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Friday, June 10, 2022

पथ संचलन निकालकर स्वयंसेवकों ने सामूहिक एकता, अनुशासन तथा राष्ट्रभक्ति का दिया परिचय

प्रयागराज। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षित गणवेशधारी बृहस्पतिवार को शिक्षार्थी स्वयंसेवकों ने नैनी स्थित माधव ज्ञान केंद्र इंटर कॉलेज में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग-प्रथम वर्ष (सामान्य) के दौरान घोष  के साथ पथ संचलन निकाला| माधव ज्ञान केंद्र इंटर कॉलेज नैनी प्रांगण से शुरू हुआ यह पथ संचलन नागरिकों के आकर्षण का केंद्र बना रहा। पथ संचलन में काशी प्रांत प्रचारक श्रीमान रमेश जी की उपस्थिति से स्वयंसेवकों का उत्साहवर्धन हो रहा था| 

इस दौरान विभिन्न चौराहों समेत सड़क के दोनों किनारों पर खड़े नागरिकों द्वारा स्वयंसेवकों का स्वागत किया गया| हाथों में दंड, दिलों में राष्ट्रभक्ति का भाव संजोए सैनिकों की भांति कदम से कदम मिलाते हुए संघ के तीन विभागों तथा पांच प्रशासनिक जिलों से आए साढ़े तीन सौ प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का यह पथ संचलन माधव ज्ञान केंद्र के पश्चिमी द्वार  से पथ संचलन जेल चौराहे पर पहुंचा। वहां से अंबेडकर नगर से आगे बढ़ता हुआ बेथनी कान्वेंट 

स्कूल से पुलिस चौकी जेल रोड पहुंचा, वहां से अरैल चौराहे पहुंचकर संगम मार्ग की ओर से उत्तरी लोकपुर चौराहे होते हुए आर्य समाज मंदिर से आगे बढ़कर माधव ज्ञान केंद्र के उत्तरी दरवाजे से परिसर में पहुंच कर समाप्त हुआ। संचलन में मा.प्रांत संघचालक डॉ विश्वनाथ लाल निगम, सह प्रांत प्रचारक मुनीश जी, विभाग प्रचारक डॉ पियूष जी, वर्ग अधिकारी रमेश जी, वर्ग कार्यवाह हरीश जी, सह वर्ग कार्यवाह घनश्याम जी, सह प्रांत कार्यवाह राज बिहारी जी, प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ. मुरारजी समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने पथ संचलन को निर्विघ्न पूर्ण कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।




वरिष्ठ प्रचारक कला साधक पद्मश्री बाबा योगेंद्र का देवलोकगमन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक व संस्कार भारती के संस्थापक एवं संरक्षक कला साधक पद्मश्री बाबा योगेंद्र 98 वर्ष की आयु में आज प्रातः देवलोकगमन कर गए. 10 जून 2022, शुक्रवार (भीमसेन एकादशी) को लखनऊ के डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल में प्रातः 8:00 बजे शरीर शांत हुआ. बाबा योगेंद्र ज़ी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे तथा उनका लखनऊ स्थित अस्पताल में उपचार चल रहा था.

बाबा योगेंद्र कला के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था संस्कार भारती के अनेक वर्षों तक राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे.

बाबा योगेंद्र का जन्म 7 जनवरी, 1924 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में प्रसिद्ध वकील बाबू विजय बहादुर श्रीवास्तव के घर में हुआ था. बचपन में गांव में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाने लगे. जब मोहल्ले में संघ की शाखा लगने लगी, तो योगेन्द्र को भी वहां जाने के लिए कहा. छात्र जीवन में उनका सम्पर्क गोरखपुर में संघ के प्रचारक नानाजी देशमुख से हुआ. योगेन्द्र जी यद्यपि सायं शाखा में जाते थे; पर नानाजी प्रतिदिन प्रातः उन्हें जगाने आते थे, जिससे वे पढ़ सकें. एक बार तो तेज बुखार की स्थिति में नाना जी उन्हें कन्धे पर बिठाकर डेढ़ किमी. पैदल चलकर पडरौना गए और उनका उपचार करवाया. इसका इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने शिक्षा पूर्ण कर स्वयं को संघ कार्य के लिए ही समर्पित करने का निश्चय कर लिया.

1942 में लखनऊ में प्रथम वर्ष ‘संघ शिक्षा वर्ग’ का प्रशिक्षण करने के बाद 1945 में प्रचारक बने. बाबा योगेंद्र गोरखपुर, प्रयाग, बरेली, बदायूं और सीतापुर में प्रचारक रहे.

विभाजन को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा था. उन्होंने इस पर एक प्रदर्शनी बनाई. संघ शिक्षा वर्ग में जिसने भी यह प्रदर्शनी देखी, वह अपनी आँखें पोंछने को मजबूर हो गया. फिर तो ऐसी प्रदर्शिनियों का सिलसिला चल पड़ा. शिवाजी, धर्म गंगा, जनता की पुकार, जलता कश्मीर, संकट में गोमाता, 1857 के स्वाधीनता संग्राम की अमर गाथा, विदेशी षड्यन्त्र, माँ की पुकार…आदि ने संवेदनशील मनों को झकझोर दिया. ‘भारत की विश्व को देन’ नामक प्रदर्शिनी को विदेशों में भी प्रशंसा मिली.

उनकी प्रतिभा को देखकर वर्ष 1981 में जब संस्कार भारती संगठन बना, तो बाबा योगेंद्र को कार्य सौंपा गया. विश्व को भीमबेटका तथा सरस्वती नदी के मार्ग की जानकारी देने वाले पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर जी के साथ मिलकर उन्होंने कला साधकों के मन में राष्ट्रीय भावना के जागरण का कार्य लम्बे समय तक किया. उनके मार्गदर्शन में संस्कार भारती आज कला के क्षेत्र में  देश की अग्रणी संस्था है. आज सामाजिक दायित्वबोध एवं राष्ट्रप्रेम से युक्त कला-साधकों की अग्रणी संस्था है.

विनम्र श्रद्धांजलि..

ॐ शांतिः

Sunday, June 5, 2022

पर्यावरण संरक्षण की भारतीय दृष्टि

 - रवि कुमार 

आज पर्यावरण की चर्चा सर्वत्र है. सामान्य व्यक्ति से लेकर देश के बुद्धिजीवी तक और देश ही नहीं दुनिया के बुद्धिजीवी भी विषय को लेकर विचार करते हैं. पर्यावरण के विषय में विचार करने की आवश्यकता सभी को अनुभव होने लगी है. बदलती प्रकृति, नित परिवर्तित होता मौसम, सर्दी के समय सर्दी न होना, गर्मी के समय अधिक गर्मी होना, वर्षाकाल का आगमन आगे-पीछे होना, ऐसे अनेक अनुभव सोचने पर मजबूर करते हैं. ऐसा क्यों हो रहा है? जब इस पर विचार होता है तो उत्तर आता है कि समय बदल गया है. यह भी कह सकते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है. परंतु, इस बात का विचार भी करना चाहिए कि प्रकृति में ऐसा बदल क्यों आया है? प्रकृति सभी का कल्याण करती है. परंतु, प्रकृति मानव के विनाश के विषय में कैसे सोच सकती है? अनेक घटनाएं हैं जो यह संकेत करती हैं कि मानव का कल्याण या विनाश किस ओर है.

कुछ वर्षों पूर्व तक सितंबर की अर्धवार्षिक परीक्षा में जब बालक आता था तो स्वेटर पहनता था यानि सर्द ऋतु उस समय प्रारम्भ होने लगती थी. दीपावली से पूर्व रामलीला देखने जब व्यक्ति रात्रि में घर से निकलता था तो लोई या शाल ओढ़ कर निकलता था. आज दिसंबर प्रारम्भ में भी ऐसा कम दिखता है. मौसम में परिवर्तन के अपने दैनंदिन जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण ढूँढे जा सकते हैं.

प्रकृति विनाश की बजाय कल्याण कारक ही रहे, ऐसा ध्यान में रखकर भारतीय ऋषि-मनीषियों ने चिंतन किया है. इस चिंतन को भारतीय वांग्मय में उल्लेखित किया. इस चिंतन से प्रकट बातों को मानव समाज में प्रयोग कर स्थापित किया. प्रकृति संरक्षण का मानव का सहज स्वभाव बने, ऐसी व्यवस्थाएं समाज में निर्माण कीं. सैकड़ों-हजारों वर्षों तक भारतीय समाज ने इन व्यवस्थाओं का पालन किया. प्रकृति के संबंध में इन व्यवस्थाओं का पालन जब टूटने लगा, तो परिवर्तन होने लगा.

इस चिंतन को हम भारतीय दृष्टि कह सकते है. यह भारतीय दृष्टि क्या है?

अथर्वेद के भूमि सूक्त में पर्यावरणीय मूल्यों का विधान है. मनुष्य धरित्री (भूमि) से कहता है, “मैं आपके उत्खनन से कुछ प्राप्त कर रहा हूँ, पर मैं ऐसा कभी न करूं कि इस प्रक्रिया से आपके हृदय अर्थात् मर्मस्थल पर चोट पहुँच जाए.” अर्थात् उत्खनन करते समय दोहन करना शोषण करना नहीं.

दुनिया में जहां-जहां अत्यधिक उत्खनन हुआ है, वहाँ-वहाँ प्रकृति में परिवर्तन हुआ है, कहीं जल संकट तो कहीं अत्यधिक बाढ़ की स्थिति बनी है.

ऋग्वेद में प्रार्थना की गई है कि वृक्ष, जल, आकाश एवं पर्यावरण की वेणीयाँ तथा वनस्पतियों से भरे पूरे वन और पर्व हमारा संरक्षण करें. ऋग्वेद में उल्लेखित है, ‘वनं आस्थाप्यध्वम्’ अर्थात् वन में वनस्पतियाँ उगाओ, वृक्षारोपण करो. वानस्पतिक संपदा के भंडार में वृद्धि करो, उसे  घटाओ नहीं. यजुर्वेद के एक सूत्र में कहा गया है कि हे वनस्पति! इस धारदार कुल्हाड़े से अपने महान सौभाग्य के लिए मैंने तुम्हें काटा अवश्य है, परंतु तेरा उपयोग हम सहस्र अंकुर होते हुए करेंगे.

जीवन यापन के लिए यदि लकड़ी की आवश्यकता है तो वृक्ष न काटकर उसकी शाखाओं का उपयोग करना, उसमें भी ऊपर की शाखाएँ नहीं केवल नीचे की शाखाएँ ताकि हमारे प्रयोग लायक लकड़ी भी मिल जाए और पेड़ का अस्तित्व बना रहने के साथ तना भी बढ़ता रहे.

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण जी ने कहा है, “धर्मविरुद्धो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ:” अर्थात् जहाँ भोग धर्म की अवमानना नहीं करता वह दिव्य है. प्रकृति का भोग भी करना है तो धर्म का पालन करते हुए करना है, यानि प्राणी मात्र के कल्याण का भाव सदा बना रहे.

ईशोपनिषद् में कहा गया, “ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्. तेन त्यक्तेन भुंजिथा मा गृधः कस्यस्विद्धनं ..” अर्थात् समस्त सृष्टि राम में है, उसका उपयोग केवल त्याग की भावना से करो. दूसरों के भाग पर डाका डालने का प्रयास न करो.

अथर्वेद के भूमिसूक्त में कहा है, ‘माता भूमिः पुत्रोSहं पृथिव्याः’ अर्थात् यह भूमि हमारी माता है और हम सब उसके पुत्र हैं. प्रत्येक प्राणी, वनस्पति एवं प्रत्येक चैतन्ययुक्त वस्तु पर प्रकृति का बराबर स्नेह है. शायद यही कारण है कि वनों में निवास करने वाले वनवासी एवं ग्रामों में निवास करने वाले ग्रामवासियों का पर्यावरण के प्रति आदर व स्नेह प्रारम्भ से रहा है.

हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है. पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए ऋषियों ने कहा है – “वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव:” अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है. अथर्ववेद के भूमिसूक्त में भूमि को कहा गया है, “अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु” अर्थात् तेरे जंगल हमारे लिए सुखदाई हों. भारतीय जीवन के आश्रम चतुष्टय में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है.

छान्दोग्य उपनिषद् में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं. छान्दोग्य उपनिषद् में ही सत्यकाम की कथा का उदाहरण है. कुछ समय सत्यकाम ब्रह्मचारी को शिक्षा देने के उपरांत गुरु उसे 400 गायों के साथ वन में भेज देते हैं और कहते हैं कि जब गायों की संख्या एक हजार हो जाए, तभी वह वापस आए. वापसी के समय सत्यकाम को अग्नि के अतिरिक्त एक वृषभ तथा दो पक्षियों हंस व मृदु से ब्रह्म ज्ञान का उपदेश मिलता है. गुरु द्वारा सत्यकाम को वन गमन करने के आदेश देने का उद्देश्य भी यही समझाना था कि सच्ची शिक्षा सदैव प्रकृति के संपर्क में रहने से ही आती है.

महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भवम्’ में हिमालय की महानता और देवत्व को बताते हुए कहा है – “अस्तुस्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज: .” हिमालय देवतात्मा है और पर्वतों का राजा है. प्रकृति के संरक्षण में पहाड़ का भी महत्व है. अतः पहाड़ का भी ध्यान रखा जाए.

गीता में भगवान श्रीकृष्ण का कथन है, ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्’ अर्थात् वृक्षों में मैं पीपल हूँ.. 10/26 .. परिमाण और आयुमर्यादा दोनों की दृष्टि से अश्वत्थ अर्थात् पीपल वृक्ष को सर्वव्यापक और नित्य माना जा सकता है. पर्यावरण को संतुलित रखने की वृक्षों की भूमिका को रेखांकित करने का उदाहरण है कि वृक्षों में भी जीवन है. महाभारत के शांति पर्व के 184वें अध्याय में महर्षि भारद्वाज व महर्षि भृगु का संवाद है. इस संवाद में स्पष्ट वर्णन है कि कि वृक्ष पंचभौतिक अवचेतन हैं. हमारी संस्कृति में नीम को पूर्ण चिकित्सक, आंवले को पूर्ण भोजन, पीपल को शुद्ध वायुदात्री, पाकड़ और वट के युग्म वृक्षों को जल संग्राहक एवं वट को पूर्ण घर माना गया है.

केवल वृक्ष लगाने से ही पर्यावरण संरक्षण होने वाला है क्या? जल, जंगल और जमीन इन तीनों का ध्यान रखना पड़ेगा. जो चर्चा सर्वत्र चली है. उस चर्चा में भारतीय दृष्टि को सम्मिलित करने की महती आवश्यकता है. और केवल चर्चा ही नहीं प्रत्यक्ष क्रियान्वित करनी होगी. वास्तव में भारतीय दर्शन विश्व के स्वस्थ विकास का ब्लूप्रिंट है.

राष्ट्रीय उत्तरदायित्व

 – श्रीगुरु जी (माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर)

‘‘जब हम कहते हैं कि यह हिन्दू राष्ट्र है, तो कुछ लोग तुरन्त प्रश्न करते हैं कि जो मुसलमान और ईसाई यहाँ रहते हैं, उनके विषय में आप क्या कहते हैं? क्या वे भी यहाँ उत्पन्न नहीं हुए? तथा यहीं उनका पालन-पोषण नहीं हुआ? वे धर्म के परिवर्तन से ही परकीय कैसे हो गये? किन्तु निर्णायक बात तो यह है कि क्या उन्हें यह स्मरण है कि वे इस भूमि की संतान हैं? केवल हमारे ही स्मरण रखने से क्या लाभ? यह अनुभूति और स्मृति उन्होंने पोषित करनी चाहिए. हम इतने क्षुद्र नहीं हैं कि यह कहने लगे कि केवल पूजा का प्रकार बदल जाने से कोई व्यक्ति उस भूमि का पुत्र नहीं रहता. हमें ईश्वर को किसी नाम से पुकारने में आपत्ति नहीं है. हम संघ के लोग पूर्णरूपेण हिन्दू हैं. इसलिए हममें प्रत्येक पंथ और सभी धार्मिक विश्वासों के प्रति सम्मान का भाव है, जो अन्य पंथों के प्रति असहिष्णु है, वह कभी भी हिन्दू नहीं हो सकता. किन्तु अब हमारे सामने प्रश्न यह है कि जो मुसलमान और ईसाई हो गए हैं उनका भाव क्या है? निस्संदेह वे इसी देश में पैदा हुए हैं. किन्तु क्या वे इसके प्रति प्रामाणिक हैं? इस मिट्टी के ऋणी हैं? क्या इस देश के प्रति, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ है, कृतज्ञ हैं? क्या वे अनुभव करते हैं कि वे इस देश और इसकी परम्पराओं की सन्तति है और इसकी सेवा करना उनके भाग्य की धन्यता है? क्या उसकी सेवा करना वे अपना कर्तव्य मानते हैं? नहीं.

धर्म परिवर्तन (पूजा के प्रकार परिवर्तन) के साथ ही उनकी राष्ट्र के प्रति प्रेम और भक्ति की भावना समाप्त हो गई है. मुसलमानों ने, उनको देश से आबद्ध करने वाले सभी पूर्व पारम्परिक राष्ट्रीय सम्बन्ध-सूत्र काटकर अलग कर दिये हैं.

‘‘हमें यह स्पष्ट करना होगा कि यहाँ निवास करने वाले अहिन्दुओं का एक राष्ट्रधर्म अर्थात् राष्ट्रीय उत्तरदायित्व है, एक समाज-धर्म अर्थात् समाज के प्रति कर्तव्यभाव है, एक कुलधर्म अर्थात् अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्यभाव है, तथा केवल व्यक्तिगत धर्म, व्यक्तिगत निष्ठा का पंथ, अपनी आध्यात्मिक प्रेरणा के अनुरूप चुनने में वह स्वतंत्र हैं.’’

‘‘ईसाई, मुसलमान, हिन्दू सभी को साथ रहना चाहिए, यह भी केवल हिन्दू ही कहता है. किसी उपासना पद्धति से हमारा द्वेश नहीं है. परन्तु राष्ट्र के विरोध में जो भी खड़ा होगा, वह फिर प्रत्यक्ष अपना पुत्र ही क्यों न हों, तो अहिल्याबाई या छत्रपति शिवाजी महाराज के समान व्यवहार का आदर्श हमारे यहाँ है. तब राष्ट्रविरोधी यदि अन्य मतावलम्बी हुआ तो उसके साथ भी वैसा ही व्यवहार करेंगे, यह कहने में हमें हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए.’’

(संदर्भ – श्रीगुरु जी और राष्ट्र अवधारणा)

Saturday, June 4, 2022

अतिवाद से बचकर सभी को राष्ट्रीय जीवन की समृद्ध धारा में शामिल होना चाहिए – डॉ. मोहन भागवत जी


नागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि, देश में रहने वाले सभी लोगों को अतिवाद से बच कर राष्ट्रीय जीवन की समृद्ध धारा मे शामिल होना चाहिए.

गुरुवार को तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में उद्बोधन के दौरान स्वयंसेवकों को पाथेय देते हुए सरसंघचालक जी ने देश के गौरवमयी इतिहास, परंपरा और राष्ट्रीयता के भाव को अपना कर चलने का आह्वान किया. इस अवसर पर भाग्यनगर के श्रीरामचंद्र मिशन के अध्यक्ष दाजी उपाख्य कमलेश पटेल जी मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थित रहे.

सरसंघचालक जी ने कहा कि, हमें पूरे विश्व में भारत माता की विजय पताका फहरानी है. लेकिन हमें विश्व को जितना नहीं है. हमारी प्राचीन सभ्यता दूसरे को बलपूर्वक जीतने में विश्वास नहीं रखती. हमें विश्व को स्नेहभाव से जोड़ते हुए अपनाना होगा. हिन्दू धर्म वास्तव में मानव धर्म और युग धर्म है. प्राचीन काल में हमारे देश में समृद्धि और सुरक्षा थी. जिसके चलते हम स्नेह और बंधुत्व के बंधन में रहते हुए जीते आए हैं. हमारे जीवन का वह सूत्र आज भी यथावत है. उसी सूत्र पर हमारा देश दोबारा आगे बढ़ रहा है. हमें स्वतंत्रता के ‘स्व’ की उन्नति के आधार पर ‘तंत्र’ बनाकर चलना होगा.

उन्होंने कहा कि धर्म हमारे जीवन का आधार है. धर्म का संरक्षण दो तरह से होता है. दूसरे के आक्रमण से धर्म की रक्षा करके और आपसी व्यवहार में स्नेह और बंधुत्व से हम धर्म की रक्षा कर सकते हैं. समाज को शक्ति की उपासना करनी होगी. सत्य की रक्षा के लिए शक्ति का होना आवश्यक है. बिना शक्ति के सत्य टिक नहीं सकता.

उन्होंने कहा कि केवल यशस्वी होना हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए. यशस्वी तो पशु भी होते हैं. हमारे यश में सार्थकता होनी चाहिए. हमारे अंदर विद्या, धन और बल के साथ साथ नैतिकता होना आवश्यक है. बिना नैतिकता के विद्या, धन और बल उपयोगी सिद्ध नहीं होता. नैतिकता के कारण विद्या में सकारात्मकता, धन में दान और बल में दूसरों की सहायता का भाव पैदा होता है. नतीजतन हमारे आचरण में नैतिकता का भाव होना चाहिए.

सरसंघचालक जी ने रशिया-युक्रेन युद्ध का उदाहरण देते हुए बताया कि, रशिया अपने बल के आधार पर दुनिया को डरा रहा है. वहीं पश्चिमी जगत की शक्तियां युक्रेन को शस्त्र उपलब्ध करा कर अपनी रोटियाँ सेक रही हैं. पश्चिमी जगत हमेशा से ऐसा करते आया है. मौजूदा समय में रशिया-युक्रेन विवाद पर भारत ने एकदम संतुलित भूमिका अपनाई है. यदि भारत के पास पर्याप्त शक्ति होती तो भारत इस युद्ध को रोक देता. लेकिन चीन जैसे शक्तिसंपन्न देश ऐसा नहीं कर रहे हैं. उनके पास शक्ति और संपन्नता होने के बावजूद वह स्वार्थ में जीते हैं.

देश में चल रहे ज्ञानवापी के विवाद पर सरसंघचालक ने कहा कि, इतिहास हमने नहीं बनाया है. भारतीय हिन्दू समाज को नीचा दिखाने के लिए विदेशी आक्रांताओं ने हमारे श्रद्धा स्थान खंण्डित किए, ऐसा इतिहास में दर्ज है. हिन्दू समाज मुस्लिमों के विरूद्ध नहीं है. हिन्दू किसी का विरोध नहीं करता. संघ ने भी अपनी भूमिका स्पष्ट की है. भारत में रहने वाले सभी लोग संविधान से चलने वाले न्यायालय के निर्णय का सम्मान करें. न्यायालय के निर्णयों पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाना चाहिए.

देश के विभाजन के बाद इस देश को अपना मानने वाले मुस्लिम पाकिस्तान में ना जाते हुए भारत में ही रहे. उन्हें अपने से अलग नहीं समझना चाहिए. हमारे पूर्वज एक ही थे. यदि कोई वापस आना चाहता हो तो उसका सहर्ष स्वागत होना चाहिए. यदि कोई भिन्न उपासना पद्धति में विश्वास रखता है तो हमारे ३३ कोटी देवताओं सहित अन्य कोई उपासना पद्धति जुड़ती है तो हिन्दू समाज बहुत अधिक प्रभावित नहीं होगा. हम अन्य उपासना का भी सम्मान करते आए हैं और करते रहेंगे. समाज में अतिवादियों को टोकना चाहिए. सरसंघचालक ने कहा कि देश में और देश के बाहर हिन्दू- मुस्लिम को लड़ाकर अपनी रोटियां सेकने वाले लोगों से हमें सावधान रहना चाहिए.

भौतिक और आध्यात्मिक दोनों की संयुक्त शक्ति से देश विश्वगुरू बनेगा

    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दाजी उपाख्य कमलेश जी पटेल ने कहा कि, मेरे मन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कई भ्रांतियां थीं. वे दूर हो गई हैं. उनका समन्वय, समर्पण हमारे देश के लिए है. आज की परिस्थिति में आतंकवादियों में समन्वय और एकता दिखाई देती है, लेकिन सात्विक लोग बहुत बड़े काम करते हैं. लेकिन दो संत एक दूसरे के साथ नहीं बैठते. एकता के बिना भारतमाता की जय कैसे हो सकती है. हिन्दू धर्म में तीन हजार से अधिक विभिन्न जातियां और पंथ हैं. वे अपने लोगों के लिए कुछ मांग रहे हैं, लेकिन सभी को सोचना चाहिए कि मैं देश के लिए क्या कर सकता हूं. देश में सभी धर्मों के लोग हैं और वे पूजा-अर्चना कर रहे हैं. सबका लक्ष्य भारत की प्रगति है. यदि आप विश्वगुरू बनना चाहते हैं, तो दुनिया को दिशा दिखाना महत्वपूर्ण है. आध्यात्मिकता चाहे कैसी भी हो, भौतिक शक्ति प्राप्त करना आवश्यक है. ये दोनों शक्तियां एक पक्षी के दो पंखों की तरह हैं. भौतिक और आध्यात्मिक दोनों की संयुक्त शक्ति से देश विश्वगुरू बन सकता है.

    यह एक तरह का योग है. एक अकेला व्यक्ति कुछ नहीं बदलेगा. करोड़ों संतों की प्रार्थना से भारत भूमि अस्तित्व में आई है. उनके विचार, प्रार्थना, तपस्या, राष्ट्र निर्माण में उनका मौलिक योगदान है. मैं समाज को तभी कुछ दे सकता हूं, जब मैं पहल करूं और मजबूत बनूं. लोग शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होने पर समाज के विकास में योगदान दे सकते हैं. सभी समाजों, संस्थाओं को एक साथ आना चाहिए और देश का पुनर्निर्माण करना चाहिए.

मंच पर वर्ग के सर्वाधिकारी अशोक पांडे, विदर्भ प्रांत संघचालक राम हरकरे, महानगर संघचालक राजेश लोया उपस्थित थे. कोरोना महामारी के कारण दो वर्षों के अंतराल के पश्चात इस वर्ष ९ मई से तृतीय वर्ष वर्ग का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर से कुल ७३५ स्वयंसेवक शिक्षार्थियों सह कुल ९०० कार्यकर्ता उपस्थित रहे. शिक्षार्थियों के लिए प्रशिक्षण में शारीरिक, बौद्धिक, सेवा के साथ अन्य विविध विषयों का समावेश था.

समापन कार्यक्रम के आरम्भ में स्वयंसेवकों ने दंड, यष्टीगण, समता, दंडयोग, सामूहिक समता, योगासन आदि विविध शारीरिक प्रात्यक्षिक तथा घोष प्रात्यक्षिक प्रस्तुत किए. वर्ग कार्यवाह ख्वाई राजेन सिंह ने अपने प्रास्ताविक में वर्ग की जानकारी दी.

    



















Thursday, June 2, 2022

महाराणा प्रताप जयंती – ईश्वरीय तेज की अभिव्यक्ति सम्पूर्ण विश्व को चमत्कृत व प्रेरित करती है

- अजय दिवाकर

स्वतन्त्रता भारतीय राष्ट्र का अनन्तकाल से चरम आदर्श रहा है और इस स्वतन्त्रता के लिए भारत और यहां की संतानों ने बड़े से बड़ा मूल्य चुकाने में कभी संकोच नहीं किया. कह सकते हैं कि स्वतन्त्रता भारतीय राष्ट्र जीवन की मूल प्रेरणा में रचा-बसा शाश्वत और सनातन तत्व है. जिसकी रक्षार्थ भारत की संतानों ने संघर्ष व युद्ध को सहस्राब्दियों तक अनवरत जारी रखा. भारत के ज्ञात इतिहास में इसका सबसे प्रखर अनुभव आक्रमणकारी और कथित विश्व विजेता सिकन्दर को भारत की सीमा को छूते-छूते सिंधु तट पर आया था और वह अनुभव इतना तीखा व तीव्र था कि कथित विश्व विजेता का सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार का स्वप्न ना केवल भंग हुआ, बल्कि भारतीय वीरों के तीरों से छलनी हुए उसके शरीर का भी शीघ्र ही अंत हुआ. और मैदान छोड़ भागते हुए उसकी विशाल सेना को पहली बार विश्व ने देखा.

स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष की भारत की उसी सनातन, पुरातन और गौरवशाली परम्परा में राणा प्रताप के जनयुद्ध का इतिहास स्वर्णाक्षरों से मण्डित हुआ है. राणा प्रताप के नेतृत्व में लड़े गए इस महान युद्ध के पग-पग पर भारतीय जीवन-मूल्यों का दर्शन हमें होता है और इस प्रकार मेवाड़ का यह संघर्ष विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ राष्ट्रीय महायुद्ध का स्थान सायास प्राप्त कर लेता है.

राणा प्रताप के नेतृत्व में अकबर जैसे क्रूर और बलवान विदेशी आक्रमणकारी से लड़े गए मेवाड़ के इस युद्ध की प्रेरणा राष्ट्रीय थी और सत्य, न्याय व ईश्वर के साक्ष्य में यह युद्ध लड़ा गया था. मेवाड़ का एक-एक बच्चा इस युद्ध का सैनिक था और नारी शक्ति भी इस युद्ध में स्वयं जगदम्बा रूप में खड्ग धारण कर शत्रुओं पर काल बनकर टूट पड़ी थी. जहां इस युद्ध से उठी जौहर की पवित्र लपटों ने अखिल विश्व को चारित्रिक उज्ज्वलता के प्रकाश से सराबोर कर दिया था तो राष्ट्रहित में सर्वस्व अर्पण कर देने वाले भामाशाह के त्याग ने मानवजाति को अनन्तकाल के लिए देवत्व की पदवी से विभूषित किया था.

यह संघर्ष कितना महान और विलक्षण था, इसका साक्ष्य इस संघर्ष के नायकों और सामान्यजन के विराट चरित्र में प्रकट हुआ. मातृभूमि की स्वतन्त्रता तक महलों और स्वर्णपात्रों का त्याग करने की राणा प्रताप की प्रतिज्ञा उनके साथियों व अनुयायियों के लिए बलिदान और कष्टपालन की आज्ञा बनी थी. उस प्रतिज्ञा की छाया भी कितनी दूर तक पड़ी तो अभी तक स्वतन्त्र भारत की सरकारों और सज्जन समूहों को मेवाड़ की पूर्ण स्वाधीनता की स्मृति कराकर घर बसाकर रहने हेतु उन्हें अनुनय-विनय करना पड़ा. राष्ट्रीय स्वाधीनता का कैसा महान रण-रंग चढ़ा होगा उन मतवालों पर जो युद्ध के पांच सौ वर्ष उपरांत भी उतरना तो दूर, फीका तक नहीं हुआ.

यूँ तो हम महान पुरुषों की जयंती प्रचलित तिथि अनुसार मनाते हैं. परंतु महाराणा प्रताप इस धरा पर तब जन्मे थे, जब भारत में अंग्रेज़ी शासन की नींव भी नहीं पड़ी थी. क्या हम ऐसा संकल्प ले सकते हैं कि अपने महापुरुषों की जयंती या बलिदान दिवस भारतीय तिथि अनुसार आयोजित कर सकें. इससे हम भारतीयों को भी अपनी परंपराओं पर गौरव अनुभव होगा.

श्रीमद्भगवदगीता शौर्य को ईश्वरीय तेज का प्रकटीकरण बताती है और ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को जन्मे महाराणा प्रताप सहित उनके प्रत्येक सैनिक में प्रकट ईश्वरीय तेज की यह अभिव्यक्ति आज भी सम्पूर्ण विश्व को चमत्कृत भी करती है और प्रेरित भी.

(लेखक मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जयपुर में कार्यरत हैं.)