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Monday, September 21, 2020

184 दिन बाद खुला श्रीसंकटमोचन मंदिर, गूंजा जय श्रीराम, 20,000 श्रद्धालुओं ने किया दर्शन-पूजन

वैश्विक महामारी कोरोना के कारण देश के अनेक मंदिरों के साथ मंदिरों का नगर कहा जाने वाला काशी का प्रमुख मंदिर श्रीसंकटमोचन मंदिर भी अब तक बंद रहा. रविवार को लगभग छह माह और कुल 184 दिन बाद इस मंदिर को पुनः खोला गया. मंदिर खुलते ही दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लम्बी कतार लग गयी. पूरा परिसर जय श्रीराम, जय बजरंगबली और हर हर महादेव के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा. देश में कोविड-19 की आहट लगते ही 21 मार्च से मंदिर में दर्शन बंद कर दिया गया था.

काशी समेत आस पास के अन्य क्षेत्रों से आये श्रद्धलुओ का कहना था कि मंदिर खुलने की सूचना मिलते ही उन्होंने पहले दिन ही दर्शन की योजना बना ली थी. मंदिर में सुबह साढ़े चार बजे प्रतिदिन की भांति मंगला आरती की गयी. इस दौरान मंदिर प्रशासन ने शासन द्वारा घोषित गाइड लाइन के साथ पूरी व्यवस्था का ध्यान रखा. मंदिर में मास्क लगाए और गमछा से मुंह ढंके व्यक्ति को ही प्रवेश दिया जा रहा था. प्रवेश द्वार पर थर्मल स्कैनिंग की जा रही थी. मंदिर में प्रवेश करते ही सैनिटाइजर टनल में सभी को सैनिटाइज किया जा रहा था. परिसर में रस्सी बाँधकर आवागमन का मार्ग बनाया गया है. मंदिर प्रशासन के अनुसार रविवार को मंदिर खुलने के बाद लगभग 20 हजार लोगों ने दर्शन-पूजन किया.   




Friday, September 18, 2020

प्रशासनिक पद का त्याग कर राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हुए काशी के प्रथम भारत रत्न डॉ भगवान दास

डॉ भगवान दास की पुण्यतिथि पर विशेष

देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी विद्या और विद्वता का गढ़ माना जाता है शिक्षा, ज्ञान, साहित्य, कला, पत्रकारिता आदि क्षेत्रों में काशी की धरती को ऐसे कई विभूतियों ने भी अपनी विद्वता से सुशोभित किया है जिनकी देश में अमिट छाप है। इनमें से ही एक डॉ भगवान दास। प्रतिबद्ध गाँधीवादी डॉ भगवान दास जी का जन्म काशी में 12 जनवरी 1869 को हुआ था

डॉ भगवान दास जी के पुण्यतिथि पर हिन्दी पत्रकारिता संस्थान, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के निदेशक प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डॉ. भगवान दास जी ऐसे मनीषि है जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सम्पूर्ण योगदान दिया है, भारत राष्ट्र की सेवा किया है। वे हमारे लिए सदैव स्मरणीय हैं और आजीवन रहेंगे। प्रों सिंह ने चर्चा करते हुए बताया कि डॉ. भगवान दास जी प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। गांधी जी के आह्वान पर प्रशासनिक पद का त्याग कर वे राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गये। अंग्रेजों का बहिष्कार करने के लिए गांधी जी के साथ मिलकर वे स्वदेशी अपनाने की लड़ाई भी लड़े। डॉ. भगवान दास जी ने भारतीय दर्शन को भी दिशा दी है। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ समेत अन्य शिक्षण संस्थाओं के वे संस्थापक सदस्य भी रहें हैं। शिक्षा क्षेत्र के विकास के लिए काशी में शिक्षा शास्त्रीयों का 21 दिवसीय सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें डॉ भगवान दास के नेतृत्व में ‘‘भारत की भावी शिक्षा नीति क्या हो’’ इस पर विचार किया गया। उन्हें सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। इस प्रकार वे काशी क्षेत्र के प्रथम भारत रत्न बनें। प्रो. सिंह ने आगे बताया कि यह कहा जा सकता है कि उस समय गांधी जी के नेतृत्व में चलने वाला जो भी राष्ट्रीय आन्दोलन था उसकी वैचारिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि को बनाने में डॉ भगवान दास जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

Friday, September 11, 2020

स्वामी विवेकानंद - शिकागो भाषण

Swami Vivekananda - The Idol of Young India

11 सितंबर 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद शुरू हुईजिसमें दुनिया के अनेक राष्ट्रों से हजारों प्रतिनिधि आए थे। उनमे स्वामी विवेकानंद सबसे युवा थे। जब उनके बोलने की बारी आई तो भारतीय संस्कृति के अनुसार उन्होने सबसे पहले अपने गुरु स्वामी राम कृष्ण परमहंस और माँ शारदा को मन ही मन नमन किया और कहा सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका यानि मेरे अमेरिकी भाईयों और बहनों', यह सुनते ही वहाँ माजूद हजारों लोगों के लगभग तीन मिनट तक स्वामी विवेकानंद के लिए खड़े होकर तालिया बजाईं थी। अभी तक कोई भी वक्ता इतने अपनेपन से नहीं बोला था। अपने औजास्वी और ग्रीमामाई भाषण में स्वामी विवेकानन्द ने दुनिया का भारत कि शक्ति से परिचय कराया।अपने विचारों से पूरी दुनिया को नतमस्तक करने वाले स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म के महान विचारों पर अदभुत भाषण दियाजिसकी बदौलत भारत को विश्व में एक अलग पहचान मिली थी।

भाषण का भाग –

मैं आपको अपने देश की प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से भी धन्यवाद देता हूं और सभी जातिसंप्रदाय के लाखोंकरोड़ों हिंदुओं की तरफ से आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है

उस सभा में पूरे विश्व के अलग-अलग धर्मों के धर्मावलंबी उपस्थित थे और पूरा हॉल श्रोताओं से खचाखच भरा था। मंच पर उनके आने से पहले कई वक्ता आ कर जा चुके थे और कई अन्य को अभी आना शेष था। तभी मंच पर एक युवा ओजस्वी सन्यासी आया और उसने अभी मात्र श्रोताओं का अभिनंदन ही किया था की पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। वहां बैठा एक एक व्यक्ति उनके केवल अभिवादन मात्र से ही सममोहक हो गया और यह सम्मोहन इतना तीक्ष्ण था कि अगले 3 मिनट तक वहां केवल तालियों की गड़गड़ाहट रही।

ऐसा क्या कह दिया था उस व्यक्ति ने श्रोताओं के अभिवादन में...

11 सितंबर 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में विश्व भर से हजारों प्रतिनिधि आए थे जिनमें स्वामी विवेकानंद सबसे युवा थे। वहां उपस्थित श्रोताओं में अधिकांश अमेरिका के निवासी और यूरोप के देशों से उस सभा को सुनने आए लोग थे। ये सभी लोग अपने सम्मान में मिस्टर और मिसेज... और बहुत अधिक हो तो फ्रेंड्स सुनने के आदी थेलेकिन जब इस तेजस्वी सन्यासी ने के मुंह से उन्होंने अपने लिए सुना - मेरे अमेरिकी बहनों और भाइयों - तो वे अपने कानों पर सहसा विश्वास नहीं कर सके और एक सुखद अनुभूति के साथ रोमांचित हो उठेक्योंकि अपने लिए इस प्रकार के संबोधन की उन्होंने कोई कल्पना ही नहीं थी।

अभी तक कोई भी वक्ता इतने अपनेपन से नहीं बोला था। अपने औजास्वी और गरीमामाई भाषण में स्वामी विवेकानन्द ने विश्व को भारत के आध्यात्म से परिचय कराया।

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में कहा कि जिस तरह अलग अलग स्थानों से बहनें वाली नदियां अंत में समुद्र में मिलती हैंउसी प्रकार विभिन्न धर्मों में जन्मे मनुष्य अंत में परमात्मा के पास पहुंचते हैं। कोई भी धर्म ऊंचा या नीचा नहीं है। उन्होने कहा कि वे ऐसी भारत भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सांस्कृतिक दृष्टि से सबसे प्राचीन है। दुनिया में यही ऐसी इकलौती धरती है जिसने सभी धर्मों को संकट के समय आश्रय दिया। दरअसल इसके माध्यस से स्वामी विवेकानंद ने भारत की सहिष्णुता और सनातन संस्कृति की बात कही।

1893 में कई सदियों बाद दुनियां ने भारत का यह रूप देखा। अगले ही दिन अनेक पत्र पत्रिकाओं में उनका भाषण छपा। राजगोपाल चटोपाध्याय की पुस्तक स्वामी विवेकानन्द इन इंडिया में अमेरिका के एक समाचार पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स कि एक टिप्पणी का उल्लेख हैभाषण के बाद इस समाचार पत्र  ने लिखा था कि "कई लोगों ने बहुत अच्छा  भाषण दिया लेकिन एक हिन्दू साधु ने विश्व धर्म संसद के विषय को जिस तरह लोगों के सामने रखा वैसा कोई और नहीं कर सका। वो एक बहुत बड़े वक्ता हैं। हम यहाँ उनका पूरा भाषण छाप रहे हैं लेकिन वहाँ मौजूद लोगों पर उनके भाषण का जो प्रभाव पड़ाउसको बता पाना बहुत कठिन है। उनका तेजस्वी चेहराउनकी बुद्धिमानीउनकी वेश भूषा के प्रभाव को बताने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं।"

एक और अमेरिकी पत्र न्यूयॉर्क हेराल्ड ने लिखा "इसमें कोई शक नहीं कि विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानद सबसे महान वक्ता हैं। उनको सुनने के बाद लगता है इतने विद्वान और बुद्धिमान देश में मिशनरीयों को भेजना कितना मूर्खतापूर्ण है।"

अंग्रेजी भाषा पर भी स्वामी विवेकानंद का प्रभुत्व असाधारण था। उनका तेजस्वी व्यक्तित्ववेशअपूर्व वाक्पटुता हिन्दू धर्म के सार को प्रस्तुत करने की कुशाग्रता से उन्होनें पूरे अमेरिकावासियों का मन मोह लिया। उन्हें एक युग पुरुष के रूप में देखा जाने लगा। इस सन्यासी का सभी जगह भव्य स्वागत होने लगा। इस योद्धा सन्यासी की लंदन की पत्रिकाओं में खुलकर प्रशंसा की गई।

स्वामी विवेकानंद के भाषण से पहले भारतीयों को लेकर पश्चिमी देशों में यह धारणा थी कि भारत के लोग अनपढ़अभद्र व मूढ़ विचारों के होते हैं। उस समय हमारे ही पूर्वज अंग्रेजों कि दमनकारी नीतियों से कुचले जा रहे थे। ऐसे समय में स्वामी विवेकानन्द के भाषण और इसके बाद दिये अनेकों वक्तव्यों से अमेरिका ही नहीं सभी प्रगतिशील देशों में भारत और भारतीयता को गौरव का स्थान प्राप्त हुआ और अनेक लोग उनके शिष्य बने।

Wednesday, September 9, 2020

भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों का रेंजा गला पर कब्ज़ा करने के प्रयास को किया विफल

लद्दाख बॉर्डर पर बिगड़े हालात, भारत-चीन ने तैनात किए टैंक, काला टॉप हिल पर  सेना मुस्तैद - India china border tank deployment BATTLE TANKS kala top  hills pangong hill - AajTak

चीनी सैनिकों के एक और प्रयास को भारतीय सैनिकों ने उस समय विफल कर दिया जब दक्षिणी पैन्गोंग में रेंजा गला से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित मुखपरी पहाड़ी पर चीनी सैनिक कब्ज़ा करने का प्रयास कर रहे थे. गलावन घाटी जैसी घटना दोहराने के प्रयास में लगे चीनी सैनिकों के इस साजिश को विफल कर उन्हें करारा जवाब दिया है.

यदि इस चोटी पर कब्ज़ा करने में चीनी सेना सफल हो जाती तो वह पैन्गोंग इलाके में भारतीय सैनिकों की तैनाती से लेकर आवाजाही समेत सभी गतिविधियों पर नजर रख सकती थी. हाल के दिनों में पैन्गोंग इलाके में कई स्थानों पर भारतीय सेना ने अपनी तैनाती नए सिरे से की है. कई अहम चोटियों पर अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराई है. ऐसा इसलिए जरूरी था क्योंकि चीनी सेना फिंगर - 4 एवं फिंगर - 5 की चोटियों पर डटी हुई थी. जबकि भारतीय सेना निचले इलाकों में थी. पिछले हफ्ते भारतीय सेना ने ब्लैक टॉप समेत कई चोटियों पर मोर्चा संभाला. इससे वह चीनी सेना से बेहतर पोजीशन में आ गयी.

इन क्षेत्रों पर है चीन की नजर

तवांग

1914 में तिब्बत ने एक समझौते में तवांग को भारत का एक हिस्सा माना था. जबकि चीन अरुणांचल के तवांग को तिब्बत का हिस्सा मानता है. चीन की कोशिश यही है कि तवांग पर कब्ज़ा किया जाए. लेकिन हर बार चीन को मुंह की खानी पड़ी है.

पैन्गोंग त्सो झील

यह एक मुख्य मार्ग है जिसका चीन आक्रमण के लिए प्रयोग कर सकता है. इसका 45 किलोमीटर क्षेत्र भारत में और 90 किलोमीटर चीन में है. 14000 फुट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित इस झील के मध्य से एलएसी गुजरती है.

डोकलाम

2017 में डोकलाम को लेकर भारत-चीन में विवाद हुआ था. यह पठारी क्षेत्र भारत, चीन और भूटान की सीमा का ट्राई-जंक्शन है. भारत इसे भूटान का और चीन अपना हिस्सा मानता है. भारत ने यहाँ चीन द्वारा सड़क बनाने की कोशिश का विरोध किया था.

नाथुला

नाथूला हिमालय का पहाड़ी दर्रा है जो भारत के सिक्किम राज्य और दक्षिण भारत में चुम्बी घाटी को जोड़ता है. 14,200 फुट उंचाई पर स्थित नाथूला भारत के लिए महत्वपूर्ण है. कैलाश मानसरोवर का जत्था यहीं से गुजरता है.

रेजां गला

1962 के युद्ध में 13 कुमाऊं दस्ते का यह अंतिम मोर्चा था. लद्दाख की चुशूल घाटी की बर्फीली चोटी पर स्थित रेजां गला पोस्ट भारत के लिए काफी अहम है. इस इलाके से चीन को घुसपैठ के लिए लेह तक का रास्ता मिलता है.

गलवान घाटी

गलवान घाटी का क्षेत्र अक्साई चिन से बहुत नजदीक है. यहाँ पर एलएसी अक्साई चिन को भारत से विभाजित करती है. 1962 की लड़ाई के दौरान भी गलवान नदी का यह क्षेत्र लड़ाई का केन्द्र रहा था.

समझौते तोड़ रहा चीन

1993 : भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में एलएसी पर शांति-स्थिरता के रखरखाव पर समझौता

1996 : एलएसी के साथ सैन्य क्षेत्र में विश्वास निर्माण उपायों पर समझौता

2005 : एलएसी के साथ सैन्य क्षेत्र में विश्वास बहाली के उपायों के कार्यान्वयन के लिए तौर-तरीकों पर प्रोटोकाल

2012 : भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए एक कार्य प्रणाली की स्थापना पर समझौता

2013 : सीमा रक्षा सहयोग समझौता

Friday, August 28, 2020

आत्मनिर्भर भारत अभियान : काशी के भाई-बहन ने ढूंढ निकाला टिक-टॉक का विकल्प

हमारे देश में आत्मनिर्भर भारत जैसे सकारात्मक पहल की आवश्यकता है. आत्मनिर्भर भारत की हवा को देश के युवाओं ने आंधी में बदल दिया. देश के युवाओं को जब यह संबल मिला कि उनके रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा दिया जाएगा तो प्रतिदिन भारत में कोई न कोई नए अविष्कार होने लगे. इन्हीं में से एक है काशी के भाई-बहन प्रखर और स्वर्णिमा का प्रयोग. दोनों ने भाई बहन ने बहुचर्चित एप्प टिक-टॉक का विकल्प रिवाइंड एप्प के रूप में ढूंढ निकाला. हाल ही में केन्द्र सरकार ने डाटा चोरी के आरोप में बड़ी संख्या में चीनी एप्प पर देश में प्रतिबन्ध लगाया था. इनमें देश में ख़ासा लोकप्रिय हो चुका एप्प टिक-टॉक भी था. 

इंजीनियरिंग के छात्र प्रखर और एमबीए की छात्रा उनकी बहन स्वर्णिमा के साथ उनकी टीम कॉलेज बंद होने के दौरान समय का सदुपयोग करते हुए इस सफलता को प्राप्त किया है. प्रखर के अनुसार टिक-टॉक के प्रति देश के युवाओं में क्रेज ज्यादा था. इस पर पाबंदी लगने के बाद इस प्रकार के दूसरे कई एप्प बड़ी कंपनियों द्वारा बनाये गये. लेकिन उनकी टीम ने बेहतर एप्प बनाने के लिए बाद में इस पर काम शुरू किया. उन्होंने आगे कहा कि हमने टीम तैयार की और मोंकाई साल्यूशन के नाम से स्टार्टअप के तहत एप्प बनाने की सोची. करीब महीने भर की मेहनत के बाद एप्प तैयार कर २४ अगस्त को लांच किया. इस टीम में प्रखर और स्वर्णिमा के अलावा जौनपुर के रजनीश गुप्ता, असिता विजय सेठी और वैष्णवी शिवहरे इनके सहयोगी बनें.

Thursday, August 27, 2020

गोदौलिया गेट बतायेगा श्रीकाशी विश्वनाथ धाम की भव्यता और दिव्यता

Outlook India Photo Gallery - Kashi Vishwanath Corridor Project

बनारस में निर्माणाधीन श्रीकाशी विश्वनाथ कॉरिडोर को भव्य रूप देने की चल रही तैयारियों में मन्दिर प्रशासन किसी तरह की कोई भी कमी छोड़ना नहीं चाहती. मन्दिर से गंगा घाट तक बनाए जा रहे कॉरिडोर की भव्यता और उसकी दिव्यता का एहसास की शुरुआत परिसर के मुख्य द्वार गोदौलिया गेट से होने लगेगी. लगभग 32 फीट ऊँचा और 90 फीट चौड़ा दो मंजिला इस गेट को गोदौलिया गेट के नाम से जाना जाएगा. इसे सड़क मार्ग से देखा जाए अथवा जल मार्ग से देखने वालों को हर तरफ से यह आकर्षित करेगा. इसके दोनों तरफ सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये जाएँगे. परिसर में प्रवेश करने वालों की पूरी तरह जाँच की जाएगी. इसके आलावा यात्री सुविधा केन्द्र भी होंगे जिससे यात्रियों को किसी असुविधा का सामना न करना पड़े. इसके साथ ही इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया है कि 24 भवनों वाले इस कॉरिडोर के किसी भी भवन की ऊंचाई काशी विश्वनाथ दरबार के शिखर से ऊँची न होने पाए.

प्रोजेक्ट पूर्ण होने में अभी लगेंगे 1 वर्ष 

जनवरी से शुरू इसके निर्माण कार्य में कोरोना संकट के कारण अभी तक सिर्फ 11 फीसद कार्य ही पूरा हो पाया है. शेष कार्य अगस्त 2011 तक पूरा कर लेने का लक्ष्य है. इसके लिए श्रमिकों की संख्या बढ़ा दी गयी है. 

Wednesday, August 26, 2020

काशी की संस्कृति में बसे डोमराजा जगदीश चौधरी का निधन

  • संघ के प्रखर समर्थक थे डोमराजा,  श्रीगुरूजी की जन्मशताब्दी कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर लिया था हिस्सा
  • प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने व्यक्त किया शोक 
  • संतों के साथ महंत अवेद्यनाथ ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाकर डोमराजा के घर किया था भोज 
  • डोमराजा ने मोदी को प्रधानमंत्री बनने का दिया था आशीर्वाद 
  • राजा हरिश्चंद्र को ख़रीदा था डोमराजा परिवार ने 
SP chief Akhilesh Yadav mourns death Domraja Jagdish Chaudhary Kashi
महादेव की मोक्ष नगरी काशी के डोमराजा जगदीश चौधरी का मंगलवार को निधन हो गया. उन्होंने त्रिपुरा भैरवी घाट स्थित आपने आवास पर अंतिम सांस ली. डोमराजा एक माह से पैर में गंभीर घाव के कारण अस्वस्थ थे. उनका निजी चिकित्सालय में इलाज चल रहा था. उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को ही सायंकाल महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर ही किया गया. संघ के प्रखर समर्थक रहे डोमराजा ने द्वितीय सरसंघचालक प० पू० माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरूजी की जन्मशताब्दी कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था.
ऐसी मान्यता है कि जगदीश चौधरी की मां जमुना देवी को डोम राजमाता माना जता है, जिनके दिशा-निर्देश पर मणिकर्णिका घाट पर अग्नि देने का काम शुरू किया गया. डोमराजा के निधन की सुचना मिलते ही भैरवी घाट स्थित उनके आवास पर जिलाधिकारी समेत अनेक गणमान्य लोगों की जुटान शुरू हो गयी. डोमराजा अपने पीछे अपनी मां के अलावा पत्नी रुक्मणी, दो पुत्री व एक पुत्र से भरा परिवार छोड़ गये. 
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने व्यक्त किया शोक 
डोमराजा जगदीश चौधरी के निधन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरा दुःख व्यक्त करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रर्थना की. प्रधानमंत्री ने कहा कि वह काशी की संस्कृति में रचे बसे थे और वहां की सनातन परम्परा के संवाहक थे. 
संतों के साथ महंत अवेद्यनाथ ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाकर डोमराजा के घर किया था भोज 
.धर्मान्तरण का मुख्य कारण हिन्दू समाज में अस्पृश्यता को कोढ मानते हुए उसके विरुद्ध अभियान छेड़ने वाले गोरक्षपीठ के महंत अवेद्यनाथ ने ढ़ाई दशक पहले संतों के साथ सहभोज करके सामाजिक क्रांति ला दी थी. उक्त बातें अपने सन्देश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बताई. उन्होंने सन्देश में चर्चा किया कि डोमराजा काशी ही नहीं अध्यात्म के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं. यहाँ महंत अवेद्यनाथ से जुड़े उस क्रांतिकारी  प्रसंग की चर्चा लाजिमी है, जिससे डोमराज परिवार और नाथ पीठ के उस आध्यात्मिक रिश्ते की नींव पड़ी थी. 19 फरवरी 1980  में मिनाक्षीपुरम में घटित धर्मांतरण की घटना ने महंत जी को विचलित कर दिया था. फिर उन्होंने अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था. इस अभियान के दौरान ही उन्होंने संतों और धर्माचार्यों के साथ काशी के डोमराजा सुजीत चौधरी के घर उनकी मां सारंगी देवी के हाथ का बना भोजन किया. उनके इस कार्य की देश भर में प्रशंसा और स्वागत हुई. उन्होंने इससे छुआछूत मिटाने के प्रयासों की नींव रखी.
डोमराजा ने मोदी को प्रधानमंत्री बनने का दिया था आशीर्वाद 
डोमराजा जगदीश चौधरी ने लोकसभा चुनाव - 2019 के दौरान नरेन्द्र मोदी को प्रधानमन्त्री बनने का आशीर्वाद दिया था. उन्होंने कहा था कि 'हमारा आशीर्वाद है कि वह फिर से प्रधानमंत्री बनें और देश की सेवा करें'. लोकसभा चुनाव - 2019 में वाराणसी लोकसभा नामांकन के लिए जगदीश चौधरी को मोदी का प्रस्तावक बनाया गया था. इस पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि पहली बार किसी नेता या प्रधानमंत्री ने डोमराजा की बारे में सोचा है. डोम समाज दुनिया के सबसे पुराने शहर बनारस ने सबसे पिछड़ा समाज है. वह पीढ़ियों से मणिकर्णिका घाट पर शवों के दाह संस्कार का काम करता आया है. कोई नेता कभी हमारे बारे में नहीं सोचता है, जिस तरह प्रधानमंत्री ने मेरे बारे में, मेरे पूरे परिवार समेत पूरे समाज के बारे में सोचा है, वह नेक पहल है.
राजा हरिश्चंद्र को ख़रीदा था डोमराजा परिवार ने 
 कहा जाता है कि जगदीश चौधरी के पुरखे-पुरनियों ने कभी सत्यवादी, चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र को इसी काशी नगरी की घाट पर मुंह-मांगा मोल देकर ख़रीदा था. बस इसी गौरव बोध की थाती को सीने से लगाए वे सदियों से मोक्ष नगरी काशी के महाश्मशान पर अपनी समान्तर सत्ता चलाते रहें है.