WELCOME

VSK KASHI
63 MADHAV MARKET
LANKA VARANASI
(U.P.)

Total Pageviews

Saturday, June 25, 2022

आपातकाल, पुलिसिया कहर और संघ – संघर्ष की भूमिगत सञ्चालन व्यवस्था

- नरेन्द्र सहगल

प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी द्वारा 25 जून, 1975 को समूचे देश में थोपा गया आपातकाल एक तरफा सरकारी अत्याचारों  का पर्याय बन गया. इस सत्ता प्रायोजित आतंक को समाप्त करने के लिए संघ द्वारा संचालित सफल भूमिगत आन्दोलन इतिहास का एक महत्वपूर्ण पृष्ठ बन गया. सत्ता के इशारे पर बेकसूर जनता पर जुल्म ढा रही पुलिस की नजरों से बचकर भूमिगत आन्दोलन का सञ्चालन करना कितना कठिन हुआ होगाइसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

भूमिगत प्रेस

सरकार ने प्रेस की आजादी का गला घोंटकर आपातकाल से सम्बंधित सभी प्रकार की खबरों पर प्रतिबन्ध लगा दिया. जिन अख़बारों तथा पत्रिकाओं ने आपातकाल की घोषणा का समाचार छापा उन पर तुरन्त ताले जड़ दिए गये. राष्ट्रीय विचार अथवा प्रखर देशभक्त पत्रकारों को घरों से उठाकर जेलों में बंद कर दिया गया. जनता की आवाज पूर्णतया खामोश कर दी गयी. जनसंघर्ष/सत्याग्रह की सूचनाओं और समाचारों को जनता तक पहुँचाने के लिए संघ के कार्यकर्ताओं ने लोकवाणीजनवाणीजनसंघर्ष इत्यादि नामों से भूमिगत पत्र पत्रिकाएं प्रारंभ कीं.

इन पत्र पत्रिकाओं को रात के अँधेरे में छापा जाता था. कहीं-कहीं तो हाथ से लिखकर भी पर्चे बंटे जाते थे. साइक्लो स्टाइल मशीन से छापे गये इन पत्रों को संघ के बाल स्वयंसेवक घर घर बांटने जाते थे. इन्हीं पत्रों में सत्याग्रह की सूचनासंख्यास्थान इत्यादि की जानकारी होती थी. देश भर में छपने और बंटने वाले इन पत्रों ने तानाशाही की जड़ें हिलाकर रख दी.

कई स्थानों पर छापे पड़ेकार्यकर्त्ता पकड़े गयेबाल स्वयंसेवक भी पत्र बांटते हुए गिरफ्तार कर लिए गये. देश के विभिन्न स्थानों पर 500 से ज्यादा बाल स्वयंसेवकों को भी हिरासत में लेकर यातनाएं दी गईं. इन वीभत्स यातनाओं को बर्दाश्त करने वाले इन स्वयंसेवकों ने कहीं भी कोई भी जानकारी पुलिस को नहीं दी. भूमिगत पत्र पत्रिकाओं द्वारा आपातकाल में हो रहे पुलिसिया कहर की जानकारी आम जनता तक पहुंचा दी जाती थी.

जनांदोलन को संचालित करने से सम्बंधित प्रत्येक प्रकार की व्यवस्था के लिए बैठकों का आयोजन होता था. ये बैठकें मंदिरों की छतोंपार्कोंजेल में जा चुके कार्यकर्ताओं के घरोंशमशान घाटों इत्यादि स्थानों पर होती थीं. भूमिगत कार्यकर्ताओं ने अपने नामवेशभूषायहाँ तक की अपनी भाषा भी बदल ली थी. एक रोचक अनुभव ऐसे रहा. एक बैठक स्थान के बाहर कार्यकर्ताओं ने अपने जूते पंक्ति में रख दिए. एक CID वाला समझ गया कि भीतर ‘संघ कार्यकर्ता’ ही होंगे. उसकी सूचना पर सभी गिरफ्तार हो गये. इस घटना के बाद जूते अपने साथ ही रखने की सूचना दी गयी. ये बैठकें ऐसे स्थान पर होती थींजिसके दो रास्ते हों. ताकि विपत्ति के समय दूसरे रास्ते से निकला जा सके. बैठकों में सत्याग्रहियों की सूचीउनके घरों की व्यवस्थाधन इत्यादि का बंदोबस्त और अधिकारियों के गुप्त प्रवास इत्यादि विषयों पर विचार होता था. बैठकों के स्थानों को भी बार बार बदलते रहना पड़ता था.

भूमिगत गुप्तचर विभाग

जनांदोलन के प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ताओं विशेषतया संघ के स्वयंसेवकों की टोह लेने के लिए पुलिस का गुप्तचर विभाग बहुत सक्रिय रहता था. सत्याग्रह से पहले ही गिरफ्तारियां करनागली मोहल्ले वालों से पूछताछ करनाभूमिगत स्वयंसेवकों के ठहरने काउठने-बैठनेखाने इत्यादि के स्थानों की जानकारी लेकर सत्याग्रह को किसी भी प्रकार से विफल करने का प्रयास होता था. अतः सरकारी गुप्तचरों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिय संघ ने भी अपना गुप्तचर विभाग बना लिया. वेश बदलकर पुलिस थानों में जानापुलिस अफसरों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध बनाना और सत्याग्रह के समय पुलिस की तादाद की पूर्ण जानकारी ले ली जाती थी. कई बार तो जानबूझकर सत्याग्रह के स्थान की गलत जानकारी देकर पुलिस को वन्चिका भी दी जाती थी.

संघ के इस गुप्तचर विभाग में ऐसे वृद्ध स्वयंसेवक कार्यरत थे जो शारीरिक दृष्टी से कमजोर होने पर सत्याग्रह नहीं कर सकते थे.

सत्याग्रहियों के परिवारों की देखभाल

पुलिस द्वारा पकडे जाने अथवा सत्याग्रह करके जेलों में जाने वाले अनेक स्वयंसेवकों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. परिवार में एक ही कमाने वाला होने के कारण दाल रोटीबच्चों की फ़ीसमकान का किराया इत्यादि संकट आते थे. संघ की ओर से एक सहायता कोष की स्थापना की गयी. संघ के स्वयंसेवकों ने इस अति महत्वपूर्ण कार्य को संपन्न करने का बीड़ा उठाया. ऐसे परिवार जिनका कमाने वाला सदस्य जेल में चला गयाउस परिवार की सम्मानपूर्वक आर्थिक व्यवस्था कर दी गयी. ऐसे भी परिवार हैंजिनके बच्चों ने स्वयं मेहनत करके पूरे 19 महीने तक घर में पिता की कमी महसूस नहीं होने दी. इधर पुलिस ने ऐसे लोगों को भी पकड़कर जेल में ठूंस दिया जो इन जरूरतमंद परिवारों की मदद करते थे. उल्लेखनीय है कि स्वयंसेवकों ने एक दूसरे की सहायता अपना राष्ट्रीय एवं संगठात्मक कर्तव्य समझकर की.

रामसेवा समिति

संघ पर प्रतिबन्ध लग चुका था. स्वयंसेवक आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे. पुलिसिया कहर अपने चरम सीमा पर था. ऐसे में संगठन के काम में अनेक प्रकार की बाधाएं आना स्वाभाविक ही थीं. शाखाएं लगाना संभव नहीं था. इस संकट से निपटने के लिए ‘राम सेवा समिति’ (आरएसएस) का गठन किया गया. इसी नाम से पार्कोंमंदिरों इत्यादि स्थानों पर योग कक्षाएंवॉलीबालबैडमिन्टन इत्यादि के कार्यक्रम प्रारंभ हो गए अर्थात संगठन और संघर्ष को एक साथ चलाने की नीति पर संघ सफ़ल हुआ. परिणामस्वरूप सरकार झुकी आपातकाल हटाया गया और चुनावों की घोषणा हो गयी.

क्रमशः…

No comments: