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Thursday, June 16, 2022

आतंकियों और पत्थरबाजो की चुनौती का सामना कर रहा है देश - रामकुमार वर्मा

प्रयागराज। देश एक बार फिर से आंतरिक एवं बाह्य चुनौतियों का सामना कर रहा है। आजादी से पहले जिस तरह की चुनौती थी लगभग वैसी ही चुनौतियां इस समय भी है। भारत के दुबारा बटवारे का सपना देखने वाली ताकतो को पोषित करने वाले इस देश के भीतर छुपे हुये हैं। समय रहते  इनको पहचानने की जरूरत है। कुछ राजनीतिक दल इनको खुला प्रश्रय दे रहे है। आतंकियों और पत्थरबाजो की चुनौती का भी देश सामना कर रहा है। उक्त उद्गार बुधवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह क्षेत्र संघचालक रामकुमार वर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किया। वह नैनी स्थित माधव ज्ञान केन्द्र इंटर कॉलेज मे चल रहे 20 दिवसीय संघ शिक्षावर्ग-प्रथम वर्ष (सामान्य) के समापन समारोह मे प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित कर रहे थे।

    उन्होंने  आह्वान किया कि राष्ट्रहित में उठाए जा रहे कदमों का विरोध करने वाली तथा दंगा कराने वाली ताकतों को पहचानकर उन्हें रद्दी की टोकरी में फेकने का काम करें| देश को अस्थिर करने वाली शक्तियां अपना खेल जम कर खेल रही है। देश वैचारिक चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। शहरी नक्सली बड़े ही सुनियोजित ढंग से राष्ट्रीयता और यहां की प्राचीन संस्कृति के बारे में भ्रम फैला रहे हैं। चिरंतन काल से यहां एक संस्कृति की अजस्र धारा प्रवाहित हो रही है जिसे भारतीय संस्कृति या हिंदू संस्कृति के नाम से पूरी दुनिया जानती है। यह संस्कृति अरबो वर्ष पुरानी है। यही संस्कृति पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधे हुए है। इस संस्कृति की धारा में  बंधे हुए लोग देश के तीर्थ, महापुरुषों के प्रति समान रूप से श्रद्धा रखते है तथा भारत माता को अपनी माता मानते है। देश में अलग-अलग समूह के रूप में रहने वाले लोगों की उपासना पद्धति  भले ही अलग हो सकती है किंतु  सभी के पुरखे तो एक ही है। सब के पूर्वज हिंदू है। हिंदू राष्ट्रीयता का बोधक है।

      उन्होंने अनेकता में एकता के भाव को दर्शाते हुए कहा कि इस देश से हज करने के लिए जाने वाले मुसलमानों को भी हिंदुस्तानी मुसलमान कहा जाता है। स्वामी विवेकानंद को भी हिंदू सन्यासी कहकर पुकारा गया। यह समय की मांग है कि हर तरह का अहंकार भूलकर सामाजिक समरसता से देश को मजबूत बनाएं। लार्ड मैकाले की शिक्षा को छोड़कर स्वावलंबी एवं देशभक्त बनाने वाली शिक्षा ग्रहण करें। संपूर्ण मानव कल्याण के लिए हिंदुत्व को बढ़ाएं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत अखंड होकर रहेगा महर्षि अरविंद का संकल्प पूरा होगा।

      समारोह के अध्यक्ष रज्जू भैया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.अखिलेश सिंह ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे यहां प्राप्त प्रशिक्षण का लाभ समाज को पहुंचाए। समाज को भी संगठित और अनुशासित करें। असली ताकत नेतृत्व में नहीं उन लोगों के पास होती है जिनका वह नेतृत्व करता है। इस सच्चाई को कभी भी न भूले। संघ में सेवा अनुशासन एवं समर्पण का गजब का भाव है, देश इसी से आगे बढ़ेगा। अपने प्रशिक्षण का उपयोग बेहतर मानव बनाने हेतु करें।

      मुख्य वक्ता एवं अध्यक्ष के उद्बोधन के पूर्व गणवेशधारी प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ने घोष की धुन के साथ समता, दंड, दंड युद्ध, पदविन्यास, नियुद्ध, व्यायाम, योग आदि का सामूहिक प्रदर्शन किया जो अत्यंत उत्साहित करने वाला था| मंच पर प्रांत संघचालक डॉ विश्वनाथ लाल निगम, वर्ग अधिकारी रमेश प्रमुख रूप से उपस्थित थे‌।

      समारोह में अखिल भारतीय गौ सेवा प्रमुख अजीत प्रसाद महापात्र, क्षेत्र प्रचारक अनिल जी, क्षेत्र प्रचारक प्रमुख राजेंद्र जी, सह प्रांत संघचालक अंगराज जी, प्रांत प्रचारक रमेश जी, सह प्रांत प्रचारक मुनीश जी, प्रांत प्रचारक प्रमुख रामचंद्र जी, प्रांत कार्यवाह मुरली पाल, सह प्रांत कार्यवाहद्वय राकेश जी एवं राज बिहारी लाल, विभाग प्रचारक डॉ पीयूष जी, प्रांत बौद्धिक प्रमुख सत्यपाल जी प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ.मुरार जी, विभाग प्रचार प्रमुख वसु जी, चारु मित्र जी उपस्थित रहें। वर्ग कार्यवाह हरीश जी ने इस अवसर पर बताया कि वर्ग में तीन विभागों के सारे जिलों की लगभग 300 प्रशिक्षणार्थियों ने प्रशिक्षण  प्राप्त किया। इनमें छात्र, कृषक, वक्ता, शिक्षक, व्यवसाई तथा पूर्ण कालिक कार्यकर्ता सम्मिलित रहें।








Wednesday, June 15, 2022

शिवाजी महाराज ने सनातन भारत की हताश भूमि को एक नई ऊर्जा प्रदान की - प्रो. राकेश उपाध्याय

प्रयागराज। मुगलिया सल्तनत की तानाशाही और अत्याचारों से जब पूरा देश कराह रहा था, उस समय हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करके छत्रपति शिवाजी महाराज ने सनातन भारत की हताश भूमि को एक नई ऊर्जा प्रदान की। सर्वपंथ समादर हिंदवी स्वराज्य का मूल आदर्श था। यह विचार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. राकेश उपाध्याय ने माधव ज्ञान केंद्र इंटर कॉलेज मे व्यक्त किया। वे हिंदू साम्राज्य स्थापना उत्सव को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे।

प्रो. उपाध्याय ने आगे कहा कि शिवाजी महाराज ने किसानों, महिलाओं तथा वंचितों को उनका अधिकार प्रदान कर प्राचीन भारत के राम राज्य के आदर्श को पुन: प्रतिष्ठित किया। उन्होंने जागीरदारी प्रथा समाप्त की तथा किसानों को उनकी भूमि का अधिकार दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने सत्ता का विकेंद्रीकरण किया तथा लोगों को अत्याचार धर्मांतरण से पूरी तरह मुक्ति दिलाई। उन्होंने सांस्कृतिक गुलामी के चिन्ह को मिटाया तथा जबरन धर्मांतरित लोगों की घर वापसी का मार्ग प्रशस्त किया। देश में पहली बार शिवाजी ने नौसेना बनाई तथा देश धर्म की प्रतिष्ठा एवं सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा की। शिवाजी ने सबको अन्न, वस्त्र तथा न्याय सुलभ कराया। विदेशी शक्तियों के अत्याचार के खिलाफ पहली बार वे सीना तान कर खड़े हुए और समाज के अति साधारण लोगों को साथ लेकर हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज की राजनीति को शिवाजी से प्रेरणा लेनी चाहिए। शिवाजी के जीवन के संबंध में विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने आगे कहा कि अपनी मां वीरमाता जीजाबाई और समर्थ गुरु रामदास को दिए वचन का उन्होंने पालन किया। शिवाजी के महान योगदान को देखते हुए ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र से शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक दिवस को उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने छह उत्सव में इस उत्सव को महत्वपूर्ण स्थान दिया। कहा कि प्राणों की बाजी लगाकर शिवाजी ने भारतीय राजनीति को नई राह दिखाई। समारोह में मंच पर प्रांत संघचालक डॉ.विश्वनाथ लाल निगम के अतिरिक्त वर्ग अधिकारी रमेश जी उपस्थित रहें|

इस अवसर पर वर्ग कार्यवाह हरीश जी, विभाग प्रचारक डॉ.पीयूष जी, प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ. मुरारजी त्रिपाठी, सह विभाग कार्यवाह घनश्याम जी, राकेश सेंगर आदि की उपस्थिति रही।

दूसरी ओर प्रयाग उत्तर तथा दक्षिण के सभी नगरों में हिंदू साम्राज्य दिवस पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। प्रयाग उत्तर में चंद्रशेखर नगर में गंगा दत्त जोशी, ब्रह्मचारी नगर में संतोष जी, शिव प्रकाश जी ब्रह्म शंकर एवं लालता प्रसाद आदि वक्ताओं ने अलग-अलग स्थानों पर आयोजित उत्सव को संबोधित किया।

Tuesday, June 14, 2022

वैदिक मंत्रोच्चार के साथ बाबा योगेन्द्र की अस्थि त्रिवेणी संगम में विसर्जित, दी गयी श्रद्धांजलि

 

प्रयागराज। संस्कार भारती के संस्थापक एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक पद्मश्री बाबा योगेंद्र का मंगलवार को त्रिवेणी संगम में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अस्थि विसर्जन किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक अनिल जी तथा संस्कार भारती के संगठन मंत्री दीपक जी ने संगम तट पर बड़ी संख्या में उपस्थित विचार परिवार के कार्यकर्ताओं की उपस्थिति के बीच कला एवं संस्कृति के इस महान साधक, राष्ट्रव्रती प्रचारक के अस्थि कलश को संगम के पवित्र जल में विसर्जित किया गया।

    तीर्थ पुरोहित प्रदीप पांडे ने मध्य संगम में नौका पर शास्त्रोक्त विधि विधान से गंगा पूजन, अस्थि अभिषेक तथा पिंडदान कराया जिसे संगठन मंत्री दीपक जी एवं क्षेत्र प्रचारक अनिल जी ने पूर्ण किया। इसके पश्चात तीर्थ पुरोहित को अन्न दान, वस्त्र दान तथा दक्षिणा आदि समर्पित की गई। बीती रात लखनऊ से बाबा की अस्थि कलश यात्रा सिविल लाइंस स्थित संघ कार्यालय पहुंची।

बाबा योगेन्द्र को दी गयी श्रद्धांजलि

    मंगलवार को प्रातः ज्वाला देवी इंटर कॉलेज सभागार में एक शोक सभा आयोजित की गई। इसमें क्षेत्र प्रचारक अनिल जी, अखिल भारतीय गौ सेवा प्रमुख अजीत प्रसाद महापात्र, क्षेत्र प्रचारक प्रमुख राजेंद्र जी, प्रांत संघचालक डॉ विश्वनाथ लाल निगम, प्रांत प्रचारक रमेश जी, प्रांत कार्यवाह मुरली पाल जी, संस्कार भारती के जिलाध्यक्ष योगेंद्र जी, महामंत्री ज्योति मिश्रा विभाग, प्रचारक डॉक्टर पीयूष, सीताराम जी, प्रदीप भटनागर, रविंद्र कुशवाहा, आशुतोष आदि ने श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उन्हें कला एवं संस्कृति का महान साधक बताया। शोक सभा के पश्चात अस्थि कलश यात्रा विचार परिवार कार्यकर्ताओं की उपस्थिति के साथ संगम तट के लिए प्रस्थान हुई और वहां वैदिक विधि विधान से अस्थि कलश को विसर्जित किया गया।

ललित कला अकादमी के क्षेत्रीय सचिव डॉक्टर देवेंद्र त्रिपाठी ने बताया कि बाबा की एक अस्थि कलश यात्रा 18 से को लखनऊ से हरिद्वार के लिए प्रस्थान करेगी। इसके पूर्व 11 को लखनऊ से एक यात्रा बस्ती के लिए गई| सरयू में उनका अस्थि कलश प्रवाहित किया गया।

 

हिंदू समाज ने अपनी शक्ति में बिखराव के कारण अपना लंबा समय संघर्षों में बिताया - डा.वीरेंद्र जी

 

चुनार (मीरजापुर)। अकबर का साथ देने वाले मानसिंह, पोरस का साथ देने वाला आंभी, शिवाजी के विरुद्ध मिर्जा राजा जयसिंह जैसे व्यक्ति हमारे ही समाज के थे जिनके कारण हम एक साथ एक दिशा में उठना, चलना भूल गए। हिंदू समाज अपनी इन्हीं शक्ति में बिखराव के कारण लंबा समय संघर्षों में बिताया। उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र कार्यवाह डॉ वीरेंद्र जायसवाल ने व्यक्त किया। वे स्थानीय रामबाग में संघ शिक्षा वर्ग प्रथम वर्ष (सामान्य) के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने आगे कहा कि अपना लक्ष्य राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने का है। इसी समाज के संगठन के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। हिंदू समाज में पूज्यनीय राम और कृष्ण परम शक्तिशाली होते हुए भी वनवासी गिरीवासी अथवा अर्जुन रूपी समाज को अपना संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान के क्षेत्र में भी भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र रहा है। हमारी परंपरा में मंगल को भुमि का पुत्र कहा गया है। मंगल भूमि के पुत्र है तो धरती के सारे गुण मंगल में होंगे। यह तथ्य हजारों वर्ष पहले सिद्ध किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि मृत्यु पर हमने अष्टांग योग के समाधि द्वारा विजय प्राप्त की है। आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र रसायन सभी ने भारत हजारों वर्षों से विश्व का सिरमौर रहा है। 250 वर्ष पूर्व तक भारत का विश्व व्यापार में योगदान 30% तक था। आज हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव होने के उपलक्ष्य में डॉ वीरेंद्र जायसवाल जी ने शिवाजी का वर्णन करते हुए बताया कि भारतीय संस्कार से भरा हुआ बालक मात्र 14 वर्ष की अवस्था में 20 साथियों के साथ एक किले को जीत जाता है। कम संख्या में भी शत्रु का सामना करने के लिए छापामार युद्ध नीति का नवीन प्रयोग किया। अंग्रेजो के कालखंड में नई शिक्षा पद्धति लाई गई जिससे हम धीरे-धीरे मानसिक रूप से पराजित हो गए। इस देश को चरवाहों और सपेरों का देश बताया गया। संघ के संस्थापक परम पूजनीय डॉ. केशव राम हेडगेवार के विचार में आया कि समाज में जो बिखराव है उससे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी राष्ट्र विखंडित हो जाएगा। राष्ट्र को एक साथ लाने के लिए शाखा प्रारंभ किया गया जिसका एकमात्र कार्य व्यक्ति में संस्कार का निर्माण करना है। अध्यक्षता करते हुए सेवानिवृत्त मेजर कृपाशंकर सिंह जी ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र मे काफी पतन हुआ है। संघ के संगठन संस्कृत भारती द्वारा आजकल संस्कृत को वरीयता दी जा रही है, जो स्वागत योग्य कदम है। कार्यक्रम के प्रारंभ में ध्वजारोहण किया गया तत्पश्चात घोष के माध्यम से "ॐ नमोस्तुते ध्वजाय, सकल भुवन जन हिताय, विभव सहित विमल चरित, बोधकाय मंगलाय ते सततम" मंत्र से ध्वज की मान वंदना की गई। स्वयंसेवकों द्वारा किया गया  शारीरिक प्रशिक्षण का प्रदर्शन उपस्थितजनों के आकर्षण का केन्द्र रहा जिसमें दण्ड, पदविन्यास, दंडयुद्ध, नियुद्ध, घोष, सामूहिक समता, दण्ड व्यायाम योग, व्यायाम योग एवं आसन सम्मिलित रहा। इस दौरान मंचासीन काशी प्रांत के मा. सहप्रांत संघचालक अंगराज जी, मा. वर्गाधिकारी सच्चिदानंद जी रहें।

कार्यक्रम में पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक प्रमुख राजेंद्र जी, क्षेत्र ग्राम विकास प्रमुख चंद्र मोहन जी, काशी प्रांत प्रचारक रमेश जी, सह प्रांत प्रचारक मुनीष जी, प्रांत कार्यवाह मुरली पाल जी, प्रांत प्रचारक प्रमुख रामचंद्र जी, सह प्रांत कार्यवाह डॉ राकेश जी, प्रांत शारीरिक शिक्षण प्रमुख राजन जी, सह प्रांत शारीरिक शिक्षण प्रमुख राकेश अग्रहरी जी आदि बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहें। धन्यवाद ज्ञापन गौतम जी एवं वृत्त निवेदन वर्ग कार्यवाह कुलदीप जी ने दिया।




























Monday, June 13, 2022

काशी में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया हिंदू साम्राज्य स्थापना उत्सव

 

काशी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छह उत्सवों में से एक हिंदू साम्राज्य स्थापना उत्सव (ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी) का आयोजन रविवार को काशी में विभिन्न स्थानों पर किया गया। सभी नगरों में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने हिन्दू साम्राज्य दिवस के महत्व के साथ वीर शिवाजी के व्यक्तित्व एवं आज के दिन हुए उनके राज्याभिषेक पर प्रकाश डाला। इस दौरान पूर्ण गणवेश में स्वयंसेवकों ने कार्यक्रम में अपना योगदान दिया।

काशी दक्षिण भाग के केशव नगर स्थित औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान करौंदी के प्रांगण में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रो. समीर कुमार सिंह एवं अध्यक्षता कर रहे प्रो. सदाशिव द्विवेदी ने कहा कि सुराज्य और सुशासन की विरासत छत्रपति शिवाजी महाराज ने हमको दी है, उस विरासत को अब हमको अपने राष्ट्र जीवन में लाना पड़ेगा। अपना सेनादल स्वयं पूर्ण रहे, इस पर छत्रपति शिवाजी महाराज काफी ध्यान दिया करते थे। काशी के लोगो के लिए ये गर्व का विषय है कि शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक करने का सौभाग्य काशीवासियों को मिला था। कामाख्यानगर की विनायका शाखा द्वारा क्रान्तिपल्ली कालोनी के पार्क में आयोजित कार्यक्रम में वक्ताद्वय प्रो. राधेश्याम दूबे एवं प्रो. सुनील कुमार विश्वकर्मा ने हिंदू समाज को संगठित करने, सामंजस्य बनाने और अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक रहने के लिए कई उदाहरणों और कथानकों के माध्यम से स्वयंसेवकों को समझाने का प्रयास किया। अध्यक्षता गया प्रसाद अरोड़ा एवं संचालन संजय कुशवाह ने किया। सरस्वती शाखा पर नगर संघचालक विजय जायसवाल ने शिवा जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। विश्वकर्मा नगर में आयोजित कार्यक्रम में स्वयंसेवकों ने डा.हेडगेवार, श्रीगुरू जी एवं वीर शिवाजी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर हिन्दू साम्राज्य उत्सव मनाया। शंकुलधारा शाखा पर आयोजित कार्यक्रम में शाखा कार्यवाह मनोज कुमार ने विषय रखा। अध्यक्षता डा. वी वी मिश्र ने किया। केदारेश्वर नगर में डा. ओ.पी. शर्मा एवं डा. विश्वनाथ दूबे ने अपना विचार रखा। इसके अतिरिक्त भाग के रविदास नगर, माधव नगर, कबीर नगर समेत अन्य नगरों में कार्यक्रम आयोजित किए गए।

काशी उत्तर भाग के समस्त नगरों में आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने अपने विचार रखें। केशव शाखा पर डॉ.के.के. सिंह ने छत्रपति शिवाजी महाराज व माता जीजाबाई के जीवन काल घटना का वर्णन किया| चेतसिंह नगर में  पूर्व महानगर कार्यवाह व वरिष्ठ स्वयंसेवक मुरली जी ने शिवाजी के मूर्ति पे पुष्पार्चन किया उन्होंने हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव का महत्व व 1674 ईसवी  से 1818 ईसवी तक के काल खंड की शौर्य गाथा स्वयंसेवको को बताया। लमही स्तिथ प्रेमचन्द्र शाखा पर गोविंद जी ने शिवाजी के जीवन मे भगवान श्रीकृष्ण के आचरण व उनकी महाभारत काल की युद्ध नीति को किस प्रकार शिवाजी ने अपने आचरण में समाहित किया व प्रभु श्रीराम के रामराज को प्रतिरूप बनाकर शिवा जी अपने शासन की व्यवस्था कैसे बनाई, इस विषय चर्चा किया| साथ ही भाग के अन्य क्षेत्रों में भी शाखाओं पर विचार परिवारिक कार्यकर्ताओं के द्वारा अनेक कार्यक्रम आयोजित किये गए|

Saturday, June 11, 2022

पद्मश्री योगेन्द्र जी – अहर्निष साधनारत कर्मयोगी


जनवरी माह की कपकपाती ठंड. वर्ष 1924 उत्तर प्रदेश का बस्ती शहर प्लेग की चपेट में था. एक के बाद एक लोग शहर खाली करके जाने लगे. लेकिन शहर के प्रसिद्ध मुख्तार (वकील) बाबू विजय बहादुर श्रीवास्तव की पत्नी नौ माह का गर्भ लिये कहाँ जाती, उस मरघट होते शहर में आये दिन मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी. ऐसे ही विकट समय में 7 जनवरी को घर के पास बगीचे में बाबू विजय बहादुर की पत्नी ने अपनी तीसरी संतान को जन्म दिया. शिशु का नाम रखा गया योगेन्द्र. बालक योगेन्द्र के तोतले बोलों पर रीझती माँ अचानक कहाँ चली गई, 2 वर्ष का योगेन्द्र कुछ नहीं समझ पाया. फिर उसे पड़ोस के ही एक ब्राह्मण परिवार में बेच दिया गया, इस मान्यता के कारण कि बेच देने से बच्चा दीर्घायु होता है. दस वर्ष तक उसी ब्राह्मण के घर योगेन्द्र का खाना-पीना रहा. माँ की कमी इस बिन माँ के बालक को कभी नहीं खाली, उस ब्राम्हणी ने न केवल माँ यशोदा की भूमिका निभायी, बल्कि खूब लाड-प्यार दिया.

यह शुरुआत थी एक निश्छल कर्मयोगी के कठिन जीवन की. बेहद साधारण सा धोती-कुर्ता, कन्धे पर गमछा और झोला, उसमें एक अदद हाथ से सिली बनियान, एक धोती-एक कुर्ता और मोती जड़े अक्षरों में देशभर के कलाकारों और संस्कार भारती के कार्यकर्ताओं के फोन नम्बर और पते. इस हुलिये में प्रथम दृष्ट्या अति साधारण से दिखने वाले व्यक्ति में इतना असामान्य व्यक्तित्व छिपा हुआ है, अनुमान लगाना ही कठिन था. डगर-डगर स्नेह पुष्प विखेरते इस व्यक्ति का नाम यूँ तो योगेन्द्र था, लेकिन सब उन्हें प्यार और श्रद्धा से ‘बाबा’ ही कहकर पुकारते. इस ‘बाबा’ शब्द में न केवल परिवार के मुखिया होने का भाव छिपा है, बल्कि एक फक्कड़पन भी झलकता, सांसारिक मोहमाया से दूर साधनारत कर्मयोगी. आँखों में और चेहरे पर साधना का तेज साफ झलकता था. कर्मयोगी की साधना अपने पिता के मार्ग दर्शन में शुरु हुई थी. पिता जी कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता तो थे ही, आर्य समाज से भी गहरे जुड़े हुए थे. एक दिन बाबू विजय बहादुर को पता लगा कि बस्ती में कोई शाखा लगती है तो उन्होंने योगेन्द्र से कहा, ‘देख चल वहाँ कबड्डी, कुश्ती वगैरा होती है.’ पिता की बात मान बालक योगेन्द्र वहाँ चला गया और फिर तो जैसे शाखा का ही होकर रह गया. शाखा में ही माधवराव देशमुख से भेंट हुई. सोलह साल की आयु में नाना जी देशमुख से सम्पर्क हुआ, गोरखपुर में उन प्रारम्भिक दिनों की याद करते हुए ‘बाबा’ बताते थे, रोज सुबह-सुबह चार-पाँच बजे नाना जी मुझे जगाने आ जाते थे. जगाने इसलिए ताकि भोर में उठकर पढ़ाई कर रहा हूं या नहीं. उनकी सोच समझ और विचार धारा धीरे-धीरे मेरे भीतर तक बैठने लगी.

1942 में अठारह वर्ष की उम्र में योगेन्द्र पहली बार संघ शिक्षा वर्ग में आए. वर्ग लखनऊ में लगा था. बस यहीं से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्पर्क गहन होता चला गया. नव युवक की कर्मठता और उसके भीतर छिपी राष्ट्रधर्मिता को नाना जी भलीभाँति परख चुके थे. 1945 में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रुप में नेपाल से लगे जिला गोरखपुर के गाँव महाराज गंज भेज दिया गया. न रहने की जगह, न खाने-पीने का ठौर-ठिकाना. ठिकाना न मिला तो सड़क के किनारे एक पान के खोखे के नीचे शरण ली. उसी के पीछे ईंटों का चूल्हा बनाया और पतीले को आज के कुकर की तरह इस्तेमाल करते हुए एक डिब्बे में दाल, एक में चावल चढ़ा देते और निकल जाते संपर्क अभियान में दो-तीन घण्टे में तीन-चार घरों से संपर्क करते और लौटते तो खाना तैयार होता था. भोजन करके फिर संपर्क. सांझ ढलती, फिर रात होती. सभी अपने-अपने घरों में जाते, पान वाला भी खोखा बन्द कर घर चला जाता. तब खोखे के सामने की बेंच होती इस युवा प्रचारक का बिस्तर. कई महीने यूँ ही बेंच पर सोकर बिताये.

1943 में वाराणसी में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में अटल विहारी बजपेयी से मुलाकात हुई. उनकी वाकपटुता और कविताओं से मन प्रभावित होता. खूब अच्छा साथ रहा. वर्ष 2000 में दिल्ली में योगेन्द्र जी के अमृत महोत्सव वर्ष के समापन समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री पद पर आसीन अटल बिहारी वाजपेयी जी के शब्द स्मरण होते हैं, ‘मेरी और योगेन्द्र जी की यात्रा एक साथ शुरु हुई थी.’ आगे राह बदल गई, मैं राजनीति की राह पर चल पड़ा और योगेन्द्र जी समाज की राह पर.

योगेन्द्र जी का पथ बहुत कठिन था, कई बार उनका मन हुआ, सब छोड़-छाड़ वापस घर चलें. तमाम आशा-निराशा के क्षण आने लगे, क्या बवाल पाल लिया. अगले ही क्षण लगा, इस ओखली में सिर तो मैंने खुद ही दिया है और फिर जुट गए अपनी पूरी ताकत के साथ.

योगेन्द्र जी अपने मार्गदर्शक नाना जी देशमुख को कैसे भूल सकते थे. जब तेज बुखार में तपते योगेन्द्र को अपने कन्धे पर लेकर डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर देवरिया के पडरौना स्टेशन पहुंचे थे नाना जी.

राष्ट्र सेवार्थ पूरा जीवन समर्पित करने वाले योगेन्द्र जी प्रचारक के रुप में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, प्रयाग, बरेली, बदायूँ, सीतापुर आदि जिलों में संघ कार्य के प्रसार में जुटे. लेकिन रचनाधर्मी कलाकार उनके भीतर कुलबुलाता रहा. भीतर से कुलबुलाहट पहली बार भारत-विभाजन के समय सामने आई. उसके लिए यह विभाजन मात्र भूखंड का नहीं-प्रिय मात्र भूमि का था. नाना जी के मार्गदर्शन में संवेदनशील योगेन्द्र ने विभाजन से सम्बन्धित चित्र एकत्रित किये और एक छोटी-सी प्रदर्शनी आयोजित की. जिसने भी यह प्रदर्शनी देखी भाव विहृवल हो उठा.

फिर तो ऐसे चित्र-प्रदर्शनियों का सिलसिला चल निकला. देशभक्ति भाव केन्द्रित इन प्रदर्शनियों ने जनमानस को उद्वेलित कर राष्ट्रभाव से भर दिया. शिवाजी, धर्म गंगा, जनता की पुकार, शीर्शक से कई प्रदर्शनियाँ आयोजित कीं. ऐसी ही एक प्रदर्शनी ‘इंडियाज कंट्रीब्यूशन टु द वर्ल्ड थॉट को, पद्मश्री हभिाऊ वाकणकर अमरीका ले गये. उसके बाद जलता हुआ कश्मीर, ‘संकट में गोमता’, ‘1857 की स्वाधीनता संग्राम की अमर गाथा’, ‘विदेशी षड्यंत्र’, ‘माँ की पुकार’ आदि प्रदर्शनियों ने देशभर में संवेदनशील मनों को झकझोर कर जगा दिया.

1981 में योगेन्द्र जी के प्रयोगों को नया आयाम मिला. लखनऊ में मकर संक्रांति (11 जनवरी, 1981) को कुछ कलाकारों को साथ लेकर एक नया प्रयोग आरम्भ किया – इसका नाम था – संस्कार भारती. भाउराव देवरस, माधवराव देवले, हरिभाऊ वाकणकर जैसे अधिकारियों की छत्रछाया में कलाकारों का यह नवजात संगठन पल्लवित, पुष्पित होने लगा. एक दशक के भीतर ही योगेन्द्र जी के अथक प्रयासों से संस्कार भारती देश व्यापी बन गई. कलासाधकों को अपने से जोड़ते चलने वाला यह योगी गाँव- गाँव, नगर-नगर, शहर-शहर कलाकार तलाशने लगा, उन्हें प्रेरित-प्रोत्साहित करने लगा. कितने ही उदीयमान कलाकारों को संस्कार भारती ने मंच दिया. ‘हीरों की परख जौहरी ही कर सकता है और जौहरी की पारखी नजरें योगेन्द्र जी के पास थीं.’ देशभर में संस्कारों का अलाव जगाने वाली संस्कार भारती आज विश्वव्यापी संगठन है. संस्कार भारती रुपी इस शरीर के आँख व कान, हाथ-पैर चाहे कोई हों, किन्तु आला हैं योगेन्द्र जी, सबके ‘बाबा’. वह आत्मा जिसके लिए गीता में कहा गया है अजर है, अमर है और सर्वव्यापी है. बाबा सशरीर किसी कार्यक्रम में भले ही मौजूद हों या न हों, उनकी उपस्थिति हर कार्यकर्ता महसूस करता, उसके कानों में गूँजते शब्द – हों मइया, ‘तो ताई-हाँ दीदी बोल’, देवी बता क्या बात है.

ऐसे ही थे अहर्निष साधनारत कर्मयोगी – फक्कड़ ‘बाबा’.