WELCOME

VSK KASHI
63 MADHAV MARKET
LANKA VARANASI
(U.P.)

Total Pageviews

Sunday, August 22, 2021

सामाजिक कर्तव्य का बोध कराता है रक्षाबंधन उत्सव : रमेश जी

प्रयाग| “संगठन सूत्र में मचल - मचल हम , आज पुनः बंधते जाते । मां के शत - शत खंडित मंदिर का शिलान्यास करते जाते”| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रयाग दक्षिण भाग की शिवाजी शाखा द्वारा माधव नगर  में रविवार को आयोजित रक्षाबंधन कार्यक्रम में विश्व बंधुत्व की कामना के साथ एक- दूसरे को रक्षा सूत्र बांधकर वसुधैव कुटुंबकम की भावना को मूर्तरूप दिया गया।

इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्त प्रचारक रमेश जी ने कहा कि भारत पर्वों का देश है, यहां का हर दिन पावन है, इसको सम्पूर्ण विश्व बोलता है। संघ के छह प्रमुख उत्सवों में रक्षाबंधन का पर्व हमें कर्तव्य का बोध कराता है, और सम्पूर्ण समाज को एकरूपता में पिरोने का कार्य करता है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन हम हिंदू अपने इस त्यौहार को श्रद्धा, आस्था और विश्वास की भक्ति-भावना से प्रेरित होकर मनाते हैं। यह पर्व हमें अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है। इस दिन हम संकल्प लेते हैं कि हम संपूर्ण देश समाज की रक्षा करेंगे। रक्षाबंधन समाज के हित के लिए मनाया जाने वाला सामाजिक समरसता को बल देने वाला हमारा पौराणिक त्यौहार है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेकर यह उत्सव मनाता है।

उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज के परिवारों में बहनों द्वारा भाइयों  को रक्षा सूत्र बांधना, इस पर्व का स्थायी स्वरूप था। संघ के उत्सवों के कारण इसका अर्थ विस्तार हुआ । सीमित अर्थों में न होकर व्यापक अर्थों में समाज का प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक वर्ग की रक्षा का संकल्प लेने लगा । समाज का एक भी अंग अपने आपको अलग-थलग या असुरक्षित अनुभव न करने पाये – यह भाव जाग्रत करना संघ का उद्देश्य है।

कार्यक्रम के उपरांत प्रान्त प्रचारक रमेश जी तथा विभाग प्रचारक डा. पीयूष जी एवं स्वयंसेवक अपने समाज की उन बस्तियों में गये जो वंचित एवं उपेक्षित हैं।  बस्ती में बाल स्वयंसेवक के निवास पर रक्षा सूत्र बाध कर सामाजिक समरसता का बोध कराया। वंचितों एवं उपेक्षितों के बीच बैठकर उनको भी रक्षा सूत्र बांधते और बंधवाते हुए सभी ने संकल्प को दोहराया जिसे भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “समानम् सर्व भूतेषु”। इस दिन लाखों स्वयंसेवक इस देश की हजारों बस्तियों में निवास करने वाले लाखों वंचित परिवारों में बैठकर रक्षा बंधन के भाव को प्रकट करते हैं।

इस अवसर पर मा. नगर संघचालक विद्याशंकर जी, मा. सह नगर संघचालक विजय जी, प्रांत व्यवस्था प्रमुख राकेश सेंगर जी, प्रांत बाल कार्य प्रमुख श्याम सुंदर जी,भाग कार्यवाह वीर कृष्ण जी, भाग सह बौद्धिक प्रमुख कृष्ण मनोहर जी , नगर कार्यवाह रविन्द्र नाथ आदि उपस्थित रहे।

Thursday, August 19, 2021

खतरा तालिबान नहीं तालिबानी सोच है

 

- राजीव सचान

बात बहुत पुरानी है, जब भारतीय शासक अफगानिस्तान में शासन करते थे. ऐसे अंतिम शासक थे महाराजा रणजीत सिंह, लेकिन यह बात ज्यादा पुरानी नहीं, जब अफगानिस्तान एक आम एशियाई देश था, जहां लड़कियां पश्चिमी परिधानों में स्कूल-कालेज जाती थीं और भारतीय फिल्मकार अपनी फिल्मों की शूटिंग करने वहां जाते थे. शायद अफगानिस्तान में शूट होने वाली आखिरी हिंदी फिल्म थी-खुदा गवाह. अब इस सबकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वे तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज हो गए हैं, जो सदियों पुरानी कबीलाई मानसिकता में जी रहे हैं और जिन्होंने काबुल में कब्जा जमाते ही शरिया लागू करने के इरादे जाहिर कर दिए हैं. इसके तहत लड़कियों को स्कूल जाने और महिलाओं को अकेले घर से बाहर निकलने की मनाही होगी. अब वे किसी दफ्तर में काम करने की सोच भी नहीं सकतीं. जो कामकाजी महिलाएं थीं, वे घरों में दुबक गई हैं और टीवी चैनलों ने अपनी महिला एंकरों को या तो हटा लिया है या बुर्का पहनकर काम करने को कहा है. फिलहाल काबुल में मौजूद विदेशी टीवी चैनलों की महिला संवाददाताओं ने भी बुर्कानुमा परिधान धारण कर लिया है. सार्वजनिक स्थलों में जिन होर्डिंग में महिलाएं दिख रही थीं, उन्हें या तो हटाया जा रहा है या फिर उन पर कालिख अथवा सफेदी पोती जा रही है. यह सब तब हो रहा है, जब तालिबान कह रहा है कि महिलाओं को सरकार में शामिल किया जाएगा.

तालिबान नेताओं की बातों पर भरोसा नहीं

तालिबान नेताओं की बातों पर भरोसा न होने के कारण ही लोगों में अफगानिस्तान छोड़ने की होड़ लगी है. अफगान नागरिकों को तालिबान के शासन वाले अफगानिस्तान में अपना कोई भविष्य नहीं दिख रहा है. महिलाएं कुछ ज्यादा ही दहशतजदा हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि उनकी आजादी पर कट्टरता का कठोर पहरा बैठने वाला है और उनकी जिंदगी गुलामों जैसी होने वाली है. तालिबानी मध्ययुग की बर्बर सोच वाले लोग हैं. भले ही काबुल हवाईअड्डे के भयावह हालात यह प्रकट करते हों कि हजारों हजार अफगानी देश छोड़ने के लिए तत्पर हैं, लेकिन अफगानिस्तान में तमाम लोग ऐसे भी हैं, जो तालिबान के समर्थक हैं. तालिबान केवल इसलिए आसानी से अफगानिस्तान में काबिज नहीं हो गए, क्योंकि अमेरिका ने अपनी सेनाओं को आनन-फानन वापस बुलाने का फैसला कर लिया और अफगान सेना बहुत पिलपिली निकली. तालिबान की राह इसलिए भी आसान हो गई, क्योंकि अफगान जनता का एक वर्ग ऐसा है, जो तालिबानी सोच वाला है और जिसे शरिया में कोई बुराई नहीं नजर आती. अमेरिकी संस्था प्यू के एक सर्वेक्षण के अनुसार अफगानिस्तान के 90 प्रतिशत से अधिक लोग शरिया के पक्षधर हैं. ऐसी ही सोच वाले लोग पाकिस्तान में भी हैं. पाकिस्तान किस तरह तालिबान के लौट आने से गदगद है, इसका उदाहरण है पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का बयान. तालिबान खान की उपाधि पा चुके इमरान खान का कहना है कि तालिबान ने काबुल में काबिज होकर अफगानिस्तान को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराया है.

अफगानिस्तान का भविष्य

अफगानिस्तान का भविष्य क्या होगा, पता नहीं, लेकिन तालिबान के काबुल में कब्जा कर लेने के बाद पाकिस्तान में जश्न का सा माहौल है. सरकार और सेना के साथ पाकिस्तान के तमाम लोग खुश हैं. उन्हें भी इमरान खान की तरह लगता है कि तालिबान के अफगानिस्तान में काबिज हो जाने में कुछ भी गलत नहीं. उन्हें अपने यहां न सही, अफगानिस्तान में शरिया लागू होती दिख रही है और यह उनके लिए खुशी की बात है. अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे पर खुश होने वाले लोग दुनिया के और देशों में भी हैं. दुर्भाग्य से ऐसे लोग भारत में भी हैं. इंटरनेट मीडिया पर ऐसे कई भारतीय मिल जाएंगे, जो तालिबान की तारीफ कर रहे हैं और उन्हें अफगानिस्तान की सत्ता का वैध दावेदार बता रहे हैं. एक वायरल चैट में जब एक तालिबान प्रेमी उत्साहित होकर यह खुशखबरी सुनाता है कि राष्ट्रपति अशरफ गनी इस्तीफा देकर अफगानिस्तान से चले गए हैं तो अन्य लोग-अलहमदुल्ला-कहकर खुशी जताते हैं. वे अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे को आजादी की जंग की जीत के तौर पर रेखांकित करते हैं. ये सब अनाम-गुमनाम लोग नहीं. इनमें तथाकथित एक्टिविस्ट, पत्रकार और नेता भी हैं. संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्जे को सही ठहराते हुए कहा कि तालिबान की कार्रवाई वैसी ही है, जैसी हम भारतीयों की आजादी की लड़ाई की थी. यह वही बर्क हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले कहा था कि कोरोना की आफत इसलिए आई, क्योंकि भारत सरकार ने शरिया से छेड़छाड़ की है.

तालिबान काबुल में काबिज

तालिबान के काबुल में काबिज होने के बाद इस्लामिक स्टेट और अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों के सिर उठा लेने के तो प्रबल आसार हैं ही, यह भी अंदेशा है कि पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन लश्कर एवं जैश और अधिक बेलगाम हो जाएंगे. वे इन दिनों तालिबान की मदद के इरादे से अफगानिस्तान में सक्रिय हैं. इसका अंदेशा है कि वे नए सिरे से कश्मीर का रुख कर सकते हैं. आशंका यह भी है कि उन्हें तालिबान की मदद भी मिल सकती है. तालिबान का मददगार केवल पाकिस्तान ही नहीं, चीन भी है. चीन और पाकिस्तान तालिबान को भारत के खिलाफ उकसाने का काम कर सकते हैं. वैसे तो भारत को तालिबान से सीधे तौर पर खतरा नहीं है, लेकिन तालिबानी सोच से खतरा अवश्य है. इसी सोच के कारण एक समय कश्मीर में इस्लामिक स्टेट के झंडे लहराए जाते थे. इस्लामिक स्टेट और तालिबान में यदि फर्क है तो केवल उनके काले-सफेद झंडों का.

साभार दैनिक जागरण

Wednesday, August 18, 2021

सेवा भारत की सनातन संस्कृति व दर्शन का प्राण है – डॉ. कृष्णगोपाल

सेवा कार्यों पर केंद्रित पुस्तक, कॉफी टेबल बुक का विमोचन तथा वृत चित्र का लोकार्पण

नई दिल्ली. कोरोना के अप्रत्याशित संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय सेवा भारती द्वारा समाज के सहयोग से विविध प्रकार के सेवा कार्य संचालित किए गए. यह सेवा कार्य समाज के अंत:करण में प्रेरणा का भाव जागृत करें, इस उद्देश्य से वयं राष्ट्रांगभूता’ (कॉफी टेबल बुक), ‘कोरोना काल में संवेदनशील भारत की सेवा गाथापुस्तक एवं सौ दिन सेवा केवृत्तचित्र के रूप में प्रेरणादायी कहानियों का संकलन किया गया है. 17 अगस्त, 2021 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी की उपस्थिति में विशिष्ट संकलनों का विमोचन एवं प्रसारण किया गया. नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध उद्योगपति व समाजसेवी मुकेश गर्ग जी ने की.

कार्यक्रम में डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि ‘‘इस संकलन की पृष्ठभूमि कोरोना की त्रासदी है. वर्तमान पीढ़ी ने पहली बार इस त्रासदी को देखा और अनुभव किया. कोरोना की आपदा कुछ ऐसी थी कि विभिन्न प्रकार के उपकरण, व्यवस्थाएं और शोध पराजित होते दिखे. मनुष्य हतप्रभ, निराश और कहीं न कहीं असमंजस में था. अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं असहाय नजर आ रही थीं. भारत के शहर और गांव इससे अछूते नहीं थे. लेकिन भारत ने दुनिया के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया है.

हमारे यहां सरकार और प्रशासन के साथ समाज शक्ति ने अपने दायित्व और कर्तव्यों का जिस प्रकार निर्वहन किया, उसे दुनिया ने देखा. महामारी काल में भारत ने जिस भाव को प्रगट किया, वह दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिला. वह सभी भविष्यवाणियां एक बार पुन: गलत सिद्ध हुईं जो भारत को समझे बिना की जाती हैं. हमारा देश जो भौगोलिक रूप से दिखता है, मात्र वही नहीं है. भारत एक प्रेम की भाषा प्रगट करता है. दुनिया भर को इसने सहकार और संस्कार सीखाया. यह भावनाओं का देश है. कोरोना की त्रासदी में देश की हर सामाजिक और धार्मिक संस्था ने अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्य किए. सेवा हजारों वर्षों से दर्शन और सनातन संस्कार का अभिन्न अंग है. इस आध्यात्म की पूंजी को लेकर ही भारतीय समाज आगे बढ़ता है. संवेदना और सहकार रूपी पूंजी का पश्चिम जगत में अभाव है. यही मौलिक अंतर है. कोरोना की विभीषिका से हम इसलिए भी उठ खड़े हुए क्योंकि दूसरों की सेवा करने में यहां लोगों को आनंद आता है. दुनिया को बोध कराने का दायित्व भी हमारा है. आज दुनिया इस बात का साक्षात्कार कर रही है कि कैसे भारत ने समाज की समवेत शक्ति के आधार पर कोरोना की त्रासदी पर विजय प्राप्त की है.

कार्यक्रम में पन्नालाल जी अध्यक्ष सेवा भारती, ब्रजकिशोर कुठियाला जी अध्यक्ष भारतीय चित्र साधना, कुलभूषण आहुजा जी प्रांत संघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली, पराग अभ्यंकर जी अखिल भारतीय सेवा प्रमुख, रामलाल जी अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख, सुधीर जी संगठन मंत्री सेवा भारती, नरेन्द्र जी अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख, सहित अन्य गणमान्य व प्रबुद्धजन उपस्थित रहे.

‘‘समाज सेवा की नई प्रेरणा व ऊर्जा मिलेगी’’

प्रशांत पोल द्वारा संपादित कोरोना काल में संवेदनशील भारत की सेवा गाथा पुस्तक की प्रस्तावना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरकार्यवाह सुरेश (भय्याजी) जोशी जी ने लिखी है. उन्होंने प्रस्तावना के जरिए संकलन को एक अकल्पनीय काल के इतिहास का एक पृष्ठ बताया है. इसी प्रकार वयं राष्ट्रांगभूता’ (कॉफी टेबल बुक) प्राक्कथन में भय्याजी ने कहा कि इस संकलन को देखकर व पढ़कर सभी को समाज सेवा की नई प्रेरणा और ऊर्जा प्राप्त होगी.

वृत चित्र में सामाजिक समरसता की झलक

कार्यक्रम में भारतीय चित्र साधना के सहयोग से तैयार मुख्य वृत चित्र सौ दिन सेवा केका प्रसारण किया गया. इसके साथ ही सात लघु वृत चित्र भी विभिन्न सेवाभावी लोगों द्वारा तैयार किए गए हैं. इन सभी वृतचित्र में कोरोना कालखंड में समाज के विभिन्न वर्गों के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों, उसके समाधान के लिए प्रदर्शित सामूहिक एकता का दर्शन होता है. लघु वृत चित्र में कोरोना प्रबंधन : प्रशासन का सहयोग, कोरोना काल : अल्पसंख्यक समाज और सेवा, पूर्वोत्तर भारत : कोरोना काल में सेवा, कोरोना संकट : जनजातीय समाज में सेवा, कोरोना : समाज के उपेक्षित वर्गों की सेवा, कोरोना संकट व स्वाभिमानी घुमंतु समाज, कोरोना संकट : प्रवासी श्रमिकों को राहत जैसे विषयों को सम्मिलित किया गया है.

Tuesday, August 17, 2021

देश स्व-निर्भर होगा, तभी सुरक्षित रह सकता है – डॉ. मोहन भागवत

 

मुंबई. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि हमारे देश को स्वतंत्रता मिली, लेकिन इस स्वतंत्रता को बरकरार रखने के लिए नागरिकों को योग्य बनने की आवश्यकता है. इस योग्यता का बोध हमें हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रंग से मिलता है. हमें समग्र समृद्धि के लिए अपने जीवन में इन रंगों का उपयोग करके सभी को अपने साथ ले जाना है. देश को स्व-निर्भर, स्वावलम्बी बनाना है. देश स्व-निर्भर होगा, तभी सुरक्षित रह सकता है.

डॉ. मोहन भागवत ७५वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राजा शिवाजी विद्यालय, इंडियन एजुकेशन सोसाइटी, दादर (मुंबई) द्वारा आयोजित समारोह में संबोधित कर रहे थे. इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष अरविंद वैद्य, महासचिव शैलेंद्र गाडसे, सतीश नायक आदि मान्यवर उपस्थित रहे.

 

सरसंघचालक जी ने कहा कि हमारी आर्थिक दृष्टि का लक्ष्य सभी की खुशी है. उसके लिए भौतिक इच्छाओं की संतुष्टि और सभी के सुख के परमलक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, हमारे भीतर संतुष्टि प्राप्त करने के लिए बल की आवश्यकता होती है, और बल अर्थ साधनों से आता है. स्व-निर्भर बनते हुए हमारा ध्यान उत्पादन की उत्कृष्टता पर होना चाहिए. छोटे और बड़े उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए. जो हमारे देश में उत्पादित नहीं होता, जो अतिआवश्यक है, वही हमें निर्यात करना है और वह भी अपनी शर्तों पर लेना है.

       

राष्ट्रीय ध्वज के शीर्षस्थान का केसरिया रंग त्याग, कर्म, प्रकाश की दिशा में ले जाने की प्रेरणा देता है. यही हमारा लक्ष्य है. हम दुनिया में ऐसी ही मानवता चाहते हैं. मनुष्य का जीवन असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमयइस प्रकार परमलक्ष्य की ओर ले जाने वाली  यात्रा का वर्णन है. इसी तरह चलने वाली निरंतर यात्रा है. हम ऐसा समाज बनाना है, हमें पूरी दुनिया को ऐसा बनाना है. इसीलिए हमें भारत को स्वतंत्र बनाना है. ऐसा करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हमारा उद्देश्य जितना पवित्र और शुद्ध है, उतना ही उसके लिए किये जाने वाले हमारे प्रयास, हमारी वृत्ति उतनी ही शुद्ध और निर्मल हो, इसका प्रतीक सफेद रंग है.

यह सब करने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता है, जिस वैभव संपन्नता की आवश्यकता है, सामर्थ्य की आवश्यकता है, जिस समृद्धि की आवश्यकता है. हम श्रीसूक्त जानते हैं, इसमें प्रकृति के घटक का वर्णन है. मनुष्य अपने मन, शील के वैभव के साथ साथ जीवन में अंतिम लक्ष्य प्राप्त करता है. उस समृद्धि का रंग मतलब हरा रंग है. हम जो कुछ करने जा रहे हैं, उसका अधिष्ठान मतलब हमारे तिरंगा का धर्मचक्र है. जो सभी को सुख देता हो, सुखी जीवन व्यतीत करता हो, चराचर सृष्टि की धारणा, जिसे हम धर्म कहते हैं, हमारा प्रयास ऐसा ही धर्म-केंद्रित होना चाहिए.

मनुष्य जीवन में सुख प्राप्ति के लिए जीता है. जितने खुश उतना आनंद. लेकिन आनंद मतलब केवल भौतिक सुख नहीं है, बल्कि सुख हमारे भीतर है. सुख-दुख हमारी चित्त वृत्ति पर निर्भर करते हैं. मन की संतुष्टि बहुत जरूरी है और सब कुछ इसी पर निर्भर करता है. एक अकेला आदमी खुश नहीं हो सकता. एक व्यक्ति तब तक सुखी नहीं रह सकता, जब तक कि अन्य सभी सुखी न हों. अपने साथ सबको खुश रखना हमारा धर्म है. सबकी खुशी हमारी धारणा होनी चाहिए. संसार में सुख का सन्तुलन होना चाहिए. समृद्धि की प्राप्ति की यही हमारी दृष्टि है. सबका उत्थान करना हमारा धर्म है. हमें इसके लिए संयम से चलना होगा. 

स्रोत- विश्व संवाद केन्द्र, भारत 

फ़िल्म समीक्षा : भुज – द प्राइड ऑफ इंडिया

अतुल पांडे

हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में युद्ध और देशभक्ति पर आधारित फ़िल्में बनाने का चलन ज़ोर पकड़ रहा है. लेकिन हर निर्माता सिर्फ़ प्रचलित घटना पर ही फ़िल्म बनाना चाहता है. ऐसे में भुजजैसे अनसुने या कम सुने सब्जेक्ट पर फ़िल्म बनाने का रिस्क उठाना अपने आप में एक उदाहरण है.

फिल्म की कहानी 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध की है. इस दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने भुज एयरबेस पर जोरदार हमला किया था, जिसके बाद वहां पास के गांव माधापार में रहने वाली 300 महिलाओं ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर इंडियन एयरफोर्स के रनवे की मरम्मत का कार्य किया ताकि वहां भारतीय सैनिक मदद के लिए पहुंच सकें. भुज एयरबेस के स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक (अजय देवगन) ने रनवे पट्टी को रिपेयर करने के लिए उन स्थानीय लोगों प्रेरित किया था. यह फिल्म संकट की घड़ी में देश के नागरिकों और सेना के सहयोग का स्मरण करवाती है.

1962 के भारत-चीन युद्ध के परिणाम भले ही भारतीय सेना के पक्ष में न आए हों. लेकिन उस युद्ध में हमारी सेना की बहादुरी के किस्सों के साथ इतिहासकारों और फ़िल्म निर्माताओं ने बखूबी जीवित रखा. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के पैटन टैंकों का अकेले सामना करके बलिदान होने वाले सैनिक अब्दुल हमीद और लोंगोवाल पोस्ट पर भारतीय सेना की एक छोटी सी टुकड़ी के बड़े दुस्साहस को भी हमारी पाठ्य पुस्तकों में कुछ ऐसा ही मुकाम हासिल हुआ है.

1999 के कारगिल युद्ध में बलिदान हुए सैनिकों के जोशीले और अनूठे नारे आज के दौर में देशभक्ति की फ़िल्मों के लिए प्रेरणास्तोत्र का बन चुके हैं. इस संदर्भ में फ़िल्म उरीसबसे बड़ा उदाहरण है, जिसका एक नारा हाऊ इज़ द जोशसबसे हिट धुनों से भी बड़ा हिट बन गया और सार्वजनिक सभाओं से लेकर खेल के मैदानों और संसद तक में भी गूंजता रहा. इस सप्ताह रिलीज़ हुई फ़िल्म भुज द प्राइड ऑफ इंडिया’, युद्ध और देशभक्ति पर बनी फ़िल्मों की उसी कड़ी का अगला हिस्सा है. इसलिए इस फ़िल्म का विश्लेषण एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है.

1971 के युद्ध के दौरान भुज एयरबेस पर जो हुआ उसके बारे में शायद ही किसी ने सुना होगा. भुज द प्राइड ऑफ इंडियाफ़िल्म की, फ़िल्म की समीक्षा करते हुए कुछ खास पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा कि यह कोविड-19 महामारी के दौरान बनाई गई एक बड़ी युद्ध फ़िल्म है, जिसके कुछ मुख्य अभिनेता, तारीखों में तालमेल न बैठने की वजह से फ़िल्म से अलग हो गए थे और इन सभी चुनौतियों का सामना करते हुए फ़िल्म को अंजाम तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी एक नवोदित निर्देशक के कंधों पर थी.

सभी सुरक्षा बलों के लिए देशभक्ति के नारेऑक्सीजन का काम करते हैं. यह सुरक्षा बल, धर्म, जाति, लिंग और सामाजिक रुतबे जैसे हर एक भेदभाव को भुला कर, अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मन की बंदूक के आगे निडर होकर डटे रहते हैं. लड़ो या मरोके सिद्धान्त का पालन करने वाले मराठा योद्धाओं (विजय कार्णिक) के शौर्य को फ़िल्म में विस्तार से दर्शाया है. लेकिन यह फ़िल्म सिर्फ़ भारतीय वायु सेना अधिकारियों के बारे में नहीं है, माधापुर गांव की लगभग 300 महिलाओं की दिलेरी भी फ़िल्म का एक अहम और दिलचस्प हिस्सा है, जिन्होंने भुज में स्क्वाड्रन लीडर कार्णिक (फ़िल्म में अजय देवगन द्वारा अभिनीत किरदार) की सहायता की थी. हालांकि युद्ध पृष्ठभूमि पर आधारित इस फ़िल्म का ताना-बना कुछ ऐसा है कि जिसमें आम नागरिकों और महिला किरदारों को शामिल करने की गुंजाइश न के बराबर थी, लेकिन सोनाक्षी सिन्हा के किरदार के माध्यम से हमेशा हाशिये पर धकेल दिये जाने वाली गांव की महिलाओं की बहादुरी को याद किया गया है, जो उस मुश्किल समय के दौरान भारतीय वायु सेना की मदद का इकलौता जरिया थीं, जब भुज एयरबेस के संचार और सड़क के सभी कनेक्शन काट दिए गए थे. रनछोड़ पगी इस फ़िल्म में एक महत्वपूर्ण किरदार है, जो 1965 और 1971 युद्ध के दौरान भारतीय सेना के लिए बहुत ज़रूरी और महत्वपूर्ण शख्सियत थे. किसी मायावी इंसान जैसे पगी के किरदार को संजय दत्त ने निभाया है.

फ़िल्म में हल्की सी रोशनी इस मुद्दे पर भी डाली गई है कि 1971 में बांग्लादेश को आज़ाद कराने के दौरान, पश्चिमी सीमा को किस कदर नजरअंदाज किया गया था और उस इलाके में तैनात सैनिकों को उनकी अपनी बहादुरी और किस्मत के भरोसे छोड़ दिया गया था. हर एक सैनिक इस सच्चाई से वाकिफ़ था कि उनके बचने की संभावना न के बराबर थी क्योंकि पाकिस्तान हर मुठभेड़ में सैकड़ों टैंक और हजारों सैनिकों भेजता था.

अब बात करते हैं अजय देवगन की, हालांकि अज्ञात लोगों के किरदार को पर्दे पर निभाना, इतना आसान काम नहीं है. लेकिन अजय ने न सिर्फ़ स्क्वाड्रन लीडर कार्णिक की भूमिका के साथ न्याय किया है, बल्कि अपने दम पर इस फ़िल्म की ओर दर्शकों का ध्यान खींचने में भी सफल रहे हैं.

युद्ध की फ़िल्मों में सहायक किरदार की भूमिका निभाने में संजय दत्त अब माहिर हो चुके हैं. जबकि सोनाक्षी सिन्हा के किरदार को हैंडल करना निर्देशक अभिषेक दुधैया के लिए एक खास चुनौती रहा होगा क्योंकि यह किरदार उनकी अपनी माँ के जीवन पर आधारित है. इस फ़िल्म की लेखन टीम का हिस्सा होने के नाते अभिषेक ने अपनी माँ के उस अनुभव को दिल से महसूस किया होगा. शरद केलकर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि स्क्रीन का साइज़ बड़ा हो या छोटा, शरद की मौजूदगी हर किरदार को यादगार बना देती है, जबकि छोटे पर्दे से बड़े पर्दे की ओर रुख़ करने वाले बहुत से अभिनेता ऐसा नहीं कर पाते.

डॉग फाइट सीक्वेंस बड़े हैं, लेकिन वास्तविक लगते हैं. लगता है कि टॉप गनके बाद किसी ने ज़्यादा डॉग फाइट्स नहीं देखी है. हवाई हमले के दृश्य बेहतरीन नहीं हैं, लेकिन बुरे भी नहीं हैं. असीम बजाज की सिनेमेटोग्राफ़ी को उनका सबसे अच्छा काम नहीं कहा जा सकता, हालांकि वीएफ़एक्स डिपार्टमेंट की मेहनत का निखार साफ़ दिखाई देता है. भुज एक अच्छी कहानी है, हालांकि फ़िल्म की पटकथा को और असरदार बनाया जा सकता था. डायलॉग में कविता क्षेत्र में ढलने की उल्लेखनीय प्रवृत्ति है. संगीत एक कमी है, और फ़िल्म में गानों की जरूरत नहीं थी.

ऐसा लगता है कि विषय की विशालता ने कहीं-कहीं अभिषेक दुधैया को बेहतर बना दिया है, यही बात फ़िल्म की एडिटिंग के बारे में भी कही जा सकती है. कुल मिलाकर फ़िल्म भुज, ज़्यादातर युद्ध फिल्मों की तरह एक ऐसी फ़िल्म है, जिसका सही आनंद और अनुभव उचित साउंड सिस्टम वाले थिएटर में लिया जाना चाहिए.

अब सवाल यह कि क्या भुज की घटना, एक बेहतर फ़िल्म का रूप ले सकती थी? जवाब में मैं तो यही कहूँगा कि हाँ, बेशक ऐसा हो सकता था. लेकिन एक सच्ची और ईमानदार समीक्षा करते समय मैं उन सभी पहलुओं और चुनौतियों पर ज़रूर गौर करूंगा, इतने पड़े पैमाने की फ़िल्म बनाते हुए जिनका सामना इसके निर्माता और निर्देशक ने किया होगा.

स्रोत- विश्व संवाद केन्द्र, भारत