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Wednesday, November 25, 2020

100 वर्ष पूर्व काशी से चोरी मां अन्नपूर्णा की मूर्ति कनाडा ने भारत को सौंपी

 

 काशी. काशी की विरासत विश्‍व भर में मौजूद है, लेकिन भारतीयों की सक्रियता के कारण अब यहां से चोरी मूर्तियां वापस लाने की तैयारियों को अमलीजामा पहनाया जा रहा है. वाराणसी शहर में आज से लगभग 100 साल पहले चुराई गई अन्‍नपूर्णा देवी की प्रतिमा अब कनाडा वापस करने जा रहा है. यह मूर्ति करीब एक सदी पहले वाराणसी से चोरी हो गई मानी जा रही है. कनाडा के मैकेंजी आर्ट गैलरी में मौजूद यह मूर्ति यह यूनिवर्सिटी आफ रेजिना के संग्र‍ह का अब तक हिस्‍सा थी.

बीते दिनों 5 से 25 नवंबर तक वर्ल्ड हेरिटेज वीक के दौरान भारतीय मूल की एक आर्टिस्ट की नजर मूर्ति पर पड़ी और उन्होंने इसका मुद्दा उठाया. इसके बाद कनाडा यह पौराणिक महत्‍व की मूर्ति अब भारत को वापस सौंपने जा रहा है. इसे देश में लाने की तैयारी की जा रही है. मैकेंजी आर्ट गैलरी में रेजिना विश्वविद्यालय के संग्रह से माता अन्नपूर्णा की प्रतिमा को अंतरिम राष्ट्रपति और विश्वविद्यालय के उपकुलपति थॉमस चेस ने कनाडा में भारत के उच्चायुक्त अजय बिसारिया को 19 नवंबर को एक समारोह में सौंप भी दिया है. कनाडा में आयोजित समारोह में मैकेंजी ग्लोबल सर्विसेज एजेंसी के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे. हालांकि, इस आशय की सूचना संबंधित अधिकारियों और उच्‍चायोग की सोशल मीडिया पर मौजूद नहीं है.

वर्ष 1981 में विंनिपेग, एमबी, कनाडा में जन्मी दिव्‍या मेहरा वर्तमान में विंनिपेग, कनाडा और नई दिल्ली, भारत में रह रही हैं. उन्‍हीं के प्रयासों से यह मूर्ति देश में वापस लाने की स्थिति बनी है. आर्टिस्‍ट दिव्या मेहरा ने इस मूर्ति को देखने के बाद मामला उठाया कि इसे अवैध रूप से कनाडा में लाया गया था. मैकेंजी ने सौ साल पहले भारत की यात्रा की थी और उसी समय वह वाराणसी भी आए. यहां से कनाडा पहुंची मूर्ति के एक हाथ में खीर और दूसरे हाथ में अन्‍न मौजूद है. माना जा रहा है कि यह मूर्ति काशी की अन्नपूर्णा मंदिर से चोरी कर पहुंचाया गया था. अब यह मूर्ति भारत में वापस आने के साथ ही उम्मीद है कि अन्नपूर्णा दरबार का सौ साल बाद एक अभिन्न हिस्सा भी बन जाएगी.

वाराणसी में अन्‍नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्‍वर पुरी के अनुसार यह मूर्ति कई दशक पहले वाराणसी से गायब या चोरी हुई थी. इसके बाद यह कहां गई इसकी जानकारी लोगों को नहीं हो सकी. अब यह मूर्ति मिलने के बाद उम्‍मीद है कि काशी के प्राचीन मंदिर में सौ साल पुरानी मां अन्‍नपूर्णा की यह मूर्ति वापस काशी आ सकेगी.

Tuesday, November 24, 2020

समाज की सज्जनशक्ति को संपर्क में लाने की आवश्यकता – मोहन भागवत

मातृशक्ति के सम्मान का स्वभाव परिवार के प्रत्येक सदस्य का बनना चाहिए भय्याजी जोशी

प्रयागराज. प्रयागराज के वशिष्ट वात्सल्य पब्लिक स्कूल गौहनिया में दो दिन से चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र की बैठक सोमवार को संपन्न हो गयी. बैठक में पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और कुटुम्ब प्रबोधन पर कार्य करने का आह्वान किया गया. बैठक में संघकार्य की वर्तमान स्थिति की समीक्षा के साथ आगामी कार्यक्रमों पर विचार किया गया.

समापन सत्र में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि कोरोना संकटकाल में संघ के स्वयंसेवकों के अलावा समाज के जिन लोगों ने आगे आकर सेवा की है. हमें ऐसी सज्जनशक्ति को अपने संपर्क में लाने की आवश्यकता है. सरसंघचालक जी पहले के प्रवासों में भी मंदिर, जल स्रोत व शमशान घाट सबके लिए खुले होने और पर्यावरण संरक्षण के लिए जल-जंगल-जमीन को प्रदूषित होने से बचाने का आह्वान करते रहे हैं.

सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने कुटुम्ब प्रबोधन पर कार्य करने का आह्वान करते हुए कहा कि मातृशक्ति का सम्मान करने का स्वभाव परिवार के प्रत्येक सदस्य में आना चाहिए. आज परिवार टूट रहे हैं. इसकी वजह से तमाम विकृतियां समाज में आ रही हैं. इसलिए परिवार व्यवस्था को बनाए रखने की आवश्यकता है.

सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने व्यवसायी स्वयंसेवकों का सर्वे कर उनको कैसे सक्रिय किया जाए इस विषय पर मार्गदर्शन किया. सह सरकार्यवाह मुकुंद जी ने युवा कार्यकर्ता विकास योजना से संबंधित विषय रखा. सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने समाज की उत्सुक शक्ति को अपने समीप कैसे लाया जाए, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि समाज संघ के साथ कार्य करने को उत्सुक है.

बैठक में कोरोना काल में सेवा कार्यों के कौन कौन से प्रयोग किए, ऐसे ही शाखा कार्य में कौन-कौन से नए प्रयोग हुए आदि पर चर्चा हुई. बैठक में यह विचार किया गया कि लॉकडाउन में जिन संस्थाओं, नागरिकों, अधिकारियों, डॉक्टर्स, सफाई कर्मियों ने श्रेष्ठ भूमिकाएं निभाई, उनके साथ सम्पर्क की योजना पर ध्यान देना चाहिए. बैठक में अवध प्रान्त, कानपुर प्रान्त, गोरक्ष व काशी प्रान्त के अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल के सदस्य उपस्थित रहे.

Monday, November 23, 2020

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकारी मण्डल बैठक (पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र) - प्रथम दिवस

 

प्रयागराज! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र की दो दिवसीए बैठक वृक्षों, वनस्पतियों, सुवासित पुष्पों की क्यारियों से सुसज्जित प्रयागराज के वशिष्ट वात्सल्यविद्यालय के सुरम्य परिसर में प्रारम्भ हुई। रविवार को संघ के सरसंघचालक डा. मोहनराव भागवत की अध्यक्षता में बैठक शुरू हुई। बैठक में सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी ने लाकडाउन के समय संघ के स्वयंसेवकों द्वारा किये गये सेवाकार्योंकी समीक्षा और संघ द्वारा आत्मनिर्भरता के लिए किये जा रहे प्रयासों पर चर्चा की।

लाकडाउन के समय प्रान्तों में ज सेवाकार्य किये गये प्रान्त के अनुसार उसकीसमीक्षा की गयी। सभी प्रान्त कार्यवाहों ने अपने प्रान्त के अंदर किये गये सभी सेवाकार्योकी जानकारी दी। जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समाज का सहभाग हुआ। प्रवासी मजदूर हों या छात्र सभी के लिए सेवाकार्य किये गये। जिसमें रक्तदानहो या भोजन पैकेट वितरण अथवा भोजन सामग्री, वस्त्र आदि का वितरण किया गया। सभी प्रान्तों में आत्मनिर्भरता के लिए प्रयास हुए हैं। स्वावलंबन के प्रयास जारी हैं। विद्यार्थियों की शिक्षा हो अथवा मजदूरों को आत्मनिर्भर बनाने वाले कार्य अपने सामार्थ्य के अनुरूप स्वयंसेवक कर रहे हैं। अन्य विषयों पर चर्चा जारी है। यह बैठक कल सायंकाल तक चलेगी।

पर्यावरण के अनुरूप कार्यक्रम स्थल

  • ·    बैठक में पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भोजन,जलपान एवं पानी के लिए प्लास्टिक मुक्त बर्तन का प्रयोगकिया गया है।
  • ·      परिसर में बैनर या मंच सज्जामें कागज एवं कपड़े का प्रयोग किया है।
  • ·        संपूर्णपरिसर का वातावरण पर्यावरण युक्त है।
  • ·     परिसर का प्लास्टिक मुक्त कार्यक्रम उहा संघ की कथनी व करनी की एकरूपता को सिद्ध करता है वहीं समाज को यह संदेश दे रहा है कि निजी व सार्वजनिक कार्यक्रमों में पर्यावरण के अनुरूपव्यवहार करना ही लाभदायक है।

बैठक में संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले,सह सरकार्यवाह डा.मनमोहन वैद्य,सह सरकार्यवाह डा.कृष्ण गोपाल व सह सरकार्यवाह मुकुन्द जी के साथ संघ के तीन अखिल भारतीय अधिकारी जिसमें बालकृष्ण त्रिपाठी जी अनिल ओक जी व अजीत महापात्रा उपस्थित रहे। इस बैठक में अवध प्रान्त, कानपुर प्रान्त, गोरक्ष व काशी प्रान्त के अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल के सदस्य सहभाग कर रहे हैं।

Sunday, November 22, 2020

आत्मनिर्भरता एवं स्वावलंबन की चुनौती को स्वीकार करें स्वयंसेवक

 संघ ने किया आत्मनिर्भरता एवं स्वावलंबन का आह्वान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल, (पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र) की बैठक में पर्यावरण संरक्षण व वैश्विक महामारी कोरोना के कारण बदलते परिवेश में स्वयंसेवक को और अधिक गंभीरता व जिम्मेदारी के साथ कार्य करने का आह्वान किया गया. सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए स्वरोजगार, आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन को कार्य का आधार बनाना चाहिए. पानी को पैदा नहीं कर सकते, लेकिन बचा सकते हैं, वृक्षों को लगाया जा सकता है, इसलिए अधिकाधिक पौधारोपण करने और प्लास्टिक के उपयोग से बचने पर जोर दिया गया. बैठक में संघकार्य की वर्तमान स्थिति की समीक्षा के साथ आगामी कार्यक्रमों पर विचार किया गया. स्वदेशी, कुटुंब प्रबोधन जैसे सामाजिक सरोकार के विषयों पर चिंतन किया गया.

स्थानीय सरस्वती शिशु मंदिर, नेहरू नगर में संघ की दो दिवसीय बैठक चल रही है. बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी व सरकार्यवाह सुरेश जी जोशी, सह सरकार्यवाह (दत्तात्रेय जी होसबले, डॉ कृष्ण गोपाल जी, डॉ. मनमोहन जी वैद्य, मुकुंद जी), 2 अखिल भारतीय अधिकारी (सुरेश चंद्र जी अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, राजकुमार मटाले जी, अखिल भारतीय सह सेवा प्रमुख) सहित 3 प्रान्तों के 20 प्रतिनिधि उपस्थित हैं.

सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि कोरोना के कारण सामाजिक परिवेश में परिवर्तन आया है. इस बदलते परिवेश में स्वयंसेवकों को अपनी कार्य भूमिका बदलने की आवश्यकता है. बैठक में निर्णय लिया गया कि कोरोना के कारण ऑनलाइन व परिवार शाखाओं को अब अपने पूर्व स्वरूप में आना चाहिए. शाखाओं को कोरोना संबंधी सावधानियों के साथ शारीरिक दूरी बनाए रखते हुए खुले मैदानों में लगाने की बात की गई. राष्ट्रभक्ति, सेवा, संस्कार की भावना मजबूत करने के लिए साप्ताहिक कुटुंब-बैठकें प्रारम्भ करने का आह्वान किया गया. भारत की प्राचीन कुटुम्ब परंपरा में परस्पर स्नेह व सामंजस्य विशेषता रही है.

सरकार्यवाह सुरेश जोशी जी (भय्याजी) के अनुसार पर्यावरण संरक्षण वर्तमान समय की मांग है. उन्होंने कहा कि जब पर्यावरण संरक्षण का विषय आता है तो जल प्रबंधन, जल के दुरुपयोग की रोकथाम, प्लास्टिक उपयोग पर रोक जैसे जागरूकता अभियान चलाने होंगे. समाज में अधिक से अधिक पौधारोपण की अलख जगानी होगी. सभी प्रान्तों ने अपने यहां चल रहे पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों व अभियानों की जानकारी बैठक में दी.

बैठक में स्वदेशी निर्मित समान के उपयोग से भारत को आर्थिक रूप से सशक्त करने की अवधारणा को साकार किया जा सकता है. इसलिए छोटे उद्योग, ग्रमीण कुटीर उद्योग का सहयोग करने की बात कही गई.

विशेष उल्लेखनीय कार्य

मेरठ प्रांत – कोरोना महामारी के दौरान किए गए सेवा कार्य

कोरोना संकट के समय मेरठ प्रान्त में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा 1,12,943 राशन किट और 19,74,381 भोजन पैकेट का वितरण किया गया.

लॉकडाउन में 1,28,652 मास्क,10,100 पैकेट काढ़ा और 48,665 लीटर सेनेटाइजर का वितरण संघ द्वारा किया गया.

– 4,132 घुमंतू जातियों के परिवारों को भी संघ के स्वयंसेवकों ने सहायता पहुंचायी.

– 663 यूनिट रक्तदान स्वयंसेवकों ने किया.

दिल्ली से निकले 2,24,310 प्रवासी मजदूरों को भी स्वयंसेवकों ने सहायता पहुंचायी.

इस पूरे सेवाकार्य में 6,703 स्वयंसेवक लगे.

कोरोना काल में बहुत सारे लोगों के नौकरी काम-धंदे बंद हो जाने के कारण बहुत आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा है. ऐसे कठिन समय में उनको इस कष्ट से बाहर निकलने के लिए स्वरोजगार हेतु कौशल विकास का एक प्रयास किया गया.

ब्रज प्रांत कोरोना महामारी के दौरान किए गए सेवा कार्य

आगरा में रोजगार भारती द्वारा 08 नवंबर को रोजगार प्रोत्साहन मेले का आयोजन किया गया.

यह मेला युवाओं को स्वरोजगार की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से लगाया गया था. मेले में बड़ी संख्या में उद्यमी, स्वरोजगार उपलब्ध कराने वाली ईकाइयां, बैंक के अधिकारी व अपना उद्यम शुरू करने के इच्छुक युवक आए थे.

मेले का उद्घाटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र संघचालक सूर्य प्रकाश टोंक ने किया. इस मौके पर प्रान्त प्रचारक हरीश जी व क्षेत्र सेवा प्रमुख गंगाराम जी और रोजगार भारती के संरक्षक पूरन डाबर उपस्थित रहे.

मेले में सक्षम डाबर द्वारा तैयार ठेले, जिसमें साईकिल पर चाय की दुकान, साईकिल पर गोलगप्पे की दुकान, जिनके माध्यम से युवक कम पैसे में अपना रोजगार शुरू कर सकता है.

रोजगार प्रोत्साहन मेले में रोजगार के इच्छुक 1200 से अधिक युवक युवतियों ने पंजीकरण कराया.

– 15 वर्षीय बालिका गार्गी का सम्मान किया. गार्गी ने 15 वर्ष की आयु में मोम के दीपक बनाना प्रारम्भ किया. एक सप्ताह में 30 हजार से अधिक दीपक बिक गए. गार्गी अपने काम में 20 महिलाओं को रोजगार दे रही है.

कार्यक्रम में 40 से अधिक महिला उद्यमियों का सम्मान किया गया. रामबाग सेवा बस्ती के रहने वाले दो दिव्यांग भाईयों बुद्ध प्रकाश और सत्य प्रकाश को ठेला प्रदान किया गया. दोनों दिव्यांग भाई नानखटाई बेचने का कार्य करते हैं.

प्रकृति वन्दन कार्यक्रम में सभी स्वयंसेवकों ने पूर्ण उत्साह से भाग लिया.

उत्तरांचल प्रांत कोरोना महामारी के दौरान किए गए सेवा कार्य

उत्तराखण्ड में संघ द्वारा 11,67,555 भोजन पैकेट और 68,055 परिवारों को राशन किट का वितरण किया गया.

कोरोना से बचाव के लिए 1,09,252 मास्क वितरण और 15,466 लीटर सेनेटाइजर का छिड़काव किया गया.

उत्तराखण्ड के स्वयंसेवकों ने 422 यूनिट रक्तदान ​किया.

सम्पूर्ण सहायता कार्य में 4,226 स्वयंसेवक लगे.

प्रतिवर्ष होने वाली कार्यकारी मंडल की बैठक इस बार राष्ट्रीय स्तर पर न होकर क्षेत्र स्तर पर हो रही है. आज बैठक का पहला दिन था. यह बैठक गुरुवार दोपहर तक चलेगी.

श्रोत - विश्व संवाद केन्द्र, भारत

Saturday, November 21, 2020

आतंकवाद तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का मखौल उड़ाने वालों के खिलाफ एकजुट लड़ाई छेड़ने की दरकार

- ए. सूर्यप्रकाश

फ्रांस में जिहादी तत्वों द्वारा एक स्कूली शिक्षक के अलावा कुछ अन्य लोगों की बर्बरतापूर्ण हत्या के बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने अपने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की जो मुखर पैरवी की, उसके खिलाफ कई इस्लामिक देशों में हिंसक प्रदर्शन देखने को मिले. जहां मुस्लिम देशों में ऐसे प्रदर्शनों का सिलसिला जारी रहा, वहीं ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में जिहादी तत्व हत्याओं को अंजाम देते रहे. फ्रांस में हुए हमले के पीछे हजरत मुहम्मद साहब के कार्टून को वजह बताया गया. ऐसे में यह उस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम ईशनिंदा का मामला बन गया, जिसकी आधारशिला ही स्वतंत्रता, समानता और बंधुता पर टिकी है. इस्लामिक देशों में अधिकांश प्रदर्शनकारियों ने जहां सिर कलम करने को जायज ठहराया, वहीं फ्रांसीसी राष्ट्रपति के खून के प्यासे भी दिखे. इसमें सबसे बड़े अपराधी तो मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मुहम्मद रहे, जिन्होंने न केवल फ्रांस में हुई घटना को उचित करार दिया, बल्कि उनका बयान लोगों को खुलेआम रक्तपात के लिए उकसाने वाला था.

यह बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान था, फिर भी ट्विटर ने महातिर पर कोई कड़ी कार्रवाई करने के बजाय महज उस ट्वीट को हटाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली. इस्लामिक देशों में चल रहे इस घटनाक्रम के बीच आखिर भारतीय नागरिकों को फ्रांस के घटनाक्रम पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए? कई भारतीय शहरों में भी मुहम्मद साहब के कार्टून को लेकर मुसलमानों ने विरोध-प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इजहार किया. जब तक ये विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से होते हैं और सामान्य जन-जीवन में गतिरोध उत्पन्न नहीं करते, तब तक कोई आपत्ति नहीं. हालांकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नेता फरहान जुबेरी जैसों की कड़ी निंदा की जानी चाहिए, जो न केवल सिर कलम करने जैसे अपराधों को वाजिब बताता है, बल्कि इस्लाम के खिलाफ बोलने वाले हर किसी का सिर धड़ से जुदा करने की खुली धमकी देता है.

अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप भारत ने एकदम उचित रुख अपनाया और फ्रांसीसी राष्ट्रपति पर निजी हमलों की कड़ी भर्त्सना करते हुए कहा कि इसमें अंतरराष्ट्रीय विमर्श के सामान्य शिष्टाचार का उल्लंघन किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा कि आतंक के खिलाफ फ्रांस की लड़ाई में भारत उसके साथ खड़ा है. असल में सभी भारतीयों को यही रेखा खींचनी होगी. वे इस्लामिक देशों के नागरिकों सरीखा व्यवहार नहीं कर सकते, जहां सब कुछ धर्म के इर्द-गिर्द ही घूमता है और सार्वजनिक विमर्श की राह बहुत संकीर्ण होती है. एकबारगी यह कहा जा सकता है कि एएमयू छात्र नेता जैसी टिप्पणियां अपवाद हैं और लोकतंत्र का सम्मान करने वालों की बोली अलग है. एक सौ भारतीय हस्तियों ने फ्रांस में धर्म के नाम पर हुई हत्याओं की एक सुर में और बिना किसी किंतु-परंतु के निंदा की है. इस बयान पर नसीरुद्दीन शाह, पूर्व आइपीएस जूलियो रिबेरो और गीतकार हुसैन हैदरी सहित कई बड़े नामों के हस्ताक्षर हैं. इस बयान के अनुसार, ‘भारतीय मुसलमानों के कुछ स्वयंभू रहनुमाओं द्वारा हत्याओं को तार्किक बताने और कुछ राष्ट्र प्रमुखों के हिंसक एवं घृणित बयानों से हम क्षुब्ध हुए हैं.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा, सेक्युलर, उदार लोकतांत्रिक गणराज्य है और जिसे भी इन मूल्यों और उस खुली हवा की परवाह है, जिसमें हम सांस लेते हैं तो उसे ऐसे हिंसक कृत्यों का समर्थन करने वालों के खिलाफ एकजुट होना ही होगा. दुनिया के सबसे लोकतांत्रिक एवं विविधतापूर्ण राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हमारा भविष्य संविधान और लोकतांत्रिक जीवन शैली के संरक्षण में ही निहित है. ऐसे में यदि कोई तबका किसी किस्म की हिंसा का समर्थन करने लगे तो सेक्युलर और उदार लोकतंत्र का आगे बढ़ना तो छोड़िए, उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है. यह सभी भारतीयों पर लागू होता है. भारत का कोई नागरिक इस्लामी मुल्क से सीख नहीं ले सकता, जो समानता और बहुलतावाद का कोई सम्मान नहीं करते. हम उनसे अलग हैं. हमारे संविधान निर्माताओं ने इसे मान्यता दी और इसी कारण हमारी संवैधानिक व्यवस्था फ्रांस से थोड़ी अलग है. हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगे हुए हैं. हम इसकी आड़ में सामान्य जन-जीवन, गरिमा और नैतिकता पर आघात करने या किसी की मानहानि या उकसाने की अनुमति नहीं दे सकते. भारतीय दंड संहिता की धारा 153, 295 और 295 ए के प्रावधानों से इसकी पुष्टि होती है. ये धाराएं दो समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाने या किसी एक धार्मिक वर्ग की मान्यताओं को भड़काकर माहौल खराब करने की आशंकाओं को रोकती हैं.

आजादी की लड़ाई के दौरान जब अलग मुस्लिम देश के लिए मुहिम छिड़ी तो पूरे परिदृश्य पर गहन विचार के बाद डॉ. आंबेडकर इसी नतीजे पर पहुंचे कि पाकिस्तान का गठन अपरिहार्य हो गया है. अपनी पुस्तक थॉट्स ऑन पाकिस्तान में उन्होंने कहा कि किसी मुस्लिम की राज्य निष्ठा इस पर निर्भर नहीं कि वह किस देश में रहता है, बल्कि उसके धर्म पर निर्भर होती है. मुसलमानों के लिए जहां रोटी, वहां देश वाली कहावत सटीक नहीं बैठती, बल्कि जहां इस्लाम, वहीं उनका देश वाली बात माकूल लगती है. डॉ. आंबेडकर ने ये बातें 75 साल पहले और उस खास संदर्भ में कही थीं, जब देश में मुस्लिम एक अलग राष्ट्र बनाने की मुहिम में जुटे थे और पाकिस्तान बना. तब पाकिस्तान बनने के बावजूद करीब 3.5 करोड़ मुसलमानों ने भारत में ही रहने को वरीयता दी, क्योंकि उन्हें यही विश्वास था कि किसी इस्लामिक देश में रहने के बजाय उदार, लोकतांत्रिक परिवेश में जीवन गुजारना कहीं बेहतर होगा. भारतीय संविधान के संरक्षण में उन मुस्लिम परिवारों की अब तीसरी पीढ़ी बड़ी हो रही है. अन्य नागरिकों की तरह एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक छत्रछाया में पले बढ़े ये मुस्लिम नागरिक देख सकते हैं कि पाकिस्तान एकदम नाकाम मुल्क है, जिसका भारत के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल ही एकमात्र एजेंडा है. जिस मुद्दे के दम पर पाकिस्तान का गठन हुआ, वह अब बेमानी हो गया है. अब वक्त बदल गया है और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व हम सभी को बेहतरीन अवसर प्रदान करता है. एक भारतीय के नाते हमें फ्रांस और सभी लोकतंत्रों के साथ खड़ा होने और आतंकवाद तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का मखौल उड़ाने वालों के खिलाफ एकजुट लड़ाई छेड़ने की दरकार है.

श्रोत- विश्व संवाद केन्द्र, भारत

Tuesday, November 17, 2020

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के उन्नायक श्री अशोक सिंहल जी

श्री अशोक सिंघल जी की पुण्यतिथि पर विशेष

बीसवीं इक्कीसवीं सदी का संधि काल हिन्दू समाज के नवजागरण के काल खण्ड के रूप में इतिहास के पन्नों में अंकित होगा. यह वह कालखंड है, जब शताब्दियों से पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े जाने से उत्पन्न आत्मविस्मृति एवं आत्महीनता की भावना को तोड़कर हिन्दू समाज ने विश्वपटल पर हूंकार भरी थी.

सोए हुए हिन्दू पौरुष को जगाने का आधार बना श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन और इस आंदोलन के स्मरण के साथ ही इसके नायकों में जो नाम प्रमुखता से उभरकर सामने आता है वह है श्रद्धेय अशोक सिंहल का.

श्रद्धेय अशोक जी ने राष्ट्र की सुप्त पड़ी विराट चेतना को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से झकझोर कर रख दिया. प्रांत भाषा, क्षेत्र के भेदभाव सुप्त पड़ गए. कश्मीर से कन्याकुमारी तक संपूर्ण भारत एक स्वर में जयश्रीराम के नारों से गूंज उठा. एक विदेशी आक्रांता द्वारा राष्ट्र के आदर्श एवं उपास्य के जन्मस्थान को ध्वस्त कर बनाया गया ढांचा देखते ही देखते ध्वस्त हो गया, लेकिन इस आंदोलन की पूर्णाहुति अभी बाकी है जो श्रीराम जन्मूभमि पर भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही भारत के जन-जन में श्रीराम के चरित्र के आधान से पूर्ण होगी.

श्रद्धेय अशोक जी का मानना था कि यह आंदोलन भारत की सांस्कृतिक स्वतंत्रता का आंदोलन है. श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण द्वारा इस आंदोलन का द्वितीय चरण पूर्ण होगा. परंतु यह आंदोलन अपनी पूर्णता को तब प्राप्त करेगा, जब संपूर्ण भारत श्रीराम के आदर्शों पर चलते हुए एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होगा. जब इस राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक अपने राष्ट्र की अस्मिता आदर्श एक मानबिंदु के प्रति जागरूक रहते हुए अपना आचरण करेगा. जब इस देश में कोई अशिक्षित वंचित, भूखा एवं लाचार नहीं होगा. जब इस देश के शौर्य एवं संगठन की अदभुत शक्ति को देखकर कोई परकीय भारत की तरफ वक्र दृष्टि से देखने का साहस नहीं करेगा.

अब वह समय आ गया है जब श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही राष्ट्र इस आंदोलन के तृतीय चरण में प्रवेश कर दुनिया के सामने एक समर्थ शक्तिशाली एवं समृद्ध भारत के रूप में खड़ा हो. तभी श्रद्धेय अशोक सिंहल जी का स्वप्न साकार होगा.

अशोक जी का जीवन कर्मज्ञान एवं भक्ति का अदभुत समन्वय था. उनके जीवन पर तीन महापुरुषों का बहुत गहरा प्रभाव था, जिसका वह यदा-कदा उल्लेख किया करते, अपितु उनके संपूर्ण जीवन पर गहराई से दृष्टि डालने पर इन महापुरुषों की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है.

इनमें प्रथम महापुरुष हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य श्रीगुरुजी. अपने संस्मरण में वे सुनाया करते थे कि एक बार वह अपने कानपुर के कार्यकाल में इटावा के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में एक संत से मिलने गए. उन्होंने परिचय पूछा तब अशोक जी को लगा कि शायद महात्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विषय में न जानते हों, इसलिए उन्होंने कहा कि एक महात्मा हैं गोलवलकर जी, मैं उनका अनुयायी हूं. उन महात्मा ने तुरंत प्रश्न पूछा तुम जानते हो गोलवलकर क्या कर रहे हैं ? अशोक जी ने कहा, महाराज जी आप ही मार्गदर्शन करने की कृपा करें.

उन महात्मा ने जो उत्तर दिया, वही अशोक जी के जीवन का केंद्र बिंदु बन गया. उन्होंने कहा, तुमने जमीन में पड़ी दो-चार इंच चौड़ी दरारें देखीं होंगी, किंतु हिन्दू समाज में इतनी चौड़ी दरारें पड़ गई हैं, जिनमें हाथी चला जाए. गोलवलकर उन्हीं दरारों को भरने का कार्य कर रहे हैं. तुम पुण्यात्मा हो जो उनके साथ लगे हो. अशोक जी ने इसको अपना ध्येय बनाया और विश्व हिन्दू परिषद में आने के बाद धर्म संसद एवं श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से संपूर्ण देश के साधु-संतों और हिन्दू समाज को संगठित करने का महती कार्य किया.

उनके जीवन को प्रभावित करने वाले दूसरे व्यक्ति थे, उनके गुरुदेव श्रीरामचंद्र तिवारी जी. जो वेदों के साधक थे और जिनकी प्रेरणा से अशोक जी के जीवन में संघ के समाज संगठन एवं राष्ट्रजागरण के प्रत्यक्ष कार्य के साथ अध्यात्म की एक आंतरिक धारा भी प्रवाहित हो चली, जिसका समन्वय उनके जीवन की अंतिम सांस तक बना रहा.

अशोक जी का जीवन जितना आंदोलनात्मक था, उतना ही संरचनात्मक भी था जो उनके बहुआयामी कार्यों से प्रकट होता है. गंगारक्षा, गोरक्षा, अस्पृश्यता निवारण, शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधित सेवाकार्य की प्रेरणा, संघ कार्य के साथ ही उस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें प्राप्त हुई थी. जहां पर उन्होंने शिक्षा प्राप्त की. जिसके अधिष्ठाता महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने स्वयं इन सभी विषयों पर चिंतन एवं कार्य किया था.

सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, बौद्ध और जैन सभी को अपनी-अपनी परंपराओं का पालन करते हुए परस्पर प्रेम और आदर से गूंथने का जो महान कार्य अशोक जी के द्वारा किया गया, वह अद्वितीय है. समाज में कोई भी अछूता नहीं है, सब ही भारत माता के सहोदर पुत्र हैं. अशोक जी ने इसे साकार कर दिखाया. उनके जीवन के व्यक्तित्व का यह अदभुत कौशल था कि देश के शीर्षस्थ, संत महात्मा काशी के डोम राजा के घर सहभोज में सम्मिलित हुए.

अशोक जी का जीवन समाज एवं भारत के स्वर्णिम भविष्य के लिए एक प्रकाश स्तंभ है. अंत समय तक उनका सतत सक्रिय जीवन प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए प्रेरणा स्रोत है. वह श्रीगुरुजी का संस्मरण सुनाते हुए कहा करते थे कि कार्यकर्ता केवल चिता पर विश्राम करता है और उन्होंने अपने जीवन में इसे चरितार्थ कर दिखाया. 17 नवंबर 2015 को शरीर छोड़ने के तीन दिन पूर्व तक एक अनथक कर्मयोगी की तरह वह मां भारती की सेवा में सक्रिय रहे. ऐसे महापुरुष की पुण्य तिथि पर सादर नमन.

(लेखक अंरुधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ, प्रयाग के संयोजक एवं दो दशक तक श्री अशोक सिंहल जी के निजी सचिव रहे हैं)                                          श्रोत- विश्व संवाद केंद्र, भारत

https://vskbharat.com/shri-ashok-sinhal-ji-the-unnaik-of-shri-ram-janmabhoomi-movement/?fbclid=IwAR1baI5v2L_e5QuHR1V2rpCdy785pLvVzuTb7RUVzp2UR-0bdl9Zg79vIcY