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Sunday, October 11, 2026

नारी तू नारायणी - दुनिया उजड़ी, अपने छूटे फिर भी स्वावलंबी बनने से स्वावलंबी बनाने त​क की यात्रा पूरी की

गुंजन नंदा ने निरंतर संघर्ष किया, 22 प्रांतों की 1300 बालिकाओं को मिल रही शिक्षा और संस्कार

जीवन है तो किसी न किसी रूप में संघर्ष का सामना होगा ही। संघर्षों का सामना जिसने किया, जीवन उसी ने जिया। यह अटल सत्य है कि जिसने भी जीवन में संघर्ष किया है, उसने समाज को कुछ न कुछ अवश्य दिया है। जीवन-यात्रा में संघर्ष, साहस, आत्मनिर्भरता और सेवा की ऐसी ही प्रेरक कहानी है जौनपुर में जन्मी गुंजन नंदा की। जिन्होंने जीवन के प्रारम्भ से दुखों का सामना करते हुए स्वयं को स्वावलम्बी बनाने के साथ समाज की महिलाओं को भी स्वावलम्बी बना रही हैं।

चार अगस्त 1977 को सामान्य परिवार में जन्मी गुंजन ने बहुत कम उम्र में जीवन की कठोर वास्तविकताओं को देखा। जब वह मात्र आठ वर्ष की थीं. तभी हृदयाघात के कारण उनके पिता का निधन हो गया। पिता का स्नेह, संरक्षण और मार्गदर्शन अचानक उनसे छिन गया। ऐसे कठिन समय में उनके चाचा और भाइयों ने उन्हें संभाला तथा उनकी पढ़ाई और परवरिश को आगे बढ़ाया। उनकी जीवन-यात्रा बताती है कि परिस्थितियाँ जीवन की दिशा बदल सकती हैं, लेकिन मंजिल तय नहीं कर सकतीं।

रास्ते कितने भी कठिन हों, यदि हौसला जीवित हो तो मंजिल तक पहुँचा जा सकता है।" हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद अक्टूबर 1993 में उनका विवाह एक संपन्न परिवार में हुआ। अगस्त 1994 में उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। मातृत्व की यह खुशी उनके जीवन की सबसे सुंदर अनुभूतियों में से एक थी, लेकिन बेटी अभी केवल दस महीने की थी कि उसके पिता का असमय निधन हो गया।

बहुत छोटी उम्र में पति को खो देना उनके लिए जीवन का दूसरा बड़ा आघात था। एक ओर छोटी बच्ची की जिम्मेदारी थी और दूसरी ओर स्वयं को संभालने की चुनौती। उन्होंने ससुराल में रहने का निर्णय लिया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अपने ही घर में परायेपन का अनुभव होने लगा। भावनात्मक और मानसिक संघर्ष इतना बढ़ गया कि लगभग डेढ़ वर्ष बाद वे पूरी तरह टूट गई और जीवन समाप्त करने का प्रयास तक किया। उपचार के बाद उनके भाइयों ने उन्हें वापस जौनपुर ले जाने का निर्णय लिया।

इस वापसी के साथ उन्हें अपनी बेटी को उसकी पढ़ाई और परवरिश के लिए वहीं छोड़ना पड़ा। एक माँ के लिए अपनी बच्ची से दूर होना उनके जीवन का सबसे गहरा दर्द था। बाद में बेटी से मिलने का रास्ता भी पूरी तरह बंद हो गया। इसी पीड़ा ने उनके भीतर एक संकल्प जन्म दिया कि "मैं अपने जीवन को इस तरह सेवासँगी कि एक दिन मेरी बेटी को मेरे संघर्ष पर गर्व हो।"

शिक्षा से स्वावलंबन की ओर : भाइयों ने उनका इंटरमीडिएट का फॉर्म भरवाया और उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की। आगे पढ़ने की इच्छा के साथ उन्होंने यह निर्णय लिया कि पढ़ाई का खर्च अपने स्वाभिमान के साथ स्वयं उठाएँगी। माँ के सुझाव पर उन्होंने सिलाई सीखना शुरू किया और लगभग चार महीने में अच्छे कपड़े सिलने लगीं। छोटी-छोटी आमदनी ने उनके भीतर यह विश्वास पैदा किया कि वे अपने जीवन को स्वयं संभाल सकती हैं।

सिलाई के साथ उन्होंने बी.ए. में प्रवेश लिया, ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और विद्यालय में नौकरी भी की। इसी दौरान उन्होंने कंप्यूटर शिक्षा भी प्राप्त की। विद्यालय में प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्य करते हुए उनके मन में विचार आया कि बच्चों को अकादमिक शिक्षा के साथ कंप्यूटर शिक्षा भी मिलनी चाहिए। उन्होंने बिना घर में बताए अपनी बचत के लगभग 50,000 रुपये से एक कंप्यूटर खरीदा और विद्यालय में रखवा दिया। बच्चों को कंप्यूटर सिखाना शुरू किया।

जब बड़े भाई को इसकी जानकारी हुई तो घर में नाराजगी हुई, लेकिन गुंजन को संतोष था कि उन्होंने बच्चों के भविष्य के लिए एक सार्थक पहल की है। इस घटना ने उनके भीतर यह विश्वास और मजबूत किया कि सही उद्देश्य के लिए छोटे-से-छोटे प्रयास भी बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।

उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 2000 में एम.ए. में प्रवेश लिया। उनके लिए शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि आत्मविश्वास वापस पाने का रास्ता थी।

गुंजन को मिला दूसरा : अवसर परिवार में दूसरी शादी की बात चली तो उन्होंने कई बार मना किया। पिछले अनुभवों की पीड़ा और भविष्य की आशंकाएँ उनके मन में थीं। जौनपुर जैसे शहर में एक युवा विधवा के लिए अपने दम पर जीवन आगे बढ़ाना कठिन था। वाराणसी से रिश्ता आया और उन्होंने इसे जीवन का दूसरा अवसर मानकर फरवरी 2001 में दूसरा विवाह स्वीकार किया। वाराणसी, अर्थात काशी, उनके जीवन में नई शुरुआत का द्वार बनी। उन्होंने जेटकिंग, पेंटासॉफ्ट और हैप्पी होम जैसी संस्थाओं में काम किया तथा बाद में यूरेका फोर्ब्स लिमिटेड में सीआरआर के रूप में कार्य किया। लगभग तीन वर्षों बाद उन्होंने इसकी सर्विस फ्रेंचाइजी ले ली। व्यवसाय आगे बढ़ा, आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और उन्होंने अपना नया घर लिया। इसी बीच पुत्र का जन्म हुआ।

वर्ष 2008: एक और परीक्षा : वर्ष 2008 में बीमारी के कारण उनके पति का निधन हो गया। पाँच वर्ष के बेटे की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर थी। लेकिन इस बार वे वह गुंजन नहीं थीं जो परिस्थितियों के सामने टूट गई थीं। पहले के संघर्षों ने उन्हें भीतर से मजबूत कर दिया था।

उन्होंने यूरेका फोर्ब्स का सर्विस सेंटर संभालना जारी रखा। साथ ही एक पार्लर शुरू किया, जहाँ सेवाओं के साथ प्रशिक्षण भी दिया जाता था। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत बुटीक के क्षेत्र में कार्य शुरू किया। माँ की चुनरियों पर गोटा लगाने से शुरू हुआ काम धीरे-धीरे बोक स्तर तक पहुँचा और ग्रामीण महिलाओं को भी रोजगार तथा व्यापार का अवसर मिलने लगा। यहीं उनके व्यवसाय की सोच बदली। व्यवसाय अब केवल उनकी आय का साधन नहीं रहा, बल्कि दूसरी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम भी बन गया।

बेटे की शिक्षा: सबसे बड़ी उपलब्धि : बेटे की शिक्षा हमेशा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रही। उनके बेटे ने द आर्यन इंटरनेशनल स्कूल, वाराणसी से हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा पूरी की, VIT वेल्लोर से बी.टेक. किया और वर्तमान में TCS में कार्यरत है। बेटे को आत्मनिर्भर देखकर उन्हें लगता है कि उनके वर्षों के संघर्ष व्यर्थ नहीं गए।

पत्रकारिता और सामाजिक सेवा : शिक्षा और लेखन के प्रति रुचि ने उन्हें पत्रकारिता की ओर भी प्रेरित किया। उन्होंने बी.ए. और एम.ए. पत्रकारिता से किया। आज वे समाचार-पत्रों और पुस्तिकाओं में लेखन के साथ पुस्तक लेखन से भी जुड़ी हैं। प्रिंट मीडिया में 'एक संदेश' और 'जगप्रकाश हिंदी दैनिक' में ब्यूरो चीफ तथा जिला संवाददाता के रूप में कार्य कर रही हैं। उनके लिए पत्रकारिता समाज की समस्याओं, लोगों की आवाज और सकारात्मक बदलाव को सामने लाने का माध्यम है।

काशी यूनिवर्सल फाउंडेशन की अध्यक्ष के रूप में वे सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी हैं। संस्था VWSPL, नगर निगम वाराणसी से अधिकृत होकर वेस्ट मैनेजमेंट और सेग्रीगेशन के क्षेत्र में कार्य करती हैं। विभिन्न वार्डों में IEC गतिविधियों के माध्यम से लोगों को कचरा प्रबंधन, कचरे के पृथक्करण और स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है।

बेटी से समाज की बेटियों तक : बेटी से बिछड़ने का दर्द आज भी उनके भीतर है, लेकिन उन्होंने उस पीड़ा को कमजोरी नहीं बनने दिया। आज समाज की हर बेटी में उन्हें अपनी बेटी की झलक दिखाई देती है। यही भावना उन्हें बेटियों की सुरक्षा, सम्मान, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के विषयों से जोड़ती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार परिवार से जुड़ने के बाद समाज और राष्ट्र के प्रति उनकी दृष्टि और व्यापक हुई। उन्होंने अनुभव किया कि राष्ट्र निर्माण बड़े मंचों से ही नहीं, बल्कि जागरूक परिवारों, संस्कारित समाज और जिम्मेदार नागरिकों से होता है। इसमें महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास और महिलाओं से संवाद ने उनके अनुभवों को और व्यापक किया। उन्होंने महसूस किया कि परिस्थितियाँ भले अलग हों, लेकिन महिलाओं में आगे बढ़ने की आकांक्षा, परिवार के लिए बेहतर करने की इच्छा और समाज के प्रति योगदान की भावना समान है। आज उनका प्रयास केवल स्वयं आगे बढ़ने का नहीं, बल्कि दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ाने का है। उनका विश्वास है "परिवार हमारी पहली जिम्मेदारी है, लेकिन हमारी क्षमताओं की अंतिम सीमा नहीं।

उनकी जीवन-यात्रा बताती है कि परिस्थितियाँ जीवन की दिशा बदल सकती है, लेकिन मंजिल तय नहीं कर सकतीं। पिता की कमी ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया, पति को खोने ने जिम्मेदारी उठाना सिखाया, बेटी से दूरी ने त्याग और धैर्य का अर्थ समझाया, आर्थिक संघर्ष ने मेहनत का मूल्य बताया, शिक्षा ने आत्मविश्वास दिया, व्यवसाय ने स्वावलंबन और सामाजिक कार्य ने सेवा का अर्थ समझाया।