Friday, September 6, 2013
Saturday, July 27, 2013
Sunday, July 7, 2013
स्वामी विवेकानन्द ने काशी से ही शिकागो जाने निर्णय लिया था
भगवान शंकर की पवित्र नगरी काशी में ही स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद शिकागो जाने का निर्णय लिया था। वर्ष 1889 में प्रतिज्ञा की थी कि ‘शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि’ (आदर्श की उपलब्धि करूंगा, नहीं तो देह का ही नाश कर दूंगा)।
अर्दली बाजार स्थित ‘गोपाल लाल विला’ (अब एलटी कालेज परिसर) से स्वामी विवेकानंद का जन्म से नाता रहा है, वह यहां अनेक बार स्वास्थ्य लाभ के लिए आए। कई संदर्भ इतिहास के पन्नों में मिलता है। वह प्रवास स्थल आज भी है। यह कभी ‘गोपाल लाल विला’ के नाम से जाना जाता था। स्वामी जी ने ‘गोपाल लाल विला’ को अपने स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से उत्तम स्थान माना था। स्वामीजी ने भगिनी निवेदिता, स्वामी ब्रतानंद व सुश्री वुली बुल को जो पत्र लिखा था, उसमें इसका उल्लेख है। स्वामी विवेकानंद ने काशी की अंतिम यात्रा 1902 में की थी। उस दौरान वह बीमार थे। वह ‘गोपाल लाल विला’ में ठहरे व एक महीने तक यहीं स्वास्थ्य लाभ किया। 14 मार्च, 1902 को यहां से बहन निवेदिता को भेजे पत्र में लिखा था कि ‘मुझे सांस लेने में काफी तकलीफ है। यहां आम, अमरूद के बड़े-बड़े पेड़ हैं, गुलाब का खूबसूरत बगीचा है और तालाब में सुंदर कमल खिले रहते हैं। ये जगह मेरे स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। यहां से कुछ मील दूर बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ भी है।’ (पत्रवली नामक किताब में यह प्रकाशित है)। कुछ दिन बाद स्वास्थ्य खराब होने के कारण स्वामीजी बेलूर मठ चल गए। चार जुलाई, 1902 को महामानव विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए। 39 वर्ष पांच माह और 24 दिन की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया।
स्वामी विवेकानंद के जन्म से पूर्व उनकी मां भुवनेश्वरी देवी ने एक रात स्वप्न में भोले शंकर को ध्यान करते देखा। उस दौरान वह संतान को लेकर बहुत परेशान थीं। मंदिरों में मन्नत मांग रही थीं। उन्होंने इस स्वप्न की बात काशी में रहने वाली अपनी एक महिला रिश्तेदार से बताई। बाकायदा इस बात का जिक्र ‘स्वामी निखिलानंद जी’ ने अपनी किताब में किया है। विवेकानंद की मां भुवनेश्वरी देवी, पिता विश्वनाथ दत्त काशी आए और सूतटोला स्थित वीरेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना की, मन्नत मांगी। बताते हैं कि जब कुछ दिनों बाद यहां से कोलकाता वापस गए तो विवेकानंद, मां की गर्भ में थे। 12 जनवरी, 1863 को उनका जन्म हुआ व मां ने उनका बचपन का नाम वीरेश्वर रखा। बाद में जब स्कूल में गए तो नरेंद्रनाथ नाम रखा गया। वर्ष 1887 में पहली बार 24 वर्ष की अवस्था में स्वामी विवेकानंद काशी आए। गोलघर स्थित दामोदर दास की धर्मशाला में ठहरे। सिंधिया घाट पर गंगास्नान के दौरान बाबू प्रमदा दास मित्र से सामना हुआ। बगैर शब्दों के दोनों के बीच संवाद हुआ। प्रमदा दास स्वामीजी को घर ले आए। इसके बाद स्वामीजी का काशी आने का सिलसिला कायम रहा और पांच बार यहां आए। पूरा देश स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयंती मना रहा है। उक्त स्थल आज सरकार द्वारा उपेक्षित है। इस ऐतिहासिक स्थल को सजाने और संवारने की जरूरत है। sabhar : Dainik jagran
अर्दली बाजार स्थित ‘गोपाल लाल विला’ (अब एलटी कालेज परिसर) से स्वामी विवेकानंद का जन्म से नाता रहा है, वह यहां अनेक बार स्वास्थ्य लाभ के लिए आए। कई संदर्भ इतिहास के पन्नों में मिलता है। वह प्रवास स्थल आज भी है। यह कभी ‘गोपाल लाल विला’ के नाम से जाना जाता था। स्वामी जी ने ‘गोपाल लाल विला’ को अपने स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से उत्तम स्थान माना था। स्वामीजी ने भगिनी निवेदिता, स्वामी ब्रतानंद व सुश्री वुली बुल को जो पत्र लिखा था, उसमें इसका उल्लेख है। स्वामी विवेकानंद ने काशी की अंतिम यात्रा 1902 में की थी। उस दौरान वह बीमार थे। वह ‘गोपाल लाल विला’ में ठहरे व एक महीने तक यहीं स्वास्थ्य लाभ किया। 14 मार्च, 1902 को यहां से बहन निवेदिता को भेजे पत्र में लिखा था कि ‘मुझे सांस लेने में काफी तकलीफ है। यहां आम, अमरूद के बड़े-बड़े पेड़ हैं, गुलाब का खूबसूरत बगीचा है और तालाब में सुंदर कमल खिले रहते हैं। ये जगह मेरे स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। यहां से कुछ मील दूर बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ भी है।’ (पत्रवली नामक किताब में यह प्रकाशित है)। कुछ दिन बाद स्वास्थ्य खराब होने के कारण स्वामीजी बेलूर मठ चल गए। चार जुलाई, 1902 को महामानव विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए। 39 वर्ष पांच माह और 24 दिन की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया।
स्वामी विवेकानंद के जन्म से पूर्व उनकी मां भुवनेश्वरी देवी ने एक रात स्वप्न में भोले शंकर को ध्यान करते देखा। उस दौरान वह संतान को लेकर बहुत परेशान थीं। मंदिरों में मन्नत मांग रही थीं। उन्होंने इस स्वप्न की बात काशी में रहने वाली अपनी एक महिला रिश्तेदार से बताई। बाकायदा इस बात का जिक्र ‘स्वामी निखिलानंद जी’ ने अपनी किताब में किया है। विवेकानंद की मां भुवनेश्वरी देवी, पिता विश्वनाथ दत्त काशी आए और सूतटोला स्थित वीरेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना की, मन्नत मांगी। बताते हैं कि जब कुछ दिनों बाद यहां से कोलकाता वापस गए तो विवेकानंद, मां की गर्भ में थे। 12 जनवरी, 1863 को उनका जन्म हुआ व मां ने उनका बचपन का नाम वीरेश्वर रखा। बाद में जब स्कूल में गए तो नरेंद्रनाथ नाम रखा गया। वर्ष 1887 में पहली बार 24 वर्ष की अवस्था में स्वामी विवेकानंद काशी आए। गोलघर स्थित दामोदर दास की धर्मशाला में ठहरे। सिंधिया घाट पर गंगास्नान के दौरान बाबू प्रमदा दास मित्र से सामना हुआ। बगैर शब्दों के दोनों के बीच संवाद हुआ। प्रमदा दास स्वामीजी को घर ले आए। इसके बाद स्वामीजी का काशी आने का सिलसिला कायम रहा और पांच बार यहां आए। पूरा देश स्वामी विवेकानन्द की 150वीं जयंती मना रहा है। उक्त स्थल आज सरकार द्वारा उपेक्षित है। इस ऐतिहासिक स्थल को सजाने और संवारने की जरूरत है। sabhar : Dainik jagran
Friday, June 21, 2013
डाॅ. अमर सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे: डाॅ. मुरली मनोहर जोषी
डाॅ. अमर सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे: डाॅ. मुरली मनोहर जोषी
वाराणसी, 21 जून। लोक लेखा समिति के अध्यक्ष एवं वाराणसी के सांसद डाॅ. मुरली मनोहर जोषी ने कहा कि संघ के वरिष्ठ प्रचारक डाॅ. अमर सिंह मेधावी, विष्लेषक और तीक्ष्ण बुद्धि के साथ गहरा चिन्तन करते हुए समस्याओं का सरल समाधान करते थे। डाॅ0 सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी और राष्ट्र सेवा के प्रति हमेशा समर्पित रहते थे। उनकी आत्मा को श्री चरणों में स्थान अवष्य मिलेगा, ऐसा विश्वास है।
उक्त बाते उन्होंने सिगरा स्थित प्रान्त कार्यालय केषव निलय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित ‘श्रद्धाँजलि’ सभा में व्यक्त की। उन्होंने कहा कि डाॅ. सिंह का अध्यात्म के प्रति गहरा लगाव था। विज्ञान के विद्यार्थी होने के कारण हर बात प्रमाण के साथ कहते थे। उनका जीवन हम सभी स्वयंसेवकों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।
क्षेत्र प्रचारक प्रमुख अषोक उपाध्याय ने कहा कि डाॅ. अमर सिंह हमारे अविभावक थे। हमेषा लोगों को हंसाते रहना उनका स्वभाव था। हर जगह मजाक-मजाक में बड़ी बात कह देते थे। षाखा के साथ कोई समझौता नहीं, षाखा उनके लिए प्राण थी। काषी प्रान्त के प्रान्त कार्यवाह डाॅ0 वीरेन्द्र जायसवाल ने कहा कि डाॅ. सिंह हमेषा प्रेरक प्रसंक सुनाते थे। आज वे षरीर से हमारेे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी पवित्र स्मृतियां हैं जो संघ कार्य के लिए प्रेरित करती रहेंगी।
काषी प्रान्त के संघचालक डाॅ0 विष्वनाथ लाल निगम ने कहा कि डाॅ. अमर सिंह अनेक दायित्वों का निर्वहन करते हुए समाज और देष सेवा के लिए पूरा जीवन समर्पित किया। प्रज्ञा प्रवाह के क्षेत्र संगठन मंत्री रामाषीष जी ने कहा कि छोटी-छोटी बातों में डा.ॅ अमर सिंह लोगों का मार्ग दर्षन करते थे। उनका पूरा जीवन भारतमाता के चरणों में समर्पित था।
ग्राहक पंचायत के प्रदीप चैरसिया ने कहा कि डाॅ0 साहब स्नेह और प्रेरणा के प्रतिमूर्ति थे। साहित्य परिषद के डाॅ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि डाॅ. साहब का साहित्य से बहुत लगाव था। मालवीय मिषन के प्रो. जय प्रकाष लाल ने कहा कि डाॅ. अमर सिंह संघ की रीति और नीति सरल ढंग से स्वयंसेवकों के सामने रखते थे। संस्कृत भारती के प्रो. नागेन्द्र पाण्डेय ने कहा कि डाॅ0 अमर सिंह पुन: राष्ट्र उत्थान के लिए भारत भूमि पर जन्म लेंगे।
इस कार्यक्रम में सैकड़ो की संख्या मे स्वयंसेवक उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन संघ के विभाग कार्यवाह दीनदयाल पाण्डेय ने किया।
Wednesday, June 19, 2013
Tuesday, June 18, 2013
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक डाॅ0 अमर सिंह का निधन, पंचतत्व में विलिन
वाराणसी, 18 जून (विसंके.)। पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं वर्तमान में क्षेत्र कार्यकारिणी के सदस्य डाॅ0 अमर सिंह का पार्थिव शरीर मंगलवार को मर्णिकाघाट पर पंचतत्व में विलिन हो गया। मुखाग्नि उनके भतीजे अजीत सिंह ने दी। वे अनेक वर्षो से हृदय की बीमारी से पीडि़त थे। सोमवार को रात्रि 9.05 बजे अचानक दर्द के बाद हृदयाघात होने से उनकी मौत हो गयी। वे लगभग 75 वर्ष के थे। अचानक अपने प्रचारक डाॅ. अमर सिंह के स्वर्गवासी हो जाने से पूरा संघ परिवार शोकाकुल है।
डाॅ अमर सिंह महान कर्मयोगी, ध्येयनिष्ठ व सौम्य व्यक्तित्व के धनी थे। उनके व्यक्तित्व से युवा, किशोर, तरुण व प्रौढ़ हर उम्र के स्वयंसेवक प्रभावित होते थे, उनका जीवन बड़ा ही सहज, सरल व विनोदप्रिय रहा। वे अपने चुटुकिले व हास्यभाव से गमगीन माहौल को भी सहज बना देते थे। उनके इस हास्य व्यवहार से ही युवा पीढ़ी उनसे ज्यादा प्रभावित थी। उनके अचानक निधन से संघ को अपूरणीय क्षति हुयी है।
श्री सिंह 1969 में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से भौतिकी में पी-एच.डी करने के बाद अपना पूरा जीवन मां भारती की सेवा के लिए समर्पित कर दिया और सन् 1970 में गोरखपुर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक निकल गये। वे मुलतः सुलतानपुर के सिंहौली गांव के रहने वाले थे। अपने चार भाइयों में वे सबसे बड़े थे तथा चार बहिनें भी थी। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में होने के उपरान्त उच्च शिक्षा के लिए जौनपुर चले गये और तिलकधारी डिग्री काॅलेज से बी.एससी किया, उसके उपरान्त परास्नातक के लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय चले गये और वहीं से परास्नातक व पी-एच.डी. करने के बाद संघ के प्रचारक निकले। वे संघ के महानगर, विभाग व सम्भाग प्रचारक के बाद प्रान्त सम्पर्क प्रमुख रहे। सन् 2000 में वे संघ के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के प्रचारक प्रमुख बनेे। वे कुछ वर्षो तक विद्याभारती में भी संगठन मंत्री रहे।
मई-जून माह में लगे संघ के प्रशिक्षण वर्ग में उन्होंने उन्नाव, बस्ती, सुलतानपुर, प्रयाग व फतेहपुर में अपने बौद्धिक से स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन भी किया। वे हृदय की बीमारी के बावजूद संघ कार्य के लिए निरन्तर गतिशील रहे।
उनके अंतिम संस्कार में स्व0 श्री सिंह के भाई इन्द्रसेन सिंह, डाॅ0 शिवप्रताप सिंह व राजमणी सिंह व अन्य परिवार के लोग उपस्थित रहे। प्रमुख रुप से क्षेत्र प्रचारक शिवनारायण, क्षेत्र प्रचारक प्रमुख अशोक उपाध्याय, काशी प्रान्त के प्रचारक श्री अभय कुमार, गोरक्ष प्रान्त के प्रान्त प्रचारक श्री अनिल जी, क्षेत्र बौद्धिक प्रमुख श्री मिथीलेश जी, समग्र ग्राम विकास प्रमुख चन्द्रमोहन जी, विभाग प्रचारक रत्नाकर जी, सुनील जी, प्रयाग विभाग प्रचारक मनोज जी, विधायक श्यामदेव राय चैधरी, रविन्द्र जायसवाल, श्रीमती ज्योत्सना श्रीवास्तव, महापौर रामगोपाल मोहले, डाॅ0 दीनानाथ सिंह, मुकेश त्यागी, विभाग कार्यवाह दीनदयाल, डाॅ0 सुखदेव, बीएमएस के संगठन मंत्री अनुपम, समवैचारिक संगठनों के पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं समेत सैकड़ो स्वयंसेवक उपस्थित रहे।
Wednesday, May 29, 2013
पत्रकारिता में अपसंस्कृति के विस्तार पर चिंता
वाराणसी। आदर्शवादी पत्रकारिता के लिए इस दौर में नारद जैसे गुणों को विकसित कर सत्य के साथ मजबूती से खड़ा होने की जरूरत है। देवर्षि नारद जयंती को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाने की परिपाटी को तभी समृद्ध किया जा सकेगा। मूल्यपरक पत्रकारिता के बल पर ही समाज को दिशा दी जा सकती है। नारद जयंती पर रविवार को यह बातें लंका स्थित विश्व संवाद केंद्र में विद्वानों ने कही। इसी दिन हिंदी के प्रथम अखबार ‘उदंत मार्तंड’ के कोलकाता से शुरू हुए प्रकाशन का भी जिक्र किया गया।
‘भारतीय संदर्भ में मूल्यपरक पत्रकारिता का महत्व’ विषयक परिचर्चा में अध्यक्ष पद से लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. देवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पत्रकार को मानवतावादी और राष्ट्रवादी बनना चाहिए। अपसंस्कृति के विस्तार पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया को कारपोरेट जगत संचालित कर रहा है। बाजारवाद आएगा तो लाभ-हानि का प्रश्न खड़ा ही होगा। ऐसे में विसंगतियां बढ़ती हैं। परिवर्तन ही विकास है लेकिन उसे विनाशकारी नहीं होने देना चाहिए। देवर्षि नारद निर्भीक होते हुए सत्य के पर्याय थे। उन्होंने बताया कि नारद संस्कार है और पत्रकारिता प्रवृत्ति। बतौर मुख्य अतिथि आकाशवाणी वाराणसी के केंद्र प्रमुख डॉ. रविशंकर उपस्थित थे। प्रो. ओमप्रकाश, डॉ. वीरेंद्र जायसवाल ने विचार व्यक्त किया। संचालन डॉ. अत्रि भारद्वाज ने किया। स्वागत हर्ष सिंह ने किया। इससे पहले, चेतना प्रवाह के प्रबंध संपादक नागेंद्र, सोच-विचार पत्रिका के संरक्षक डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र, अमर उजाला के अजय राय, हिमांशु उपाध्याय, बृजेश चंद्र यादव, प्रज्ञा त्रिपाठी को सम्मानित किया गया। प्रज्ञा को युवा प्रतिभा सम्मान दिया गया।
‘भारतीय संदर्भ में मूल्यपरक पत्रकारिता का महत्व’ विषयक परिचर्चा में अध्यक्ष पद से लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. देवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पत्रकार को मानवतावादी और राष्ट्रवादी बनना चाहिए। अपसंस्कृति के विस्तार पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया को कारपोरेट जगत संचालित कर रहा है। बाजारवाद आएगा तो लाभ-हानि का प्रश्न खड़ा ही होगा। ऐसे में विसंगतियां बढ़ती हैं। परिवर्तन ही विकास है लेकिन उसे विनाशकारी नहीं होने देना चाहिए। देवर्षि नारद निर्भीक होते हुए सत्य के पर्याय थे। उन्होंने बताया कि नारद संस्कार है और पत्रकारिता प्रवृत्ति। बतौर मुख्य अतिथि आकाशवाणी वाराणसी के केंद्र प्रमुख डॉ. रविशंकर उपस्थित थे। प्रो. ओमप्रकाश, डॉ. वीरेंद्र जायसवाल ने विचार व्यक्त किया। संचालन डॉ. अत्रि भारद्वाज ने किया। स्वागत हर्ष सिंह ने किया। इससे पहले, चेतना प्रवाह के प्रबंध संपादक नागेंद्र, सोच-विचार पत्रिका के संरक्षक डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र, अमर उजाला के अजय राय, हिमांशु उपाध्याय, बृजेश चंद्र यादव, प्रज्ञा त्रिपाठी को सम्मानित किया गया। प्रज्ञा को युवा प्रतिभा सम्मान दिया गया।
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