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Monday, November 29, 2021

१९४७ की मध्य रात्रि में स्वराज मिला, स्वतंत्रता नहीं- जे.नन्दकुमार

 

काशी। १९४७ की मध्य रात्रि में स्वराज मिला, स्वतंत्रता नहीं मिली| भारत के सभी पुत्र-पुत्रियां अपने दायित्व का निर्वहन राष्ट्रहित में करें, स्वाधीनता अवश्य प्राप्त होगी| उक्त विचार प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक मा. जे.नन्दकुमार जी ने व्यक्त किया। वे शनिवार को काशी दक्षिण भाग के अमृत महोत्सव आयोजन समिति काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा स्वतंत्रता भवन सभागार में आयोजित "स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर" कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने आगे कहा कि हर क्षेत्र में स्वतंत्रता के लिए कार्य हुआ| महामना जी ने विश्वविद्यालय रूपी तीर्थ बनाया है| यह भी शिक्षा के क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम है| उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता किन्हीं दो परिवारों के रसोई की कोई रचना नहीं है| उन्होंने आह्वान किया कि विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर और अध्यापकों सम्पूर्ण सन्दर्भों में इतिहास बताना चाहिए| एक घटना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि १४९४ में स्पेन में एक बैठक में पोप ने कुछ राजाओं को बुलाया और स्पेन पुर्तगाल को क्रमशः पश्चिम और पूर्व में भेजा गया| व्यापार करना इन औपनिवेशिक आक्रान्ताओं का उद्देश्य नहीं था| उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम  १४९८ से ही प्रारंभ है| १७५९ में प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला पराजित हुआ इसे आज भी स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है, जो एक मिथक है| सत्य यह है कि यह युद्ध मात्र एक घंटे चला|

इसी क्रम में  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र कार्यवाह डॉ वीरेंद्र जायसवाल ने कहा कि प्राचीन समय में न्यायशास्त्र हमारा धर्म हुआ करता था| सिकंदर जो भारत में प्रवेश नहीं कर पाया| उसे कुछ लोग विश्व विजेता बताते हैं| वर्तमान में भी हम बातचीत, पहनावें, संस्कार में पराधीन हैं| दुर्भाग्य से हम एक हजार वर्षों की पराधीनता में रहे हैं| उन्होंने कहा कि अंग्रेजों द्वारा 6 लाख विद्यालय बंद किए गये| इस विषय में आज की शिक्षा प्रणाली पर हमें विचार करना चाहिए|

श्री नन्दकुमार के आगमन होते ही सभागार देशभक्ति उद्घोषों से गूंज उठा। उपस्थित लोगों ने भारत माता की जय और वन्देमातरम का गगनभेदी उद्घोष कर उनका स्वागत किया।


"एक मंच-एक स्वर" में गाया वन्देमातरम

कार्यक्रम में "एक मंच-एक स्वर" का आयोजन किया गया। इस दौरान डॉ ज्ञानेश चन्द्र पांडेय एवं प्रो.बाला लखेन्द्र के संयुक्त संयोजन में एक मंच पर एक स्वर में संगीत एवं मंच कला संकाय के 75 विद्यार्थियों द्वारा कुलगीत एवं वन्देमातरम की प्रस्तुति दी गयी। इसके उपरांत प्रो.रेवती संग्लकर ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत प्रस्तुत कर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। प्रारंभ में अतिथियों ने भारत माता चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलित किया| मंगलाचरण अनयमणि त्रिपाठी ने किया।

इस दौरान में मुख्य रूप से रामकुमारजी, कृष्णचंद्र जी, डॉ हेमंत गुप्त, डॉ हरेन्द्र राय, प्रो.मंजू द्विवेदी, डॉ उपेन्द्र जी, प्रो.के.के.द्विवेदी, आशीषजी, विनोदजी, सुनील जी,  समेत बड़ी संख्या छात्र छात्राएं एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहें। अध्यक्षता छात्र अधिष्ठाता डॉ एम. के. सिंहसंचालन धीरेन्द्र राय एवं धन्यवाद ज्ञापन सह संयोजक प्रो.बालालखेन्द्र ने दिया|


कामाख्या नगर में अमृत महोत्सव

स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत कामाख्या नगर के क्रांति पल्ली कालोनी निवासियों ने भव्य तिरंगा यात्रा निकाली। तिरंगा यात्रा क्रांति पल्ली कालोनी से महावीर कालोनीशिवअवध धाम अपार्टमेंटकाशी इन्कलेव सरीन रेजीडेंसीसुदामा पुर सरस्वती नगर से होती हुई वापस क्रांति पल्ली कालोनी पार्क पर समाप्त हुई। तिरंगा यात्रा का शुभारंभ  नगर कार्यक्रम संयोजक प्रो० सुनील विश्वकर्मा जी(महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) ने तिरंगा दिखा कर किया।मदर टेरेसा पब्लिक स्कूल के छात्रों और अध्यापकों ने तिरंगा यात्रा में प्रधानाचार्य डा ० के०के० वर्मा जी की अनुमति से भाग लिया।

यात्रा में अपना पार्क के विशाल जीनिवेदिता शिक्षा सदन से पारसनाथ जी एवं बड़ी गैबी से ज्योति प्रकाश जी  एवं समाज के विभिन्न वर्गों की महिलाओं पुरुषों सहित बच्चों ने भाग लिया।

तिरंगा यात्रा में श्री वेद प्रकाश जीश्रीपति जी संजय जी , विपिन जी,पुष्कर जीस्वास्तिक जी एवं तान्या जी भी उपस्थित थे। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के प्रांतीय संगठन मंत्री श्री प्रदीप चौरसिया जी भी उपस्थित थे। यात्रा का पूरा मार्ग  भारत माता की जय एवं वन्दे मातरम के नारों से गूंजता रहा। कार्यक्रम का संचालन कामाख्यानगर के शारीरिक प्रमुख श्री अंशु अरोड़ा जी ने किया। भारतीय सिंधु सभा के श्री कमलेश जी एवं श्री कुमार जी उपस्थित थे।


शिवाला घाट पर अमृत महोत्सव

शिवाला घाट पर मानस नगर अमृत महोत्सव आयोजन समिति एवं दक्षिण भारत समाज द्वारा गंगा एवं भारत माता की आरती का आयोजन किया गया| मुख्य अतिथि प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे नन्द कुमार जी एवं अजित महापात्राअखिल भारतीय गौ सेवा प्रमुख जी रहे| मुख्य वक्ता ने अपने उद्बोधन में कहा की भारतीय स्वाधीनता संघर्ष आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक थाधर्म सुधारकों ने भी कई आंदोलन खड़े कियेभारत माता पुनः उच्च शिखर पर स्थापित हो यही प्रयास सबका होना चाहिए5 बटुकों ने गंगा एवं भारत माता की आरती की| कार्यक्रम के अंत में वन्दे मातरम हुआ| दक्षिण भारतीय समाज के अनेक स्त्रीपुरुषउपस्थित थे | पूरा घाट भारत माता की जय तथा वन्दे मातरम के नारों से गूंज रहा थाकार्यक्रम में मुख्य रूप से सर्व श्री शुकदेव त्रिपाठीश्याम जीमणि जीदयाशंकर मिश्रवेंकट रमन घनपाठीकृष्णाचन्द्र जी उपस्थित थे|

Thursday, November 25, 2021

धमनियों में राष्ट्रधर्म : काशी का एक विद्यालय जिसके छात्रों एवं शिक्षकों ने स्वतंत्रता की वेदी पर दी थी अपनी आहुति

- डॉक्टर हेमंत गुप्त

अंग्रेजों के शासन काल में भारतीयों को मानसिक और बौद्धिक  रूप से ग़ुलाम बनाने के लिए मैकाले ने भारतीय गुरुकुल शिक्षा को ध्वस्त कर मिशनरी शिक्षा नीति को स्थापित किया। इसके  अंतर्गत 1854 में यूपी का पहला आधुनिक विद्यालय बंगाली टोला इंटर कॉलेज वाराणसी के रूप में स्थापित हुआ। जहाँ देश में अधिकतर विद्यालय सरकारी राज्य कोष से आगे बढ़ रहे थे, वहीं काशी की धरती पर बंगाली टोला इंटर कॉलेज के शिक्षकों और छात्रों में अंग्रेज़ी सरकार के प्रति रोष पनप रहा था।

विद्यालय में शिक्षा के साथ-साथ यहाँ के शिक्षक अपने छात्रों को राष्ट्रप्रेम और स्वाधीनता की भी शिक्षा देते थे। इस विद्यालय के संस्थापक योगीराज श्यामाचरण लाहिरी जैसे विभूति थे। उन्होंने इस विद्यालय के शिक्षक और विद्यार्थियों में राष्ट्रभक्ति एवं पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति के लिए संघर्ष करने का मंत्र दिया। उनकी प्रेरणा से इस विद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने काशी से राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में 1905 के बंग-भंग आंदोलन का महत्वपूर्ण स्थान है। इस आंदोलन ने विद्यालय के अंदर स्वतंत्रता का बीज प्रस्थापित किया और यही से काशी में स्वतंत्रता संग्राम पुष्पित एवं पल्लवित हुआ, जिसमें यहाँ के छात्रों और शिक्षकों ने  अपना सर्वस्व माँ भारती के चरणों में अर्पित कर दिया। इसका जीता जागता उदहारण है विद्यालय के प्रांगण में स्थापित शहीद वेदी; जिसमें वे ग्यारह नाम वर्णित है जिन्होंने अपने अदम्य साहस से अंग्रेजो को धूल चाटने पर मजबूर कर दिया था। पूरे विद्यालयों में शायद ऐसा पहला विद्यालय होगा जहाँ के छात्र और शिक्षकों ने स्वतंत्र भारत का सपना लिए स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। आज की आधुनिक सदी में भी बनारस का ये बंगाली टोला इंटर कॉलेज विद्यालय अपने स्वतंत्रता सेनानियों को नहीं भूला है। अपने शहीदों के सम्मान में आज भी  विद्यालय में पठन-पाठन से पहले विद्यालय के प्रधानाचार्य और छात्रगण शहीद वेदी पर माल्यार्पण करते है फिर देशभक्ति गीत और राष्ट्रगीत के माध्यम से उन शहीदों को नमन किया जाता है। इस वेदी की स्थापना से आज भी यहाँ के छात्रों में राष्ट्र्भक्ति एवं राष्ट्रधर्म का संचार होता है। विद्यालय में राष्ट्रधर्म के उद्भव से आज भी इस विद्यालय के छात्रों एवं शिक्षकों की धमनियों में राष्ट्रधर्म का संचार होता है, जब भी माँ भारती को अपने सपूतों की आवश्यकता हो, वे राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व लुटाने के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं।

इस विद्यालय के शिक्षक और छात्र जिन्होंने भारत माता के चरणों में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया उनके नाम निम्न प्रकार से हैं -

1-      सुशील कुमार लाहिड़ी - अध्यापक - मृत्युदंड

2-      सचिन्द्र नाथ सान्याल - छात्र - (काकोरी काण्ड में ) आजीवन कारावास

3-      सुरेश चंद्र भटाचार्य  -छात्र -  (काकोरी काण्ड में )7  वर्ष  कारावास

4-   जितेंद्र नाथ सान्याल - (बनारस लाहौर षड्यंत्र में ) छात्र - सश्रम कारावास

5-      प्रियनाथ भट्टाचार्य  - (बनारस षड्यंत्र में )छात्र - 2 वर्ष कारावास

6-      रविंद्र नाथ  सान्याल - (बनारस षड्यंत्र में ) - छात्र - कारावास

7-      सुरेंद्र नाथ मुख़र्जी -(बनारस षड्यंत्र में ) - छात्र - कारावास

8-      विभूति भूषण गांगुली - छात्र - नजरबंद

9-      विजय नाथ चक्रवर्ती - अध्यापक - बनारस से निर्वासन

10-      रमेश चंद्र जोयेरदार - अध्यापक - बनारस से निर्वासन

11-      राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी - छात्र - (काकोरी षड्यंत्र में ) - मृत्युदंड

ये वो महान विभूतियाँ थी जिनके नाम विद्यालय की शहीद वेदी पर अंकित है और ये सिर्फ काशी ही नहीं अपितु पूरे भारतवर्ष के लिए गर्व का विषय है। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी यह शहीद वेदी समस्त काशीवासियों में राष्ट्र भक्ति का संचार करती है।

Wednesday, November 24, 2021

...और स्वमेव महामना से महामानव के पथ पर अग्रसर हो गये मालवीय जी


- डॉमंजु द्विवेदी

    भारत के महान पुरूषों में महामना जी का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। आपका जन्म 25 दिसम्बर 1861 में प्रयाग के श्रीमदभागवत् के प्रकाण्ड विद्वान पंडित प्रेमदत्त चतुर्वेदी के परिवार में हुआ। इनके माता का नाम मूना देवी और पिता का नाम ब्रजनाथ था।

    महामना के चरित्र और व्यक्तित्व पर अगर समग्र दृष्टि डाली जाय तो एक अजीब सी अनुभूति होती है तथा स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि राष्ट्रवादियों की कतार में महामना प्रथम पंक्ति में खड़े नजर आते हैं। महामना जी मानवता के पुंज थे। वे संकीर्ण और साम्प्रदायिक विचारों से बहुत घृणा करते थेउनके समक्ष जब-जब हिन्दू-मुस्लिम झगड़े हुए उन्हें भारी दुःख हुआ। यह सच है कि महामना जी सनातनी हिन्दू थेऔर उन्हें प्राचीन रीति-रिवाजों से भारी लगाव थापरन्तु वे राष्ट्र भक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। राष्ट्रीयता की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा है कि "राष्ट्रीयता उस भावना का नाम है जो देश के सम्पूर्ण निवासियों के हृदय में देश-हित की लालसा में व्याप रही होजिसके आगे अन्य भावों की श्रेणी नीची ही रहती हो।" (मालवीय जी के लेख-पृष्ठ संख्या 99-महामना मदन मोहन मालवीय : जीवन और नेतृत्व-मुकुट बिहारी लालपृष्ठ संख्या-600) "दिसम्बर सन् 1886 में मालवीय जी कांग्रेस में शरीक हुए तथा सन् 1937 तक उसके वार्षिक अधिवेशनों में करीब-करीब नियमित रूप से उपस्थित होते रहे और जीवन के अन्त तक वे उससे सम्बन्धित रहे। 1886 में नव गठित कांग्रेस के कोलकाता में आयोजित दूसरे वार्षिक सत्र में प्रेरणादायक भाषण देकर राजनीतिक परिदृश्य में उभरे। वे चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष थे, 1909 में (लाहौर) 1918 और 1930 में (दिल्ली) 1932 में (कोलकाता) में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। स्वाधीनता आन्दोलन में गरम दल और नरम दल के उदारवादियों एवं राष्ट्रवादियों के बीच सेतु का काम किया। महामना जी ने कांग्रेस की नीति-रीति का समय-समय पर विरोध किया परन्तु कभी कांग्रेस को छोड़ने का प्रयास नहीं किया| गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद 1932 में राष्ट्रीय एकता सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता महामना जी ने की थी और 1934 में मैकडोनाल्ड के साम्प्रदायिक पंचाट का विरोध किया था। पंडित मालवीय उतने उग्र भले न होंजितना कुछ लोग उन्हें देखना चाहते थेपर वे निःसन्देह गतिशील और प्रगतिशील थे। अपनी योग्यता से अपनी मातृभूमि और देशवासियों की भरसक सेवा की प्रखर कामना से वे स्पन्दित थे और शायद ही कोई दावा कर सके कि उन्होंने हिन्दुस्थान के सार्वजनिक जीवन के इतने बहुल क्षेत्रों में उनसे अधिक सेवा की।" प्राक्कथन-(महामना मदन मोहन मालवीय : जीवन और नेतृत्व-मुकुट बिहारी लालपृष्ठ संख्या-4-5)

    महामना के स्वाधीनता से स्वतन्त्रता की ओर कर्म एवं विचार की परस्पर विवेचना की जाय तो सम्पूर्ण तथ्यों की प्रकाशमान स्वरूप रूपी कुंजी उपर्युक्त सामाजिक समरसता के रूप में मानस में अंकित हो जाती है। जो इस देश की उत्कृष्ट संस्कृति है और वह समन्वयवादी परम्परा का पूरा सम्पुट है। नानाप्रकार की भाषाधर्मसमुदायवर्णजाति से सम्पूरित आनन्द-कानन भूमि यह भारत भूमि है। आज सम्पूर्ण धर्मदर्शनसंस्कृतिकलाइतिहास प्राचीन-अर्वाचीन विमर्श सनातन धर्म के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। दिग्भ्रमित लोकमत को ध्यान में रखते हुए मालवीय जी अपने जीवन में सनातन धर्म को आत्मसात करते हुए वह सृष्टि विद्या की परिभाषाओं पर ही आश्रित थे। महाभारतश्रीमद्भागवत् का पाठ वह प्रतिदिन करते थे। वह सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आने से पहले ही सनातन धर्म सभा का आयोजन किया थाउसी समय सारे देश में बहुतेरे राष्ट्रभक्त ग्रामसुधार और हरिजन आन्दोलन का वीड़ा उठाये हुए थेउसी समय में महामना जी अछूतों के वास्तविक ठोस सुधार में लगे हुए थे। यह एक अनूठा संगम थाइसी कारण वे स्वमेव महामना से महामानव के पथ पर अग्रसर हो गये थे। महामना ने अद्भुतअलौकिक ज्ञानउत्थान और मुक्ति पथ की ओर परमेश्वरमय शान्ति स्थापित करने के लक्ष्य से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की ताकि धर्मनिष्ठ विद्यार्थी सच्चे रूप से देशभक्त तैयार हो सकें। महामना का व्यक्तित्व अथाह सागर की गहराई के समान अनन्त एवं अद्भुत है। वह किसी भी तथ्य को बिना प्रमाण के नहीं कहते थेउनके हर कथन-करणीय में वेदों में वर्णित श्लोकमंत्र एवं दृष्टान्त का ही आधार था।

    सनातन धर्म की स्थिति उस हंस के समान है जो सरोवर के मध्य से दूसरा पैर उठाने के लिए पहले पैर को स्थिर रखता है। महामना जी का जीवन इसी बात का प्रमाण है अर्थात् उनके जीवन में यह सत्य भाष्वर रूप में दिखाई देता है। मालवीय जी के हृदय की अपार करूणादया और उदारता की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। ‘‘हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म की रक्षाकीर्ति और अभिवृद्धि के लिए एवं तथाकथित अस्पृश्यों के अभ्युदय और निःश्रेयस के लिए छुआछूत की प्रथा का धर्मानुकूल परिशोधन मालवीय जी नितान्त आवश्यक समझते थे। ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य वर्णों से सम्बन्धित व्यक्तियों का कर्त्तव्य है कि शास्त्र विहित शीलसदाचार और भगवद्भक्ति द्वारा वे स्वयं द्विजत्व के वास्तविक अधिकारी बनने का प्रयत्न करें और अन्त्यज पर्यन्त सब शूद्रों को उसका उपदेश देंउनके साथ आत्मौपम्य व्यवहार करें तथा उनके उत्कर्ष में उनकी यथोचित सहायता करें। यही सनातन धर्म हैयही सनातन धर्म का आदेश हैइसी में सनातन धर्म का गौरव है।" (मदन मोहन मालवीय जीवन और नेतृत्व-मुकुट बिहारी लाल पृष्ठ संख्या-522-523) देदीप्यमान बुद्धित्व से सुशोभित महामानव पण्डित मदन मोहन मालवीय जी शरीरधारी धर्म और धर्म की रक्षा के लिए समुद्यत समाज सेवा ही उनका जीवन प्राण था। दीन-दुखियों के दुःख दूर करने में वह सदा लगे रहते थे। वह अपना स्पष्ट मत रखते हैं कि सनातनधर्मीआर्यसमाजीब्रह्मसमाजीसिक्खजैन और बौद्ध आदि सब हिन्दुओं को चाहिए कि अपने-अपने विशेष धर्म का पालन करते हुए एक दूसरे के साथ प्रेम और आदर करें तथा अपने सब जातिधर्म के भाइयों को साथ लेकर जीवन कर्मफल का अनुसरण और आनन्द पूर्वक भारत भूमि पर जीवन यापन करें।

- (लेखिका काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र से जुड़ी हैं) 

Tuesday, November 23, 2021

सोनभद्र (अमृत महोत्सव) : स्वतत्रता आन्दोलन में सोनभद्र की भूमिका पर हुई चर्चा, बलिदानियों को किया नमन

 

दुद्धी जिले में निकाली गयी भव्य शोभायात्रा

सोनभद्र| अमृत महोत्सव आयोजन समिति सोनभद्र द्वारा शुक्रवार को नगर व छपका  खंड में स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव का भव्य उद्घाटन किया गया। इस दौरान सोनभद्र विभाग में भी विभिन्न स्थानों पर उत्साह और हर्षोल्लास का माहौल दिखा|

    सोनभद्र जिला प्रचार प्रमुख नीरज के अनुसार जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार विजय शंकर चतुर्वेदी ने स्वतंत्रता  के अमृत महोत्सव पर सारगर्भित विचार रखते हुए कहा कि हर व्यक्ति के मन में राष्ट्रप्रेम का भाव और भारत माता के प्रति श्रद्धा ही स्वतंत्रता का अमृत है। स्वतंत्रता के अमृत से भारत विश्व गुरु बनेगा। भारत को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गए। जनपद सोनभद्र भारत के 150 पिछड़े जिलों में शामिल है| उन्होंने सोनभद्र के 100 वर्ष पहले का रेखांकन करते हुए बताया कि सोनभद्र में कुल 112 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे जिन्होंने स्वतंत्रता का सपना देखा था। उन्होंने बताया कि वर्ष 1941 में सोनभद्र में महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में  दुद्धी की राजेश्वरी देवी जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत द्वारा वर्ष की सजा व 50रु. जुर्माना किया था और पेटराही की शिवकुमारी का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सोनभद्र के परासी दूबे स्थित शहीद उद्यान में सोनभद्र के 112 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम गौरव स्तंभ पर उद्धिर्त है।

 

    कवित्री रचना तिवारी ने स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव का चित्रण काव्य पाठ में किया। सोनभद्र बार एसोसिएशन सोनभद्र के पूर्व अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद चौबे ने स्वतंत्रता के पूर्व के इतिहास का चित्रण करते हुए कहा कि मुगलोंहूणो आदि आक्रांताओं ने भारत की संस्कृति को नष्ट किया। राष्ट्र की अपनी सांस्कृतिक चेतना होती है। विंध्य कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या अंजली विक्रम ने वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम का विस्तृत चित्रण किया। कार्यक्रम का समापन में अध्यक्षता कर रहे शिवधारी शरण राय ने कहा कि 20 सितंबर से 30 सितंबर तक तिरंगा यात्रा तथा दिसंबर से 19 दिसंबर तक स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जायेगा जिसमे भारत माता का पूजन, आरती और वंदे मातरम का गायन आदि कार्यक्रम होंगे| स्वागत भाषण शारदा महेश इंटर कॉलेज के प्रभारी प्रधानाचार्य जितेंद्र सिंह ने किया। उपस्थित लोगों ने  वंदे मातरम के गान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

    रानी लक्ष्मीबाई जयंती पर आरम्भ हुए इस कार्यक्रम के दौरान राजा शारदा महेश इंटर कॉलेज सोनभद्र नगर में भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण किया गया| दीप प्रज्वलित कर  भगवान श्री गणेश की वंदना से कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ| तत्पश्चात उपस्थित विद्यार्थियों द्वारा देश भक्ति गीत व सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इस दौरान मुख्य रूप से कुंवर देवांश शिवशंकर उपस्थित रहें| संचालन भोला नाथ मिश्र ने किया।

ओबरा

    ओबरा नगर में आयोजित स्वाधीनता के 75 वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम का आयोजन अमृत महोत्सव आयोजन समिति ओबरा द्वारा किया गया| मुख्य वक्ता में सर्वप्रथम सोनभद्र जनपद के प्रख्यात लेखक पत्रकार नरेंद्र नीरव जी ने अपने उद्बोधन में कहा की सभी धर्म पंथ से ऊपर उठकर संघ  समाज  के सभी महापुरुषों को समुचित महत्व देता है। इसके साथ-साथ उन्होंने आदिवासी, वनवासी जैसे धीरशाहवीरशाहरमणी देवी, कोरबागुर्जर, खरवार सभी से जुड़े प्रेरणादाई महत्वपूर्ण घटनाओं का भी उल्लेख किया और बताया कि किस तरह झारखंड के चेरोकोल वनवासी प्रजातियों द्वारा अंग्रेजों का घोर विरोध बहुत अधिक संख्या में किया गया था और आदिवासी पंचशील सिद्धांत का भी उल्लेख किया। अन्य वक्ता के रूप में आनंद जी (संगठन मंत्री सेवा समर्पण संस्थान चपकी) बभनी ने संस्कृत श्लोक के साथ अखंड भारत गौरवशाली, प्राचीनता और सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार व्यक्त कियाl  उन्होंने बताया कि किस तरह अखंड भारत राजा विक्रमादित्य ,चंद्रगुप्त मौर्य और मेहर पाल के समय में रहा और कभी भी पूर्ण रूप से पराधीन नहीं रहा| किस प्रकार भारत सदैव सामर्थ्यवान चरित्रवान और शक्तिशाली था| अपने व्यक्तिगत निष्ठासंकल्पएवं हितों के दूरदृष्टि के अभाव के कारण कई बार अधर्म बढ़ने की वजह से पराधीन हुआकिंतु इसके  निरंतर गौरवशाली संघर्ष का इतिहास अत्यंत ही स्वर्णिम है|

   

    कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही ओबरा स्नातकोत्तर महाविद्यालय की डॉ विभा पांडे ने अपने उद्बोधन में महापुरुषों द्वारा दिए गए बलिदान का उल्लेख किया। सोनभद्र के परासी गांव से शहीद उद्यान का भी उन्होंने उल्लेख किया। उन्होंने आज की युवा पीढ़ी को हमारे पूर्वजों द्वारा महापुरुषों द्वारा इस राष्ट्र के निर्माण में दिए गए बलिदान और त्याग का भान होना चाहिए, उन्हें जागरूक होना चाहिए ताकि आने वाले भारत का संस्कृतिक और चारित्रिक रूप से नव निर्माण कर सकें सरस्वती विद्या मंदिर की छात्राओं द्वारा मां भारती आरती के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।

    कार्यक्रम में नगर अध्यक्ष प्रानमती देवीप्रमोद चौबे, शशिकांत शुक्लासंजय बैसवारधुरन्धर शर्मासंजीत चौबेदीपेश दीक्षित, मनोजजेपी केशरीमृदुलराजेशराजन,  सतीश पांडेयविकासशिशिर शर्माविनोद और बड़ी संख्या में नगरवासी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन सरस्वती विद्या मंदिर की छात्राओं द्वारा वंदेमातरम का गान हुआ| संचालन प्रमोद चौबे ने किया|

Saturday, November 20, 2021

अमृत महोत्सव : गुणगान हमलावरों का नहीं देश के शूर वीरों का होना चाहिए - डॉ मुरारजी

प्रयागराज। देश को विश्व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित कराने के लिए नई पीढ़ी में सही इतिहास का बोध बहुत आवश्यक है। गुणगान हमलावरों का नहीं देश के शूर वीरों का होना चाहिए। उक्त विचार प्रयाग दक्षिण के देवप्रयागम नगर के पीपल गांव स्थित रामचंद्र मिश्र मेमोरियल पब्लिक स्कूल में आयोजित महोत्सव का उद्घाटन के दौरान मुख्य अतिथि अमृत महोत्सव आयोजन समिति काशी प्रांत के सह संयोजक डॉ मुरारजी त्रिपाठी ने व्यक्त किया| इस दौरान कारगिल योद्धा को सम्मानित किया गया।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता की दशा एवं दिशा पर विचार करने का महत्वपूर्ण अवसर है यह अमृत महोत्सव। उन्होंने आगे कहा कि नई पीढ़ी को यह बताना जरूरी है कि हमलावर महान नहीं| उन्हें धूल चटाने वाले देश के शूरवीर महान थे डचो को त्रावणकोर से खदेड़ने वाले मार्तंड वर्मा शकारि विक्रमादित्य चंद्रगुप्त मौर्य राणा प्रताप शिवाजी महान थे। सिकंदर तथा अकबर को महान बताना देश की युवा पीढ़ी को गुमराह करने जैसा है।

विद्यालय के प्रबंधक आकाश मिश्रा जी की अध्यक्षता में संपन्न हुये इस कार्यक्रम में वक्ता आइटीबीपी के कमांडेंट श्री डब्ल्यू इनोबी सिंह ने सरकारी संस्थाओं में 12 मार्च 2021 से प्रारंभ हुए तथा आगे आने वाले 75 सप्ताह के कार्यक्रमों की संक्षिप्त जानकारी दी। जिसमें अरुणाचल प्रदेश से दिल्ली तक की साइकिल यात्रा हो चुकी है। कमांडेंट सीआइएसएफ एस के सारस्वत ने टूगेदर एवरीवन अचीव मोर (टीम) के माध्यम समझाया कि जब हम साथ मिलकर काम करते हैं तो हम जल्दी और ज्यादा उपलब्धि हासिल करते हैं। प्रिया जी ने  महारानी लक्ष्मीबाई पर लिखी कविता का सुंदर वाचन किया तथा माताओं से अपनी परंपरा के संरक्षण और देश भक्ति के भाव अपनी संतानों में जगाने का आव्हान किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ भारत माता के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्प अर्पण के साथ किया गया। समापन वंदेमातरम् से किया गया|

विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने राष्ट्र गान और देशभक्ति के गीत प्रस्तुत किए। विद्यालय के निदेशक सुभाष मिश्र ने कारगिल योद्धा श्री राम प्रकाश द्विवेदी को शाल,  श्रीफल से सम्मानित किया। संचालन श्री राहुल चावला ने किया। इस अवसर पर विजय मिश्र जी, चारु मित्र जी,  श्रीधर जी, वीरेंद्र त्रिपाठी जी, मनोज गौतम जी, वसु पाठक सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।