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Wednesday, December 31, 2025

भारत की संस्कृति व्यक्तिमंगल से विश्वमंगल की – प्रदीप जोशी जी

 हिन्दू समाज का जागरण एवं संगठन ही संघ का उद्देश्य

जौनपुर। तिलकधारी महाविद्यालय के प्रांगण में आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी जी ने कहा कि भारत की संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम एवं सर्व धर्म समभाव की है। यह व्यक्तिमंगल से विश्वमंगल की संस्कृति है। आज वर्तमान समय में हिन्दू समाज के जागरण एवं संगठन की आवश्यकता है। हिन्दू समाज के जागरण के इस कार्य को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 में प्रारंभ किया। इस वर्ष 2025 में संघ के स्थापना के सौ वर्ष पूरे हुए हैं और इसी क्रम में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त देशभर में हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि जब हिन्दू समाज संगठित और अनुशासित होगा, तभी भारत विश्व गुरु बनेगा। एक संगठित और संयमित समाज ही राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जा सकता है।

उन्होंने कहा कि संघ शताब्दी वर्ष में समाज परिवर्तन के लिए पांच आयाम पर कार्य कर रहा है। ये पांच बातें सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुम्ब प्रबोधन, स्वदेशी भाव का जागरण और नागरिक कर्तव्यों का बोध को लेकर समाज का जागरण कर रहा है। इनसे हिन्दू समाज की जय होगी और विश्व का कल्याण होगा, जिसमें सभी को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। मुख्य वक्ता ने सकारात्मक विमर्श को खड़ा करने की आवश्यकता का बल दिया। युवा को पश्चिम के झूठे एवं छद्म विचारों को तोड़ने की आवश्यकता है।

मुख्य अतिथि गायत्री परिवार के आचार्य राम सिंह जी ने कहा कि सनातन धर्म ने ही संपूर्ण विश्व को जोड़ने का मंत्र दिया है। इसकी कल्पना केवल सनातन संस्कृति में ही मिलती है।

विशिष्ट अतिथि प्रो शिखा श्रीवास्तव जी ने कहा कि आधुनिक दौर में परिवार एवं कुटुम्ब परम्परा को बचाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की साधना और संतों की प्रेरणा से आज देश का हिन्दू संगठित हुआ है। अब लोग ‘भारतमाता की जय’ और ‘वंदेमातरम्’ बोलने के लिए तत्पर हैं। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि फूलचंद सोनकर जी ने कहा, जब हिन्दू समाज में जाति-पाति, ऊंच-नीच का भेदभाव मिटकर एकता और समरसता आएगी, तभी एक मजबूत और विकसित, समर्थ भारत का निर्माण संभव है।

अतिथियों का स्वागत एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. उत्तम गुप्ता जी ने किया। संचालन डॉ. उदय जी ने किया।


Tuesday, December 30, 2025

धर्मान्तरित लोगों की घर वापसी कराना प्रत्येक हिन्दू का दायित्व — अनिल कुमार जी

हीन भावना से दूर रहने वाला हिन्दू है — भवानी नन्दन यति जी

काशी। धर्मान्तरित लोगों की घर वापसी कराना प्रत्येक हिन्दू का दायित्व है। हमारे ही परिवारों में कार्य करने वाले स्त्री—पुरुष धर्मान्तरण कर रहे हैं और हमें इस संकट का अनुमान भी नहीं है। गरीबी के कारण धर्मान्तरण होता है, यह बिल्कुल झूठ है क्योंकि वनवासी प्रदेशों में हमारे वनवासी भाई—बन्धु अपनी परम्पराओं को आज भी सहेजे हुए है। सोने को बेचकर यदि लोहा खरीदना पड़े तो अवश्य खरीदें। उक्त विचार काशी दक्षिण एवं उत्तर भाग में आयोजित हिन्दू सम्मेलनों को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक अनिल कुमार जी ने व्यक्त किया।

सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित काशी दक्षिण के श्रीनाथ उपवन सामने घाट एवं काशी उत्तर के हनुमान मंदिर परमानन्दपुर में कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू के शरीर पर सोना तभी तक सुरक्षित है, जब तक उनके घरों में लोहा सुरक्षित है। 1947 के भारत पाक बंटवारे के समय कराची एवं लाहौर में अनेक धनवान हिन्दुओं को अपना सबकुछ छोड़कर आना पड़ा। यह घटना दोहराई न जाए अत: समग्र हिन्दू समाज को धर्मयोद्धा बनना ही पड़ेगा। सामाजिक समरसता के सन्दर्भ में मुख्य वक्ता ने कहा कि दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान में अलग—अलग महापुरुषों की जयन्तियां अलग—अलग जातियों के लोग आयोजित कर रहे हैं। जबकि भारत की ही थारू एवं गाडिया लोहार जन—जाति महाराणा प्रताप को देवता की तर​ह सम्मान देती है। महापुरुष किसी भी जाति में नहीं बांधी जा सकती है। स्वामी विवेकानन्द जी का कथन है कि जब कोई व्यक्ति धर्मान्तरित होता है तो देश का एक दुश्मन बढ़ता है। हिन्दू सम्मेलन की सार्थकता धर्मांतरण को समाप्त करने में है।

काशी उत्तर के हनुमान मंदिर परमानन्दपुर में मुख्य अतिथि हथियाराम मठ गाजीपुर के पीठाधीश्वर भवानी नन्दन यति जी महाराज ने कहा कि हीन भावना से दूर रहने वाला हिन्दू है। हिन्दू धर्म वरिष्ठ जनों का सम्मान, राष्ट्रभक्ति, भातृप्रेम एवं संस्कारों का अनुपालन करना है। परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नही अधमाई। धारण किये जाने योग्य कर्तव्य ही धर्म है। हिन्दू सम्मेलन का उद्देश्य ही यह है कि युवा धर्म को ठीक प्रकार से समझे। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवत् गीता में कहा कि अपने धर्म में रहकर मर जाना अच्छा है। दूसरे के धर्म में जीवन भी निरर्थक है। भारत के विखण्डन का मूल आधार धर्म ही रहा है। परन्तु वर्तमान भारत में धर्म एवं संस्कृति की उपेक्षा आज भी जारी है। काशी दक्षिण के श्रीनाथ उपवन में साध्वी मु​क्तेश्वरी देवी जी ने कहा कि हिन्दू घरों में जो पुरुष या महिला काम करते हैं वह केवल एक कम्बल के लिए चर्च चले जाए यह चिन्ता का विषय है। हिन्दू परिवारों में दिन का एक घण्टा ऐसा होना चाहिए, जब सारा परिवार एक साथ बैठकर बातें करें। इस कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन डॉ0हरेन्द्र राय ने किया। भारत माता की आरती से हिन्दू सम्मेलन का वातावरण राष्ट्रभक्ति से ओत—प्रोत हुआ।

राष्ट्रीयता का विकास करने हेतु सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है — हरमेश चौहान

काशी दक्षिण के असी घाट पर आयोजित हिन्दू सम्मेलन में पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र कार्यकारिणी सदस्य हरमेश चौहान ने कहा कि राष्ट्रीयता का विकास करने हेतु सामाजिक परिवर्तन आवश्यक है। इस सामाजिक परिवर्तन को पांच प्रमुख परिवर्तनों द्वारा लाया जा सकता है। जिसे पंच प्रण का नाम दिया गया है। भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति की चर्चा करते हुए वक्ता ने कहा कि भारतीय शिक्षा अनुभव पर आधारित थी। व्यक्ति के अन्दर तीन ​गुण विशेष रूप से होने चाहिए। पहला जिज्ञासा, दूसरा धैर्य और तीसरा नेतृत्व क्षमता। हिन्दू समाज के जागृत होने पर उसका विरोध स्वाभाविक रूप से होगा। परन्तु राष्ट्र के विखण्डन का मूल्यांकन करना ही होगा।

बच्चों को अध्यात्म, साहित्य, संस्कृति, धर्म से जोड़ने की आवश्यकता — सुनील जी

काशी मध्य के शिवपुरवा बस्ती महमूरगंज में हिन्दू सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी प्रान्त के सह प्रान्त प्रचारक सुनील जी ने कहा कि आज अपने बच्चों को जीवन मूल्य सिखाने की आवश्यकता है। बच्चों को अध्यात्म, साहित्य, संस्कृति, धर्म से जोड़ने की आवश्यकता है। बच्चों को कहानियों, व्यवहार, आचरण, शिक्षा से एक श्रेष्ठ नागरिक बनाने का कार्य करना है। संघ समाज में पंच परिवर्तन सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्यबोध, पर्यावरण, स्वदेशी और कुटुंब प्रबोधन को लेकर जा रहा है, इसे अपने जीवन में उतारना है। इस दृष्टि से अपने जीवन को सार्थक और सफल बनाने के लिए हमें संकल्प करना होगा।

प्राचीन भारत में समरसता, सहकारिता के सा​थ थी — त्रिलोक

काशी दक्षिण के खोजवा स्थित कम्पोजिट प्राथमिक विद्यालय परिसर में आयोजित हिन्दू सम्मेलन में मुख्य वक्ता मा0सह विभाग संघचालक काशी विभाग त्रिलोक जी ने कहा कि प्राचीनभारत में समरसता, सहकारिता के सा​थ थी। सभी सामाजिक आयोजन एक दूसरे के परस्पर सहयोग से सम्पादित होते थे। प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्थ भी सहकारिता आधारित कृषि पर निर्भर थी। हिन्दू धर्म को खतरा परकियों से नहीं बल्कि अपने आप से है। हिन्दुओं का खान पान, आचार विचार से 75 प्रतिशत धर्म परिवर्तन हो चुका है। 180 वर्ष पूर्व लॉर्ड मैकाले नामक अंग्रेज अधिकारी ने भारतीय शिक्षा पद्धति को नष्ट करने हेतु 6 बिन्दु दिये। उसके अनुसार हिन्दू समाज अतार्किक है, इसका कोई इतिहास नहीं है। य​ह अवैज्ञानिक धर्म है। इस धर्म में मिथ्या तथ्य दिये गये है, यह अनैतिक और कपोल कल्पित है। भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली इन्हीं बिन्दुओं पर टिकी हुई है।

काशी मध्य भाग के विनायक और सरस्वती बस्ती में आयोजित हिंदू सम्मेलन के मुख्य अतिथि महंत द्वारकाधीश मंदिर श्री रामदास आचार्य जी मुख्यवक्त मुख्य वक्ता श्रीमान दीनदयाल जी ने सम्बोधित किया। दीनदयाल जी ने पंच परिवर्तन के सभी विषय उदाहरण सहित बताए। अध्यक्षता डॉ महेंद्र कुमार जायसवाल ने किया। विशिष्ट अतिथि देवी गुप्ता जी विद्यालय प्रबंधिका एवं श्री बाल गंगाधर प्रसाद समाजसेवी की उपस्थिति में संपन्न हुआ कार्यक्रम का संचालन प्रदीप चौरसिया एवं समीर ने किया। धन्यवाद ज्ञापन अंशु ने किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम छात्र—छात्राओं ने प्रस्तुत किया। बच्चों को पर्यावरण संरक्षण की जानकारी के लिए जो चित्रकला प्रतियोगिता रखी गई थी उसका परिणाम भी घोषित किया गया और छात्रों को पुरस्कृत किया गया। हिन्दू सम्मेलन के कार्यक्रम कामाख्या नगर के नगर संघचालक श्रीमान ओमप्रकाश जी भी उपस्थित थे।

इन स्थानों पर भी आयोजित हुए हिन्दू सम्मेलन

केशव नगर स्थित महामनापूरी कॉलोनी एवं कबीर नगर के होरीलाल पार्क में नवीन श्रीवास्तव, लोहिया नगर कालोनी सामुदायिक केन्द्र आशापुर में गुलाब जी, मुड़ीकट्टा बाबा पार्क दौलतपुर में दिनेश जी, पिसौर (शिवनगर) में कमलेश जी, रामजानकी मंदिर एवं दास नगर कॉलोनी पार्क के सामने जगतगंज, चंदेश्वर महादेव मंदिर चंदापुर, आकाश वाटिका भरथरा समेत अन्य कई स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित हुए।







Tuesday, December 23, 2025

सम्पूर्ण विश्व को हिंदुत्व ही बंधुता और एकता का संदेश देता है — सुभाष जी

प्रतापगढ़। भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिस्थापित करने के लिए जाति-पाति का भेद मिटाकर हमें हिन्दू संस्कृति पर चलना होगा। भारत हिन्दू राष्ट्र है, इसे घोषित करने की आवश्यकता नहीं। अनेक आक्रमण झेलने के बाद भी भारत में हिंदुत्व जिंदा है। सम्पूर्ण विश्व को हिंदुत्व ही बंधुता और एकता का संदेश देता है। "अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्" यह हिंदुत्व का मूल संदेश है। उक्त विचार सकल हिन्दू समाज समिति दयानंद बस्ती द्वारा आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में उपास्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुभाष जी ने रखी।

उन्होंने आगे कहा कि हिन्दू एक जीवन पद्धति है जो सबको आदर्शों पर चलना सिखाती है। हिंदू ही हैं जो सर्वे भवन्तु सुखिन: अर्थात सबके सुख की कामना करता है। आज हमें विधर्मियों के षड्यंत्रोंं से बाहर आकर एक सूत्र में आबद्ध होने की आवश्यकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता सेवा निवृत्त उप पुलिस अधीक्षक ओम प्रकाश सिंह ने किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में ज्योतिषाचार्य पंडित अमरनाथ मिश्र ने कहा कि हम हिंदुओं के संगठित प्रयास से ही भारत भव्य होगा क्योंकि हिंदू ही भारत को अपना समझता है। विशिष्ट अतिथि अधिवक्ता बृजलाल सरोज एवं साध्वी विभा दीदी, कथावाचक शिवम प्रपन्नाचार्य एवं समाजसेविका श्रीमती प्रेम कुमारी ने भी अपना विचार प्रकट किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रवज्जलन के साथ हुआ।





Monday, December 22, 2025

कुटुम्ब का भाव ही हिन्दू समाज को संगठित रखता है — रमेश जी

भारत का होकर ही भारतीय संस्कृति को समझा जा सकता है - अभय कुमार जी


काशी। काशी दक्षिण भाग के रोहनिया स्थित शिवधाम नगर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित हिंदू सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी प्रान्त के प्रान्त प्रचारक रमेश जी ने कहा कि कुटुम्ब का भाव ही हिन्दू समाज को संगठित रखता है। जनवरी में आयोजित महाकुम्भ में 50 करोड़ लोगो विभिन्न पण्डालों एवं महामण्डलेश्वर के आश्रमों में भोजन ग्रहण किया। यह भारतीय परिवार प्रणाली का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने आगे कहा कि प्राचीन भारत इतना सम्पन्न था कि व्यापार में सोने और चांदी के सिक्के प्रयोग में लाये जाते थे। बाद में व्यक्तिगत संघर्ष में हिन्दू समाज विखण्डित हुआ। इसी विखण्डन का लाभ लेते हुए अखण्ड भारत के टुकड़े किये गये। जिसमें लगभग दो करोड़ हिन्दुओं ने पलायन किया। वर्तमान में हिन्दू समाज की समस्या का समाधान एकता, समरसता बन्धुता परस्पर प्रेम तथा संगठित होने में है। तत्पश्चात उन्होंने काशी मध्य भाग के लोहता के रामलीला मैदान एवं सिगरा के कल्याणी वाटिका में भी आयोजित हिन्दू सम्मेलन को सम्बोधित किया। शिवधाम नगर में मातृशक्तियों ने कलश यात्रा भी निकाली जिसमें नगर की माता—बहनों ने बड़ी संख्या में सहभाग किया।

भारत का होकर ही भारतीय संस्कृति को समझा जा सकता है - अभय कुमार जी

दक्षिण भाग के बृजएंक्लेव कॉलोनी के मुंशी प्रेमचंद पार्क एवं जानकी नगर के पद्मजा लॉन में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र धर्म जागरण प्रमुख अभय जी ने कहा कि भारत का होकर ही भारतीय संस्कृति को समझा जा सकता है। हिंदू शब्द मात्र एक धर्म सूचक शब्द ना हो करके समस्त भारतीयों का परिचय है। उन्होंने कहा कि भारत में जब सभी सनातनी थे तब हिंदू शब्द का बहुत प्रचलन नहीं था,बाद में अन्य संप्रदाय के भारत में बढ़ने के बाद हिन्दू शब्द परिचय के रूप में प्रयोग बढ़ा। एक मान्यता है कि सिंधु शब्द का उच्चारण हिंदू हुआ, परंतु वास्तव में सही तथ्य यह है कि भारत के विदेशी आक्रांताओं के आने के बाद स्वयं को अलग करने की दृष्टि से भारत के मूल निवासियों ने हिंदू शब्द के प्रयोग को बढ़ाया। यह प्राचीन धर्म है, इस्लाम की स्थापना 610 ईस्वी में होती है उसके पूर्व इस्लाम का नाम लेने वाला कोई नहीं था, इसी प्रकार 26 वर्ष की आयु में ईसा मसीह ने ईसाई धर्म प्रारंभ किया, उसके पूर्व ईसाई धर्म का कोई अस्तित्व नहीं था।

भारतीयों को हिंदू शब्द प्रयोग करने में जो संकोच उत्पन्न होता है उसका कारण है तो 2300 वर्षों तक आक्रमणकरियों से सतत संघर्ष करते रहना। इस बीच हिंदू धर्म को लेकर कई झूठ बोले गए और लंबे समय तक यदि कोई झूठ बोला जाता रहे तो वह भी कभी-कभी सच जैसा लगता है। भारत में  जातियों का उल्लेख 1872 से लिखित रूप में प्राप्त होता है। इसी प्रकार भारत में छुआछूत का उल्लेख 712 ई से प्रारंभ होता है। 1947 में जो भारत स्वतंत्र हुआ तब भारत सरकार द्वारा सामान्य, अनुसूचित जाति एवं जनजातीय के रूप में हिन्दुओं को बांटा गया। वर्ष 1990 में पिछड़ा वर्ग के रूप में हिंदू समुदाय में और अधिक विखंडन किया गया। मुख्य वक्ता ने हिंदू समाज की समस्याओं के निराकरण के लिए मुख्य अवसरों पर एक साथ भोजन और समाज की समस्याओं के लिए एक साथ बैठकर निराकरण करने को महत्वपूर्ण बताया। इसके अतिरिक्त उन्होंने चेतगंज के सेनपुरा मैदान में आयोजित हिन्दू सम्मेलन कार्यक्रम को भी सम्बोधित किया।

इसके पूर्व प्रख्यात लेखिका विनीता जी द्वारा राष्ट्रभक्ति कविता प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे छात्र अधिष्ठाता आईआईटी बीएचयू श्रीमान राजेश जी ने कहा कि मनुष्य को उसके माता-पिता से संस्कार प्राप्त होता है और चेतना के विकास के साथ-साथ हम अपने परिवार समाज और राष्ट्र के साथ एकाकार होते हैं। हमें जो भी ज्ञान अपने पूर्वजों से मिला है उसे अपने जीवन में उतारना आवश्यक है हिंदू को आत्मबोध की पहचान आवश्यक है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में मंचासीन अतिथियों के साथ श्री हनुमान ध्वज यात्रा समिति के संस्थापक रामबली जी एवं अगिया जोगिया वीर बाबा मंदिर के महंत रामदास जी ने भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर एवं दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का प्रारंभ कियाl  कार्यक्रम का संचालन कृष्ण मोहन तिवारी ने किया।

दक्षिण भाग के रामनगर में मुख्य वक्ता प्रख्यात चिकित्सक डॉ0शशिभूषण उपाध्याय, हनुमान नगर में विश्व हिन्दू परिषद अ0भा0सेवा प्रमुख राधेश्याम द्विवेदी, संत रविदास नगर में मुख्य वक्ता ​विधि संकाय बीएचयू के प्रो0विवेक पाठक, मालवीय नगर में आयोजित दो हिन्दू सम्मेलनों में ​मुख्य वक्ता मा0विभाग संघचालक जयप्रकाश लाल एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र कार्यकारिणी सदस्य हरमेश चौहान, माधव नगर में अरविन्द जी, केशव नगर में मुख्य वक्ता अ0भा0संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती एवं कर्दमेश्वर नगर में काशी विभाग के विभाग कार्यवाह राजेश विश्वकर्मा जी समेत अनेक हिन्दू सम्मेलनों को वक्ताओं ने सम्बोधित किया।


भाग के मानस नगर के दीनदयाल पार्क में आयोजित हिन्दू सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए काशी विद्वत परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री प्रोफेसर रामनारायण जी ने कहा कि हिंदू समाज को अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रतिकार करना सीखना होगा। वाल्मीकि रामायण में "सत्यम परम धीमहि" का आश्रय लेकर ही वृद्ध पक्षी जटायु द्वारा रावण का प्रतिकार किया गया था। 

हिंदू समाज की वर्तमान समस्याएं प्राचीन व्यवस्थाओं में संक्रमण दोष के कारण उत्पन्न हुई है। हिंदू शब्द की व्याख्या करते हुए वक्ता ने कहा कि भारत भूमि में जन्म लेने वाला भारत भूमि को मातृभूमि पितृ भूमि मानने वाला हिंदू है। वेदों पर विश्वास करने वाला ऋषि मुनियों पर विश्वास करने वाला जैन बौद्ध सिख यह सभी हिंदू भाई हैं। हिंदू समाज के उत्थान में मातृशक्ति की चर्चा करते हुए वक्ता ने कहा कि वेदों में मातृ देवों भव कहकर माता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। मंचासीन विजय चौधरी ने सामाजिक समरसता पर बल  दिया। असिस्टेंट कमिश्नर जीएसटी कनक तिवारी जी ने नारी सम्मान की चर्चा करते हुए बताया कि सुभद्रा के सो जाने के कारण अभिमन्यु को चक्रव्यूह का पूरा ज्ञान नहीं हो पाया। अतः भारतीय समाज में माता को नींद से जागना ही होगा। कार्यक्रम के अध्यक्षता भूतपूर्व अखिल भारतीय सिख संगत के अध्यक्ष भूपेंद्र वालिया ने किया।










विभिन्न जाति इकाईयों में रहने के बाद भी हम हिन्दू है — स्वांत रंजन जी

गौतम नगर में क्षेत्र कार्यवाह डॉ. वीरेन्द्र जी ने किया सम्बोधित


काशी। विभिन्न जाति इकाईयों में रहने के बाद भी हम हिन्दू है। हम सबकी एक ही भारत माता है। सहभोज, सामूहिक विवाह, समरसता के माध्यम से हम अपना सामाजिक स्वरूप समय—समय पर प्रकट करते हैं। उक्त विचार काशी उत्तर भाग के विश्वनाथ नगर (चांदमारी) में सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित हिन्दू सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन जी ने व्यक्त किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित हिंदू सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में पारिवारिक विघटन को बचाने के लिए परिवार मुहल्ले की पूरी जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को होनी चाहिए। बच्चों को पैसा कमाने की मशीन न बनाये। स्व—बोध की चर्चा करते हुए वक्ता ने कहा कि स्व के भाव का जागरण हम सभी को हिन्दी में हस्ताक्षर के रूप में प्रारम्भ करना चाहिए। भारत के पीछे इतिहास है। जबकि यह इतिहास इण्डिया में नहीं है। इसी कारण भारत हमारी माता हैं। भारत की जनता ने परकीय शासन को कभी स्वीकार नहीं किया। मुगल काल में भी जनता के राजा भगवान रामचन्द्र रहे। 1947 के भारत विभाजन की विभीषिका को बताते हुए मुख्य वक्ता ने म​हर्षि अरविन्द के वक्तव्य का उदाहरण दिया जिसमें यह कहा गया कि यह विभाजन कृत्रिम है, प्राकृतिक नहीं है। मुख्य अतिथि स्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज के शिष्य स्वामी नारद जी ने कहा कि भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि मनुष्य मेरा विशुद्ध सनातन अंश है। जब प्रत्येक व्यक्ति इस भाव के साथ समाज में व्यवहार करेगा तब छुआछूत, भेदभाव, जातिभाव स्वत: समाप्त हो जाएगा। विशिष्ट अतिथि मातृशक्ति समाजसेवी भावना अग्रवाल ने परिवार में मातृशक्ति द्वारा बच्चों में भारतीय संस्कार दिये जाने के लिए प्रेरित किया। संचालन आलोक एवं संयोजन सर्वेश सिंह ने किया। 

गौतम नगर में क्षेत्र कार्यवाह डॉ. वीरेन्द्र जी ने किया सम्बोधित

काशी उत्तर भाग के गौतम नगर में आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र कार्यवाह वीरेंद्र जी ने कहा कि हिंदू समाज को भगवान श्रीराम और श्री कृष्ण के जीवन से समाज को प्रेरणा लेने की जरूरत है। बौद्ध धर्मगुरु डॉ. के सिरी सुमेधा थिरो ने भारत के वसुधैव कुटुंबकम प सिद्धांत पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ.कमलेश झा जी ने किया। डॉ.अशोक सोनकर जी ने समरसता एवं वंचित समाज विषय पर प्रकाश डाला। इसके अतिरिक्त उत्तर भाग के न्याय नगर में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षाविद् डॉ0 हरेन्द्र राय, प्रेमचन्द नगर में प्रान्त घोष प्रमुख राकेश जी, रा​जर्षि नगर में विभाग सम्पर्क प्रमुख दिनेश जी, शिवनगर में विभाग सेवा प्रमुख संजय जी ने विभिन्न हिन्दू सम्मेलनों को सम्बोधित किया।






Saturday, December 20, 2025

संघ गंगा के तीन भगीरथ के मंचन ने संघ यात्रा से कराया परिचित

  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम तीन सरसंघचालकों के जीवन पर आधारित नाटिका
  • मुख्य अतिथि काशी प्रांत प्रचारक रमेश जी ने कहा कि शताब्दी वर्ष में संघ के प्रथम तीन सरसंघचालकों के जीवन कार्य को जीवंत मंच पर देखना, हम स्वयंसेवकों का सौभाग्य 

काशी। संस्कार भारती द्वारा आयोजित संघ के प्रथम तीन सरसंघचालकों के जीवन कार्य पर आधारित नाटक संघ गंगा के तीन भगीरथ का मंचन हुआ। नागरी नाटक मंडली के मंच पर आयोजित इस नाटक का प्रारंभ केशव के ऋग्वेद शिक्षक श्री वझे गुरुजी (नानाजी वझे) से होता है, जहाँ वे केशव की छोटी-छोटी शरारतों और छत्रपति शिवाजी महाराज के पदचिह्नों पर चलने की उसकी प्रबल इच्छा का उल्लेख उसके माता-पिता से करते हैं। सामाजिक चेतना जगाने वाले संवादों से नाटक धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। केशव ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में, परंतु दृढ़ निश्चय के साथ कलकत्ता जाकर डॉक्टर बनने का अपना सपना पूरा किया –

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार बनने के बाद उनके क्रांतिकारी विचार, जातिवाद पर उनके स्पष्ट मत,  और संघ के कार्य में अंतर की स्पष्टता – इन सबका सुंदर चित्रण किया गया है।

इतिहास प्रस्तुत करते समय वह नीरस न लगे, इसके लिए लेखक की कला और कौशल की परीक्षा होती है। नाटक में दो प्रसंगों को जोड़ने के लिए भारत माता की मधुर वाणी में प्रस्तुत प्रस्तावना दर्शकों को मंत्रमुग्ध करती है। जब वास्तविक रूप से भारत माता मंच पर अवतरित होती है, तो पूरा सभागार खड़ा होकर उनका अभिवादन करता है – यह दृश्य सब कुछ कह देता है। मीनल मुंडले ने भारत माता की भूमिका निभाई है।

इतने सीमित समय में संघ के पहले तीन सरसंघचालकों का कार्य, उनका नेतृत्व, नेतृत्व का हस्तांतरण, उससे जुड़ा इतिहास और जीवन चरित्र मंच पर नाटक ने सफलतापूर्वक निभाया है, संघ की स्थापना का संकल्प, प्रचार-प्रसार का विचार और महात्मा गांधी व डॉ. हेडगेवार की भेंट का प्रसंग अविस्मरणीय सिद्ध होता है। महात्मा गांधी की भूमिका निभाने वाले संकल्प पायळ ने गांधी जी को इतने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है कि उनकी चाल, बोलने का ढंग और अंत में मंच से निकल जाने तक सब कुछ अद्भुत और शानदार लगा।

प.पू. श्री गुरुजी (गोलवलकर) का जीवन, स्वामी अखंडानंद जी के साथ उनका प्रवास, नागपुर लौटना, डॉ. हेडगेवार से मुलाकात, आदि का मंचन हुआ। दृश्यों के परिवर्तन में संगीत का उपयुक्त प्रयोग दर्शकों को बाँधकर रखता है।

सरदार वल्लभभाई पटेल और प.पू. श्री गुरुजी के बीच संवाद, कश्मीर का भारत में विलय, संघ पर लगा प्रतिबंध – ये सब भारत माता के रूप में सूत्रधारिका की कोमल, किंतु ठोस वाणी में सहजता से प्रस्तुत होते हैं। वंदे मातरम् का गगनभेदी उद्घोष, भगवा ध्वज का संतुलित उपयोग और संघ घोष की लय – इन सबका अद्भुत समन्वय देखने को मिला।

युवा अवस्था के बाळासाहेब देवरस द्वारा प.पू. गुरुजी को किया गया प्रणाम अत्यंत प्रभावशाली और नाटक की पकड़ मजबूत करने वाला था।

बाळासाहेब देवरस का तीसरे सरसंघचालक के रूप में चयन, 1975 की आपातकाल की पृष्ठभूमि, उसके विरोध में हुए सत्याग्रह, मीसा बंदी, रामजन्मभूमि आंदोलन – ऐसे अनेक प्रसंग 1889 से 1996 तक की कालावधि के प्रस्तुत किए गए।

संघगंगा” – एक अनादि प्रवाह

नाटक के शीर्षक में “संघगंगा” शब्द प्रयोग अत्यंत सार्थक है। इन तीन भगीरथों ने जो प्रवाह आरंभ किया, वह आज शताब्दी मना रहा है। यह संघगंगा निरंतर कार्यों के रूप में बह रही है और अनंत काल तक बहती रहेगी – यह भावना नाटक ने दर्शकों तक प्रभावी रूप से पहुँचाई।

नाटक का लेखन श्रीधर गाडगे ने किया है। नाटक के मार्गदर्शक रविंद्र भुसारी, निर्देशक संजय पेंडसे, निर्मात्री सारिका पेंडसे हैं। संगीत डॉ. भाग्यश्री चिटणीस का है और नेपथ्य सतीश पेंडसे ने रचा है। निर्माण में रमण सेनाड, नीलिमा बावणे और अरुणा पुरोहित का योगदान है।

मनीष ऊईके (डॉ. हेडगेवार), रमण सेनाड (प.पू. गुरुजी) और यशवंत चोपडे (बाळासाहेब देवरस) -इनके अभिनय ने अनुभव कराया कि मानो हम संघ गंगा की इन तीन विभूतियों से साक्षात मिल रहे हों और उनके विचार सुन रहे हों।

प्रांत प्रचारक रमेश जी ने कहा कि शताब्दी वर्ष में संघ के प्रथम तीन सरसंघचालकों के जीवन कार्य को जीवंत मंच पर देखना, हम स्वयंसेवकों के लिए सौभाग्य का विषय है। समापन पर नाटक के कलाकारों का सम्मान वीरेंद्र जायसवाल, क्षेत्र कार्यवाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, व अन्य ने किया।