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Thursday, October 22, 2026

आरएसएस के स्वयंसेवक ने अपने प्राण देकर परहित सरिस धर्म नहिं भाई को चरितार्थ किया, दो की जान बचाई

प्रयागराज। गंगापार स्थित कौड़िहार के कुरेसर घाट पर हुई घटना ने मानव धर्म और संघ संस्कारों को जीवंत किया। कौड़िहार निवासी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक खण्ड शारीरिक शिक्षण प्रमुख सुरेश केशरवानी जी अपने प्राण न्यौछावर कर गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित चौपाई ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ को चरितार्थ किया।

स्थानीय लोगों के अनुसार सोमवार प्रातः कुरेसर घाट पर एक परिवार स्नान कर रहा था। उस परिवार के राम सिंह यादव डूबने लगे, उन्हें बचाने उनका छोटा भाई नितेश और उनकी पत्नी अनीता भी कूद पड़ी। तीन लोगों को डूबते देख जब चीख पुकार मची तो सुरेश जी ने एक क्षण भी देर नहीं की और तेज धारा में छलांग लगा दी। उन्होंने दो लोगों को तो बचा लिया, लेकिन महिला को बचाते बचाते स्वयं काल के गाल में समा गए। प्रशासन और जल पुलिस की टीम देर रात तक महिला और सुरेश केशरवानी के शव को ढूंढने में लगी रही। मंगलवार दोपहर को संघ स्वयंसेवक सुरेश का शव मिला। सुरेश केशरवानी प्रतिदिन की तरह शाखा के पश्चात नहाने के लिए कुरेसर घाट गए थे।

न कोई पहचान, न कोई रिश्ता, अजनबी सुरेश बने फरिश्ता

लोगों ने बताया कि डूब रहे लोगों से सुरेश जी की कोई जान पहचान नहीं थी, फिर भी जान की बाजी लगाने से पीछे नहीं हटे। उन्होंने दो लोगों को जीवन दिया। उनका यह समर्पण मानवता का उदाहरण बन गया।

संघ कार्य में बीतता था दिन

परिजनों ने बताया कि सुरेश को बस एक धुन संघ कार्य की रहती थी। कहते थे कि हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता हैं, और हमें जीवन समाज के लिए ही मिला है। देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें। लेकिन किसे पता था कि सुरेश इतना शीघ्र अपना सब कुछ अर्पण कर हमारे बीच से चले जाएंगे।

Wednesday, October 21, 2026

काशी : समाज को विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध संगठित होकर देवत्व का निर्माण करना होगा - रामाशीष जी

 स्वयंसेवक सतर्क होकर राष्ट्र रक्षा के लिए कार्य करें — रमेश जी

काशी। समाज को  विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध संगठित होकर देवत्व का निर्माण करना होगा। आसुरी शक्तियों के बढ़ने से देवता संगठित हुए, जिससे देवी दुर्गा  का प्रादुर्भाव हुआ। असंगठित होने से दैत्य शक्ति में वृद्धि होती है। विजयादशमी के पूर्व नौ दिनों तक देवी की आराधना का संदेश यह है कि हम अपनी आंतरिक शक्ति में वृद्धि करें। उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी दक्षिण भाग के शिवाला स्थित रत्नाकर पार्क में विजयादशमी उत्सव कार्यक्रम में प्रज्ञा प्रवाह के केंद्रीय टोली सदस्य रामाशीष जी ने मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 101 वाँ वर्ष पूर्ण होने पर स्थापना दिवस की शुभकामना देते हुए वक्ता ने कहा कि भगवान राम भारतवर्ष का अंक है इन्हें बचा कर रखने की आवश्यकता है।

क्योंकि यदि एक अंक सुरक्षित है तो उसके आगे लगने वाले शून्य संख्या में गुणात्मक वृद्धि करेंगे जबकि एक अंक मिट जाने पर केवल शून्य बचेगा । हिंदुत्व की वर्तमान स्थिति पर विचार रखते हुए वक्ता ने कहा कि भारत ने अपना दो तिहाई भूखंड खो दिया है, अफगानिस्तान पाकिस्तान बांग्लादेश में हिंदुओं की दशा अत्यंत शोचनीय हो गई है । भारत में हिंदुत्व की विचारधारा को मजबूत करने की आवश्यकता है । जाति व्यवस्था पर हिंदू समाज को सावधान करते हुए रामाशीष जी ने कहा कि जिस प्रकार केले और प्याज को बार-बार छीलने पर सिर्फ छिलका रह जाता है, केला और प्याज पूरे नहीं मिलते हैं । उसी प्रकार हिंदू समाज को जाति में बांटने पर हिंदू राष्ट्र को कुछ भी नहीं मिलेगा।

विदेशी ज्ञान एवं विज्ञान के भारत में आने पर वक्ता ने बताया कि अपने मकान में स्वच्छ हवा आने के लिए खिड़की खोलना आवश्यक है ना की पूरी दीवाल को हटाया जाता है अतः भारत को अपनी दीवारें नहीं गिरानी चाहिए । भारतीय ज्ञान विज्ञान ही भारत की मजबूत दीवारें हैं । संघ की स्थापना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए प्रज्ञा प्रवाह के केंद्रीय टोली सदस्य ने बताया कि हिंदू समाज अपने आंतरिक शक्ति के विघटन के कारण विदेशी आक्रांताओं से परास्त हुआ । यूरोप का एक समूह यहां व्यापार करने आया था और सत्ता पर स्थापित हो गया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हिंदू समाज को शारीरिक ,मानसिक ,आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से सशक्त बनाने के लिए हुई है । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए शेखर द्रविड़ घनपाठी जी ने कहा कि सभी के मंगल की कामना करने वाला एकमात्र धर्म हिंदू धर्म है ।

हिंदू समाज को भी इस चिंतन को ध्यान में रखना चाहिए कि जो राष्ट्र हमें सब कुछ प्रदान करता है हम भी उसके लिए तन, मन ,धन से खड़े रहे । कार्यक्रम के प्रारंभ में मंचासीन अतिथियों द्वारा शस्त्र पूजन किया गया । विजयादशमी उत्सव का संचालन शाखा कार्यवाह रंजीत जी ने किया।

स्वयंसेवक सतर्क होकर राष्ट्र रक्षा के लिए कार्य करें — रमेश जी

काशी मध्य के चांदपुर औद्योगिक संस्थान स्थित महेश शाखा में काशी प्रान्त के प्रान्त प्रचारक रमेश जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डाॅ0 केशव बलिराम हेडगेवार ने मूल रूप से आधार अथवा जड़ों पर काम किया। विजयादशमी के अवसर पर हम रावण को जलाते हैं। रावण के दस सिर थे। भगवान श्रीराम बार-बार सिर काटते थे और वे जम आते थे। लेकिन जब भगवान श्रीराम ने रावण की नाभि में प्रहार किया तो वह मरा। इसीलिए डाॅ0 हेडगेवार ने चरित्र निर्माण को आधार बनाकर समाज की जड़ों में व्याप्त कुरीतियों के केन्द्र अथवा नाभि को भेदने का कार्य किया। हम सदियों से इसलिए गुलाम और पराजित रहे क्योंकि व्यक्ति और समाज के व्यवहार और चरित्र में भेदभाव और कुरीतियां व्याप्त थी। इसे मिटाने के लिए डाॅ0हेडगेवार ने उसी प्रकार की शक्ति समाज के बीच प्रकट किया जैसे नवरात्र की आराध्य देवी दुर्गा देवताओं की सामूहिक शक्ति से प्रकट हुई थी और देवताओं ने उन्हें अस्त्र-शस्त्र दिये। ठीक उसी प्रकार डाॅ0हेडगेवार ने संघ के माध्यम से समाज की सज्जन शक्ति को एकत्र किया।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विश्व की शक्तियों द्वारा भारत के विकास को रोकने के लिए षड़यंत्र जारी है, हम स्वयंसेवक सतर्क होकर राष्ट्र रक्षा के लिए कार्य करें। सौ वर्षाें में अर्जित हिन्दू शक्ति से श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति हो सकी और आगे विश्वनाथ मंदिर भी मुक्त होगा। इस अवसर पर स्वयंसेवकों द्वारा परम्परागत विधि से शस्त्र पूजन सम्पन्न किया गया।

बागीश्वरी नगर में काशी विभाग कार्यवाह राजेश जी ने कहा कि संघ संस्थापक परमपूज्य डा. हेडगेवार जी ने राष्ट्र की अवनति के तीन प्रमुख कारणों को समझा पहला देश के गौरवशाली इतिहास की विस्मृति, दूसरा सम्पूर्ण समाज का हित नहीं बल्कि व्यक्तिगत हित का भाव और तीसरा सामूहिक एकता की कमी। समाज के इन दोषों को दूर करने हेतु स्वाभिमानी, संस्कारित, चरित्रवान, अनुशासन एवं देशभक्ति से परिपूर्ण परन्तु व्यक्तिगत अहंकार से दूर रहने वाले लोगों के संगठन की आवश्यकता और उसके महत्व को समझकर 1925 में आज ही के दिन डा. साहब ने संघ की स्थापना की। दैनंदिन संघ की शाखा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण एवं व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की यह अनोखी पद्धति डा. साहब द्वारा विकसित की गयी।

काशी उत्तर भाग के दीनदयालपुर स्थित वाटर पार्क मैदान में आयोजित विजयादशमी उत्सव के मुख्य वक्ता काशी विभाग के सह विभाग कार्यवाह डॉ आशीष जी ने कहा कि अहंकार ही रावण का वास्तविक स्वरूप है। हमें अपने भीतर के अहंकार पर विजय प्राप्त कर सत्य, सदाचार एवं विनम्रता को अपनाना चाहिए। वक्ता ने कहा कि समाज में बदलाव की अपेक्षा करने से पहले हमें स्वयं में परिवर्तन लाना चाहिए तथा अपने परिवार से इसकी शुरुआत करनी चाहिए।

काशी उत्तर भाग के  वरुणा नगर में आयोजित विजयादशमी उत्सव को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए विभाग प्रचारक श्रीमान नितिन जी ने कहा कि संघ की स्थापना से लेकर 101वें वर्ष तक की यात्रा, स्वयंसेवक निर्माण, संगठन विस्तार, समाजसेवा एवं राष्ट्र निर्माण में योगदान का काल खण्ड रहा।  काशी महानगर के सभी 33 नगरों में विजयादशमी उत्सव का आयोजन किया गया,  कई स्थानों पर पथ संचलन का भी आयोजन रहा।


भारत की शक्ति सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना में निहित : सुभाष जी

प्रतापगढ़। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रतापगढ़ नगर द्वारा विजयादशमी उत्सव के अवसर पर राजकीय इंटर कॉलेज, प्रतापगढ़ में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचार प्रमुख श्री सुभाष जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि विजयादशमी अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। इसी पावन पर्व पर वर्ष 1925 में परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज को संगठित करना और राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना में निहित है। समाज को जाति, भाषा एवं क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता और बंधुत्व को मजबूत करना चाहिए। प्रत्येक स्वयंसेवक सेवा, संस्कार, अनुशासन और समर्पण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान दे।कार्यक्रम के पश्चात पूर्ण गणवेश में स्वयंसेवकों का विराट पथ संचलन राजकीय इंटर कॉलेज से प्रारंभ होकर घोष की मधुर ध्वनि के साथ अनुशासित कदमताल करते स्वयंसेवकों का नगर के विभिन्न मार्गों पर नागरिकों एवं सामाजिक संगठनों ने पुष्पवर्षा कर भव्य स्वागत किया। अतिथियों का परिचय जिला कार्यवाह हेमंत कुमार ने कराया। 

पथ संचलन ने नगर में अनुशासन, संगठन शक्ति, सामाजिक एकता और राष्ट्रभक्ति का संदेश दिया। जनप्रतिनिधियों एवं गणमान्य नागरिकों की उपस्थित रही। कार्यक्रम में मा0 विभाग संघचालक रमेश, विभाग प्रचारक ओमप्रकाश, विभाग कार्यवाह हरीश, मा0 जिला संघचालक चिंतामणि, मा0 सह जिला संघचालक अशोक, जिला कार्यवाह हेमन्त कुमार, जिला प्रचारक प्रवीण, नगर प्रचारक आशीष एवं नगर कार्यवाह अंकित, सुमित, सहित सहित अनेक जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, मातृशक्ति, संघ के अनेक पदाधिकारी और स्वयंसेवक उपस्थित रहे।

Sunday, October 11, 2026

नारी तू नारायणी - दुनिया उजड़ी, अपने छूटे फिर भी स्वावलंबी बनने से स्वावलंबी बनाने त​क की यात्रा पूरी की

गुंजन नंदा ने निरंतर संघर्ष किया, 22 प्रांतों की 1300 बालिकाओं को मिल रही शिक्षा और संस्कार

जीवन है तो किसी न किसी रूप में संघर्ष का सामना होगा ही। संघर्षों का सामना जिसने किया, जीवन उसी ने जिया। यह अटल सत्य है कि जिसने भी जीवन में संघर्ष किया है, उसने समाज को कुछ न कुछ अवश्य दिया है। जीवन-यात्रा में संघर्ष, साहस, आत्मनिर्भरता और सेवा की ऐसी ही प्रेरक कहानी है जौनपुर में जन्मी गुंजन नंदा की। जिन्होंने जीवन के प्रारम्भ से दुखों का सामना करते हुए स्वयं को स्वावलम्बी बनाने के साथ समाज की महिलाओं को भी स्वावलम्बी बना रही हैं।

चार अगस्त 1977 को सामान्य परिवार में जन्मी गुंजन ने बहुत कम उम्र में जीवन की कठोर वास्तविकताओं को देखा। जब वह मात्र आठ वर्ष की थीं. तभी हृदयाघात के कारण उनके पिता का निधन हो गया। पिता का स्नेह, संरक्षण और मार्गदर्शन अचानक उनसे छिन गया। ऐसे कठिन समय में उनके चाचा और भाइयों ने उन्हें संभाला तथा उनकी पढ़ाई और परवरिश को आगे बढ़ाया। उनकी जीवन-यात्रा बताती है कि परिस्थितियाँ जीवन की दिशा बदल सकती हैं, लेकिन मंजिल तय नहीं कर सकतीं।

रास्ते कितने भी कठिन हों, यदि हौसला जीवित हो तो मंजिल तक पहुँचा जा सकता है।" हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद अक्टूबर 1993 में उनका विवाह एक संपन्न परिवार में हुआ। अगस्त 1994 में उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। मातृत्व की यह खुशी उनके जीवन की सबसे सुंदर अनुभूतियों में से एक थी, लेकिन बेटी अभी केवल दस महीने की थी कि उसके पिता का असमय निधन हो गया।

बहुत छोटी उम्र में पति को खो देना उनके लिए जीवन का दूसरा बड़ा आघात था। एक ओर छोटी बच्ची की जिम्मेदारी थी और दूसरी ओर स्वयं को संभालने की चुनौती। उन्होंने ससुराल में रहने का निर्णय लिया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अपने ही घर में परायेपन का अनुभव होने लगा। भावनात्मक और मानसिक संघर्ष इतना बढ़ गया कि लगभग डेढ़ वर्ष बाद वे पूरी तरह टूट गई और जीवन समाप्त करने का प्रयास तक किया। उपचार के बाद उनके भाइयों ने उन्हें वापस जौनपुर ले जाने का निर्णय लिया।

इस वापसी के साथ उन्हें अपनी बेटी को उसकी पढ़ाई और परवरिश के लिए वहीं छोड़ना पड़ा। एक माँ के लिए अपनी बच्ची से दूर होना उनके जीवन का सबसे गहरा दर्द था। बाद में बेटी से मिलने का रास्ता भी पूरी तरह बंद हो गया। इसी पीड़ा ने उनके भीतर एक संकल्प जन्म दिया कि "मैं अपने जीवन को इस तरह सेवासँगी कि एक दिन मेरी बेटी को मेरे संघर्ष पर गर्व हो।"

शिक्षा से स्वावलंबन की ओर : भाइयों ने उनका इंटरमीडिएट का फॉर्म भरवाया और उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की। आगे पढ़ने की इच्छा के साथ उन्होंने यह निर्णय लिया कि पढ़ाई का खर्च अपने स्वाभिमान के साथ स्वयं उठाएँगी। माँ के सुझाव पर उन्होंने सिलाई सीखना शुरू किया और लगभग चार महीने में अच्छे कपड़े सिलने लगीं। छोटी-छोटी आमदनी ने उनके भीतर यह विश्वास पैदा किया कि वे अपने जीवन को स्वयं संभाल सकती हैं।

सिलाई के साथ उन्होंने बी.ए. में प्रवेश लिया, ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और विद्यालय में नौकरी भी की। इसी दौरान उन्होंने कंप्यूटर शिक्षा भी प्राप्त की। विद्यालय में प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्य करते हुए उनके मन में विचार आया कि बच्चों को अकादमिक शिक्षा के साथ कंप्यूटर शिक्षा भी मिलनी चाहिए। उन्होंने बिना घर में बताए अपनी बचत के लगभग 50,000 रुपये से एक कंप्यूटर खरीदा और विद्यालय में रखवा दिया। बच्चों को कंप्यूटर सिखाना शुरू किया।

जब बड़े भाई को इसकी जानकारी हुई तो घर में नाराजगी हुई, लेकिन गुंजन को संतोष था कि उन्होंने बच्चों के भविष्य के लिए एक सार्थक पहल की है। इस घटना ने उनके भीतर यह विश्वास और मजबूत किया कि सही उद्देश्य के लिए छोटे-से-छोटे प्रयास भी बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।

उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 2000 में एम.ए. में प्रवेश लिया। उनके लिए शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि आत्मविश्वास वापस पाने का रास्ता थी।

गुंजन को मिला दूसरा : अवसर परिवार में दूसरी शादी की बात चली तो उन्होंने कई बार मना किया। पिछले अनुभवों की पीड़ा और भविष्य की आशंकाएँ उनके मन में थीं। जौनपुर जैसे शहर में एक युवा विधवा के लिए अपने दम पर जीवन आगे बढ़ाना कठिन था। वाराणसी से रिश्ता आया और उन्होंने इसे जीवन का दूसरा अवसर मानकर फरवरी 2001 में दूसरा विवाह स्वीकार किया। वाराणसी, अर्थात काशी, उनके जीवन में नई शुरुआत का द्वार बनी। उन्होंने जेटकिंग, पेंटासॉफ्ट और हैप्पी होम जैसी संस्थाओं में काम किया तथा बाद में यूरेका फोर्ब्स लिमिटेड में सीआरआर के रूप में कार्य किया। लगभग तीन वर्षों बाद उन्होंने इसकी सर्विस फ्रेंचाइजी ले ली। व्यवसाय आगे बढ़ा, आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और उन्होंने अपना नया घर लिया। इसी बीच पुत्र का जन्म हुआ।

वर्ष 2008: एक और परीक्षा : वर्ष 2008 में बीमारी के कारण उनके पति का निधन हो गया। पाँच वर्ष के बेटे की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर थी। लेकिन इस बार वे वह गुंजन नहीं थीं जो परिस्थितियों के सामने टूट गई थीं। पहले के संघर्षों ने उन्हें भीतर से मजबूत कर दिया था।

उन्होंने यूरेका फोर्ब्स का सर्विस सेंटर संभालना जारी रखा। साथ ही एक पार्लर शुरू किया, जहाँ सेवाओं के साथ प्रशिक्षण भी दिया जाता था। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत बुटीक के क्षेत्र में कार्य शुरू किया। माँ की चुनरियों पर गोटा लगाने से शुरू हुआ काम धीरे-धीरे बोक स्तर तक पहुँचा और ग्रामीण महिलाओं को भी रोजगार तथा व्यापार का अवसर मिलने लगा। यहीं उनके व्यवसाय की सोच बदली। व्यवसाय अब केवल उनकी आय का साधन नहीं रहा, बल्कि दूसरी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम भी बन गया।

बेटे की शिक्षा: सबसे बड़ी उपलब्धि : बेटे की शिक्षा हमेशा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रही। उनके बेटे ने द आर्यन इंटरनेशनल स्कूल, वाराणसी से हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा पूरी की, VIT वेल्लोर से बी.टेक. किया और वर्तमान में TCS में कार्यरत है। बेटे को आत्मनिर्भर देखकर उन्हें लगता है कि उनके वर्षों के संघर्ष व्यर्थ नहीं गए।

पत्रकारिता और सामाजिक सेवा : शिक्षा और लेखन के प्रति रुचि ने उन्हें पत्रकारिता की ओर भी प्रेरित किया। उन्होंने बी.ए. और एम.ए. पत्रकारिता से किया। आज वे समाचार-पत्रों और पुस्तिकाओं में लेखन के साथ पुस्तक लेखन से भी जुड़ी हैं। प्रिंट मीडिया में 'एक संदेश' और 'जगप्रकाश हिंदी दैनिक' में ब्यूरो चीफ तथा जिला संवाददाता के रूप में कार्य कर रही हैं। उनके लिए पत्रकारिता समाज की समस्याओं, लोगों की आवाज और सकारात्मक बदलाव को सामने लाने का माध्यम है।

काशी यूनिवर्सल फाउंडेशन की अध्यक्ष के रूप में वे सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी हैं। संस्था VWSPL, नगर निगम वाराणसी से अधिकृत होकर वेस्ट मैनेजमेंट और सेग्रीगेशन के क्षेत्र में कार्य करती हैं। विभिन्न वार्डों में IEC गतिविधियों के माध्यम से लोगों को कचरा प्रबंधन, कचरे के पृथक्करण और स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है।

बेटी से समाज की बेटियों तक : बेटी से बिछड़ने का दर्द आज भी उनके भीतर है, लेकिन उन्होंने उस पीड़ा को कमजोरी नहीं बनने दिया। आज समाज की हर बेटी में उन्हें अपनी बेटी की झलक दिखाई देती है। यही भावना उन्हें बेटियों की सुरक्षा, सम्मान, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के विषयों से जोड़ती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार परिवार से जुड़ने के बाद समाज और राष्ट्र के प्रति उनकी दृष्टि और व्यापक हुई। उन्होंने अनुभव किया कि राष्ट्र निर्माण बड़े मंचों से ही नहीं, बल्कि जागरूक परिवारों, संस्कारित समाज और जिम्मेदार नागरिकों से होता है। इसमें महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास और महिलाओं से संवाद ने उनके अनुभवों को और व्यापक किया। उन्होंने महसूस किया कि परिस्थितियाँ भले अलग हों, लेकिन महिलाओं में आगे बढ़ने की आकांक्षा, परिवार के लिए बेहतर करने की इच्छा और समाज के प्रति योगदान की भावना समान है। आज उनका प्रयास केवल स्वयं आगे बढ़ने का नहीं, बल्कि दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ाने का है। उनका विश्वास है "परिवार हमारी पहली जिम्मेदारी है, लेकिन हमारी क्षमताओं की अंतिम सीमा नहीं।

उनकी जीवन-यात्रा बताती है कि परिस्थितियाँ जीवन की दिशा बदल सकती है, लेकिन मंजिल तय नहीं कर सकतीं। पिता की कमी ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया, पति को खोने ने जिम्मेदारी उठाना सिखाया, बेटी से दूरी ने त्याग और धैर्य का अर्थ समझाया, आर्थिक संघर्ष ने मेहनत का मूल्य बताया, शिक्षा ने आत्मविश्वास दिया, व्यवसाय ने स्वावलंबन और सामाजिक कार्य ने सेवा का अर्थ समझाया।

Tuesday, September 8, 2026

भारत हमारी शक्ति, तन—मन—धन से राष्ट्र की आराधना करे- सुभाष जी


गाजीपुर। भारत हमारी हस्ती और यही हमारी शक्ति है, तन से, मन से, धन से राष्ट्रदेव की आराधना करे। यह आह्वान मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुभाष जी ने किया। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गाजीपुर द्वारा आयोजित संघ शताब्दी वर्ष के क्रम में प्रमुख जन गोष्ठी को सम्बोधित कर रहे ​थे।

संघ द्वारा समाज परिवर्तन के पंच प्रण में पंचमुखी विकास योजना, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व का बोध स्वदेशी, नागरिक कतर्व्य, कार्य का विस्तार, कार्य की गुणवत्ता, सामाजिक परिवर्तन, विमर्श, सज्जन शक्ति जैसे दस बिन्दू पर आधारित संवाद कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता ने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष चल रहा है। गत वर्ष से 101वां वर्ष मना रहे है, इस सौ वर्ष की यात्रा सहज व समान्य नही थी। संघ के जीवन मे उपहास व आपातकाल जैसे परस्थितियो को झेला है। इस सौ साल में कितने पड़ाव आये और कितने झेलने पड़े। उन्होंने कहा कि संघ हम सबके उपासना का केन्द्र रहा है। संघ ने प्रारम्भ से ही यह कहा है कि संगठित रहेंगे तो ठीक रहेंगे। हम विश्व गुरू की परिकल्पना को लेकर चल रहे है सन् 1898 मे शिकागो से लौटे स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि दर्शन बड़ा, की ज्ञान बड़ा, गुरू से पुछा तो उन्होने चार दिन का समय लिया। तत्पश्चात उन्होंने बताया कि ज्ञान वहीं समाप्त हो जाता है जहां व्यवहार मे कोई दोष हो जाये, कितना भी ज्ञानी आप हो जाये, आपके व्यवहार में कोई दोष निकल जाये तो आपके सारे ज्ञान धरे के धरे रह जायेंगे। विवेकानन्द ने तीन काम पर जोर देने की बात किया, भारत के समाज को संगठित करना, सुमति कुमति, व्यक्ति निर्माण करना, चिन्तन स्मृतियां भगवत गीता मे है। उन्होंने आगे कहा कि भारत में तीन एम मार्क्स, मैकाले व मिल थे, जो भारती की सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा पर कुठाराघात किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे एक घंटा नित्य की शाखा मे कोई भी आये तो उसे संगठन के बारे मे सब कुछ धीरे—धीरे ज्ञात हो जायेगा। शाखा गंगा की धारा है, सारे हिन्दू भाई चुनौतियों का संकल्प लेते हैं। इस कालखण्ड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरकार और सेना से मिलकर काम करता है। अगले क्रम में संवाद कार्यक्रम में प्रश्नो के माध्यम से सुभाष जी ने सभी की जिज्ञासा का समाधान किया। संवाद कार्यक्रम के पश्चात पंच प्रण, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व का बोध स्वदेशी, नागरिक कतर्व्य, कार्य का विस्तार, कार्य की गुणवत्ता, सामाजिक परिवर्तन, विमर्श, सज्जन शक्ति के जागरण पर बल दिया। कार्यक्रम के पूर्व में सुभाष जी व मा0 जिला संघचालक जयप्रकाश, मा0 नगर संघचालक सर्वजीत ने संयुक्त रूप से भारत माता व प0पू0 डा. केशव बलिराम हेडगेवार, प0पू0 सदाशिव राव गोलवरकर गुरूजी की चित्र पर माल्यापर्ण कर दीपप्रज्जवलित किया। शुभारम्भ राष्ट्रगीत वन्दे मातरम से हुआ। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया। अतिथियों का परिचय नगर कार्यवाह हर्ष तथा मंच संचालन सेवा प्रमुख अनुज राय ने किया। इस अवसर पर जिला प्रचारक प्रभात, प्रचार प्रमुख चंद्र कुमार एवं गाजीपुर के प्रत्येक क्षेत्र के गणमान्य सज्जन शक्ति उपस्थित रहे।

 


Monday, September 7, 2026

“विभाजन के बजाय जोड़ने वाले तत्वों पर बल देने से दुनिया बेहतर स्थान बन जाएगी” – डॉ. मोहन भागवत जी

“स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं”

“हिन्दू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं”

लंदन, 06 सितम्बर 2026। न्यूयॉर्क, अमेरिका में 29 अगस्त तथा टोरंटो, कनाडा में 31 अगस्त को संबोधन के पश्चात्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने 6 सितम्बर को यूनाइटेड किंगडम के लंदन में आयोजित ‘Celebration of Oneness’ (एकात्मता का उत्सव) कार्यक्रम के दौरान संघ की 100 वर्षों की यात्रा से संबंधित विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते हुए संघ की दृष्टि को रेखांकित किया। “संघ का ऐसा कौन-सा एक तत्व है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “यदि मुझे एक ही सिद्धांत का उल्लेख करना हो, तो मैं ‘अपनापन’ कहूंगा, जिसका अर्थ है सभी के प्रति शुद्ध, सात्त्विक प्रेम। व्यक्ति, समुदाय, समाज और समूची मानवता के प्रति प्रेम- यही हिन्दू का पारंपरिक स्वभाव है। हिन्दू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।”

संघ की सेवा गतिविधियों के संबंध में डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा,“स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनके कार्य के पूरे विस्तार का सार प्रस्तुत करना कठिन है। राजनीतिक कारणों से हमारा विरोध करने वाले लोग भी हमारे कार्य तथा स्वयंसेवकों के गुणों और योगदान को स्वीकार करते हैं। समय-समय पर वे महत्वपूर्ण विषयों पर हम से सहयोग की अपेक्षा करते हैं और हमसे संवाद भी करते हैं। यह समाज के विभिन्न वर्गों में हमारे कार्य की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। जहां कोई कुछ नहीं कर रहा होता, वहां संघ सेवा कर रहा होता है – लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक।”

अगले 100 वर्षों के लिए संघ के लिए एक प्रमुख संदेश के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संघ को अगले सौ वर्षों तक भी वही कार्य निरंतर आगे बढ़ाना होगा, जो उसने अब तक किया है। उन्होंने कहा, “सबसे पहले मेरे मन में यह बात आती है कि सारे कार्यों को पूरा करने में इतना समय नहीं लगना चाहिए। अभी मेरी तीसरी पीढ़ी कार्य कर रही है। संघ में अब दो पीढ़ियां और भी साथ काम कर रही हैं। इस प्रकार पांच पीढ़ियां साथ काम कर रही हैं। सातवीं पीढ़ी आने से पहले हिन्दू समाज के संगठन का कार्य पूरा हो जाना चाहिए।”

‘विश्व के लिए हिन्दू सभ्यता का ऐसा क्या योगदान है, जिसकी विशेष आवश्यकता है” – इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “सभी हिन्दू विचार इसी एक सूत्र पर आधारित रहे हैं कि प्रत्येक कर्म के पीछे कोई कारण है। अस्तित्व वास्तव में एक है, यद्यपि वह विविध दिखाई देता है। विविधता हमारा स्वभाव है। इसलिए हमें उसे स्वीकार करना है और उसका सम्मान करना है। लेकिन विविधताओं के साथ इस बात को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करना होगा कि ये अस्तित्व की एकता के विभिन्न शृंगार हैं। एक ही अनेक हुआ है, इसलिए अनेक का सम्मान किया जाता है। सब एक हैं। इसी आधार पर हम हर विषय को देखते और उससे व्यवहार करते हैं।”

उन्होंने कहा, “हिन्दू’ शब्द को हम किसी धार्मिक आचरण या जीवन-शैली के आधार पर नहीं समझ सकते। हिन्दू एक प्रकृति है। समाज को ऐसी प्रकृति की आवश्यकता है, जो सभी विविधताओं को स्वीकार करे और उनका सम्मान करे, क्योंकि उसका विश्वास है कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं। सभी विविधताएं एकता की ही विविध अभिव्यक्तियां हैं। इसलिए जब हम उस एकता को देखते हैं, तब सभी विविधताओं का सम्मान और स्वीकार करना संभव होता है। यही हिन्दू विचार है, यही हिन्दू प्रकृति है। हिन्दू समाज और भारत के इतिहास में यही दिखाई देता है। इसलिए जब हम हिन्दू कहते हैं, तो यह कोई धर्म नहीं है। यह केवल एक शब्द भी नहीं है। हिन्दू धर्म की विभिन्न परंपराएं अपनी विशिष्ट दर्शन-पद्धतियों और आचरण के साथ इस व्यापक हिन्दू सभ्यतागत परिवेश के भीतर अस्तित्व में रह सकती हैं।” उन्होंने यह बात ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में कही।

भविष्य की पीढ़ी की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उन्हें नई पीढ़ी पर अधिक विश्वास है। उनमें दुनिया को बेहतर बनाने की तीव्र आकांक्षा है और इस उद्देश्य के लिए वे विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठने को तैयार हैं। “वे अधिक ईमानदार होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्वाभाविक रूप से ऐसा होता है कि हम अनेक अनुभवों से गुजरते हैं और इसलिए अधिक सतर्क हो जाते हैं। हम हर समय खुलकर नहीं बोलते। हम यह सोचते रहते हैं कि आगे क्या होगा, क्योंकि हमें पता होता है कि क्या-क्या हो सकता है। युवा पीढ़ी के पास ऐसे अनुभव नहीं होते। यदि उन्हें कुछ सही लगता है, तो वे उसे सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं और उसी के अनुसार कार्य करते हैं। वे परिणामों को लेकर चिंतित नहीं होते, क्योंकि वे युवा हैं। इसलिए यदि हम उन्हें यह उद्देश्य दें और अपने अनुभव से प्राप्त आवश्यक ज्ञान तथा दृष्टि प्रदान करें, बिना उसे उन पर थोपे, तो हमें उन्हें अपना मार्ग स्वयं खोजने देना चाहिए।”

भारत के सामने भविष्य की चुनौतियों से निपटने में युवा हिन्दुओं की भूमिका के संबंध में सरसंघचालक जी ने कहा कि युवा पीढ़ी का दायित्व अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीना है। इसलिए सेवा के क्षेत्र में भी उन्हें यही भाव रखना होगा। “सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सेवा ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिससे आप महान बनते हैं। यह उपकार नहीं है और न ही यह ऐसा कुछ है जो आप मानवता पर किसी करुणा के रूप में कर रहे हैं। हम कहते हैं कि सेवा ईश्वर के निकट जाने का आपका अवसर है। आप जिनकी सेवा कर रहे हैं, उन पर कोई उपकार नहीं कर रहे। वे आपको सेवा का अवसर देकर आपके ऊपर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं। इसलिए सेवा इसी भाव के साथ की जानी चाहिए।”

ब्रिटिश हिन्दुओं की निष्ठा को लेकर यूनाइटेड किंगडम में उठाए जाने वाले प्रश्न तथा एक ब्रिटिश स्वयंसेवक से संघ की अपेक्षाओं के संबंध में अंतिम प्रश्न पूछा गया। इसका उत्तर देते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “कोई संघर्ष नहीं है। यदि ब्रिटिश हिन्दू अच्छे, पक्के और सच्चे हिन्दू हैं, तो ब्रिटेन और भारत के हितों के बीच कभी कोई संघर्ष नहीं होगा। यदि कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश हिन्दू ब्रिटेन के साथ जाएंगे। अपवाद हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व इस विषय पर स्पष्ट है। आपकी कर्मभूमि ही वह स्थान है, जहां आपकी निष्ठा होती है। आपकी जन्मभूमि – अर्थात आपकी उत्पत्ति या जन्म का स्थान – और आपकी पुण्यभूमि वह स्थान है, जहां से आपको अपने मूल्य प्राप्त होते हैं। आपको उन्हीं मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में जीना है और जिस भूमि पर आप रहते हैं, उसकी सेवा करनी है।”

हिन्दुओं के एकजुट न होने की धारणा तथा एकता के सार के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा, “यदि आप श्रोताओं को देखें या सामान्य रूप से समाज को देखें, तो मानव समाज में विविधता है और यह स्वाभाविक है। हमें इसके साथ चलना है। लेकिन अपना जोर इस बात पर होना चाहिए कि हमें क्या जोड़ता है, न कि इस बात पर कि हमें क्या विभाजित करता है। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हमारे समुदाय, हमारा समाज समृद्ध होगा और दुनिया एक बेहतर स्थान बनेगी। हमें यही करना होगा।”

इस संवाद का संचालन यूनाइटेड किंगडम निवासी वेलनेस विशेषज्ञ ममता सुब्रह्मण्यम ने किया। हिन्दू स्वयंसेवक संघ, यूनाइटेड किंगडम  (HSS UK) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 600 लोग उपस्थित रहे, उन्होंने 326 संगठनों का प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम में हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य, सांसद (हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य), मेयर, काउंसिलर्स तथा यूनाइटेड किंगडम में भारत के उच्चायुक्त पेरियासामी कुमारन, उप उच्चायुक्त कार्तिक पांडे सहित समुदाय के अन्य प्रमुख नेता उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत नेपाल में आई बाढ़ के कारण जान गंवाने वाले लोगों तथा विस्थापित परिवारों की स्मृति में मौन रखकर हुई। कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि Sewa UK ने नेपाल में राहत कार्यों के लिए अंश दान के माध्यम से 1,00,000 पाउंड जुटाए हैं।

सरसंघचालक जी की यह यात्रा आरएसएस के शताब्दी वर्ष के तहत सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मूल्यों पर केंद्रित सभ्यतागत संवाद कार्यक्रम का हिस्सा है। लंदन प्रवास के दौरान सरसंघचालक जी ने विभिन्न धर्मों के प्रमुख नेताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा अन्य सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों से मुलाकात की। अंतरधार्मिक संवाद के अंतर्गत उन्होंने श्री स्वामीनारायण मंदिर, विल्सडन, खालसा जत्था ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा तथा लंदन के अन्य धार्मिक स्थलों का भी दौरा किया। यूके में हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों और भाषायी विविधता का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 भाषा-समुदायों ने भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

Monday, August 31, 2026

भारत के मौलिक दर्शन को मानने वालों का संगठन है संघ – डॉ. कृष्ण गोपाल जी


काशी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, काशी महानगर द्वारा चौकाघाट स्थित गिरजा देवी सांस्कृतिक संकुल के सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित प्रमुखजन संवाद-संगोष्ठी में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के मौलिक दर्शन को मानने वालों का संगठन है। अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान को सुरक्षित रखते हुए युगानुकूल तकनीक को स्वीकार कर समाज में संगठन का कार्य संघ कर रहा है। हिन्दू समाज दुनिया को बचाने का एकमात्र आधार है, परन्तु सबसे पहले हिन्दू समाज को अपना घर सुव्यवस्थित करना होगा।

उन्होंने कहा कि 100 वर्षों की संघ यात्रा रोचक और रोमांचकारी है। यद्यपि इस कालखण्ड में संघ को अनेक समस्याएं झेलनी पड़ी, परन्तु संघ ने युगानुकूल परिवर्तन कर समाज को एकत्रित करने का कार्य जारी रखा। प्राचीन भारत गणित, ग्रह गति, वस्त्र विन्यास, कृषि, रसायन विज्ञान, मानव शरीर रचना विज्ञान में विश्व में अग्रणी था। नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला जैसे विश्व विख्यात विश्वविद्यालय भारत में थे। विश्व अर्थव्यवस्था में 30 प्रतिशत भारत का योगदान था। मानवीय मस्तिष्क की जो भी उच्चतम कृति हो सकती है, वह सब भारत में बनती थी। परन्तु हजारों वर्षों के संघर्ष के कारण शस्य श्यामला भूमि अकाल ग्रस्त होने लगी। संघ संस्थापक पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने समस्याओं के समाधान के तीन मुख्य बिन्दु बताए। प्रथम – भारतीय नागरिकों के मन में देशभक्ति भाव का जागरण करना, दूसरा – समाज जीवन में आत्मविश्वास की वृद्धि करना और तीसरा – पूर्वजों की कीर्ति को ध्यान में रखकर उसके अनुरूप कार्य करना। अंग्रेजों का कथन था कि भारतीय अकर्मण्य है, प्रशासनिक समझ नहीं है एवं आर्य बाहर से आए हैं। डॉ. हेडगेवार ने इन भ्रांतियों को हटाने का कार्य प्रारम्भ किया।

सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि आज 90 हजार से अधिक शाखाएं और 50 लाख से अधिक स्वयंसेवक एक समान उद्देश्य को लेकर देशहित में अपना समय देते हैं। सामाजिक जीवन में बदलाव के लिए स्वयंसेवक अनेक संगठन चला रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती, श्रमिकों के मध्य भारतीय मजदूर संघ, सेवा के क्षेत्र में सेवा भारती, वनवासी समाज के मध्य वनवासी कल्याण आश्रम जैसे अनेकों समूह समाज की विषमता को दूर करने का कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति से सचेत रहने का आग्रह किया। साथ ही विश्व में व्याप्त असहिष्णुता को समाप्त करने का आह्वान किया। श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए एक प्रश्न के उत्तर में सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि 1947 में दुनिया के सभी देश मानते थे कि भारत एक राष्ट्र के रूप में लम्बे समय तक नहीं टिक सकता, वह देश बिखर जाएगा। परन्तु आज शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की यात्रा अनवरत जारी है। कोरोना काल में भारत एकमात्र देश रहा, जहां लाखों लोगों को प्रतिदिन नि:शुल्क भोजन प्राप्त हो रहा था।

भारत में हिन्दू वह व्यक्ति है, जो इस देश को मातृभूमि मानता हो, सभी मत-पंथों के प्रति श्रद्धावान रहे। हिन्दू सांस्कृतिक अधिष्ठान है जो अनन्त विविधताओं को साथ लेकर चलता है। यह ”वे ऑफ लाइफ” है। स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका के प्रश्न पर डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार स्वयं दो बार स्वतंत्रता संग्राम में जेल गए थे। डॉ. हेडगेवार ने राजगुरु एवं सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों की सहायता भी की थी। संघ के स्वयंसेवकों ने 1942 के आन्दोलन में जेल यात्रा की थी। ज़ेन-ज़ी को धर्म और संस्कृति का संस्कार देने के प्रश्न पर कहा कि सभी हिन्दू परिवारों को युवाओं के साथ चर्चा करनी चाहिए। युवाओं को यह बताना आवश्यक है कि युगानुकूल परिवर्तन के लिए हिन्दू धर्म सदैव तैयार है। उनके मन में दूसरों के प्रति आत्मीयता बढ़ानी होगी।

उन्होंने कहा कि वास्तव में धर्म कर्तव्य का बोध है। वहीं धर्म का दूसरा पक्ष उसे गुण विशेष बनाता है। मातृधर्म, राजधर्म, जल का धर्म, वायु का धर्म इत्यादि से धर्म की व्याख्या की। धर्म परिवर्तन नहीं हो सकता, वह मात्र मतांतरण होता है। कमजोर वर्गों को सम्भालना हमारी जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने कहा कि राष्ट्रधर्म सर्वोच्च है। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। निवेदिता शिक्षा सदन की बालिकाओं ने वन्देमातरम, एकल गीत प्रभात ने प्रस्तुत किया। संचालन विभाग कार्यवाह राजेश विश्वकर्मा एवं धन्यवाद ज्ञापन संजय चौरसिया ने किया।

प्रमुख जन संवाद संगोष्ठी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 अजीत चतुर्वेदी, चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ0एस.एन.शंखवार जी, प्रसिद्ध उद्यमी आर.के.चौधरी, पद्मश्री देवी प्रसाद द्विवेदी, प्रख्यात साहित्यकार डा.नीरजा माधव, समाजसेवी सूर्यकान्त जालान, प्रान्त कार्यवाह मुरली पाल जी, सह प्रान्त कार्यवाह डा0 राकेश जी, प्रान्त प्रचारक रमेश जी, सह प्रान्त प्रचारक सुनील जी, प्रो0 मंजू द्विवेदी, डॉ आनन्द प्रभा सिंह, मीना चौबे सहित बड़ी संख्या में काशी महानगर के गणमान्य एवं प्रबुद्धजन मातृशक्ति उपस्थित रही।