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Wednesday, December 8, 2021

अमृत महोत्सव : स्वतंत्रता संग्राम के अज्ञात सेनानी – कांगड़ा के वीर सिंह गुलेरिया, बर्लिन से हिन्दुस्तान में देते थे नेता जी का संदेश

 

देश की स्वतंत्रता के लिए आजाद हिन्द सेना के संस्थापक नेता जी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी के बर्लिन रेडियो स्टेशन से हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान से बाहर रहने वाले भारतीयों से संवाद स्थापित करते थे. देशभक्ति से ओत- प्रोत नेता जी के शब्दों को कांगड़ा जिला के रैत ब्लॉक के टुंडु गांव निवासी वीर सिंह गुलेरिया धाराप्रवाह अंग्रेजी और हिंदी में हिन्दुस्तानियों तक पहुंचाते थे. बर्लिन रेडियो स्टेशन पर दो साल तीन महान रेडियो अनाउंसर रहे गुलरिया बेशक अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आजाद हिन्द सेना के इस सिपाही की राष्ट्रभक्ति की चमक आज भी बरकरार है. स्वतंत्रता सेनानी वीर सिंह के जीवन से जुड़े कुछ प्रसंग


देश के नाम क्रांति का संदेश

गाजियों में बू रहेगी जब तलक इंमान की,

तब तो लंदन तक चलेगी तेग हिन्दोस्तान की
क्रांति का बिगुल फूंकने वाले इन शब्दों के साथ जर्मनी के बर्लिन में स्थित फ्री इंडिया सेंटर रेडियो स्टेशन के कार्यक्रमों की शुरूआत होती थी. नेता जी की खास रणनीति के तहत तैयार किए जाने वाले इन कार्यक्रमों का प्रसारण नियमित होता था और यह कार्यक्रम हिन्दुस्तानियों पर गहरा प्रभाव डालते थे. अंग्रेजी और हिंदी धाराप्रभाव बोलने के चलते अनाउंसर की जिम्मेवारी वीर सिंह गुलेरिया को सौंपी गई थी. अपने काम को गुलेरिया कितनी शिद्दत से निभाते रहे, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपने पत्रों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कई बार उनकी पीठ थपथपाई.

15 नवंबर, 1920 को रैत के टुंडु गांव में पैदा हुए वीर सिंह ने एसएम हाई स्कूल इंदौरा से मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त की. 20 साल की आयु में सेना में हैड क्लर्क भर्ती हो गए. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रजों की ओर से लड़ने के लिए उन्हें लीबिया के मोर्चे पर जर्मन भेजा गया. वहां उन्हें अनाबर्ग कैंप में बतौर कैदी रखा गया. इसी दौरान उनकी मुलाकात आजाद हिन्द सेना के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई और उन्हें आजाद हिन्द सेना में अहम जिम्मेवारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया.



कैदी कैंप से रेडियो स्टेशन

नेताजी सुभाषचंद्र बोस उन दिनों जर्मनी में थे. बर्लिन में जर्मन सरकार की सहायता से उन्होंने भारत की आजादी के लिए फ्री इंडिया कैंप बना रखा था. इस सेंटर का स्वतंत्र रेडियो स्टेशन था, जिसके माध्यम से विदेशों में रहे हिन्दोस्तानियों के लिए कार्यक्रम प्रसारित किए जाते थे. नेताजी को एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो अंग्रेजी व हिंदी अच्छी तरह से जानता हो और कार्यक्रम सफलतापूर्वक पेश कर सके. इसी तलाश में नेताजी भारतीय कैदी कैंप में पहुंचे और दसवीं या इससे ज्यादा पढ़े सभी कैदियों के साक्षात्कार लिए और वीर सिंह गुलेरिया को अनाउंसर के लिए चुन लिया गया.

सादा जीवन व उच्च विचार रखने वाले वीर सिंह गुलेरिया असंख्य यातनाएं सहकर भी अंग्रेजों के आगे नहीं झुके. उन पर मुकद्दमे चले, परंतु वल्लभ भाई पटेल व जवाहर लाल नेहरू के सहयोग से 15 अप्रैल, 1946 को जेल से छूट कर घर लौटे. आजादी मिलने के बाद उन्होंने 21 साल भारतीय सेना में दोबारा नौकरी की. इसके बाद धर्मशाला कॉलेज में क्लर्क के रुप में काम किया. ताम्र पत्र, सेवा मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित वीर सिंह गुलेरिया की कहानी संघर्षों की एक लंबी गाथा है.


हवाई हमलों के बीच प्रसारण

वीर सिंह ने जर्मन के बर्लिन रेडियो पर दो साल तीन महीने हिंदोस्तानी अनाउंसर के तौर पर कार्य किया. यह वह दौर था, जब सारा विश्व युद्व की आग में जल रहा था. बर्लिन में दिन-रात हवाई हमलों की आशंका के चलते जीवन कष्टदायक था. वह मौत के साये में जीवन गुजार कर भी धारा प्रवाह अपने कार्यक्रम देते रहे और नेताजी के संदेश रेडियो के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंचाते रहे. मार्च 1945 में जर्मनी में लड़ाई के दौरान कार्यक्रम का प्रसारण बंद हो गया. रेडियो प्रसारण के बंद होने पर उन्हें बर्लिन से ब्रिटेन और फिर भारत को बहादुरगढ़ कैंप में भेज दिया गया. उनकी सैन्य सेवाएं रद्द कर दी गईं और भविष्य में सरकारी सेवाओं के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया.

स्रोत- विश्व संवाद केन्द्र, भारत

Saturday, December 4, 2021

प्रतापगढ़ - हमने विदेशी आक्रांताओं का प्रतिरोध कर स्वाधीनता प्राप्त की

प्रतापगढ़| भारत ने कभी भी पराधीनता स्वीकार नहीं की| अनेक विदेशी आक्रान्ताओं ने आक्रमण किये किन्तु भारत कभी उनके सामने घुटने नहीं टेकें| हमने सभी विदेशी आक्रान्ताओं का प्रतिरोध किया और  स्वाधीनता प्राप्त की| उक्त विचार अमृत महोत्सव आयोजन समिति, प्रतापगढ़ द्वारा आयोजित शैक्षिक संगोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्त किया|

नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित कार्यक्रम का आरम्भ भारत माता पूजन से किया गया| कार्यक्रम के दौरान विद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा राष्ट्र भक्ति पर आधारित अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए| इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतापगढ़ विभाग संघचालक रमेश चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अनेकों वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है| हम सभी को उनके प्रति श्रद्धावनत होकर इस अमृत महोत्सव में ज्ञात अज्ञात वीरों का स्मरण कर भारत को परम वैभव तक के शिखर तक पहुंचाने में अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए| डॉक्टर पीयूष कांत शर्मा ने कहा कि यह देश वीरों का देश है| अनेक आक्रांता आए किंतु भारत ने कभी भी पराधीनता स्वीकार नहीं की| हमने लगातार संघर्ष किया, जिसके फलस्वरूप स्वाधीनता प्राप्त की| उन्होंने प्रतापगढ़ के किसान आंदोलन की चर्चा करते हुए कहा कि प्रतापगढ़ के किसान आंदोलन ने स्वाधीनता आंदोलन को एक नई दिशा देने का कार्य किया

इसी क्रम में स्वाधीनता आंदोलन के प्रतापगढ़ जिले के विभिन्न केंद्रों जिनमें गौरा, नमक सायर,रूरे, कहला आदि के संदर्भ में विस्तार से प्रकाश डाला| जिला कार्यवाह डॉक्टर सौरभ पांडेय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत कभी भी पूर्ण रूप से परतंत्र नहीं रहा है| हमने लगातार विदेशी आक्रांताओं का प्रतिरोध किया है| स्वाधीनता आंदोलन में अगणित योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत माता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है| देश की आजादी किसी एक व्यक्ति या एक परिवार की देन नही है| स्वाधीनता संपूर्ण समाज की संगठित शक्ति के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुई है|

उन्होंने आह्वान किया कि आने वाले 19 दिसंबर को हम सब वंदेमातरम के सामूहिक गायन के लिए समाज को जागृत कर राष्ट्रभक्ति के भाव का संचार करें| अंत में भारत माता की आरती संपन्न हुई| इस अवसर पर प्रभाशंकर पाण्डेय, डॉ आर.के. सिंह, धीरेंद्र नारायण चड्ढा, अश्विनी केशरवानी, पुष्पांजलि शुक्ल, मुरलीधर केसरवानी, नितेश खंडेलवाल, शरद केसरवानी, अशोक शर्मा, गजराम मौर्य, ओम प्रकाश त्रिपाठी, कृष्ण कांत मिश्र, सावन, संदीप रावत, अश्वनी सोनी, दिनेश सिंह दिन्नू,  तुषार खंडेलवाल आदि उपस्थित रहे| संयोजन संजीव कुमार आहूजा और संचालन शिशिर खरे ने किया|

Thursday, December 2, 2021

धमनियों में राष्ट्रधर्म (भाग 2) - काशी के लाल शचीन्द्रनाथ सान्याल

 - डॉ हेमन्त गुप्त

काशी की कोख से ऐसे अनेक शूरवीर भारत माता के सपूतों ने जन्म लिया है, जिन्होंने माँ भारती की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। काशी के एक ऐसे ही लाल शचीन्द्रनाथ सान्याल भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे जिन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। राष्ट्र्भक्ति से ओतप्रोत इस नवयुवक ने अनेक राष्ट्रीय व क्रांतिकारी आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की । साथ ही साथ उन्होंने नई क्रान्तिकारियों की पीढ़ी का सृजन एवं मार्गदर्शन किया।

शचीन्द्रनाथ सान्याल का जन्म 1893 में वाराणसी में हुआ था। उनके पिता का नाम हरिनाथ सान्याल और माता का नाम वासिनी देवी था। शचीन्द्रनाथ के अन्य भाइयों के नाम थे- रविन्द्रनाथ, जितेन्द्रनाथ और भूपेन्द्रनाथ। इनमें भूपेन्द्रनाथ सान्याल सबसे छोटे थे। कहा जाता है कि पिता हरिनाथ सान्याल ने अपने सभी पुत्रों को बंगाल की क्रांतिकारी संस्था 'अनुशीलन समिति' के कार्यों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया था। पिता की शिक्षा एवं राष्ट्र्भक्ति के कारण चापेकर' बन्धुओं की तरह ही तीनों 'सान्याल बन्धु' भी राष्ट्रवादी धारा के साथ दृढ़ता के साथ खड़े रहे। इसी का परिणाम था कि शचीन्द्रनाथ के बड़े भाई रविन्द्रनाथ सान्याल 'बनारस षड़यंत्र केस' में नजरबन्द रहे। छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ सान्याल को 'काकोरी काण्ड' में पाँच वर्ष क़ैद की सज़ा हुई और तीसरे भाई जितेन्द्रनाथ 1929 के 'लाहौर षड़यंत्र केस' में भगत सिंह आदि के साथ अभियुक्त थे।

सान्याल का शैशव काशी में बीता । पिता से उन्हें देशभक्ति का  जज़्बा मिला। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बंगाली टोला हाई स्कूल और क्वीन्स कॉलेज बनारस में हुई थी। काशी की मिट्टी ने उन्हें ज्ञान, विज्ञान के साथ साथ अपनी संस्कृति और राष्ट्र से प्रेम का भी पाठ पढ़ाया। 1905 में "बंगाल विभाजन" के बाद खड़ी हुई ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी लहर ने उस समय के बच्चों और नवयुवकों को राष्ट्रवाद की शिक्षा व प्रेरणा देने का महान् कार्य किया। शचीन्द्रनाथ सान्याल और उनके पूरे परिवार पर इसका प्रभाव पड़ा। 1908 में पिता के निधन के बाद अपने अध्ययन काल के दौरान ही उन्होंने काशी के प्रथम क्रांतिकारी दल का गठन किया। शचीन्द्रनाथ की 1913 में फ्रेंच बस्ती चंदननगर में सुविख्यात क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भेंट हुई। सान्याल और रासबिहारी बोस दोने ही एक दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गए थे। इसके कुछ ही दिनों में काशी केंद्र का चंदननगर दल में विलय हो गया और रासबिहारी काशी आकर रहने लगे। क्रमशः काशी उत्तर भारत में क्रांति का केंद्र बन गई।

1914 का वर्ष पूरे विश्व के लिए अनिश्चित्तता और संघर्ष का समय था। विश्व की महाशक्तियाँ जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था के बीच में प्रथम महायुद्ध छिड़ चुका था। ब्रिटेन को इस तरह से घिरा हुआ देखते हुए कुछ वीर सिक्ख दल ब्रिटिश शासन समाप्त करने के लिए अमरीका और कनाडा से स्वदेश प्रत्यावर्तन करने लगे थे। रासबिहारी उस समय के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे| अतः यह दल उनके नेतृत्व में इस कार्य को अंजाम देना चाहता था| अतः उन्होंने रासबिहारी जी से पंजाब आने का अनुरोध किया। रासबिहारी जी ने शचींद्र को सिक्खों से संपर्क करने, स्थिति से परिचित होने और प्रारंभिक योजना बनाने के लिए लुधियाना भेजा। इस कार्य के सिलसिले में वे कई बार लाहौर, लुधियाना गए। शचींद्र के काशी लौटकर उन्हें आश्वस्त करने पर रासबिहारी लाहौर चले गए। लाहौर के सिक्ख रेजिमेंटों ने 21 फ़रवरी 1915 को विद्रोह शुरू करने का निश्चय कर लिया था और काशी की एक सिक्ख रेजिमेंट ने भी विद्रोह शुरू होने पर साथ देने का वादा किया था परंतु दुर्भाग्य से योजना विफल हुई, चारों ओर पुलिस ने धरपकड़ शुरू हो गई और बहुतों को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। रासबिहारी काशी लौट आए और शचिन्द्र के साथ नई योजना बनाने लगे। तत्कालीन होम मेंबर सर रेजिनाल्ड क्रेडक की हत्या के आयोजन के लिए शचींद्र को दिल्ली भेजा गया परंतु यह कार्य भी असफल रहा। रासबिहारी को जापान भेजना तय हुआ। 12 मई 1915 को गिरजा बाबू और शचीन्द्र ने उन्हें कलकत्ते के बंदरगाह पर छोड़ा। दो तीन महीने बाद काशी लौटने पर शचींद्र गिरफ्तार कर लिए गए। लाहौर षड्यंत्र मामले की शाखा के रूप में बनारस पूरक षड्यंत्र केस चला और शचींद्र को आजन्म कालेपानी की सजा मिली।

युद्धोपरांत शाही घोषणा के परिणामस्वरूप फरवरी, 1920 में वीरेंद्र, उपेंद्र आदि के साथ शचींद्र रिहा हुए। 1921 में नागपुर कांग्रेस में राजबंदियों के प्रति सहानुभूति का एक संदेश भेजा गया। विषय निर्वाचन समिति के सदस्य के रूप में शचींद्र ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन करते हुए एक भाषण किया। क्रांतिकारियों ने गांधी जी को सत्याग्रह आंदोलन के समय एक वर्ष तक अपना कार्य स्थगित रखने का वचन दिया था। चौरी चौरा कांड के बाद सत्याग्रह वापस लिए जाने पर, उन्होंने पुन: क्रांतिकारी संगठन का कार्य शुरू कर दिया। 1923 के प्रारंभ में रावलपिंडी से लेकर दानापुर तक लगभग 25 केंद्रों की उन्होंने स्थापना कर ली थी। इस दौरान लाहौर में तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स के कुछ छात्रों से उनका संपर्क हुआ। इन छात्रों में सरदार भगत सिंह भी थे। कहा जाता है कि जब भगत सिंह का परिवार शादी के लिए पीछे पड़ गया तो उनको कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। ऐसे में उन्होंने बनारस के शचींद्रनाथ सान्याल को पत्र लिखकर मार्ग प्रशस्त करने की गुजारिश की। जवाब में सान्याल ने लिखा, विवाह करना या न करना तुम्हारी इच्छा पर है। लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि शादी के बाद देश के लिए बड़ा काम करना तुम्हारे लिए संभव नहीं होगा।

पारिवारिक बंधन धीरे-धीरे तुम्हें इतना जकड़ लेगा कि देशभक्ति से बहुत दूर हो जाओगे। यदि तुमने खुद को देश के लिए समर्पित कर दिया है तो विवाह के बंधन को अस्वीकार कर दो। ऐसे में विवाह करना देशद्रोह के समान है। संभव है कि इस बार मना करने के बाद परिवार वाले आगे भी तुम पर दबाव डालते रहेंगे। इसलिए तुम घर-परिवार छोड़ दो। यदि तुम्हें यह स्वीकार है तो मैं तुम्हारा मार्गदर्शन कर सकता हूं। शचीन्द्रनाथ के इस पत्र ने भगत सिंह की दुविधा दूर कर दी।

भगतसिंह को उन्होंने दल में शामिल कर लिया और उन्हें कानपुर भेजा। इसी समय उन्होंने कलकत्ते में यतींद्र दास को चुन लिया। यह वही यतींद्र हैं, जिन्होंने लाहौर षड्यंत्र केस में भूख हड़ताल से अपने जीवन का बलिदान किया। 1923 में ही कौंसिल प्रवेश के प्रश्न पर दिल्ली में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ। इस अवसर पर शचींद्र ने देशवासियों के नाम एक अपील निकाली, जिसपर कांग्रेस महासमिति के अनेक सदस्यों ने हस्ताक्षर किए। कांग्रेस से अपना ध्येय बदलकर पूर्ण स्वतंत्रता लिए जाने का प्रस्ताव था। इसमें एशियाई राष्ट्रों के संघ के निर्माण का सुझाव भी दिया गया। अमेरिकन पत्र 'न्यू रिपब्लिक' ने अपील ज्यों की त्यों छाप दी, जिसकी एक प्रति रासबिहारी ने जापान से शचींद्र को भेजी। इस अधिवेशन के अवसर पर ही कुतुबद्दीन अहमद उनके पास मानवेंद्र राय का एक संदेश ले आए, जिसमें उन्हें कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय संघ की तीसरी बैठक में शामिल होने को आमंत्रित किया गया था। इसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने अपने दल का नामकरण किया 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन'। उन्होंने इसका जो संविधान तैयार किया, उसका लक्ष्य था सुसंगठित और सशस्त्र क्रांति द्वारा भारतीय लोकतंत्र संघ की स्थापना। कार्यक्रम में खुले तौर पर आम और गुप्त संगठन दोनों शामिल थे। क्रांतिकारी साहित्य के सृजन पर विशेष बल दिया गया था। समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के बारे में भी इसमें प्रचुर इंगित था। संविधान के शब्दों में 'इस प्रजातंत्र संघ में उन सब व्यवस्थाओं का अंत कर दिया जाएगा जिनसे किसी एक मनुष्य द्वारा दूसरे का शोषण हो सकने का अवसर मिल सकता है।' विदेशों में भारतीय क्रांतिकारियों के साथ घनिष्ठ संबंध रखना भी कार्यक्रम का एक अंग था। बेलगाँव कांग्रेस के अधिवेशन में गांधी जी ने क्रांतिकारियों की जो आलोचना की थी, उसके प्रत्युत्तर में शचींद्र ने महात्मा जी को एक पत्र लिखा। गांधी जी ने यंग इंडिया के 12 फ़रवरी 1925 के अंक में इस पत्र को ज्यों का त्यों प्रकाशित कर दिया और साथ ही अपना उत्तर भी। लगभग इसी समय सूर्यकांत सेन के नेतृत्व में चटगाँव दल का, शचींद्र के प्रयत्न से, हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से संबंध हो गया। शचींद्र बंगाल आर्डिनेंस के अधीन गिरफ्तार कर लिए गए। उनकी गिरफ्तारी के पहले 'दि रिह्वलूशनरी' नाम का पर्चा पंजाब से लेकर बर्मा तक बँटा। इस पर्चे के लेखक और प्रकाशक के रूप में बाँकुड़ा में शचींद्र पर मुकदमा चला और राजद्रोह के अपराध में उन्हें दो वर्ष के कारावास का दंड मिला। कैद की हालत में ही वे काकोरी षड्यंत्र केस में शामिल किए गए और संगठन के प्रमुख नेता के रूप में उन्हें पुन: अप्रैल, 1927 में आजन्म कारावास की सजा दी गई। 1937 में संयुक्त प्रदेश में कांग्रेस मंत्रिमंडल की स्थापना के बाद अन्य क्रांतिकारियों के साथ वे रिहा किए गए। रिहा होने पर कुछ दिनों वे कांग्रेस के प्रतिनिधि थे, परंतु बाद को वे फारवर्ड ब्लाक में शामिल हुए। इसी समय काशी में उन्होंने 'अग्रगामी' नाम से एक दैनिक पत्र निकाला। वह स्वयं इसस पत्र के संपादक थे। द्वितीय महायुद्ध छिड़ने के कोई साल भर बाद 1940 में उन्हें पुन: नजरबंद कर राजस्थान के देवली शिविर में भेज दिया गया। वहाँ यक्ष्मा रोग से आक्रांत होने पर इलाज के लिए उन्हें रिहा कर दिया गया। परंतु बीमारी बढ़ गई और 1942 में उनकी मृत्यु हो गई। क्रांतिकारी आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करना उनका विशेष कृतित्व था। उनका दृढ़ मत था कि विशिष्ट दार्शनिक सिद्धांत के बिना कोई आंदोलन सफल नहीं हो सकता। 'विचारविनिमय' नामक अपनी पुस्तक में उन्होंने अपना दार्शनिक दृष्टिकोण किसी अंश तक प्रस्तुत किया है। 'साहित्य, समाज और धर्म' में भी उनके अपने विशेष दार्शनिक दृष्टिकोण का भी परिचय मिलता है।

(लेखक विश्व संवाद केन्द्र, काशी कार्यसमिति के अध्यक्ष हैं)

Wednesday, December 1, 2021

ओबरा में भव्य तिरंगा यात्रा, माताओं-बहनो ने पुष्प वर्षा कर किया स्वागत

 

रेनुकूट| अमृत महोत्सव का आयोजन देश भर में जोर-शोर से चल रहा है| स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर बढ़ने का सन्देश देने वाले अमृत महोत्सव में प्रत्येक गाँव एवं नगर में तिरंगा यात्रा निकाले जा रहे हैं| इसी क्रम में ओबरा नगर के अमृत महोत्सव आयोजन समिति द्वारा भव्य तिरंगा यात्रा निकाले गये| इस यात्रा के स्वागत में सभी मुख्य चौराहों पर माताओं-बहनो ने पुष्प वर्षा की। यात्रा का शुभारंभ आकाशवाणी मैदान से होते हुए आर्य समाज, सुभाष तिराहा, शारदा मंदिर,  बिल्ली गांव, क्लब नंबर 4 स्टेडियम मार्ग,  क्लब नंबर-1  से होते हुए गांधी मैदान पहुंची| भारत माता की आरती के साथ समापन हुआ। मुख्य वक्ता भोलेंद्र जी ने अपने उद्बोधन में स्वाधीनता के महत्व, स्वाधीनता के संघर्ष, आजाद हिंद फौज और देश के लिए बलिदान हुए लोगों के ऊपर प्रकाश डाला| 

उन्होंने कहा कि स्वाधीनता के संघर्ष में बहुत से लोगों के बलिदान को भुला दिया गया जिन्हें हमें आज याद करने की आवश्यकता है| भोलेन्द्र जी ने आगे कहा कि देश को स्वाधीनता एक समझौते के तहत प्राप्त हुई, जिसमें ब्रिटिश हुकूमत ने अपने सारे हित सुरक्षित रखें और ऐसे नियम भारत संविधान में जोड़ कर गए कि अंग्रेजों का साथ देने वाले कभी कटघरे में खड़े नहीं किए जा सके। उन्होंने काकोरी कांड की चर्चा की। गांधीजी के असहयोग आंदोलन और अचानक उसे स्थगित करने की चर्चा करते हुए कहा कि देश की स्वधीनता में सिर्फ गांधीजी और भारत छोड़ो आंदोलन के सेनानियों के साथ-साथ हर अंचल से असंख्य लोगों का भी हमारी स्वाधीनता के संघर्ष में बहुमूल्य योगदान रहा है| उनका नाम समय की रेत में दब गया है| आज हमें उन्हें याद करने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में दीपेश दीक्षित, प्रमोद त्रिपाठी, आशीष जी,  रामबाबू जी, सुशील मिश्रा, संजीत चौबे, संजय बैसवार, दारा शिकोह, सतीश पांडेय, धुरन्धर शर्मा,  गीतांजली चौबे, सुनीता पांडेय,  अज़ीम खान, मनोज, राजेश, पंकज और बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।