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Saturday, March 23, 2013

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के तीसरे दिन की प्रेस ब्रिफिंग


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के तीसरे दिन की प्रेस ब्रिफिंग
 सर कार्यवाह माननीय सुरेश जी जोशी "भैय्या जी जोशी" पत्रकारों से बात करते हुए 















जयपुर 17 मार्च। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह सुरेश  जोशी  (भैय्या जी जोशी  ) ने रविवार को जयपुर में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि देश  की सीमा क्षेत्र में पाकिस्तान द्वारा बर्बरता का परिचय देना, प्रति रक्षा सौदों पर प्रष्न चिह्न लगना, महिला उत्पीडन की वेदनादायक घटनाएं आदि से देश में जो परिस्थितियां बनी है वे संघ के साथ ही समस्त देश भक्तों के लिए चिंता का विषय है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने सभी विषयों पर चर्चा कर प्रस्ताव और व्यक्तव्य के माध्यम से समाज के सामने यह विषय लाने का प्रयास किया है।
सर कार्यवाह माननीय सुरेश जी जोशी "भैय्या जी जोशी" एवं माननीय मनमोहन जी वैध्य 















उन्होंने अखिल भारतीय प्रतिनिधि में तीन दिन तक चले मंथन के बारे में मीडिया को बताया कि पाकिस्तान और बंगलादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अन्तहीन अत्याचारों के परिणामस्वरूप वे लगातार बड़ी संख्या में शरणार्थी बनकर भारत में आ रहे हैं। यह बहुत ही लज्जा एवम् दुःख का विषय है कि इन असहाय हिन्दुओं को अपने अपने मूल स्थान और भारत दोनों में ही अत्यंत दयनीय जीवन बिताने को विवश होना पड़ रहा है।
बंगलादेश के बौद्धों सहित समस्त हिन्दुओं एवं उनके पूजास्थलों पर वहाँ की हिंदु और भारत विरोधी कुख्यात जमाते इस्लामी सहित विभिन्न कट्टरपंथी संगठनों द्वारा हाल ही में किये गए हमलों की तीव्र निंदा की गई। पाकिस्तान के हिंदु सुरक्षा, सम्मान और मानवाधिकारों से वंचित निम्न स्तर का जीवन बिता रहे हैं। सिक्खों सहित समस्त हिन्दुओं पर नित्य हमले आम बात है। बलपूर्वक मतान्तरण, अपहरण, बलात्कार, जबरन विवाह, हत्या और धर्मस्थलों को विनष्ट करना वहाँ के हिन्दुओं के प्रतिदिन के उत्पीडि़त, जीवन का भाग हो गये हैं। पाकिस्तान की कोई भी संवैधानिक संस्था उनकी सहायता के लिए आगे नहीं आती है। परिणामस्वरूप पाकिस्तान के हिंदु भी पलायन कर भारत में शरण मांगने को विवश हो रहे हैं। 1950 के नेहरु-लियाकत समझौते में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि दोनों देशों में अल्पसंख्यकों को पूर्ण सुरक्षा और नागरिकता के अधिकार प्रदान किये जायेंगे। भारत में हर संवैधानिक प्रावधान का उपयोग तथाकथित अल्पसंख्यकों को न केवल सुरक्षा प्रदान करने के लिए किया गया अपितु उनको तुष्टिकरण की सीमा तक जानेवाले विशेष प्रावधान भी दिए गए। वे आज भारत में जनसांख्यिकी, आर्थिक, शैक्षिक, और सामाजिक सभी दृष्टि से सुस्थापित हैं। इसके विपरीत, पाकिस्तान और बंगलादेश के हिंदु लगातार उत्पीडन के परिणामस्वरूप घटती जनसंख्या, असीम गरीबी, मानवाधिकारों के हनन और विस्थापन की समस्याओं से ग्रस्त है। पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान में विभाजन के समय हिन्दुओं की जनसंख्या क्रमशः 28ः और 11ः थी तथा खंडित भारत में 8ः मुस्लिम थे। आज जब भारत की मुस्लिम आबादी 14ः तक बढ़ गयी है वहीं बंगलादेश में हिंदु घटकर 10ः से कम रह गए है और पाकिस्तान में वे 2 प्रतिशत से भी कम है।
इस हृदय विदारक दृश्य को देखते हुए भारत सरकार से यह अनुरोध करती है कि इन दोनों देशों में रहनेवाले हिन्दुओं के प्रश्न पर नए दृष्टिकोण से देखे, क्योंकि उनकी स्थिति अन्य देशों में रहनेवाले हिन्दुओं से पूर्णतया अलग है। इसी के साथ मांग की गई है कि बंगलादेश और पाकिस्तान की सरकारों पर वहाँ के हिन्दुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाए, राष्ट्रीय शरणार्थी एवं पुनर्वास नीति बनाकर इन दोनों देशों से आनेवाले हिन्दुओं के सम्मानजनक जीवन यापन की व्यवस्था भारत में तब तक करें जब तक कि उनकी सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी की स्थिति नहीं बनती, बंगलादेश और पाकिस्तान से विस्थापित होनेवाले हिन्दुओं के लिए दोनों देशों से उचित क्षतिपूर्ति की मांग करे, संयुक्त राष्ट्र संघ के शरणार्थी तथा मानवाधिकार से सम्बंधित संस्थाओं ख्न्छभ्ब्त्ए न्छभ्त्ब्, से यह मांग करे कि हिन्दुओं व अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा व सम्मान की रक्षा के लिए वे अपनी भूमिका का निर्वाह करें।  
महिला उत्पीडन और सरकार द्वारा सेक्स की आयु घटाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि देश मंे प्राचीन काल से ही महिलाएं श्रद्धा और आदर का केन्द्र रही है। वर्तमान परिस्थितियों मंे महिलाओं की सामाजिक भूमिका पर समाज जागरण की आवश्यकता है। इसके लिए परिवार और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना अत्यन्त आवश्यक है। सेक्स की आयु घटाने के जवाब में उन्होंने कहा कि यह देश के लिए ठीक नही है और संघ इसका विरोध करता है।

शनिवार, 16 मार्च 2013

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के दूसरे दिन की प्रेस ब्रिफिंग

  
सह सरकार्यवाह डा कृष्णगोपाल एवं अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख माननीय नन्द कुमार  जी पत्रकारों से वार्ता करते हुए 



पत्रकारों से वार्ता का एक दृश्य 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के दूसरे दिन की प्रेस ब्रिफिंग
जयपुर 16 मार्च। जयपुर के केषव विद्यापीठ जामड़ोली में चल रही अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के दुसरे दिन संवाददाताओं से बात करते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डाॅ.कृष्णगोपाल ने कहा कि पड़ोसी देषों से हो रही घुसपैठ के कारण लगातार जनसंख्या असतुंलन बढ़ता जा रहा है, यह वृद्धि प्राकृतिक नही है। डाॅ.गोपाल ने सरकार्यवाह सुरेष भैय्या जी जोशी द्वारा श्रीलंका के तमिल पीडि़तों की समस्याओं और देष की वर्तमान परिस्थितियों पर जारी दो वक्तव्यों की जानकारी भी दी।
डाॅ.कृष्णगोपाल ने संवाददाताओं द्वारा पूछे गए सवालों के जबाव देते हुए कहा कि महिला उत्पीड़न के खिलाफ कानून तो अच्छा बनना ही चाहिए। इसके साथ ही समाज, परिवार और शैक्षिणिक संस्थाओं में महिलाओं के प्रति आदर भी बढ़ना चाहिए। हर घर, परिवार में संस्कार बढे ऐसे प्रयास समाज में होने चाहिए।

जारी व्यक्तव्य में बताया गया कि गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यू.एन.एच.आर.सी.) की जेनेवा बैठक से ठीक पहले श्रीलंका सरकार को अपने देश के तमिलों की समस्याओं का समाधान करने के लिए सक्रियतापूर्वक कदम उठा उनके उचित पुनर्वास, सुरक्षा एवं राजनैतिक अधिकारों को भी सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। परन्तु एक वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी धरातल पर स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। इस कारण से वैश्विक जगत का श्रीलंका सरकार की मंशाओं के प्रति संदेह और गहरा हो गया है।
श्रीलंका सरकार को यह पुनस्र्मरण कराना चाहिए कि वह 30 वर्ष के लिट्टे (एल.टी.टी.ई.) एवं श्रीलंका सुरक्षा बलों के मध्य हुए संघर्ष के परिणामस्वरूप हुई तमिलों की दुर्दशा पर आँख मंूदकर नहीं बैठे, जिन्हें इस कारण अपने जीवन, रोजगार, घरों और मंदिरों को भी खोना पड़ा। एक लाख से अधिक तमिल आज अपने देश से पलायन कर तमिलनाडु के समुद्री किनारों पर शरणार्थी के रूप में रह रहे हंै। श्रीलंका में स्थायी शांति तभी संभव है जब सरकार उत्तरी एवं पूर्वी प्रान्तों तथा भारत में रहने वाले तमिल शरणार्थियों की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक एवं पर्याप्त रूप से ध्यान दे। भारत सरकार से यह आग्रह हैं कि वह यह सुनिश्चित करे कि श्रीलंका सरकार विस्थापित तमिलों के पुनर्वास तथा उन्हें पूर्ण नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रदान करने के लिए जिम्मेदारीपूर्वक व्यवहार करे।
देष की वर्तमान परिस्थिति के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि सरकार की अदूरदर्शितापूर्ण नीतियों से बढ़ते आर्थिक संकट और कृषि, लघु उद्योग व अन्य रोजगार आधारित क्षेत्रों की बढ़ती उपेक्षा आज देश के लिए चिन्ता का कारण बन कर उभर रही है। देश के उत्पादक उद्योगों की वृ़द्धि दर आज स्वाधीनता के बाद सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुँच गयी है। इस गिरावट से फैलती बेरोजगारी, निरंतर बढ़ रही महंगाई, विदेश व्यापार में बढ़ता घाटा और देश के उद्योग, व्यापार व वाणिज्य पर विदेशी कम्पनियों का बढ़ता आधिपत्य आदि आज देश के लिए गम्भीर आर्थिक सकंट व पराश्रयता का कारण सिद्ध हो रहे हैं।
कृषि की उपेक्षा से किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं, अधिकाधिक किसानों का अनुबंध पर कृषि के लिए बाध्य होने और सरकार की भू अधिग्रहण की विवेकहीन हठधर्मिता आदि से आज करोडों किसानों का जीवन संकटापन्न होने के साथ ही, देश की खाद्य सुरक्षा भी गम्भीर रूप से प्रभावित हो रही है।
उन्होंने बताया कि आज गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ जहाँ हमारी अगाध श्रद्धा का केन्द्र हैं, वहीं वे करोड़ों लोगों के जीवन का आधार होने के साथ-साथ, देश के बहुत बड़े क्षेत्र के पर्यावरणीय तंत्र की भी मूलाधार हैं। इन नदियों के प्रवाह को अवरूद्ध करने के सरकारों के प्रयास, उन्हें प्रदूषण मुक्त रखने के प्रति  उपेक्षा एवं उनकी रक्षार्थ चल रहे आन्दोलनों की भावना को न समझते हुए उनकी उपेक्षा भी गम्भीर रूप से चिन्तनीय है। संघ इन सभी जन आन्दोलनों का स्वागत करता है। कावेरी जैसे नदी जल विवाद भी अत्यन्त चिन्ताजनक हैं। राज्यों के बीच नदी जल विभाजन व्यापक जन हित में, न्याय व सौहार्द पूर्वक होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राचीन रामसेतु, जोे करोडों हिन्दुओं की श्रद्धा का केन्द्र होने के साथ-साथ, वहाँ पर विद्यमान थोरियम के दुर्लभ भण्डारांेेे को सुरक्षित रखने में भी प्रभावी सिद्ध हो रहा है। उसे तोड़ कर ही सेतु-समुद्रम योजना को पूरा करने की सरकार की हठधर्मिता, देश की जनता के लिए असह्य है। पूर्व में भी वहां से परिवहन नहर निकालने हेतु सरकार द्वारा उसे तोडने के प्रयास आरंभ करने पर, उसे राम भक्तों के प्रबल विरोध के आगे झुकना पडा है। आज शासन द्वारा पचैरी समिति के द्वारा सुझाये वैकल्पिक मार्ग को अपनाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने के शपथ पत्र से पुनः उसकी नीयत पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। इसलिए हम सरकार से अनुरोध करतेे हैं कि, जन भावनाओं का सम्मान करते हुए उसे तोड़ने का दुस्साहस न करे। अन्यथा उसे पुनः प्रबल जनाक्रोश का सामना करना पड़ेगा। ऐसे सभी सामयिक घटनाक्रमों के प्रति सरकार को जन भावनाओं को ध्यान में रखते हुए देश हित में व्यवहार करना चाहिए।

देश की वर्तमान परिस्थितियों पर सर कार्यवाह भय्या जी जोशी का वक्तव्य



देश की वर्तमान परिस्थितियों पर सर कार्यवाह भय्या जी जोशी का वक्तव्य
 16.03.2013
सरकार की अदूरदर्शितापूर्ण नीतियों से बढ़ते आर्थिक संकट और कृषि,लघु उद्योग व अन्य रोजगार आधारित क्षेत्रों की बढ़ती उपेक्षा आज देश के लिए चिन्ता का कारण बन कर उभर रही है। देश के उत्पादक उद्योगों की वृ़द्धि दर आज स्वाधीनता के बाद सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुँच गयी है। इस गिरावट से फैलती बेरोजगारी, निरंतर बढ़ रही महंगाई, विदेश व्यापार में बढ़ता घाटा और देश के उद्योग, व्यापार व वाणिज्य पर विदशी कम्पनियों का बढ़ता अधिपत्य आदि आज देश के लिए गम्भीर आर्थिक सकंट व पराश्रयता का कारण सिद्ध हो रहे हैं। साथ ही बढ़ते राजकोषीय संकट से,कृषि सहित रक्षा, विकास व लोक कल्याण के लिए संसाधनों का बढ़ता अभाव भी आज गम्भीर रूप से चिंतनीय है। कृषि की उपेक्षा से किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं, अधिकाधिक किसानों का अनुबंध पर कृषि के लिए बाध्य होने और सरकार की भू अधिग्रहण की विवेकहीन हठधर्मिता आदि से आज करोडों किसानों का जीवन संकटापन्न होने के साथ ही, देश की खाद्य सुरक्षा भी गम्भीर रूप से प्रभावित हो रही है। ऐसे में, विविध बहुपक्षीय व्यापारिक समझौते एवं मुक्त व्यापार समझौते भी अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में सरकार को देश हित के अनुरूप निर्णय करने के विरूद्ध बाध्य कर, विकल्प हीनता की स्थिति खड़ी कर रहे हैं, जो अत्यन्त गंभीर चिन्ता का विषय है। ऐसे में आज स्वावलम्बी आर्थिक विकास के लिए, वैकल्पिक आर्थिक पुनर्रचना की पहल की अविलम्ब आवश्यकता है।
आज गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ जहाँ हमारी अगाध श्रद्धा का केन्द्र हैं, वहीं वे करोड़ों लोगों के जीवन का आधार होने के साथ-साथ,देश के बहुत बड़े क्षेत्र के पर्यावरणीय तंत्र की भी मूलाधार हैं। इन नदियों के प्रवाह को अवरूद्ध करने के सरकारों के प्रयास, उन्हें प्रदूषण मुक्त रखने के प्रति  उपेक्षा एवं उनकी रक्षार्थ चल रहे आन्दोलनों की भावना को न समझते हुए उनकी उपेक्षा भी गम्भीर रूप से चिन्तनीय है। संघ इन सभी जन आन्दोलनों का स्वागत करता है।  कावेरी जैसे नदी जल विवाद भी अत्यन्त चिन्ताजनक हैं। राज्यों के बीच नदी जल विभाजन व्यापक जन हित में, न्याय व सौहार्द पूर्वक होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राचीन रामसेतु, जो करोडों हिन्दुओं की श्रद्धा का केन्द्र होने के साथ-साथ, वहाँ पर विद्यमान थोरियम के दुर्लभ भण्डारों को सुरक्षित रखने में भी प्रभावी सिद्ध हो रहा है। उसे तोड़ कर ही सेतु-समुद्रम योजना को पूरा करने की सरकार की हठधर्मिता, देश की जनता के लिए असह्य है। पूर्व में भी वहां से परिवहन नहर निकालने हेतु सरकार द्वारा उसे तोडने के प्रयास आरंभ करने पर, उसे राम भक्तों के प्रबल विरोध के आगे झुकना पडा है। आज शासन द्वारा पचौरी समिति के द्वारा सुझाये वैकल्पिक मार्ग को अपनाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने के शपथ पत्र से पुनः उसकी नीयत पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। इसलिए हम सरकार से अनुरोध करते हैं कि, जन भावनाओं का सम्मान करते हुए उसे तोड़ने का दुस्साहस न करे। अन्यथा उसे पुनः प्रबल जनाक्रोश का सामना करना पड़ेगा। ऐसे सभी सामयिक घटनाक्रमों के प्रति सरकार को जन भावनाओं को ध्यान में रखते हुए देश हित में व्यवहार करना चाहिए।

सरकार्यवाह श्री भैय्या जी जोशी का श्रीलंका के तमिल पीड़ितों की समस्याओं पर वक्तव्य



सरकार्यवाह श्री भैय्या जी जोशी का श्रीलंका के तमिल पीड़ितों की समस्याओं पर वक्तव्य
16 मार्च, 2013। जामडोली, जयपुर।

                गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यू.एन.एच.आर.सी.) की जेनेवा बैठक से ठीक पहले हमने यह वक्तव्य प्रसारित किया था कि श्रीलंका सरकार को अपने देश के तमिलों की समस्याओं का समाधान करने के लिए सक्रियतापूर्वक कदम उठा उनके उचित पुनर्वास, सुरक्षा एवं राजनैतिक अधिकारों को भी सुनिश्चित करे। मैं आज यह कहने को बाध्य हूँ कि एक वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी धरातल पर स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। इस कारण से वैश्विक जगत का श्रीलंका सरकार की मंशाओं के प्रति संदेह और गहरा हो गया है।
                मैं इस अवसर पर श्रीलंका सरकार को यह पुनर्स्मरण कराना चाहता हूँ कि वह 30 वर्ष के लिट्टे (एल.टी.टी.ई.) एवं श्रीलंका सुरक्षा बलों के मध्य हुए संघर्ष के परिणामस्वरूप हुई तमिलों की दुर्दशा पर आँख मुंदकर नहीं बैठ सकती, जिन्हें इस कारण अपने जीवन, रोजगार, घरों और मंदिरों को भी खोना पड़ा। एक लाख से अधिक तमिल आज अपने देश से पलायन कर तमिलनाडु के समुद्री किनारों पर शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं।
                 हमारा यह सुनिश्चित मत है कि श्रीलंका में स्थायी शांति तभी संभव है जब उस देश की सरकार उत्तरी एवं पूर्वी प्रान्तों तथा भारत में रहने वाले तमिल शरणार्थियों की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक एवं पर्याप्त रूप से ध्यान दे। हम भारत सरकार से यह आग्रह करते हैं कि वह यह सुनिश्चित करे कि श्रीलंका सरकार विस्थापित तमिलों के पुनर्वास तथा उन्हें पूर्ण नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रदान करने के लिए जिम्मेदारीपूर्वक व्यवहार करे।
                हमें ध्यान रखना ही होगा कि हिन्द महासागर क्षेत्र में स्थित यह पडोसी द्वीप, जिसके भारतवर्ष से हजारों वर्ष पुराने रिश्ते है,कहीं वैश्विक शक्तियों के भू-सामरिक खेल का मोहरा बन कर हिन्द महासागर का युद्ध क्षेत्र न बन जाए। उस देश के सिंहली व तमिलों के बीच की खाई को ओर अधिक बढाने के प्रयासों को सफल नहीं होने देना चाहिए। इसी में ही श्रीलंका के संकट का स्थायी हल निहित है। 

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

पत्रकारों से रूबरू होते माननीय दत्तात्रेय जी होस्बोले, सह सरकार्यवाह तथा माननीय नन्द कुमार जी सह अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख का विडियो देखने के लिए क्लीक करे

पत्रकारों से रूबरू  होते माननीय दत्तात्रेय जी  होस्बोले, सह सरकार्यवाह तथा माननीय नन्द कुमार जी     अखिल भारतीय प्सहरचार प्रमुख   का विडियो देखने के लिए क्लीक करे 
Press brief by Man Dattatrey ji Hosbole, Sah Sar KArywah & Manniya Nand Kumar ji , Akhil Bhartiya Sah Prachar Pramukh

पत्रकारों से रूबरू होते अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख माननीय डा. मनमोहन जी वैद्य का विडियो देखने के लिए क्लीक करे

पत्रकारों से रूबरू  होते अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख माननीय  डा. मनमोहन जी वैद्य  का विडियो देखने के लिए क्लीक करे    
ABPS-2013 First Press Brief 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखिल भारतीय प्रतिनिधी सभा की बैठक प्रारंभ

 

माननीय दत्तात्रेय जी होस्बोले एवं नन्द कुमार जी 


जयपुर 15 मार्च। अखिल भारतीय प्रतिनिधी सभा का उद्द्याटन प. पूज्य सरसंघचालक डाॅ. मोहनराव भागवत एवं सरकार्यवाह मा. भैय्या जी जोषी द्वारा भारत माता के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलन कर हुआ।

 उद्द्याटन सत्र के पश्चात् संवादाताओं को सम्बोधित करते हुए सह-सरकार्यवाह मा. दत्तात्रेय जी होसबोले ने कहा की अखिल भारतीय प्रतिनिधी सभा में 1395 प्रतिनिधी अपेक्षित है, सभा में संघ के गत वर्ष के कार्य की समीक्षा संख्यात्मक, गुणात्मक तथा प्रभावात्मक आधार पर की जायेगी तथा आगामी लक्ष्य निर्धारित किये जायेगे। उन्होनें बताया की विविध क्षेत्र में किये जा रहे कार्याे का लेखा जोखा भी प्रस्तुत किया जायेगा।

उन्होने बताया की गत वर्ष फिन्स (फोरम फार इन्टीग्रेटिड नेषनल सिक्योरिटी) द्वारा आयोजित सरहद को प्रणाम कार्यक्रम में देष के सुदुर क्षेत्रो के 6000 स्वयंसेवको ने देष की सीमाओं पर जाकर प्रत्यक्ष अनुभव किया की वहां की विपरीत परिस्थितियों में सैनिक किस प्रकार देष की रक्षा करते है, वहां रहने वाले सीमावर्ती गांवों के नागरिक किन परेषानीयों का सामना करते है।

उन्होने इस वर्ष स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं जयंती पर गठित सार्धषती समारोह समिति द्वारा देष भर में किये जाने वाले कार्यक्रमों की चर्चा करते हुए बताया कि 12 जनवरी 2013 को विवेकानन्द जी के जन्म दिवस पर शोभायात्रा के कार्यक्रमों में लाखो की संख्या में सभी आयु वर्ग व जाति बिरादरी के लोगो का सहभाग रहा। इससे समाज में भारतीयता, हिन्दूत्व का भाव प्रकट हुआ। 18 फरवरी 2013 को सामूहिक सूर्यनमस्कार में लगभग 2.5 करोड विद्यार्थियांे ने भाग लिया। जिसमें मुस्लिम व ईसाई विद्यार्थी भी शामिल थे। स्वामी विवेकानन्द जी का कथन ’स्वस्थ शरीर मेें स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है के अनुरक्ष में इस कार्यक्रम का आयोजन किया।

इस अवसर पर पारित होने वाले प्रस्ताव की जानकारी देते हुए कहा की भारत के विभाजन के 60 वर्ष पष्चात आज भी पष्चिमी पाकिस्तान व पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेष) से लाखों की संख्या में हिन्दू प्रताडित होकर भारत में शरण ले रहे है। उन्होनंे उनके जीवन के लिए आवष्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की दृष्टि से सरकार द्वारा आवष्यक ठोस नीति बनाई जाये। इस हेतु से एक प्रस्ताव विचारार्थ है।

देष की वर्तमान आर्थिक स्थिति, सुरक्षा, आतंकवाद, तुष्टीकरण व नदीयों की स्वच्छता, एकात्मता व पर्यावरण आदि विषयों पर सर कार्यवाह जी मूल प्रेस व्यक्तव्य जारी किया जाएगा। उन्होने देष में बढती हुई नारी उत्पीडन की घटनाओं पर चिन्ता व्यक्त करते हुए इसे अत्यन्त दुखद बताया।

अफजल गुरू के शव उसके परिजनों को सौंपे जाने के लिए पाकिस्तान की संसद में पारित प्रस्ताव की कड़े शब्दों में भत्र्सना करते हुए कहा कि यह भारत के आंतरिक मामलों में और भारत की सम्प्रभुता और सार्वभौमिकता पर सीधा हस्तक्षेप है। एक तरफ तो पाकिस्तान मुंबई आंतकी घटनाओं में शामिल अजमल कसाब और बारह पाकिस्तानी आतंकवादियों के शवों को लेने से मना करता है दूसरी ओर अफजल गुरू के मामले हस्तक्षेप करता है इससे पाकिस्तान का दोहरा चरित्र सामने आया है।

राममंदिर निर्माण के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इस मामले में देषभर के संत महात्मा और धर्माचार्यो ने महाकुंभ में संत सम्मेलन में मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराया है। उन्होंने कहा कि ढांचा गिरने के बाद बाबरी मस्जिद एक्षन कमेटी ने कहा था यदि यहां मंदिर था यह सिद्ध हो जाता है तो हम यह स्थान मंदिर के लिए छोड़ देंगे। अब तो हाईकोर्ट के निर्णय के बाद यह सिद्ध हो गया है कि वहां मंदिर था। ऐसे में सरकार को संसद में कानून बनाकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रषस्त करना चाहिए।

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा - कुछ दृश्य

 
  परम पूजनीय सरसंघचालक मोहन जी भागवत दीप प्रज्ज्वलित कर प्रतिनिधि सभा का शुभारम्भ करते हुए 

सह कार्यवाह माननीय भैय्या जी जोशी दीप प्रज्वल्लित करते हुए 
प्रतिनिधि सभा का एक दृश्य

प्रतिनिधि सभा का एक दृश्य 



मंच पर आसीन परम पूजनीय  सर संघचालक मोहन जी भागवत  तथा सह  कार्यवाह भय्या जी जोशी

Saturday, January 12, 2013

डा. भागवत के वक्तव्यों को ठीक तरह से पेश करें मीडिया : मनमोहन वैद्य

Source: NEWS BHARATI- HINDI      Date: 1/7/2013 4:36:03 PM
$img_titleपढ़िए डा.  भागवत के इन्दौर में दिए गएवक्तव्यों का प्रतिलेख
इन्दौर, जनवरी ७ , २०१३ : तथ्यों की छानबीन किये बिना सरसंघचालक डा. भागवत जी के वक्तव्यों पर विवाद खड़ा करने का प्रयास छोड़कर मीडिया उनके वक्तव्यों को सही तरह से पेश करें, ऐसा आवाहन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डा. मनमोहन वैद्य ने किया है।
डा. वैद्य ने कहा, "पिछले कुछ दिनों से परम पूजनीय सरसंघचालक जी के वक्तव्यों पर मीडिया द्वारा अवांछित विवाद चलाया जा रहा है। इसमें खेद की बात यह है कि कुछ चैनल तथा समाचार पत्र बिना तथ्यों की छानबीन किये अतिउत्साह तथा गैर जिम्मेदार ढंग से यह कर रहे हैं। पूजनीय सरसंघचालक जी का सिल्चर का वक्तव्य और विशेषतः इन्दौर के भाषण के परिपेक्ष्य में हुई चर्चा इसका उदाहरण हैं। मीडिया के मित्रों से निवेदन है कि बिना तथ्यों की छानबीन किये, उत्साह में इस प्रकार के अनुचित पत्रकारिता के व्यवहार से बचें।"
इस विवाद के चलते, सरसंघचालक डा. मोहनजी भागवत ने इन्दौर के कार्यक्रम में वास्तव में क्या कहा, यह जानने का प्रयास 'न्यूजभारती' ने किया। इन्दौर में परमानन्द योग थिरपी अस्पताल के अनावरण समारोह में सरसंघचालक डा. भागवत जी ने जो भाषण किया उसके कुछ (विवाद से संबंधित) अंशो का प्रतिलेख हम यहां दे रहे हैं।
$img_titleडा. भागवत ने कहा-"पिछले ३०० साल में, मनुष्य अपने विचारों के अहंकार में विचार करता गया| जो मैं कहता हूँ वही सत्य है ऐसा मानते गया। अहंकार इतना बढ़ गया उसका, कि उसने कहा कि अगर परमेश्वर भी है, तो उसको मेरे टेस्ट टयूब में उपस्थित होना पड़ेगा तभी मानूँगा।
पाश्चात्त्य समाजविचार तोड़ने वाला
तो ऐसी जब स्थिति आई तो विचार निकला की दुनिया क्या है, आत्मा परमात्मा बेकार की बात है, सब कुछ जड़ का खेल है। कोई एक हिग्ग्ज बोसों है, वो कणों को वस्तुमान प्रदान करता है, फिर ये कण आपस में टकराते हैं, कुछ मिल जाते हैं, कुछ बिखर जाते हैं, उसमें से ऊर्जा भी उत्पन्न होती है और उसमें से पदार्थ भी उत्पन्न हो जाते हैं। और इसका नियम कुछ नहीं, सम्बन्ध ही कुछ नहीं है| एक कण का दूसरे कण से कोई सम्बन्ध नहीं| इस सृष्टि में किसी का किसी से सम्बन्ध नहीं है, लाखो वर्षों से चली आ रही दुनिया, तो कहते हैं वो संबंधों की बात नहीं| वो स्वार्थ की बात है| ये एक सौदा है, theory of contract, theory of social contract, पत्नी से पति का सौदा तय हुआ है। इसको आप लोग विवाह संस्कार कहते होंगे, लेकिन वह सौदा है| तुम मेरा घर संभालो मुझे सुख दो, मैं तुम्हारे पेट पानी की व्यवस्था करूँगा और तुमको सुरक्षित रखूँगा। और इसलिए उसपर चलता है, और जब तक पत्नी ठीक है तब तक पति contract  के रूप में उसको रखता है, जब पत्नी contract पूर्ण नहीं कर सकती तो उसको छोड़ो। किसी कारण पति contract पूर्ण नहीं करता तो उसको छोड़ो। दूसरा contract करने वाला खोजो। ऐसे ही चलता है, सब बातों में सौदा है, अपने विनाश के भय के कारण दूसरों की रक्षा करना। पर्यावरण को शुद्ध रखो, नहीं तो क्या होगा? नहीं तो मनुष्य का विनाश हो जायेगा। मनुष्य का विनाश नहीं होता है तो पर्यावरण से कोई मतलब नहीं। इसलिये एक तरफ वृक्षारोपण के कार्यक्रम करना, दूसरी तरफ फैक्ट्री का मैला नदी में छोड़ना। दोनों काम एक साथ करना।
'सर्वे भद्राणि पश्यन्तु' क्यों? क्यों कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो बहुत संहार होगा, डर के मारे... और डर जादा चलता नहीं। इतना बड़ा सर्व समर्थ रशिया था, ७०- ७२ साल तक उसका डर चला, उसके बाद लोगों ने डरना छोड़ दिया। मरी हुई मुर्गी आग को क्यूँ डरेगी? इसलिए वो जो भयपूर्वक एक वैभव का दृश्य उत्पन्न किया था वो टिकता नहीं।
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अध्यात्माधारित भारतीय समाजविचार जोड़ने वाला

और भारत के विचार क्या कहते हैं इस मामले में? वो कहते हैं ऐसा नहीं है भाई, दुनिया संबंधों पर आधारित है| दिखता अलग है लेकिन सब एक हैं। यों कहो कि एक ही अनेक रूप में प्रगट हुआ है। इसलिए सब एक दूसरे से जुदा है। विश्व में कही पर घटित होने वाली अर्थहीन घटना भी, सारे विश्व के व्यापार पर कुछ न कुछ परिणाम करती है। अच्छी बातें हो गयी, अच्छे परिणाम होंगे। नहीं हुई, नहीं होंगे। किसी का विनाश हो रहा है तो वो तुम्हारा ही विनाश है। तुम उस से जुड़े हो; तुम उसी के अंग हो। मनुष्य हो; कोई सृष्टि के बाहर नहीं हो।
अपने चित्त में अभ्यासपूर्वक धीरे धीरे इस को देखना, समझना, उस से जुड़ना, जुड़कर उस के साथ ही रहने का अभ्यास करना। ऐसा व्यक्ति जो जुड़ने का प्रयास करता है और थोड़ा बहुत जुड़ता है, उस के ध्यान में आता है, कि सब मेरा ही है, सब मैं ही हूँ, तो फिर कौनसा कर्म कैसे करना इस में वो कुशल बन जाता है। जैसे गीता में कहा है, 'योग: कर्मसुकौशलम'। वो अपना भी जीवन सुख का करता है, लोगों का भी सुखकारक करता है। अपने विकास से सारी दुनिया का विकास करता है, सारी दुनिया के विकास से अपना विकास करता है। दुनिया में कोई संघर्ष नहीं रहता। दुनिया में कोई तृष्णा नहीं रहती। दुनिया से दुःख का परिहार हो जाता है। अपने यहाँ पर भारत में से जितनी भी विचारधाराएँ निकली हैं, सबने यही बताया है, शब्द अलग-अलग हैं ।"
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Friday, November 2, 2012

काशी में ‘सक्षम’ का पंचम राष्ट्रीय अधिवेशन सम्पन्न


विकलांग व्यक्ति परिवार और समाज पर बोझ नहीं: सुहास राव हिरेमठ

वाराणसी, 27 अक्टूबर। निवेदिता शिक्षा सदन के भाउÿराव देवरस सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख सुहासराव हिरेमठ ने सक्षम के पंचम राष्ट्रीय अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए कहा कि विकलांग व्यक्ति, परिवार और समाज पर बोझ नहीं है, यदि उसकी योग्यता, क्षमता व प्रतिभा के विकास का अवसर मिले तो वह स्वावलंबी बनकर राष्ट्र के पुर्ननिर्माण में योगदान कर सकता है।

उन्होंने कहा कि सेवा में बड़ी शक्ति है। शारीरिक सक्षमता का होना अपने हाथ में नहीं है यह भगवान के हाथ में है। अन्तःकरण से समाज को जगाना सक्षम का कार्य हजै। व्यक्ति को बुद्धि, मर्यादा और व्यवहार से जीवन दृष्टि आती है। जो दूसरों के दुःख से द्रवित हो, वही महात्मा है। समाज दुःखी तो हम दुःखी, समाज सुःखी तो हम सुःखी उसी आस्था और भाव से हम सब कार्य करने वाले हैं। अन्त में उन्होंने विकलांगों के समायोजन की दिशा में समाज के लोगों से आगे आने का आह्वान किया।

समारोह के मुख्य अतिथि आरोग्य मन्दिर गोरखपुर के निदेशक डाॅ. विमल कुमार मोदी ने कहा कि संयमित दिनचर्या व खान-पान आरोग्य का मूलमंत्र है। उन्होंने सफेद खाद्य पदार्थों-चीनी, मैदा और नमक के कम उपयोग की सलाह दी। साथ ही दवाओं के अत्यधिक प्रयोग से बचने का भी सुझाव दिया।

अधिवेशन की विशिष्ट अतिथि रेखा सिंह चैहान ने कहा कि विकलांग को विकलांग कहने वाला स्वयं मानसिक रूप से विकलांग होता है आवश्यकता यह है कि यदि ग्राम पंचायत अक्षम लोगों के उन्नयन की जिम्मेदारी उठा लें तो विकलांगों की स्थिति में काफी सुधार हो सकता है।

शोभायात्रा: नेत्रदान हो संकल्प हमारा

गत 28 अक्टूबर को सायंकाल अधिवेशन मे आये प्रतिनिधियों की शोभायात्रा निकाली गयी जो निवेदिता, महमूरगंज, सिगरा तथा रथयात्रा होते हुए अधिवेशन स्थल पर समाप्त हुई । इस शोभायात्रा में प्रतिनिधियों के नारे लोगों के आकर्षण के केन्द्र में रहे- जीते-जीते रक्तदान, जाते-जाते नेत्रदान, क्या आप मरने के बाद दुनिया देखना चाहते हैं। नेत्रदान करें और करवायें। तुच्छदान है हीरे-मोती-श्रेष्ठ दान है नत्र ज्योति। नया है सबेरा नया है, गीत नेत्रदान हो सबकी रीत। शरीर है नश्वर अमर है आत्मा, नेत्रदान से मिलता परमात्मा। हम सबका ये नारा है, नेत्रदान हो संकल्प हमारा, नेत्रदान को अपने परिवार की परंपरा बनाएं स्वतः नेत्रदान करें और दूसरों को प्रेरित करें, नेत्रदान का संकल्प लें दृष्टि का उपहार दें। नेत्रदान के लिए यह शोभायात्रा निश्चित रूप से समाज को नया सन्देश देगा।

समापन: विकलांगों के नाम पर भ्रष्टाचार करने वालों को दण्डित किया जाय

गत 29 अक्टूबर को पंचम अधिवेशन के समापन अवसर पर सक्षम के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. मिलिन्द कसबेकर ने कहा कि विकलांग केवल गलत सोच नहीं है बल्कि यह भ्रामक कल्पना है। महगाई की मार सबसे अधिक विकलांगों पर पड़ रही है। आज वर्तमान स्थिति ऐसी है जिसमें विकलांगों के जीवन-मरण का प्रश्न है। एक समय लखपति, करोड़पति का जबाना था, अब अरबपति और खरबपति का जबाना है। जिसमें लाखों करोड़ रूपये का घोटाला दिन-प्रतिदिन सामने आ रहा है।

अपने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कसबेकर ने कहा कि सक्षम की गतिविधियां आन लाईन है। विकलांगों को नौकरी की जानकारी दी जाय। अपने-अपने प्रान्तों में विकलांगों के हित में कार्य करने वाले संगठनों की सूची बनायी जाय। जरूरत मंद विकलांगों को नौकरी देने में मदद किया जाय। काशी में स्थित हनुमान प्रसाद पोद्वार अन्धविद्यालय की बड़ी ख्याति है। काशी में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करायी जाय।

सक्षम के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डाॅ. कमलेश ने कहा कि ‘सक्षम’ (समदृष्टि क्षमता विकास एवं अनुसंधान मण्डल) राष्ट्रीय संगठन है जो विकालांगों के विकास लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन एवं सामाजिक विकास का कार्य कर रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देशभर में प्रतिवर्ष औसतन एक करोड़ लोगों की स्वभाविक मौत होती है। इनसे नेत्रदान के रूप में 35 हजार आंखें देश के 610 आईबैंकों को प्राप्त होती है। इन 35 में सिर्फ 14 हजार आंखों का ही प्रत्यारोपण हो पाता है। शेष आंखें बीमारियों से ग्रसित होती हैं, इसलिए उनका प्रत्यारोपण नहीं हो पाता है। समदृष्टि क्षमता विकास एवं अनुसंधान मंडल (सक्षम) ने तय किया है कि नेत्रों की सुरक्षा और नेत्रदान के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए देश में व्यापक प्रयास किए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि संगठन द्वारा चलाये जा रहे कार्यों की समीक्षा एवं भावी योजना बनाने के लिए अधिवेशन किया जाता है। काशी में सम्पन्न ‘सक्षम’ के पंचम राष्ट्रीय अधिवेशन में सरकार से तीन मांगों को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया-

1. विकालांगों को उनके आबादी के अनुसार मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करायी जाय।

2. विधान सभा, राज्यसभा और लोकसभा में विकलांग बन्धुओं का भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करायी जाय।

3. विकलांगों को सहायता देने के नामपर भ्रष्टाचार करने वाली संस्थाओं को चिन्हित कर काली सूची में डाला जाय और जिम्मेदार लोगों को दण्डित किया जाय।

सक्षम के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीरामजी अग्रवाल ने संगठन की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस समय 33 प्रान्तों के 104 जिलों में सक्षम की इकाईयां गठित हो चुकी हैं। इनमें यूपी के 32 जिले शामिल हैं। ‘सक्षम’ देश भर में 18 नेत्र बैंकों के जरिए 56 स्थानों पर नेत्रदान शिविरों का आयोजन करता है। कार्यक्रम के अतिथियों का परिचय अधिवेशन संयोजक यशोवर्धन त्रिपाठी एवं संचालन डाॅ. दयाल सिंह पवान ने किया। रमेश सावंत वन्देमातरम् से कार्यक्रम का समापन हुआ। इस वर्ष विकलांग सशक्तीकरण वर्ष मनाया जा रहा है अधिवेशन में लगभग 1000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। (प्रस्तुति: लोकनाथ, विसंकें, काशी)

Wednesday, October 24, 2012

विजयादशमी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक प.पू. सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन


   (बुधवार दिनांक 24 अक्तुबर 2012) के अवसर पर दिये गये उद्बोधन -


आज के दिन हमें स्व. सुदर्शन जी जैसे मार्गदर्शकों का बहुत स्मरण हो रहा है। विजययात्रा में बिछुड़े हुये वीरों की स्मृतियॉं आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। विजयादशमी विजय का पर्व है। संपूर्ण देश में इस पर्व को दानवता पर मानवता की, दुष्टता पर सज्जनता की विजय के रूप में मनाया जाता है। विजय का संकल्प लेकर, स्वयं के ही मन से निर्मित दुर्बल कल्पनाओं ने खींची हुई अपनी क्षमता व पुरुषार्थ की सीमाओं को लांघ कर पराक्रम का प्रारंभ करने के लिये यह दिन उपयुक्त माना जाता है। अपने देश के जनमानस को इस सीमोल्लंघन की आवश्यकता है, क्योंकि आज की दुविधा व जटिलतायुक्त परिस्थिति में से देश का उबरना देश की लोकशक्ति के बहुमुखी सामूहिक उद्यम से ही अवश्य संभव है। यह करने की हमारी क्षमता है इस बात को हम सबने स्वतंत्रता के बाद के 65 वर्षों में भी कई बार सिद्ध कर दिखाया है। विज्ञान, व्यापार, कला, क्रीड़ा आदि मनुष्य जीवन के सभी पहलुओं में, देश-विदेशों की स्पर्धा के वातावरण में, भारत की गुणवत्ता को सिद्ध करनेवाले वर्तमान कालीन उदाहरणों का होना अब एक सहज बात है। ऐसा होने पर भी सद्य परिस्थिति के कारण संपूर्ण देश में जनमानस भविष्य को लेकर आशंकित, चिन्तित व कहीं-कहीं निराश भी है। पिछले वर्षभर की घटनाओं ने तो उन चिन्ताओं को और गहरा कर दिया है। देश की अंतर्गत व सीमान्त सुरक्षा का परिदृश्य पूर्णत: आश्व स्त करनेवाला नहीं है। हमारे सैन्य-बलों को अपनी भूमि की सुरक्षा के लिये आवश्यक अद्ययावत शस्त्र, अस्त्र, तंत्र व साधनों की आपूर्ति, उनके सीमास्थित मोर्चों तक साधन व अन्य रसद पहुँचाने के लिये उचित रास्ते, वाहन, संदेश वाहन आदि का जाल आदि सभी बातों की कमियों को शीघ्रातिशीघ्र दूर करने की तत्परता उन प्रयासों में दिखनी चाहिए। इसके विपरीत, सैन्यबलों के मनोबल पर आघात हो इस प्रकार, सेना अधिकारियों का कार्यकाल आदि छोटी तांत्रिक बातों को बिनाकारण तूल देकर नीतियों व माध्यमोें द्वारा अनिष्ट चर्चा का विषय बनाया गया हुआ हमने देखा है। सुरक्षा से संबंधित सभी वस्तुओं के उत्पादन में स्वावलंबी बनने की दिशा अपनी नीति में होनी चाहिए। सुरक्षा सूचना तंत्र में अभी भी तत्परता, क्षमता व समन्वय के अभाव को दूर कर उसको मजबूत करने की आवश्यकता 
ध्यान में आती है। हमारी भूमिसीमा एवं सीमा अर्न्तगत द्वीपों सहित सीमा क्षेत्र का प्रबन्धन पक्का करने व रखने की पहली आवश्यकता है। देश की सीमाओं की सुरक्षा, उनके सामरिक प्रबंध व रक्षण व्यवस्था के साथ-साथ, सुरक्षा की दृष्टि से अपने अंतरराष्ट्रीय राजनय के प्रयोग-विनियोग पर भी आजकल निर्भर होती है। उस दृष्टि से कुछ वर्ष पूर्व से एक बहुप्रतीक्षित नयी व सही दिशा की घोषणा "Look East Policy" नामक वाक्यप्रयोग से शासन के उच्चाधिकारियों से हुयी थी। दक्षिण पूर्व एशिया के सभी देशों में इस सत्य की जानकारी व मान्यता है कि भारत तथा उनके राष्ट्रजीवन के बुनियादी मूल्य समान है, निकट इतिहास के काल तक व कुछ अभी भी सांस्द्भतिक तथा व्यापारिक दृष्टि से उनसे हमारा आदान-प्रदान का घनिष्ट संबंध रहा है। इस दृष्टि से यह ठीक ही हुआ कि हमने इन सभी देशों से अपने सहयोगी व मित्रतापूर्ण संबंधों को फिर से दृढ़ बनाने का सुनिश्च य किया। वहां के लोग भी यह चाहते हैं। परन्तु घोषणा कितनी व किस गति से द्भति में आ रही है इसका हिसाब वहां और यहां भी आशादायक चित्र नहीं पैदा करता। इस क्षेत्र में हमसे पहले हमारा स्पर्धक बनकर चीन दल-बल सहित उतरा है यह बात ध्यान में लेते है तो यह गतिहीनता चिन्ता को और गंभीर बनाती है। अपनी आण्विक तकनीकी पाकिस्तान को देने तक उसने पाकिस्तान से दोस्ती बना ली है यह हम अब जानते हैं ही। नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका ऐसे निकटवर्ती देशों में भी चीन का इस दृष्टि से हमारे आगे जाना सुरक्षा की दृष्टि से हमारे लिये क्या अर्थ रखता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इन सभी क्षेत्रों में भारतीय मूल के लोग भी बड़ी मात्रा में बसते हैं, उन के हितों की रक्षा करते हुये इन हमारे परम्परागत स्वाभाविक मित्र देशों को साथ में रखने की व उन के साथ रहने की दृष्टि हमारे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी होनी चाहिये।
परन्तु राष्ट्र का हित हमारी नीति का लक्ष्य है कि नहीं यह प्रश्न  मन में उत्पन्न हो ऐसी घटनाएँ पिछले कुछ वर्षों में हमारे अपने शासन-प्रशासन के समर्थन से घटती हुई सम्पूर्ण जनमानस के घोर चिन्ता का कारण बनी है। जम्मू-कश्मीर की समस्या के बारे में पिछले दस वर्षों से चली नीति के कारण वहां उग्रवादी गतिविधियों के पुनरोदय के चिन्ह दिखायी दे रहे हैं। पाकिस्तान के अवैध कैंजे से कश्मीर घाटी के भूभाग को मुक्त करना; जम्मू, लेह-लद्दाख व घाटी के प्रशासन व विकास के भेदभाव को समाप्त करते हुये शेष भारत के साथ उस राज्य के सात्मीकरण की प्रक्रिया को गति से पूर्ण करना; घाटी से विस्थापित हिंदू पुनश्चक ससम्मान सुरक्षित अपनी भूमि पर बसने की स्थिति उत्पन्न करना; विभाजन के समय भारत में आये विस्थापितों को राज्य में नागरिक अधिकार प्राप्त होना आदि न्याय्य जनाकांक्षा के विपरित वहां की स्थिति को अधिक जटिल बनाने का ही कार्य चल रहा है। राज्य व केन्द्र के शासनारूढ़ दलों के सत्ता स्वार्थ के कारण राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करना व विदेशी दबावों में झुकने का क्रम पूर्ववत चल रहा है। इतिहास के क्रम में राष्ट्रीय वृत्ति की हिन्दू जनसंख्या क्रमश: घटने के कारण देश के उत्तर भूभाग में उत्पन्न हुयी व बढ़ती गयी इस समस्यापूर्ण स्थिति से हमने कोई पाठ नहीं पढ़ा है ऐसा देश के पूर्व दिशा के भूभाग की स्थिति देखकर लगता है। असम व बंगाल की सच्छिद्र सीमा से होनेवाली घुसपैठ व शस्त्रास्त्र, नशीले पदार्थ, बनावटी पैसा आदि की तस्करी के बारे में हम बहुत वर्षों से चेतावनियॉं दे रहे थे। देश की गुप्तचर संस्थाएँ, उच्च व सर्वोच्च न्यायालय, राज्यों के राज्यपालों तक ने समय-समय पर खतरे की घंटियॉं बजायी थीं। न्यायालयों से शासन के लिये आदेश भी दिये गये थे। परंतु उन सबकी अनदेखी करते हुये सत्ता के लिये लांगूलचालन की नीति चली, स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टि के अभाव में गलत निर्णय हुये व ईशान्य भारत में संकट का विकराल रूप खड़ा हुआ सबके सामने है। घुसपैठ के कारण वहॉं पैदा हुआ जनसंख्या असंतुलन वहॉं के राष्ट्रीय जनसंख्या को अल्पमत में लाकर संपूर्ण देश में अपने हाथ पैर फैला रहा है। व्यापक मतांतरण के साये में वहां पर फैले अलगाववादी उग्रवाद की विषवेल को दब्बू नीतियॉं बार-बार संजीवनी प्रदान करती है। उत्तर सीमापर आ धड़की चीन की विस्तारवादी नीति का हस्तक्षेप भी होने की भनक वहॉं पर लगी है। विश्वी की “अल कायदा” जैसी कट्टरपंथी ताकतें भी उस परिस्थिति का लाभ लेकर वहॉं चंचुप्रवेश करना चाह रही है। ऐसी स्थिति में अपने सशस्त्र बलों की समर्थ उपस्थिति व परिस्थिति की प्रतिकार में उभरा जनता का दृढ़ मनोबल ही राष्ट्र की भूमि व जन की सुरक्षा के आधार के रूप में बचे हैं। समय रहते हम नीतियों में अविलम्ब सुधार करें। ईशान्य भारत में तथा भारत के अन्य राज्यों में भी घुसपैठियों की पहचान त्वरित करते हुये तथा मतदाता सुची सहित (राशन पत्र, पहचान पत्र आदि) अन्य प्रपत्रों से इन अवैध नागरिकों के नाम बाहर कर देने चाहिये व विदेशी घुसपैठियों को भारत के बाहर भेजने के प्रबंध करने चाहिये। विदेशी घुसपैठियों के पहचान के काम में किसी प्रकार का गड़बड़झाला न हो यह दक्षता बरती जानी चाहिये। सीमाओं की सुरक्षा के तारबंदी आदि के दृढ़ प्रबंध व रक्षण व्यवस्था में अधिक सजगता से चौकसी बरतने के उपाय अविलम्ब किये जाने चाहिये। राष्ट्रीय नागरिक पंजी (National Register of Citizens) को न्यायालयों द्वारा स्पष्ट रूप से निर्देशित, जन्मस्थल, माता-पिता के स्थान अथवा मातामहों-पितामहों के स्थानों के पुख्ता प्रमाणों के आधार पर तैयार करना चाहिए। ईशान्य भारत के क्षेत्र में व अन्यत्र भी यह पूर्व का अनुभव है कि जनमत के व न्यायालय के आदेशों के दबाव में विदेशी नागरिकों अथवा संशयास्पद मतदाताओं ( D voters) की  पहचान करने का दिखावा जब-जब प्रशासन या शासन करने गया तब-तब बंगलादेशी घुसपैठियों को तो उसने छोड़ दिया व वहॉं से पीड़ित कर निकाले गये व अब भारत में अनेक वर्षों से बसाये गये निरुपद्रवी व निरीह हिन्दुओं पर ही उनकी गाज गिरी।
हम सभी को यह स्पष्ट रूप से समझना व स्वीकार करना चाहिए कि विश्वओभर के हिन्दू समाज के लिये पितृ-भू व पुण्य-भू के रूप में केवल भारत-जो परम्परा से हिन्दुस्थान होने से ही भारत कहलाता है, हिन्दू अल्पसंख्यक अथवा निष्प्रभावी होने से जिसके भू-भागों का नाम तक बदल जाता है- ही है। पीड़ित होकर गृहभूमि से निकाले जाने पर आश्रय के रूप में उसको दूसरा देश नहीं है। अतएव कहीं से भी आश्रयार्थी होकर आनेवाले हिन्दू को विदेशी नहीं मानना चाहिये। सिंध से भारत में हाल में ही आये आश्रयार्थी हो अथवा बंगलादेश से आकर बसे हों, अत्याचारों के कारण भारत में अनिच्छापूर्वक धकेले गये विस्थापित हिन्दुओं को हिन्दुस्थान भारत में सस्नेह व ससम्मान आश्रय मिलना ही चाहिये। भारतीय शासन का यह कर्तव्य बनता है वह विश्व्भर के हिन्दुओं के हितों का रक्षण करने में अपनी अपेक्षित भूमिका का तत्परता व दृढ़ता से निर्वाह करें। इस सारे घटनाक्रम का एक और गंभीर पहलू है कि विदेशी घुसपैठियों की इस अवैध कारवाई को केवल वे अपने संप्रदाय के है इसलिये कहीं पर कुछ तत्त्वों ने उनके समर्थन का वातावरण बनाने का प्रयास किया। शिक्षा अथवा कमाई के लिये भारत में अन्यत्र बसे ईशान्य भारत के लोगों को धमकाया गया। मुंबई के आजाद मैदान की घटना प्रसिद्ध है। म्यांमार के शासन द्वारा वहां के रोहिंगियाओं पर हुयी कार्यवाही का निषेध भारत में जवान ज्योति का अपमान करने में गर्व महसूस करनेवाली भारत विरोधी ताकतों को अंदर से समर्थन देनेवाले तत्त्व अभी भी देश में विद्यमान है यह संदेश साफ है।
      “ यह चिन्ता, क्षोभ व ग्लानी का विषय है कि देश हित के विपरित नीति का प्रशासन द्वारा प्रदर्शन हुआ व राष्ट्र विरोधी पंचमस्तम्भियों के बढ़े हुये साहस के परिणाम स्वरूप उन तत्त्वों द्वारा कानून व शासन का उद्दंड अपमान हुआ। सब सामर्थ्य होने के बाद भी तंत्र को पंगु बनाकर देश विरोधी तत्त्वों को खुला खेल खेलने देने की नीति चलाने वाले लोग दुर्भाग्य से स्वतंत्र देश के अपने ही लोग हैं। समाज में राष्ट्रीय मनोवृति को बढ़ावा देना तो दूर हमारे अपने हिन्दुस्थान में ही मतों के स्वार्थ से, कट्टरता व अलगाव से अथवा विद्वेषी मनोवृत्ति के कारण पिछले दस वर्षों में हिन्दू समाज का तेजोभंग व बल हानि करने के नीतिगत कुप्रयास व छल-कपट बढ़ते हुये दिखाई दे रहे हैं। हमारे परमश्रद्धेय आचार्यों पर मनगढंत आरोप लगाकर उनकी अप्रतिष्ठा के ओछे प्रयास हुये। वनवासियों की सेवा करने वाले स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की षडयन्त्रपूर्वक हत्या की गयी, वास्तविक अपराधी अभी तक पकड़े नहीं गये। हिन्दू मन्दिरों की अधिग्रहीत संपत्ति का अपहार व अप-प्रयोग धड़ल्ले से चल रहा है, संशय व आरोपों का वातावरण, निर्माण किया गया, हिंदू संतों द्वारा निर्मित न्यासों व तिरुअनन्तपुरम् के पद्मनाभ स्वामी मंदिर जैसे मंदिरों की संपत्ति के बारे में हिन्दू समाज की मान्यताओं, श्रेष्ठ परंपरा व संस्कारों को कलुषित अथवा नष्ट करनेवाला वातावरण निर्माण करनेवाले विषय जानबूझकर समाज में उछाले गये। बहुसंख्य व उदारमनस्क होते हुये भी हिन्दुसमाज की अकारण बदनामी कर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले कानून लाने का प्रयास तो अभी भी चल रहा है। प्रजातंत्र, पंथनिरपेक्षता व संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का दावा करने वाले ही मतों के लालच में तथाकथित अल्पसंख्यकों का राष्ट्र की संपत्ति पर पहला हक बताकर साम्प्रदायिक आधार पर आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं। लव जिहाद व मतांतरण जैसी गतिविधियों द्वारा हिन्दू समाज पर प्रच्छन्न आक्रमण करनेवाली प्रवृत्तियों से ही राजनीतिक साठगांठ की जाती है। फलस्वरूप इस देश के परम्परागत रहिवासी बहुसंख्यक राष्ट्रीयमूल्यक स्वभाव व आचरण का निधान बनकर रहने वाले हिन्दू समाज के मन में यह प्रश्नक उठ रहा है कि हमारे लिए बोलनेवाला व हमारा प्रतिनिधित्व करनेवाला नेतृत्व इस देश में अस्तित्व में है कि नहीं?” 
। हिन्दुत्व व हिन्दुस्थान को मिटाना चाहनेवाली दुनिया की एकाधिकारवादी, जड़वादी व कट्टरपंथी ताकतों तथा हमारे राज्यों के व केन्द्र के शासन में घुसी मतलोलुप अवसरवादी प्रवृत्तियों के गठबंधन के षडयंत्र के द्वारा और एक सौहार्दविरोधी कार्य करने का प्रयास हो रहा है। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर परिसर के निकट विस्तृत जमीन अधिग्रहीत कर वहां पर मुसलमानों के लिये कोई बड़ा निर्माण करने के प्रयास चल रहे हैं ऐसे समाचार प्राप्त हो रहे हैं। जब अयोध्या में राममंदिर निर्माण का प्रकरण न्यायालय में है तब ऐसी हरकतों के द्वारा समाज की भावनाओं से खिलवाड़ सांप्रदायिक सौहार्द का नुकसान ही करेगी। 30 सितंबर 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को ध्यान में लेते हुए वास्तव में हमारी संसद के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र भव्य मंदिर के निर्माण की अनुमति रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास को देनेवाला कानून बने व अयोध्या की सांस्द्भतिक सीमा के बाहर ही मुसलमानों के लिये किसी स्थान के निर्माण की अनुमति हो यही इस विवाद में घुसी राजनीति को बाहर कर विवाद को सदा के लिये संतोष व सौहार्दजनक ढंग से सुलझाने का एकमात्र उपाय है। परंतु देश की राजनीति में आज जो वातावरण है वह उसके देशहितपरक, समाजसौहार्दपरक होने की छवि उत्पन्न नहीं करता। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के माध्यम से बड़ी विदेशी कंपनियों का खुदरा व्यापार में आना विश्वर में कहीं पर भी अच्छे अनुभव नहीं दे रहा है। ऐसे में खुदरा व्यापार तथा बीमा व पेंशन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाना हमें लाभ पहुँचाने के बजाय अंततोगत्वा छोटे व्यापारियों के लिये बेरोजगारी, किसानों के लिये अपने उत्पादों का कम मूल्य मिलने की मजबूरी तथा ग्राहकों के लिये अधिक मंहगाई ही पैदा करेगा। साथ ही अपनी खाद्यान्न सुरक्षा के लिये भी खतरा बढ़ेगा। देश की प्राद्भतिक संपदा की अवैध लूट तथा विकास के नामपर जैव विविधता व पर्यावरण के साथ ही उनपर निर्भर लोगों को बेरोजगारी से लेकर तो विस्थापन तक समस्याओं के भेट चढ़ाना अनिर्बाध रूप से चल ही रहा है। देश के एक छोटे वर्गमात्र की उन्नति को जनता की आर्थिक प्रगति का नाम देकर हम जिस तेज विकास दर की डींग हांकते थे वह भी आज 9 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक नीचे आ गया है। संपूर्ण देश नित्य बढ़ती महंगाई से त्रस्त है। अमीर और गरीब के बीच लगातार बढ़ते जा रहे अन्तर में विषमता की समस्या को और अधिक भयावह बना दिया है। न जाने किस भय से हड़बड़ी में इतने सारे अधपके कानून बिना सोच-विचार-चर्चा के लाये जा रहे हैं। इन तथाकथित “सुधारों” के बजाय में जहॉं वास्तविक सुधारों की आवश्यकता है उन क्षेत्रों में-चुनाव प्रणाली, करप्रणाली, आर्थिक निगरानी की व्यवस्था, शिक्षा नीति, सूचना अधिकार कानून के नियम- सुधार की मॉंगों की अनदेखी व दमन भी हो रहा है। अधूरे चिन्तन के आधार पर विश्व  में आज प्रचलित विकास की पद्धति व दिशा ही ऐसी है कि उससे यही परिणाम सर्वत्र मिलते हैं। ऊपर से अब यह पद्धति धनपति बहुराष्ट्रीय प्रतिष्ठानों के खेलों से उन्हीं के लिये अनुकूल बनाकर चलायी जाती है। हम जब तक अपनी समग्र व एकात्म दृष्टि के दृढ़ आधार पर जीवन के सब आयामों के लिये, अपनी क्षमता, आवश्यकता व संसाधनों के अनुरूप व्यवस्थाओं के नये कालसुसंगत प्रतिमान विकसित नहीं करेंगे तबतक न भारत को सभी को फलदायी होनेवाला संतुलित विकास व प्रगति उपलब्ध होगी न अधूरे विसंवादी जीवन से दुनिया को मुक्ति मिलेगी। चिन्तन के अधूरेपन के परिणामों को अपने देश में राष्ट्रीय व व्यक्तिगत शील के अभाव ने बहुत पीड़ादायक व गहरा बना दिया है। मन को सुन्न करनेवाले भ्रष्टाचार-प्रकरणों के उद्‌घाटनों का तांता अभी भी थम नहीं रहा है। भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाने के, कालाधन वापस देश में लाने के, भ्रष्टाचार को रोकनेवाली नयी कड़ी व्यवस्था बनाने के लिये छोटे-बड़े आंदोलनों का प्रादुर्भाव भी हुआ है। संघ के अनेक स्वयंसेवक भी इन आंदोलनों में सहभागी हैं। परन्तु भ्रष्टाचार का उद्गम शील के अभाव में है यह समझकर संघ अपने चरित्रनिर्माण के कार्य पर ही केन्द्रित रहेगा। लोगों में निराशा व व्यवस्था के प्रति अश्रद्धा न आने देते हुये व्यवस्था परिवर्तन की बात कहनी पड़ेगी अन्यथा मध्यपूर्व के देशों में अराजकता सदृश स्थिति उत्पन्न कर जैसे कट्टरपंथी व विदेशी ताकतों ने अपना उल्लू सीधा कर लिया वैसे होने की संभावना नकारी नहीं जा सकती। अराजनैतिक सामाजिक दबाव का व्यापक व दृढ़ परन्तु व्यवस्थित स्वरूप ही भ्रष्टाचार उन्मूलन का उपाय बनेगा। उसके फलीभूत होने के लिये हमें व्यापक तौर पर शिक्षाप्रणाली, प्रशासनपद्धति तथा चुनावतंत्र के सुधार की बात आगे बढ़ानी होगी। तथा व्यापक सामाजिक चिन्तन-मंथन के द्वारा हमारी व्यवस्थाओं के मूलगामी व दूरगामी परिवर्तन की बात सोचनी पड़ेगी। अधूरी क्षतिकारक व्यवस्था के पीछे केवल वह प्रचलित है इसलिये आँख मूंद कर जाने के परिणाम समाज जीवन में ध्यान में आ रहे है। बढ़ता हुआ जातिगत अभिनिवेश व विद्वेष, पिछड़े एवं वंचित वर्ग के शोषण व उत्पीड़न की समस्या, नैतिक मूल्यों के ह्‌रास के कारण शिक्षित वर्ग सहित सामान्य समाज में बढती हुई महिला उत्पीडन, बलात्कार, कन्या भू्रणहत्या, स्वच्छन्द यौनाचार ,हत्याएँ व आत्महत्याएँ , परिवारों का विघटन, व्यसनाधीनता की बढती प्रवृत्ति, अकेलापन के परिणाम स्वरूप तनावग्रस्त जीवन आदि हमारे देश में न दिखी अथवा अत्यल्प प्रमाण वाली घटनाएँ अब बढ़ते प्रमाण में दृग्गोचर हो रही है। हमें अपने शाश्वलत मूल्यों के आधार पर समाज के नवरचना की काल सुसंगत व्यवस्था भी सोचनी पड़ेगी।

अतएव सारा उत्तरदायित्व राजनीति, शासन, प्रशासन पर डालकर हम सब दोषमुक्त भी नहीं हो सकते। अपने घरों से लेकर सामाजिक वातावरण तक क्या हम स्वच्छता, व्यवस्थितता, अनुशासन, व्यवहार की भद्रता व शुचिता, संवेदनशीलता आदि सुदृढ़ राष्ट्रजीवन की अनिवार्य व्यवहारिक बातों का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं? सब परिवर्तनों का प्रारम्भ हमारे अपने जीवन के दृष्टिकोण व आचरण के प्रारंभ से होता है यह भूल जाने से, मात्र आंदोलनों से काम बननेवाला नहीं है। स्व. महात्मा गांधी जी ने 1922 के Young India के एक अंक में सात सामाजिक पापों का उल्लेख किया था। वे थे। Politics without Principles Wealth without Work pleasure without Conscience तत्त्वहीन राजनीतिश्रमविना संपत्तिविवेकहीन उपभोग शील Knowledge without Character Commerce without Morality Science Without Humanity Worship without Sacrifice विना ज्ञाननीतिहीन व्यापारमानवता विना विज्ञानसमर्पणरहित पूजा आज के अपने देश के सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य का ही यह वर्णन लगता है। ऐसी परिस्थिति में समाज की सज्जनशक्ति को ही समाज में तथा समाज को साथ लेकर उद्यम करना पड़ता है। इस चुनौति को हमें स्वीकार कर आगे बढ़ना ही पड़ेगा। भारतीय नवोत्थान के जिन उद्गाताओं से प्रेरणा लेकर स्व. महात्मा जी जैसे गरिमावान लोग काम कर रहे थे उनमें एक स्वामी विवेकानन्द थे। उनके सार्ध जन्मशती के कार्यक्रम आनेवाले दिनों में प्रारंभ होने जा रहे हैं। उनके संदेश को हमें चरितार्थ करना होगा। निर्भय होकर, स्वगौरव व आत्मविश्वाउस के साथ, विशुद्ध शील की साधना करनी होगी। कठोर निष्काम परिश्रम से जनों में जनार्दन का दर्शन करते हुए नि:स्वार्थ सेवा का कठोर परिश्रम करना पड़ेगा धर्मप्राण भारत को जगाना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य इन सब गुणों से युक्त व्यक्तियों के निर्माण का कार्य है। यह कार्य समय की अनिवार्य आवश्यकता है। आप सभी का प्रत्यक्ष सहभाग इसमें होना ही पड़ेगा। निरंतर साधना व कठोर परिश्रम से समाज अभिमंत्रित होकर संगठित उद्यम के लिये खड़ा होगा तब सब बाधाओं को चीरकर सागर की ओर बढ़नेवाली गंगा के समान राष्ट्र का भाग्यसूर्य भी उदयाचल से शिखर की ओर कूच करना प्रारम्भ करेगा। अतएव स्वामीजी के शब्दों में “उठो जागो व तबतक बिना रूके परिश्रम करते रहो जबतक तुम अपने लक्ष्य को नहीं पा लोगे।” उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्यवरान्निबोधत!!!
- भारत माता की जय -

Wednesday, October 3, 2012

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुपहल्ली सीतारमैय्या सुदर्शन की अस्थियां गुरूवार को वैदिक मंत्रों के साथ गंगा-यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में विसर्जित






पूर्व सरसंघचालक की अस्थियां संगम में विसर्जित इलाहाबाद 27 सितम्बर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुपहल्ली सीतारमैय्या सुदर्शन की अस्थियां गुरूवार को वैदिक मंत्रों के साथ गंगा-यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दी गयी। इस अवसर पर संघ परिवार से जुड़े पूरे राज्य के वरिष्ठ पदाधिकारी एवं भाजपा नेता भारी संख्या में संगम तट पर मौजूद रहे। अस्थियों को विसर्जित करने के लिए संगम स्थल पर बांस और तख्त का एक विशेष मंच बनाया गया था जहां संघ मुख्यालय नागपुर के प्रचारक सुनील नियाड़े व संघ के अन्य पदाधिकारी स्टीमर से अस्थि कलश लेकर पहुंचे। संगम में अस्थियों को प्रवाहित करने से पहले वैदिक विद्वानों एवं आचार्यों द्वारा आवश्यक पूजन की प्रक्रिया भी पूरी की गयी। इससे पहले पूर्व सरसंघचालक का अस्थि कलश ज्वाला देवी इण्टर कालेज से संगम तक एक सजे हुए विशेष वाहन से लाया गया। साथ में हजारों की संख्या में संघ परिवार के स्वयंसेवक और भारतीय जनता पार्टी के नेता व कार्यकर्ता अस्थि कलश के साथ चल रहे थे। श्री सुदर्शन का अस्थि कलश बुधवार शाम को नागपुर से सुनील नियाड़े लेकर यहां पहुंचे। अस्थि कलश को रात भर के लिए संघ के सिविल लाइंस कार्यालय पर रखा गया था। गुरूवार को प्रातः सात बजे ज्वाला देवी इण्टर कालेज में अस्थि कलश को लोगों के दर्शन एवं श्रद्धांजलि के लिए रखा गया था। स्वावलम्बन के पक्के पक्षधर थे सुदर्शन-डा.जोशी इलाहाबाद 27 सितम्बर (हि.स.)। भाजपा के वरिष्ठ नेता डा0 मुरली मनोहर जोशी का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुपहल्ली सीतारमैय्या सुदर्शन स्वावलम्बन के पक्के पक्षधर थे। वह व्यक्ति, समाज और देश में स्वावलम्बन की स्थिति कैसे आए इसके लिए भी सतत् चिन्तनशील रहते थे। आवश्यकता पड़ने पर लोगों का मार्गदर्शन भी करते थे। श्रद्धांजलि देते डा0 मुरली मनोहर जोशी डा0 जोशी गुरूवार को नगर के ज्वाला देवी इण्टर काॅलेज प्रांगण में केएस सुदर्शन की श्रद्धाजंलि सभा में बोल रहे थे। डा0 जोशी ने कहा कि पूर्व सरसंघचालक चाहते थे कि देश की अपनी भाषा और अपना विज्ञान हो। वह विज्ञान के अतिरिक्त कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग और ऊर्जा सभी क्षेत्र में देश को स्वावलम्बी देखना चाहते थे। वैकल्पिक ऊर्जा के वे प्रबल पक्षधर थे। पूर्व सरसंघचालक से अपने निकटतम संबंधों की चर्चा करते हुए देश के पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डा0 जोशी ने बताया कि जब वे केन्द्र में मंत्री थे श्री सुदर्शन उन्हें अक्सर शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुझाव देते रहते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गरिमामयी सरसंघचालक पद से हटने के बाद भी उनका कृषि के प्रति अटूट प्रेम नहीं हटा और वे भोपाल प्रवास के दौरान अपने छोटे से आवास के छत पर भी जैविक खेती का प्रयोग करते थे और यदि उनके पास कोई कृषि वैज्ञानिक पहुंचता था तो उसे वह उस खेती को दिखाकर यह कहना भी नहीं भूलते थे कि हमारे देश के किसान इस तरह की खेती करके भारतवर्ष को स्वावलम्बी बना सकते हैं। डा0 जोशी ने बताया कि श्री सुदर्शन अद्भुत राष्ट्रप्रेमी थे। शायद इसीलिए वे देश में हिन्दू और मुस्लिम समन्वय के प्रति सतत् चिन्तनशील रहे। साथ ही देश के सारे समाज को हिन्दुत्व की धारा से जोड़े रखना और उसके लिए सदैव प्रयत्नशील रखना श्री सुदर्शन के व्यक्तित्व का अनूठा लक्षण था। उ0प्र0 के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने उक्त अवसर पर कहा कि लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग का सहारा लेते हैं लेकिन श्री सुदर्शन के अन्दर इन तीनों का सम्मिश्रण विद्यमान था। यद्यपि उनके अन्दर कर्मयोग ज्यादा प्रधान था। श्री सिंह ने बताया कि पूर्व सरसंघचालक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विषयों पर जो भी चिन्तन प्रस्तुत करते थे वह सदैव मौलिक हुआ करता था। भारत की चुनाव प्रणाली भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हो, इसके वह प्रबल पक्षधर रहे। साथ ही श्री सुदर्शन अपने विचारों को बेबाक रूप से प्रस्तुत करते थे। संघ के क्षेत्र संघचालक ईश्वर चंद्र गुप्त एवं सह क्षेत्र संघचालक प्रो. देवेन्द्र प्रताप सिंह ने श्री सुदर्शन के साथ कार्य करने का अनुभव बांटा और बताया कि हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था। इसीलिए उनके सामने बात करते वक्त हम सबको अधिक सावधान रहना पड़ता था। प्रो0 सिंह ने बताया कि पूर्व सरसंघचालक देश में चिकित्सा और अभियांत्रिकी की शिक्षा को भी हिन्दी माध्यम से करवाना चाहते थे। पूर्व में क्षेत्र कार्यवाह रामकुमार ने श्री सुदर्शन के जीवन परिचय पर प्रकाश डाला। श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता करते हुए सच्चा बाबा अरैल के महन्त गोपालजी महाराज ने आशा व्यक्त की कि अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने हेतु श्री सुदर्शन इस धरती पर पुनः किसी न किसी रूप में अवश्य आयेंगे। कार्यक्रम का संचालन विभाग कार्यवाह नागेन्द्र जायसवाल ने किया। कार्यक्रम में भाजपा के वरिष्ठ नेता विनय कटियार, कलराज मिश्र, प्रदेश अध्यक्ष डा0 लक्ष्मी कान्त बाजपेयी, डा0 महेन्द्र सिंह, प्रदेश के पूर्वमंत्री डा0 नरेन्द्र सिंह गौर, जय प्रकाश, डा0 यज्ञ दत्त शर्मा, उदयभान करवरिया, योगेश शुक्ला, प्रांत संघचालक विश्वनाथ लाल निगम, गोरक्ष प्रांत संघचालक डा0 उदय प्रताप सिंह, अवध प्रांत संघचालक प्रभुचंद्र श्रीवास्तव, उ0प्र0 लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 केबी पाण्डेय, क्षेत्र प्रचारक शिव नारायण, काशी प्रांत प्रचारक अभय कुमार, गोरक्ष प्रांत प्रचारक अनिल, सह प्रान्त प्रचारक राजेन्द्र, अवध प्रांत प्रचारक संजय, विभाग प्रचारक मनोज, कानपुर प्रान्त कार्यवाह काशीराम, विहिप के प्रान्त संगठन मंत्री मनोज कुमार, भारतीय मजदूर संघ के अनुपम कुमार, प्रो0 गिरीश चन्द्र त्रिपाठी, श्री चिन्तामणी सिंह, अम्बरीश, रामानन्दाचार्य, विनोद प्रकाश श्रीवास्तव, विभाग संघचालक राम शिरोमणि, ओमप्रकाश, दिनेश कुमार, अशोक मेहता सहित हजारों की संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे। गौरतलब है कि पूर्व सरसंघचालक श्री सुदर्शन का विगत 15 सितम्बर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निधन हो गया था। उनका अंतिम संस्कार 16 सितम्बर को संघ के मुख्यालय नागपुर में सम्पन्न हुआ। बुधवार शाम को उनका अस्थि कलश संगम में प्रवाहित करने हेतु इलाहाबाद लाया गया था।






इलाहाबाद 27 सितम्बर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुपहल्ली सीतारमैय्या सुदर्शन की अस्थियां गुरूवार को वैदिक मंत्रों के साथ गंगा-यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के पवित्र त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दी गयी। इस अवसर पर संघ परिवार से जुड़े पूरे राज्य के वरिष्ठ पदाधिकारी एवं भाजपा नेता भारी संख्या में संगम तट पर मौजूद रहे। 
अस्थियों को विसर्जित करने के लिए संगम स्थल पर बांस और तख्त का एक विशेष मंच बनाया गया था जहां संघ मुख्यालय नागपुर के प्रचारक सुनील नियाड़े व संघ के अन्य पदाधिकारी स्टीमर से अस्थि कलश लेकर पहुंचे। संगम में अस्थियों को प्रवाहित करने से पहले वैदिक विद्वानों एवं आचार्यों द्वारा आवश्यक पूजन की प्रक्रिया भी पूरी की गयी। 
इससे पहले पूर्व सरसंघचालक का अस्थि कलश ज्वाला देवी इण्टर कालेज से संगम तक एक सजे हुए विशेष वाहन से लाया गया। साथ में हजारों की संख्या में संघ परिवार के स्वयंसेवक और भारतीय जनता पार्टी के नेता व कार्यकर्ता अस्थि कलश के साथ चल रहे थे। 
श्री सुदर्शन का अस्थि कलश बुधवार शाम को नागपुर से सुनील नियाड़े लेकर यहां पहुंचे। अस्थि कलश को रात भर के लिए संघ के सिविल लाइंस कार्यालय पर रखा गया था। गुरूवार को प्रातः सात बजे ज्वाला देवी इण्टर कालेज में अस्थि कलश को लोगों के दर्शन एवं श्रद्धांजलि के लिए रखा गया था। 
स्वावलम्बन के पक्के पक्षधर थे सुदर्शन-डा.जोशी
इलाहाबाद 27 सितम्बर (हि.स.)। भाजपा के वरिष्ठ नेता डा0 मुरली मनोहर जोशी का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुपहल्ली सीतारमैय्या सुदर्शन स्वावलम्बन के पक्के पक्षधर थे। वह व्यक्ति, समाज और देश में स्वावलम्बन की स्थिति कैसे आए इसके लिए भी सतत् चिन्तनशील रहते थे। आवश्यकता पड़ने पर लोगों का मार्गदर्शन भी करते थे। 

श्रद्धांजलि देते डा0 मुरली मनोहर जोशी
डा0 जोशी गुरूवार को नगर के ज्वाला देवी इण्टर काॅलेज प्रांगण में केएस सुदर्शन की श्रद्धाजंलि सभा में बोल रहे थे। डा0 जोशी ने कहा कि पूर्व सरसंघचालक चाहते थे कि देश की अपनी भाषा और अपना विज्ञान हो। वह विज्ञान के अतिरिक्त कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग और ऊर्जा सभी क्षेत्र में देश को स्वावलम्बी देखना चाहते थे। वैकल्पिक ऊर्जा के वे प्रबल पक्षधर थे।
पूर्व सरसंघचालक से अपने निकटतम संबंधों की चर्चा करते हुए देश के पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डा0 जोशी ने बताया कि जब वे केन्द्र में मंत्री थे श्री सुदर्शन उन्हें अक्सर शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुझाव देते रहते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गरिमामयी सरसंघचालक पद से हटने के बाद भी उनका कृषि के प्रति अटूट प्रेम नहीं हटा और वे भोपाल प्रवास के दौरान अपने छोटे से आवास के छत पर भी जैविक खेती का प्रयोग करते थे और यदि उनके पास कोई कृषि वैज्ञानिक पहुंचता था तो उसे वह उस खेती को दिखाकर यह कहना भी नहीं भूलते थे कि हमारे देश के किसान इस तरह की खेती करके भारतवर्ष को स्वावलम्बी बना सकते हैं। 
डा0 जोशी ने बताया कि श्री सुदर्शन अद्भुत राष्ट्रप्रेमी थे। शायद इसीलिए वे देश में हिन्दू और मुस्लिम समन्वय के प्रति सतत् चिन्तनशील रहे। साथ ही देश के सारे समाज को हिन्दुत्व की धारा से जोड़े रखना और उसके लिए सदैव प्रयत्नशील रखना श्री सुदर्शन के व्यक्तित्व का अनूठा लक्षण था।
उ0प्र0 के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने उक्त अवसर पर कहा कि लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग का सहारा लेते हैं लेकिन श्री सुदर्शन के अन्दर इन तीनों का सम्मिश्रण विद्यमान था। यद्यपि उनके अन्दर कर्मयोग ज्यादा प्रधान था। श्री सिंह ने बताया कि पूर्व सरसंघचालक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विषयों पर जो भी चिन्तन प्रस्तुत करते थे वह सदैव मौलिक हुआ करता था। भारत की चुनाव प्रणाली भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हो, इसके वह प्रबल पक्षधर रहे। साथ ही श्री सुदर्शन अपने विचारों को बेबाक रूप से प्रस्तुत करते थे। 
संघ के क्षेत्र संघचालक ईश्वर चंद्र गुप्त एवं सह क्षेत्र संघचालक प्रो. देवेन्द्र प्रताप सिंह ने श्री सुदर्शन के साथ कार्य करने का अनुभव बांटा और बताया कि हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था। इसीलिए उनके सामने बात करते वक्त हम सबको अधिक सावधान रहना पड़ता था। प्रो0 सिंह ने बताया कि पूर्व सरसंघचालक देश में चिकित्सा और अभियांत्रिकी की शिक्षा को भी हिन्दी माध्यम से करवाना चाहते थे। 
पूर्व में क्षेत्र कार्यवाह रामकुमार ने श्री सुदर्शन के जीवन परिचय पर प्रकाश डाला। श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता करते हुए सच्चा बाबा अरैल के महन्त गोपालजी महाराज ने आशा व्यक्त की कि अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने हेतु श्री सुदर्शन इस धरती पर पुनः किसी न किसी रूप में अवश्य आयेंगे। कार्यक्रम का संचालन विभाग कार्यवाह नागेन्द्र जायसवाल ने किया। 
कार्यक्रम में भाजपा के वरिष्ठ नेता विनय कटियार, कलराज मिश्र, प्रदेश अध्यक्ष डा0 लक्ष्मी कान्त बाजपेयी, डा0 महेन्द्र सिंह, प्रदेश के पूर्वमंत्री डा0 नरेन्द्र सिंह गौर, जय प्रकाश, डा0 यज्ञ दत्त शर्मा, उदयभान करवरिया, योगेश शुक्ला, प्रांत संघचालक विश्वनाथ लाल निगम, गोरक्ष प्रांत संघचालक डा0 उदय प्रताप सिंह, अवध प्रांत संघचालक प्रभुचंद्र श्रीवास्तव, उ0प्र0 लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 केबी पाण्डेय, क्षेत्र प्रचारक शिव नारायण, काशी प्रांत प्रचारक अभय कुमार, गोरक्ष प्रांत प्रचारक अनिल, सह प्रान्त प्रचारक राजेन्द्र, अवध प्रांत प्रचारक संजय, विभाग प्रचारक मनोज, कानपुर प्रान्त कार्यवाह काशीराम, विहिप के प्रान्त संगठन मंत्री मनोज कुमार, भारतीय मजदूर संघ के अनुपम कुमार, प्रो0 गिरीश चन्द्र त्रिपाठी, श्री चिन्तामणी सिंह, अम्बरीश, रामानन्दाचार्य, विनोद प्रकाश श्रीवास्तव, विभाग संघचालक राम शिरोमणि, ओमप्रकाश, दिनेश कुमार, अशोक मेहता सहित हजारों की संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे।
गौरतलब है कि पूर्व सरसंघचालक श्री सुदर्शन का विगत 15 सितम्बर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निधन हो गया था। उनका अंतिम संस्कार 16 सितम्बर को संघ के मुख्यालय नागपुर में सम्पन्न हुआ। बुधवार शाम को उनका अस्थि कलश संगम में प्रवाहित करने हेतु इलाहाबाद लाया गया था।