से इस सांस्कृतिक जागरण को और अधिक सशक्त बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।

अनिल जी ने कहा कि सनातन संस्कृति केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे आचरण और व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। हमें अपने व्यक्तिगत जीवन में समाज के प्रति समभाव रखते हुए प्रत्येक व्यक्ति को समान दृष्टि से देखने और सामाजिक समरसता को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने तीर्थराज प्रयाग में आयोजित महाकुंभ का उदाहरण देते हुए कहा कि संगम स्नान के लिए किसी को व्यक्तिगत निमंत्रण नहीं दिया जाता। इसके बावजूद देश के कोने-कोने से करोड़ों श्रद्धालु स्वतः प्रयागराज पहुंचते हैं और बिना किसी जातिगत भेदभाव के संगम में स्नान करते हैं। यह हमारी सनातन संस्कृति की स्वाभाविक समरसता और एकात्म भाव का जीवंत उदाहरण है।

क्षेत्र प्रचारक जी ने कहा कि आज समाज में सनातन संस्कृति और उसकी परंपराओं के विरुद्ध विभिन्न प्रकार के विमर्श प्रस्तुत किए जा रहे हैं। ऐसे प्रयासों से समाज को सावधान रहने की आवश्यकता है। हमें अपने स्वविवेक का उपयोग करते हुए भ्रामक एवं विभाजनकारी विचारों से बचना चाहिए तथा सामाजिक एकजुटता के साथ अपनी संस्कृति, परंपरा और जीवन-मूल्यों के संरक्षण का कार्य करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह और रक्षा के संकल्प का पर्व नहीं है, बल्कि यह व्यापक सामाजिक एकता, परस्पर आत्मीयता, समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण का संदेश देने वाला पर्व है। समाज के प्रत्येक वर्ग के बीच आत्मीयता और एकता का भाव मजबूत करना ही रक्षाबंधन की वास्तविक भावना है।

कार्यक्रम में विभाग प्रचारक आदित्य जी, सह विभाग प्रचारक प्रेम प्रकाश जी, जिला प्रचारक प्रभात जी, मा0जिला संघचालक जयप्रकाश जी तथा नगर संघचालक सर्वजीत जी सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेवक एवं मातृशक्ति उपस्थित रहे।



विविधता को जोड़कर रखने वाला तत्व धर्म ही है – डॉ. कृष्ण गोपाल जी

रक्षा सूत्र बांधकर धर्म की रक्षा के संकल्प लेने का आह्वान किया

प्रयागराज। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा IIIT इलाहाबाद के ऑडिटोरियम में रक्षाबंधन उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी तथा कार्यक्रम अध्यक्ष संस्थान के निदेशक मुकुल शरद सुतावणे जी रहे।

मुकुल शरद सुतावणे जी ने कहा कि रक्षाबंधन अब केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रह गया है, यह अबल और सबल के बीच सुरक्षा और संरक्षण का पर्व बन गया है। डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि इतिहास में बड़े‑बड़े सामाजिक आंदोलनों के दौरान लोग गंगा तट पर एक‑दूसरे को रक्षा सूत्र बाँधकर एकता और समर्पण का संकल्प लेते रहे हैं। धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा आरम्भ नहीं किया गया, धर्म वे सार्वभौमिक मूल्य हैं जो समाज को जोड़ते हैं। “ध्वज धर्म का प्रतीक है – हम भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बाँध कर धर्म की रक्षा का संकल्प लेते हैं। ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’।”

उन्होंने कहा कि भारत एक बहुभाषी, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश है, जिसमें विविधता को जोड़कर रखने वाला तत्व धर्म ही है। विदेशी आक्रमणों और विभाजन के कारण सामाजिक बिखराव आया, पर संघ का प्रयास इन तोड़-फोड़ के बीच समाज में एकता और बंधुता स्थापित करना रहा है। संघ ने रक्षाबंधन को पारंपरिक भाई‑बहन के रिश्ते से ऊपर उठाकर वंचितों, वनवासियों और गिरिवासियों के प्रति अपनत्व और सुरक्षा का संकल्प बनाया है।

सह सरकार्यवाह जी ने वर्तमान सामाजिक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त की और कहा कि भौतिक समृद्धि के साथ-साथ मन की गरीबी बढ़ती जा रही है। उन्होंने अपार्टमेंट संस्कृति और अकेलेपन की ओर इशारा करते हुए कहा कि हमें आत्मीयता और सामाजिक जुड़ाव को प्रोत्साहित करना होगा ताकि समाज की पवित्रता बनी रहे।

समारोह में मंच पर विभाग संघचालक डॉ. कृष्ण पाल जी तथा नगर संघचालक रामेश्वर जी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में लगभग 1500 से अधिक कार्यकर्ता और नागरिकों ने सहभागिता की।



Saturday, August 29, 2026

विश्व बन्धुता के संरक्षण व संवर्धन का आधार है हमारी एकता एवं एकात्मता – सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी

काशी, 28 अगस्त, 2026 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी मध्य के तिलक नगर में रक्षाबन्धन उत्सव में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि हमारी एकता एवं एकात्मता विश्व बन्धुता के संरक्षण और संवर्धन का आधार है। न्यायोचित मार्ग पर चलते हुए बन्धुता को आधार बनाकर स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करने के लिए भारत ने सामाजिक समरसता को अंगीकार किया है।

सिगरा स्थित डॉ. सम्पूर्णानन्द स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में उपस्थित स्वयंसेवकों एवं मातृशक्ति से कहा कि योग वशिष्ठ के एक श्लोक के अनुसार ऐसे लोग जो हमारे बन्धु नहीं हैं, उनसे प्रतिदिन मिलने से निकटता बढ़ती है और वह हमारे बन्धु बन जाते हैं। जबकि निकटता के अभ्यास को छोड़ने से बन्धुता का स्नेह बन्धन छूट जाता है। संघ में भी अपरिचित को परिचित एवं परिचित को मित्र बनाने की परम्परा रही है। स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुता, इन तीनों अवधारणाओं को विश्व के अनेक देशों ने अलग-अलग रूपों में स्वीकार किया है। ऐसे राष्ट्र जहां केवल स्वतंत्रता को महत्व दिया गया, वहां स्वच्छंदता व्याप्त हो गयी। जबकि सोवियत रूस जैसे देश ने समानता को ​वरीयता दी, यह विचार भी टिक नहीं पाया। भारतीय संस्कृति में बन्धुता को स्वतंत्रता और समानता के साथ जोड़ा गया है। इन तीनों तत्वों का मूलाधार सामाजिक समरसता है।

सरकार्यवाह जी ने कहा कि हिन्दू संस्कृति में सम्पूर्ण विश्व को एक कुटुम्ब स्वीकार किया गया है। मैं और समस्त जीव एक ही परमात्मा के अंश हैं, उदार चरित के साथ इस भावना को स्वीकार करना चाहिए। सम्बन्धों के मध्य अविश्वास, रक्षाबन्धन के स्नेहसूत्र को कमजोर करते हैं। आपस में बंटने पर विरोधी पक्ष को उसका लाभ मिलता है। जब हम सभी विश्व बंधुत्व की चर्चा करते हैं तो उसका मूलाधार भविष्य पुराण का श्लोक –

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल॥

जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार राजा बलि को स्नेह बन्धन में बांधा गया, उसी प्रकार मैं भी आपको  स्नेह बन्धन में बांधता हूं। यह बन्धन स्थिर रहे। वर्तमान में परिवार और समाज में जो अस्थिरता उत्पन्न हो गयी है, उसका कारण स्वार्थ है। मनुष्य के अन्दर स्वार्थ विकार के रूप में नहीं आना चाहिए।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी, काशी मध्य के संघचालक डॉ. हेमन्त गुप्त जी, तिलक नगर के नगर संघचालक प्रदीप जी ने भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधा। कार्यक्रम का संचालन नगर कार्यवाह सत्यपाल ने किया। उत्सव में प्रमुख रूप से क्षेत्र कार्यवाह डॉ0वीरेन्द्र जायसवाल, क्षेत्र प्रचारक अनिल जी, क्षेत्र सेवा प्रमुख युद्धवीर जी, प्रान्त कार्यवाह मुरली पाल जी, सह प्रान्त कार्यवाह डॉ0 राकेश जी, प्रान्त प्रचारक रमेश जी, 0प्र0 के आयुष राज्यमंत्री दयाशंकर मिश्र दयालू, काशी के महापौर अशोक तिवारी, प्रो0मंजू द्विवेदी, गुंजन नन्दा, निवेदिता मेहरोत्रा, अंजू अग्रवाल समेत बड़ी संख्या में स्वयंसेवक एवं मातृशक्ति उपस्थित रहीं।

नेपाल प्राकृतिक आपदा पीड़ितों के प्रति श्रद्धांजलि

दो दिन पूर्व नेपाल के बाढ़ आपदा में मृतक जनमानस के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने पूरे संघ परिवार की ओर से श्रद्धांजलि निवेदित की। उन्होंने कहा कि जो बन्धु इस आपदा में संकटग्रस्त हुए हैं, संघ परिवार उनके प्रति भी अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता है।





Saturday, August 8, 2026

किसी भी समस्या का समाधान संवाद से संभव है, आंदोलन से विभाजन नहीं होना चाहिए – डॉ. मोहन भागवत जी

मुंबई। इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस’ (I.I.M.U.N.) के 15वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित वार्षिक कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन समारोह में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि किसी भी समस्या का समाधान संवाद के माध्यम से संभव है, समस्या का निवारण न होने पर संवैधानिक तरीके से आंदोलन करना उचित है। आंदोलन लोकतंत्र द्वारा दिया गया एक साधन होने के बावजूद उसका उपयोग अपनी विवेक बुद्धि से करना चाहिए, जिससे समाज में विभाजन न हो।

मुंबई स्थित नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित समारोह में देश के 100 से अधिक शहरों से 15 से 24 आयु वर्ग के 2,000 से अधिक छात्र उपस्थित रहे। भावी नेतृत्व तैयार करना, संवाद कौशल विकसित करना और राष्ट्रीय तथा वैश्विक प्रश्नों के विषय में युवाओं में एक सकारात्मक दृष्टिकोण का निर्माण करना कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य था। I.I.M.U.N. के संस्थापक ऋषभ शाह ने मोहन भागवत जी के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने छात्रों के मन के विभिन्न प्रश्न सरसंघचालक जी के सामने रखे। संवाद सत्र में डॉ. भागवत जी ने आंदोलन संस्कृति, शिक्षा व्यवस्था, सोशल मीडिया का युवाओं पर प्रभाव, LGBTQ विषय, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण तथा विकसित भारत के लिए आवश्यक भावी नेतृत्व जैसे विभिन्न विषयों पर विस्तार से मार्गदर्शन किया।

सरसंघचालक जी ने कहा कि आंदोलन संवाद का एक माध्यम होने के बावजूद उससे समाज में विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। भारतीय परंपरा की शास्त्रार्थ संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि जेन-जी के प्रश्नों को केवल विरोध के रूप में न देखकर उनकी समस्याओं को समझकर उनका निवारण करना समाज और व्यवस्था की जिम्मेदारी है। जेन-जी आंदोलन कर रही है, इसका मतलब यह नहीं कि वह राष्ट्र विरोधी है। नई पीढ़ी हमारे समाज का ही हिस्सा है और उसके साथ आत्मीयता से संवाद साधना आवश्यक है; उसी से आपसी सामंजस्य बढ़ता है। आज की जेन-जी और जेन-अल्फा पीढ़ी अधिक प्रामाणिक है।

शिक्षा विषय पर उन्होंने कहा कि शिक्षा जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है और वह सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार की नहीं है, बल्कि उसकी जिम्मेदारी समाज को भी उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार की आर्थिक सहायता के बिना भी विद्या भारती संस्था आज करीब 23 हजार स्कूल चला रही है। शिक्षा व्यवस्था में आंदोलनों के बिना भी सकारात्मक सुधार संभव है।

सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी से सकारात्मक और समाज हित की जानकारी ही शेयर करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि केवल विश्वसनीय जानकारी पर विश्वास किया जाना चाहिए और जेन-जी में सही-गलत की पहचान करने का विवेक विकसित करने के लिए मार्गदर्शन करना आवश्यक है। जेन-जी को हिंसक नहीं, बल्कि सकारात्मक आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए।

मोहन भागवत जी ने कहा कि भारत संवाद से सद्भाव निर्माण करने में विश्वास रखता है। संवाद और शांतिपूर्ण प्रयासों से ही स्थायी समाधान मिलता है। संघर्ष के समय नागरिकों को अपनी सरकार के साथ खड़ा रहना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर सरकार के निर्णयों को समर्थन देना हर एक का कर्तव्य है। मानवता सर्वश्रेष्ठ है, यह संदेश महत्वपूर्ण है। दूसरों को जीतकर या समाप्त करके समाज आगे नहीं बढ़ता। समाज की प्रगति सुसंवाद, समन्वय और एक-दूसरे को समझने की प्रक्रिया से होती है, इसके लिए संवाद कायम रहना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि एलजीबीटी (LGBT) समुदाय के व्यक्ति भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा हैं, समाज को उन्हें सम्मानपूर्वक स्थान देना चाहिए। प्राचीन भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं मानी जाती है। विवाह का उद्देश्य उत्तम संतति का निर्माण और सुदृढ़, सुसंस्कारित समाज का निर्माण करना भी है। विवाह संस्था के मूल स्वरूप में बदलाव होने पर उसके कुछ सामाजिक दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं, इसीलिए पहले समाज को इस विषय में जागृत करना आवश्यक है। कानून समाज तय नहीं करते, समाज की जरूरतों और मूल्यों के अनुसार कानून तय होते हैं। इस दृष्टिकोण से समलैंगिक विवाह को पारंपरिक अर्थों में विवाह न मानते हुए कंपैनियनशिप (सहचर्य) माना जाना चाहिए।

महिलाओं की राष्ट्र निर्माण में समान भागीदार और नेतृत्व के लिए आगे लाने की आवश्यकता पर कहा कि अपर्याप्त जानकारी के कारण संघ के बारे में ऐसी धारणा है। संघ की विभिन्न संस्थाओं में महिलाओं को समानता के साथ जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं और वे प्रभावी रूप से कार्य भी कर रही हैं। राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना संघ की स्थापना के काल में ही हुई थी। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में महिलाओं की सहभागिता होती है और निर्णय प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। संघ की विभिन्न संस्थाओं में भी महिलाओं की उल्लेखनीय सहभागिता होती है।

रोजगार को लेकर समाज की मानसिकता बदलनी चाहिए, रोजगार का अर्थ केवल नौकरी नहीं है। उद्यमिता और कौशल भी रोजगार के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। बेरोजगारी कम करने के लिए सभी प्रकार के कामों को समान सम्मान मिलना चाहिए। समाज में श्रम प्रतिष्ठा की भावना दृढ़ होनी चाहिए। श्रम प्रतिष्ठा को महत्व दिया जाना चाहिए तथा शिक्षा प्रणाली में उसी के अनुसार बदलाव करना जरूरी है।

आरक्षण के विषय़ पर कहा कि सामाजिक विषमता के कारण आरक्षण की आवश्यकता निर्माण हुई। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने इस विषय में स्पष्ट भूमिका रखी है। आरक्षण के प्रश्न पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और सामाजिक न्याय के लिए उपाय प्रामाणिक रूप से तथा प्रभावी रूप से क्रियान्वित किए जाने पर भविष्य में आरक्षण की आवश्यकता कम हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र के शाश्वत विकास लक्ष्यों की पूर्ति में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पर्यावरण के लिए पूरक विकास संभव है और पर्यावरण संवर्धन की शुरुआत घर से तथा दैनिक जीवन से ही होनी चाहिए।

वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण हेतु कल के प्रत्येक नेता में आवश्यक गुणों के बारे में कहा कि सच्चा नेतृत्व स्वयं से शुरू करता है। जो खुद को सही दिशा दे सकता है, वही दूसरों को मार्गदर्शन कर सकता है। नेतृत्व का वास्तविक कार्य केवल अनुयायी तैयार करना नहीं, बल्कि नए नेता गढ़ना है।

सार्थक संवाद के लिए अपनत्व का संबंध होना चाहिए – डॉ. मोहन भागवत जी

मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आयोजित I.I.M.U.N. के कार्यक्रम में युवाओं से संवाद किया। कार्यक्रम में देश के 100 से अधिक शहरों से आए 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग के करीब 2,000 हाई स्कूल विद्यार्थी शामिल रहे।

कार्यक्रम में सरसंघचालक जी के साथ के प्रमुख बिन्दु —

(भारतीय दृष्टिकोण से विश्व को एकजुट करने में युवाओं की भूमिका)
India’s International Movement to Unite Nations (I.I.M.U.N.)

Gen-Z

1.  यदि जेन-ज़ी (Gen-Z) आंदोलन कर रही है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह राष्ट्र विरोधी (Anti-National) है।

2.  नई पीढ़ी अपने ही समाज और राष्ट्र का हिस्सा है; उन्हें “अपने” मानकर समझने की आवश्यकता है।

3.  सार्थक संवाद के लिए अपनत्व का संबंध होना चाहिए।

4.  जब संवाद अपनत्व के साथ होता है, तभी एक-दूसरे की बात को सही ढंग से समझा जा सकता है।

5.  आज की जेन-ज़ी (Gen-Z) और जेन-अल्फा (Gen-Alpha) हमारी पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार हैं।

6.  यदि मुझे दोनों पीढ़ियों में किसी एक पर विश्वास करने के लिए कहा जाए, तो मैं जेन-ज़ी (Gen-Z) पर विश्वास करूँगा।

शिक्षा एवं नई पीढ़ी

1.  1. शिक्षा कोई व्यावसायिक (Commercial) व्यवसाय नहीं है, बल्कि जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता (Necessity) है।

2.  2. शिक्षा सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति तक उसकी पहुँच सुनिश्चित होनी चाहिए।

3.  3. शिक्षा केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

4.  4. शिक्षा का उद्देश्य केवल धन अर्जित करना या विद्यालयों का संचालन करना नहीं होना चाहिए।

5.  5. जो लोग शिक्षा प्रदान करते हैं, उनका भी उचित प्रशिक्षण (Training) होना आवश्यक है।

6.  6. शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 6% व्यय करने की मांग लंबे समय से चली आ रही है, और मैं उसका समर्थन करता हूँ।

7.  7. हमारे संगठन भी बड़े स्तर पर विद्यालयों का संचालन करते हैं। हमारे कई हजार विद्यालय चल रहे हैं।

8.  8. शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए हर बार आंदोलन आवश्यक नहीं होता। बिना आंदोलन के भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार संभव है।

9.  शिक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, यह हमारे बच्चों के लिए है। इसलिए हमें भी उसमें योगदान देना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य भविष्य की पीढ़ी का निर्माण है।

सोशल मीडिया

1.  यदि सोशल मीडिया पर मेरे कारण 10 लाख लोग कोई गलत निर्णय लेते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी भी है।

2.  सोशल मीडिया पर सकारात्मक, उपयोगी और समाजहित की सामग्री साझा करनी चाहिए।

3.  सोशल मीडिया पर केवल प्रामाणिक (Authentic) स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही विश्वास करना चाहिए।

4.  जेन-ज़ी (Gen-Z) में भी यह विवेक विकसित होना चाहिए कि क्या सही है और क्या नहीं।

5.  वरिष्ठ पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करे तथा उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाए।

रोल मॉडलराष्ट्रीय दृष्टिकोण एवं वैश्विक संबंध

1.  जेन-ज़ी (Gen-Z) को हिंसक (Violent) रोल मॉडल का अनुसरण नहीं करना चाहिए।

2.  दो देशों के बीच संघर्ष (Conflict) की स्थिति में नागरिकों को अपनी सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए।

3.  भारत की नीति किसी देश को पराजित करना नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से सद्भाव (Harmony) स्थापित करना है।

4.  किसी भी संघर्ष का स्थायी समाधान (Permanent Remedy) संवाद और शांतिपूर्ण प्रयासों से ही संभव है।

5.  सभी पाकिस्तानी भारत के शत्रु नहीं हैं; लोगों और परिस्थितियों में अंतर समझना चाहिए।

6.  संघर्ष के समय सरकार जो निर्णय ले, उसका समर्थन करना चाहिए।

7.  मानवता सर्वोपरि है — “Humanity is One.”

एलजीबीटी एवं विवाह

1.  एलजीबीटी (LGBT) समुदाय के लोग भी हमारे समाज का हिस्सा हैं और समाज को उन्हें स्थान देना चाहिए।

2.  भारतीय समाज में विवाह का उद्देश्य केवल दो व्यक्तियों का साथ रहना नहीं है।

3.  विवाह का उद्देश्य उत्तम संतति का निर्माण तथा एक सुदृढ़ समाज की रचना भी माना गया है।

4.  यदि विवाह संस्था के मूल स्वरूप में परिवर्तन किया जाएगा, तो उसके सामाजिक दुष्परिणाम (Side Effects) हो सकते हैं।

5.  इसी दृष्टि से समलैंगिक विवाह (Same-Sex Marriage) को विवाह नहीं कहा जाना चाहिए।

महिलाओं की भूमिका

1.  समाज में महिलाओं और पुरुषों की भूमिका समान (Equal) तथा एक-दूसरे की पूरक (Complementary) है।

2.  राष्ट्र सेविका समिति का गठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के समय ही हुआ था।

3.  यह धारणा सही नहीं है कि संघ में महिलाओं का स्थान नहीं है।

4.  अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में महिलाओं की सहभागिता रहती है और निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भूमिका होती है।

रोज़गार (Employment)

1.  रोजगार का अर्थ केवल नौकरी (Job) नहीं है।

2.  उद्यमिता (Entrepreneurship) और कौशल (Skills) भी रोजगार के महत्वपूर्ण आयाम हैं।

3.  बेरोज़गारी कम करने के लिए सभी प्रकार के कार्यों को समान सम्मान देना आवश्यक है।

4.  समाज में श्रम-प्रतिष्ठा (Dignity of Labour) का भाव विकसित होना चाहिए।

आरक्षण (Reservation)

1 . सामाजिक कारणों से आरक्षण की आवश्यकता उत्पन्न हुई है।

2 . जब तक सामाजिक भेदभाव (Discrimination) रहेगा, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी।

3 . बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

4 . आरक्षण के मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

5 यदि सभी उपायों को ईमानदारी और प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो भविष्य में आरक्षण की आवश्यकता समाप्त हो सकती है।

सतत विकास (Sustainability) एवं पर्यावरण

1.  संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals) की दिशा में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

2.  विकास पर्यावरण को क्षति पहुँचाए बिना भी संभव है।

3.  पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की शुरुआत अपने घर और अपने दैनिक जीवन से होनी चाहिए।

नेतृत्व (Leadership)

1 . नेतृत्व का पहला गुण है कि व्यक्ति सबसे पहले स्वयं का नेतृत्व करना सीखे।

2 . सच्चा नेतृत्व भीतर से प्रारंभ होता है — “You have to lead within.”

3 . एक नेता में शास्त्रों में बताए गए पाँच गुण होने चाहिए। पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु। शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा पुरुषः पञ्चलक्षणः॥

4 . नेतृत्व का उद्देश्य केवल अनुयायी बनाना नहीं, बल्कि नए नेताओं का निर्माण करना है — “Leadership is to create leaders.”